भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 990, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 990

पाँचवाँ अध्याय कथासार-महाप्रभु याजपुरसे होते हुए कटक नगरमें पहुँचे। वहाँ वे श्रीसाक्षी-गोपालके दर्शन करने गये और श्रीनित्यानन्द प्रभुके श्रीमुखसे गोपालके प्रसङ्गको श्रवण किया। विद्यानगर-निवासी दो (एक वृद्ध और दूसरा युवा) ब्राह्मण बहुतसे तीर्थोंमें भ्रमण करके श्रीवृन्दावन पहुँचे। वृद्ध ब्राह्मणने युवा ब्राह्मणकी सेवासे सन्तुष्ट होकर उसको अपनी कन्या देनेकी प्रतिज्ञा की। युवा ब्राह्मणने वृद्ध ब्राह्मणको वृन्दावनके श्रीगोपालके सामने यह बात कहलवायी और श्रीगोपालको इसका साक्षी रखा। स्वदेश लौट आनेपर युवा ब्राह्मणने जब विवाहका प्रस्ताव रखा, तब वृद्ध ब्राह्मणने अपने पुत्र-पत्नी आदिके दबावमें आकर कहा, - 'मुझे तो स्मरण नहीं है कि मैंने ऐसी कोई प्रतिज्ञा की थी।' उस वृद्ध ब्राह्मणकी बात सुनकर युवा ब्राह्मण पुनः श्रीगोपालके पास गया और उसने श्रीगोपालको पूरी बात कह सुनाकर अपनी भक्तिके द्वारा उन्हें मजबूर करके दक्षिण देश (विद्यानगर) ले आया। श्रीगोपाल युवा ब्राह्मणके पीछे-पीछे नूपुरकी ध्वनि करते-करते विद्यानगरके निकट पहुँचकर स्थित हो गये। युवा ब्राह्मणने विद्यानगरके सज्जन व्यक्तियोंको, वृद्ध ब्राह्मण और उसके पुत्रको वहाँ लाकर श्रीगोपालकी साक्षी दिलायी। वे सब बहुत चमत्कृत हो गये और उन्होंने वृद्ध ब्राह्मणकी कन्याके साथ युवा ब्राह्मणका विवाह कार्य सम्पन्न किया। विद्यानगरके राजाने श्रीगोपालके लिये भक्तिभावसे मन्दिर आदिका निर्माण करवाया। बहुत दिनोंके बाद उत्कल (उड़ीसा) के राजा पुरुषोत्तमदेवको विद्यानगरके राजाने श्रीजगन्नाथका झाडूदार कहकर अपमान करके अपनी कन्या देनेसे मना किया। राजा पुरुषोत्तमदेवने श्रीजगन्नाथकी सहायतासे उस राजासे युद्ध किया तथा उसको पराजित करके उसकी कन्या और राज्यको ग्रहण किया। उस समयसे वैष्णवराज पुरुषोत्तमदेवकी भक्तिकी डोरसे बँधकर श्रीगोपाल कटकनगरमें आये। इस प्रसङ्गको सुनकर महाप्रभुने महाप्रेमसहित श्रीगोपालका दर्शन किया। कटकसे भुवनेश्वर शिवके दर्शन करके कमलपुरमें भार्गी-नदीके तटपर कपोतेश्वर-शिवके दर्शनके छलसे महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुके हाथमें अपने संन्यासका दण्ड दिया। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस दण्डके तीन टुकड़े करके उसे भार्गी नदीमें फेंक दिया। 'आठारनाला'के पास पहुँचकर जब महाप्रभुको अपना दण्ड नहीं मिला, तब वे अपने साथियोंको छोड़कर अकेले ही श्रीजगन्नाथ मन्दिर गये। -(अमृतप्रवाहभाष्य) भक्तके वशीभूत साक्षीगोपालको प्रणाम :- पद्भ्यां चलन् यः प्रतिमा-स्वरूपो ब्रह्मण्यदेवो हि शताहगम्यम्। देशं ययौ विप्रकृतेऽद्भुतेहं तं साक्षिगोपालमहं नतोऽस्मि ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - जो ब्रह्मण्यदेव प्रतिमास्वरूप होकर भी ब्राह्मणके उपकारके लिये उस स्थानपर पैदल चलते-चलते पहुँचे, जहाँ पहुँचनेमें सौ दिन लग जाते हैं, उन्हीं अद्भुत चेष्टा करनेवाले श्रीसाक्षी-गोपालको मैं प्रणाम करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य - यः (गोपालः) प्रतिमास्वरूपः (अर्च्यश्रितविग्रहः) ब्रह्मण्यदेवः पद्भ्यां चलन् विप्रकृते (ब्राह्मणस्योपकाराय) हि शताहगम्यं (शतदिवस-प्राप्यं) देशं (माथुरमण्डलात् विद्यानगरं) ययौ, अहं तम् अद्भुतेहं (अपूर्वचेष्टासमन्वितं) साक्षिगोपालं नतोऽस्मि (प्रणमामि)। । 141

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