श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 991, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/1-9 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो तथा श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥ महाप्रभुका याजपुरमें वराहदेवका दर्शन :- चलिते चलिते आइला याजपुर-ग्राम। वराह-ठाकुर देखि' करिला प्रणाम ॥ 3 ॥ नृत्यगीत कैल प्रेमे, बहुत स्तवन। याजपुरे से रात्रि करिला यापन ॥ 4 ॥ अनुवाद-महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ चलते-चलते याजपुर नामक ग्राममें पहुँचे। वहाँ श्रीवराह भगवान्के विग्रहको देखकर प्रणाम किया। भगवान् वराहदेवके मन्दिरमें महाप्रभुने नृत्य-गीत करते हुए प्रेमसे उनकी बहुत स्तव-स्तुति कीं। उस रात वे याजपुरमें ही रहे॥ 3-4 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'याजपुरग्राम'-यह उड़ीसामें वैतरणी नदीके तटपर स्थित विरजाक्षेत्रमें नाभिगयारूप एक विशेष तीर्थ स्थान है॥ 3 ॥ अनुभाष्य- 'याजपुर'-कटक जिलेका एक उपमण्डल है, उसको 'नाभिगया' कहते हैं। यहाँ पर 'ब्राह्मणनगर' मौहल्लेमें श्रीवराहदेव विराजमान हैं॥ 3 ॥ कटकमें श्रीसाक्षी-गोपालका दर्शन :- कटके आइला साक्षिगोपाल देखिते। गोपाल-सौन्दर्य देखि' हैला आनन्दिते ॥ 5 ॥ प्रेमावेशे नृत्यगीत कैल कतक्षण। आविष्ट हञा कैल गोपाल-स्तवन ॥ 6 ॥ अनुवाद-याजपुरसे महाप्रभु कटकमें आये और वहाँ श्रीसाक्षी-गोपालके दर्शन किये। श्रीसाक्षी-गोपालका सौन्दर्य देखकर उनको बहुत आनन्द हुआ। महाप्रभुने वहाँ प्रेमावेशमें कुछ देर तक नृत्य-गीत किया और फिर आविष्ट होकर उनकी स्तव-स्तुति करने लगे॥ 5-6 ॥ श्रीनित्यानन्दके मुखसे महाप्रभुके द्वारा साक्षिगोपालके वृत्तान्तका श्रवण :- सेइ रात्रि ताँहा रहि' भक्तगण-सङ्गे। गोपालेर पूर्वकथा सुने प्रभु रङ्गे ॥ 7 ॥ अनुवाद-उस रात महाप्रभु भक्तोंके साथ वहीं रहे और उन्होंने बड़े आनन्दसे श्रीसाक्षी-गोपालकी पूर्व कथाका श्रवण किया॥ 7 ॥ पहले तीर्थ-भ्रमण करते श्रीनिताइका श्रवणका सुयोग :- नित्यानन्द-गोसाञि यबे तीर्थ भ्रमिला। साक्षिगोपाल देखिबारे कटक आइला ॥ 8 ॥ साक्षिगोपालेर कथा शुनि' लोकमुखे। सेइ कथा कहेन, प्रभु सुने महासुखे ॥ 9 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु जब तीर्थोंमें भ्रमण कर रहे थे, तब वे श्रीसाक्षी-गोपालका दर्शन करने कटक आये थे। श्रीसाक्षी-गोपालकी जो कथा उन्होंने वहाँके लोगोंके मुखसे सुनी थी, वही कथा अब वे सुनाने लगे और महाप्रभु सुखपूर्वक उसे सुनने लगे॥ 8-9 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'साक्षिगोपाल'-महानदीके तटपर कटक एक प्रधान नगर है; उस समयमें श्रीसाक्षी-गोपाल वहाँ विराजमान थे। श्रीसाक्षी-गोपाल जब दक्षिण भारतसे लाये गये थे, तब पहले वे कुछ दिनोंतक कटकमें रहे, उसके बाद कुछ दिनोंतक वे श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें रहे। वहाँ (उनकी श्रीजगन्नाथदेवसे) किसी प्रकारकी प्रेम कलह होनेपर उड़ीसाके राजाने पुरुषोत्तमसे तीन कोस दूर 'सत्यवादी'-नामक एक गाँवको बसाकर वहीं श्रीसाक्षी-गोपालको रखा। अब उसी गाँवमें एक पक्के मन्दिरमें श्रीसाक्षी-गोपाल विराजमान हैं॥ 8 ॥ 142 ।