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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 5/21-28 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाकुलीन तुमि-विद्या-धनादि-प्रवीण। आमि अकुलीन आर धन-विद्या-हीन ॥ 22 ॥ कन्यादान-पात्र आमि ना हइ तोमार। कृष्णप्रीतये करि तोमार सेवा-व्यवहार ॥ 23 ॥ ब्राह्मण-सेवाय कृष्णेर प्रीति बड़ हय। ताँहार सन्तोषे भक्ति-सम्पद बाड़य ॥"24 ॥ छोटविप्र बले,-"तोमार स्त्री-पुत्र सब। बहु ज्ञाति-गोष्ठी तोमार बहुत बान्धव ॥ 26 ॥ ता'-सबार सम्मति बिना नहे कन्यादान। रुक्मिणीर पिता भीष्मक ताहाते प्रमाण ॥ 27 ॥ भीष्मकेर इच्छा,-कृष्णे कन्या समर्पिते। पुत्रेर विरोधे कन्या नारिल अर्पिते ॥"28 ॥ अनुवाद-बड़े ब्राह्मणकी बात सुनकर छोटे ब्राह्मणने कहा,-"हे ब्राह्मण महाशय! सुनिये, आप ऐसी असम्भव बात क्यों कर रहे हैं जो कभी हो ही नहीं सकती। आप उच्च कुलके ब्राह्मण हैं और विद्या-धनादिसे सम्पन्न भी हैं। मैं छोटे कुलका हूँ, उसपर भी निर्धन और विद्यासे हीन हूँ। मैं आपके कन्यादानका योग्य पात्र नहीं हूँ। श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेके लिये ही मैंने आपकी सेवा की है, क्योंकि ब्राह्मणकी सेवा करनेसे श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न होते हैं। उनके सन्तुष्ट होनेसे भक्तिरूपी सम्पत्तिकी वृद्धि होती है॥"21-24 ॥ अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने कहा,-"आपके परिवारमें स्त्री, पुत्रादि सब लोग हैं और आपके जाति-समाजमें बहुत बन्धु-बान्धव हैं। उन सबकी सम्मतिके बिना कन्यादान नहीं हो सकता। रुक्मिणीके पिता भीष्मक इस बातका प्रमाण हैं। भीष्मककी इच्छा थी कि वे अपनी कन्याको श्रीकृष्णको समर्पित करेंगे, परन्तु अपने पुत्र रुक्मीके विरोधके कारण वे अपनी कन्याको श्रीकृष्णको अर्पण न कर सके॥"26-28 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे छोटे ब्राह्मणने भगवद्भक्त बड़े ब्राह्मणकी सेवा की थी, उसके फलस्वरूप अपने भक्तके सम्मानकी रक्षा करनेके लिये श्रीगोपालठाकुरने साक्षी दी थी। अन्यथा छोटे ब्राह्मणके द्वारा इस प्रकार बड़े ब्राह्मणकी सेवा और उसकी कन्यासे विवाहकी सम्मति आदि क्रियाएँ इन्द्रिय- सुखभोगके लिये सांसारिक कर्मकाण्ड होतीं और श्रीमन्महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु कभी भी उनका आदर नहीं करते ॥ 23-24 ॥ अनुभाष्य-(भाः 10/52/21,25)- "राजासीद्भीष्मको नाम विदर्भाधिपतिर्महान्। तस्य पञ्चाभवन् पुत्राः कन्यैका रुचिरानना॥ 21 ॥ बन्धूनाममिच्छतां दातुं कृष्णाय भगिनीं नृप। ततो निवार्य कृष्णद्विट् रुक्मी चैद्यममन्यत"॥ 25 ॥ अर्थात् "महाराज भीष्मक विदर्भदेशके अधिपति थे। उनके पाँच पुत्र और एक कन्या (रुक्मिणी) थी। रुक्मिणीके भाई-बन्धु भी चाहते थे कि हमारी बहनका विवाह श्रीकृष्णसे हो। परन्तु रुक्मी श्रीकृष्णसे बड़ा द्वेष रखता था, उसने उन्हें विवाह करनेसे रोक दिया और चेदिराज शिशुपालको ही अपनी बहिनके योग्य वर समझा।" (भाः 10/53/2)- बड़विप्र कहे,-"तुमि ना कर संशय। तोमाके कन्या दिब आमि, इथे कि विस्मय ॥"25 ॥ श्रीभगवानुवाच- "तथाहमपि तच्चित्तो निद्राञ्च न लभे निशि। वेदाहं रुक्मिणा द्वेषान्ममोद्वाहो निवारितः॥" अनुवाद-यह सुनकर बड़े ब्राह्मणने कहा,-"तुम मेरी बातमें संशय मत करो। मैं तुम्हें अपनी कन्याका दान करूँगा, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है?"॥ 25 ॥ अर्थात् "भगवान् श्रीकृष्णने कहा,-"ब्राह्मणदेवता ! जैसे विदर्भराजकुमारी मुझे चाहती है, वैसे मैं भी उन्हें चाहता हूँ। मेरा चित्त उन्हींमें लगा रहता है। कहाँ तक 144 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/26-39 ] कहूँ, मुझे रातमें नींद तक नहीं आती। मैं जानता हूँ कि रुक्मीने द्वेषवश मेरा विवाह रोक दिया है।” विदर्भराज भीष्मकके ज्येष्ठपुत्र रुक्मीके द्वारा अपनी बहन रुक्मिणीके हरणके समय श्रीकृष्णको बुरा-भला कहनेपर उसका श्रीकृष्णके साथ युद्ध हुआ। वह उस युद्धमें अवश्य ही मारा जाता, परन्तु अपने भाईकी रक्षाके लिये श्रीकृष्णसे रुक्मिणीके अनुरोधके कारण उसको जीवनदान मिला। श्रीकृष्णने तलवारके द्वारा उसकी मूँछ-दाढ़ीके केशोंको कई जगहसे मूँड़कर तथा उसका मुण्डन करके उसको कुरूप बनाकर छोड़ दिया॥26-28॥ बड़विप्र कहे,—“कन्या मोर निज-धन। निज-धन दिते निषेधिबे कोन् जन॥29॥ तोमाके कन्या दिब, सबाके करि' तिरस्कार। संशय ना कर तुमि, करह स्वीकार॥”30॥ अनुवाद—बड़े ब्राह्मणने कहा,—“कन्या मेरी अपनी सम्पत्ति है, अपनी सम्पत्ति देनेसे मुझे कौन रोक सकता है? मैं सबका तिरस्कार करके भी तुम्हें ही अपनी कन्या दूँगा। मेरी इस बातमें संशय किये बिना तुम मेरे इस प्रस्तावको स्वीकार करो॥”29-30॥ छोटविप्र कहे,—“यदि कन्या दिते आछे मन। गोपालेर आगे कह ए सत्य-वचन॥”31॥ अनुवाद—छोटे ब्राह्मणने कहा,—“यदि मुझे अपनी कन्या देनेका आपने निश्चय कर लिया है, तो आप श्रीगोपालके सामने यह प्रतिज्ञा कीजिये॥”31॥ गोपालेर आगे विप्र कहिते लागिल। “तुमि जान, निज-कन्या इहारे आमि दिल॥”32॥ छोटविप्र बले,—“ठाकुर, तुमि मोर साक्षी। तोमा साक्षी बोलाइमु, यदि अन्यथा देखि॥”33॥ अनुवाद—तब गोपालजीके सामने आकर बड़े ब्राह्मणने कहा,—“हे प्रभो! आप साक्षीके रूपमें जान लीजिये कि मैंने अपनी कन्या इसको दान की है।” तब छोटे ब्राह्मणने गोपालजीकी ओर देखते हुए कहा,—“हे ठाकुरजी! आप मेरे साक्षी हो। मैं आपको साक्षी देनेके लिये बुलाऊँगा यदि ये ब्राह्मण अपनी प्रतिज्ञासे मुकर जायेंगे॥”32-33॥ एत बलि' दुइजने चलिला देशेरे। गुरुबुद्धये छोटविप्र बहु सेवा करे॥34॥ अनुवाद—इतना कहकर दोनों ब्राह्मण अपने देशकी ओर चल दिये। मार्गमें पहलेकी ही भाँति छोटे ब्राह्मणने पूज्य मानकर बड़े ब्राह्मणकी बहुत सेवा की॥34॥ देशे आसि' दुइजने गेला निज-घरे। कतदिने बड़विप्र चिन्तित अन्तरे॥35॥ 'तीर्थे विप्रे वाक्य दिलुँ,—केमते सत्य हय। स्त्री, पुत्र, ज्ञाति, बन्धु जानिबे निश्चय॥'36॥ अनुवाद—विद्यानगर आकर दोनों ब्राह्मण अपने-अपने घर चले गये। कुछ दिन बाद वृद्ध ब्राह्मण हृदयमें चिन्ता करने लगे,—'मैंने तीर्थमें ब्राह्मणको जो वचन दिया था, वह कैसे सत्य हो? अपने स्त्री, पुत्र तथा सङ्गे-सम्बन्धियोंको अवश्य ही इस बातको बताना पड़ेगा॥'35-36॥ एकदिन निज-लोक एकत्र करिल। ता-सबार आगे सब वृत्तान्त कहिल॥37॥ शुनि' सब गोष्ठी तार करे हाहाकार। “ऐछे बात मुखे तुमि ना आनिबे आर॥38॥ नीचे कन्या दिले कुल याइबेक नाश। शुनिञा सकल लोक करिबे उपहास॥”39॥ अनुवाद—वृद्ध ब्राह्मणने एक दिन अपने सगे-सम्बन्धियोंको बुलाया और उनके सामने सारी बात खोलकर रख दी। वृद्ध ब्राह्मणकी बात सुनकर सब । 145

[ 5/37-45 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला लोग हाहाकार करने लगे और कहने लगे, - "ऐसी बात फिर कभी अपने मुखमें मत लाना। नीच जातिमें अपनी कन्याको देनेपर हमारे कुलकी मर्यादा नष्ट हो जायेगी। और इस बातको सुनकर सभी लोग हमारा उपहास करेंगे॥" 37-39॥ विप्र बले, - "तीर्थ-वाक्य केमने करि आन। ये हउक्, से हउक्, आमि दिब कन्यादान॥" 40॥ अनुवाद-वृद्ध ब्राह्मणने कहा, - "तीर्थयात्रामें मैंने जो वचन दिया है, उससे मैं कैसे मुकर सकता हूँ? अब जो होना हो, सो हो, मैं तो उसे ही अपनी कन्या दान करूँगा॥" 40॥ ज्ञाति लोक कहे, - "मोरा तोमाके छाड़िब।" स्त्री-पुत्र कहे, - "विष खाइया मरिब॥" 41॥ अनुवाद-वृद्ध ब्राह्मणके अपने वचनपर दृढ़ रहनेकी बात सुनकर सगे-सम्बन्धी लोग कहने लगे, - "तब हम तुमसे सब सम्बन्ध तोड़ देंगे।" और उनकी स्त्री और पुत्रने कहा, - "हम तो विष खाकर मर जायेंगे॥" 41॥ विप्र बले, - "साक्षी बोलाञा करिबेक न्याय। जिति' कन्या लबे, मोर व्यर्थ धर्म हय॥" 42॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥ 42॥ अनुभाष्य-वृद्ध ब्राह्मणने कहा, - "मैं अपनी प्रतिज्ञानुसार छोटे ब्राह्मणको यदि कन्या प्रदान नहीं करूँगा, तो वह श्रीगोपाल-विग्रहको साक्षीके रूपमें बुलाकर (न्याय करवा लेगा और) बलपूर्वक मेरी कन्याको जय कर ही लेगा। ऐसा होनेपर तब तो मेरा धर्म निष्फल हो जायेगा॥" 42॥ पुत्र बले, - "प्रतिमा साक्षी, सेह दूर देशे। के तोमार साक्षी दिबे, चिन्ता कर किसे॥ 43॥ 'नाहि कहिं'-ना कहिं' ए मिथ्या-वचन। सबे कहिबे-'मोर किछु नाहिक स्मरण॥' 44॥ तुमि यदि कह, - 'आमि किछुइ ना जानि।' तबे आमि न्याय करि' ब्राह्मणेरे जिनि॥" 45॥ अनुवाद-तब उनके पुत्रने कहा, - "इस बातकी साक्षी तो प्रतिमा है और वह भी बहुत दूर देशमें है। कौन आकर आपके विरुद्ध साक्षी देंगे? आप क्यों चिन्ता कर रहे हैं। 'मैंने ऐसा नहीं कहा'-आपको ऐसा झूठ बोलनेकी आवश्यकता नहीं है। आप केवल इतना ही कहना, - 'मुझे कुछ स्मरण नहीं है।' यदि आप केवल यही कहें, - 'मैं इस विषयमें कुछ नहीं जानता', तब मैं तर्कके द्वारा उस ब्राह्मणको जीत लूँगा॥" 43-45॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'मैं कन्या दूँगा, मैंने ऐसा बोला ही नहीं'-ऐसे झूठे वचन मत कहना, केवल इतना ही कहना,-'मुझे यह स्मरण नहीं है॥' 44॥ अनुभाष्य-बड़े ब्राह्मणका पुत्र नास्तिक, स्मार्त्त, सांसारिक विषयोंमें चतुर था, किन्तु उस मूर्खको यह विश्वास नहीं था कि श्रीविग्रह भी चेतन और विभु हैं। कठपुतलीकी भाँति श्रीविग्रहको भी शिला-काष्ठादि समझते हुए उसने अपने पिताजीसे कहा, - "एक तो यह कि साक्षी प्रतिमा है, इसलिये वह चेतन वस्तुकी भाँति बात करेगी-यह बात विश्वास करने योग्य नहीं है। उसपर भी वह तो बहुत दूर है, इसलिये इतनी दूरसे यहाँ आकर साक्षी देना उसके लिये सम्भव नहीं होगा। इसलिये आप किसी प्रकारकी चिन्ता मत कीजिये। आप स्पष्ट रूपसे झूठ बोलकर अपनी प्रतिज्ञाको सम्पूर्ण रूपसे अस्वीकार मत कीजिये। राजा युधिष्ठिरके वाक्य "अश्वत्थामा हत इति गजः" की भाँति, केवल इतना ही कहना और ऐसे ही हाव-भाव दिखाना कि आपको ऐसा कुछ भी स्मरण नहीं आता है, अर्थात् आप इस विषयमें कुछ नहीं जानते। आप यदि ऐसा कहेंगे, तो मैं छोटे ब्राह्मणको कूटतर्कमें जालमें फँसाकर उसको हरा दूँगा और आपको भी कन्यादानरूपी विपत्तिसे सबके सामने छुटकारा दिला दूँगा। इस प्रकार आपकी प्रतिज्ञाको भी टूटनेसे बचाकर 146 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/43-60 ] कुलके सम्मानकी रक्षा करूँगा।" 'न्याय'-तर्क ॥ 43-45 ॥ एत शुनि' विप्रेर चिन्तित हैल मन। एकान्त-भावे चिन्ते विप्र गोपाल-चरण ॥ 46 ॥ 'मोर धर्म रक्षा पाय, ना मरे निज-जन। दुइ रक्षा कर, गोपाल, लइनु शरण ॥ '47 ॥ एइमत विप्र चित्ते चिन्तिते लागिल। आर दिन लघुविप्र ताँर घरे आइल ॥ 48 ॥ अनुवाद-पुत्रकी बातें सुनकर वृद्ध ब्राह्मण मन-ही-मन बहुत चिन्तित हो गये। एकान्त भावसे श्रीगोपालजीके श्रीचरणोंको स्मरण करते हुए ब्राह्मण कहने लगे, - हे गोपाल ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। मेरे धर्मपालनमें विघ्न न आये और मेरे परिवार भी न मरे, आप कृपया इन दोनोंकी रक्षा करो।' इस प्रकार वृद्ध ब्राह्मण चिन्ता करने लगे। तब अगले दिन वह छोटा ब्राह्मण उनके घर आया ॥ 46-48 ॥ आसिञा परम-भक्त्ये नमस्कार करि'। विनय करिञा कहे कर-दुइ जुड़ि' ॥ 49 ॥ “तुमि मोरे कन्या दिते करयाछ अङ्गीकार। एबे किछु नाहि कह, कि तोमार व्यवहार ॥” 50 ॥ एत शुनि' सेइ विप्र रहे मौन धरि'। ताँर पुत्र मारिते आइल हाते ठेङ्गा करि' ॥ 51 ॥ “अरे अधम! मोर भगनी चाह विवाहिते। वामन हञा चन्द्रे येन चाह त' धरिते ॥” 52 ॥ अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने उनको आदरपूर्वक प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनय करने लगा, - “आपने मुझे अपनी कन्या देनेका वचन दिया था, परन्तु अब आप उस विषयमें कुछ नहीं कह रहे। यह कैसा आपका व्यवहार है?" छोटे ब्राह्मणकी बात सुनकर वृद्ध ब्राह्मण कुछ नहीं बोले, परन्तु उनका पुत्र उस छोटे ब्राह्मणको मारनेके लिये हाथमें लाठी लेकर आया और कहने लगा, - “अरे अधम ! तू मेरी बहनसे विवाह करना चाहता है? बौना होकर तू चाँदको पकड़ना चाहता है ॥"49-52 ॥ ठेङ्गा देखि' सेइ विप्र पलाञा गेल। आर दिन ग्रामेर लोक एकत्र करिल ॥ 53 ॥ सब लोक बड़विप्रे डाकिया आनिल। तबे सेइ लघुविप्र कहिते लागिल ॥ 54 ॥ “इँहो मोरे कन्या दिते करयाछे अङ्गीकार। एबे ये ना देन, पूछ इँहार व्यवहार ॥” 55 ॥ तबे सेइ विप्रेरे पृछिल सर्वजन। “कन्या केने ना देह, यदि दियाछ वचन ॥” 56 ॥ अनुवाद-लाठी देखकर छोटा ब्राह्मण वहाँसे भाग गया, परन्तु अगले दिन उसने गाँवके सभी लोगोंको इकट्ठा कर लिया और उन्हें सब बात बतलायी। उसकी बात सुनकर गाँवके लोग बड़े ब्राह्मणको बुलाकर ले आये। तब छोटे ब्राह्मणने कहा, - “इन्होंने मुझे अपनी कन्या देनेका वचन दिया था, परन्तु अब मुझे अपनी कन्याका दान नहीं दे रहे हैं, आप इनसे पूछिये कि ये ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं?" तब सभी लोगोंने बड़े ब्राह्मणसे पूछा, - “यदि तुमने इसे अपनी कन्या देनेका वचन दिया था, तो तुम इसे कन्यादान क्यों नहीं करते? ॥"53-56 ॥ विप्र कहे, - “शुन, लोक, मोर निवेदन। कबे कि बलियाछि, मोर नाहिक स्मरण ॥” 57 ॥ एत शुनि' ताँर पुत्र वाक्य-छल पाञा। प्रगल्भ हइया कहे सम्मुखे आसिञा ॥ 58 ॥ “तीर्थयात्राय पितार सङ्गे छिल बहु धन। धन देखि' एइ दुष्टेर लैते हैल मन ॥ 59 ॥ आर केह सङ्गे नाहि, एइ सङ्गे एकल। धुतुरा खाओयाञा बापे करिल पागल ॥ 60 ॥ । 147

[ 5/57-71 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सब धन लञा कहे,-'चोरे लइल धन।' 'कन्या दिते चाहियाछे'-उठाइल वचन ॥61॥ तोमरा सकल लोक करह विचारे। मोर पितार कन्या दिते योग्य कि इहारे॥' 62 ॥ अनुवाद-बड़े ब्राह्मणने कहा,-"आप लोग मेरा निवेदन सुनिये। मैंने कब क्या कहा था, मुझे ठीकसे स्मरण नहीं है।" यह सुनकर बड़े ब्राह्मणके पुत्रको वाक्-चातुरी दिखानेका अवसर मिल गया। वह निर्लर्ज होकर सबसे कहने लगा, - "तीर्थयात्रामें मेरे पिताजीके पास बहुत धन था। धनको देखकर इस दुष्टको उसे लेनेकी इच्छा हुई। मेरे पिताजीके साथ उस समय और कोई भी नहीं था, केवल यही अकेला था। इसने धतूरा खिलाकर मेरे पिताजीको पागल कर दिया और उनका सारा धन हड़पकर कहने लगा कि 'चोर सब धन ले गये।' और अब यह ऐसी बात उठा रहा है कि 'मेरे पिताजी इसे कन्यादान करना चाहते थे।' आप सब लोग अब विचार करो कि क्या यह मेरे पिताजीकी कन्या देने योग्य है?" 57-62॥ अनुभाष्य- 'छल'- वक्ता जिस शब्दका जिस अर्थमें प्रयोग करता है, उस शब्दके उस अर्थको ग्रहण न करके उसके विपरीत अर्थकी कल्पना करके प्रतिवादी जो सब मिथ्या दोषारोपण करता है, वही 'छल' है॥ 58 ॥ एत शुनि' लोकेर मने हइल संशय। 'सम्भवे,- धनलोभे छाड़े धर्मभय ॥'63 ॥ अनुवाद-बड़े ब्राह्मणके पुत्रकी बात सुनकर लोगोंके मनमें भी संशय हो गया कि ऐसा सम्भव है, क्योंकि धनके लोभमें लोग धर्मके भयको छोड़ देते हैं॥'63॥ अनुभाष्य-धनके लोभसे लोगोंका धर्म-अधर्मका विवेक लुप्त हो जाता है, इसलिये छोटा ब्राह्मण उस समय धनकी लालसासे बड़े-ब्राह्मणके ऊपर अत्याचार कर भी सकता था,-लोगोंने इस प्रकार सन्देह किया॥ 63 ॥ तबे छोटविप्र कहे, "शुन, महाजन। न्याय जिनिबारे कहे असत्य-वचन ॥ 64 ॥ एइ विप्र मोर सेवाय तुष्ट यबे हैला। 'तोरे आमि कन्या दिब' आपने कहिला ॥ 65 ॥ तबे मुञि निषेधिनु, - 'शुन, द्विजवर। तोमार कन्यार योग्य नहि मुञि वर ॥ 66 ॥ काँहा तुमि पण्डित, धनी, परम-कुलीन। काँहा मुञि दरिद्र, मूर्ख, नीच, कुलहीन ॥'67॥ तबु एइ विप्र मोरे कहे बार बार। 'तोरे कन्या दिब, तुमि करह स्वीकार ॥'68॥ तबे आमि कहिलाङ,-'शुन, महामति। तोमार स्त्री-पुत्र-ज्ञातिर ना हबे सम्मति ॥ 69 ॥ कन्या दिते नारिबे, हबे असत्य-वचन।' पुनरपि कहे विप्र करिया यतन ॥ 70 ॥ 'कन्या तोरे दिब, द्विधा ना करिह चित्ते। आत्मकन्या दिब, केबा पारे निषेधिते ॥ '71 ॥ अनुवाद-तब छोटे ब्राह्मणने कहा, "सुनो, महाजन ! तर्कके द्वारा मुझसे जीतनेके लिये ही यह झूठ बोल रहा है। मेरी सेवासे सन्तुष्ट होकर इन ब्राह्मणने जब स्वयं ही कहा था, - 'मैं तुम्हें अपनी कन्याका दान करूँगा।' तब मैंने मना करते हुए कहा था, - 'हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! सुनो, मैं आपकी कन्याके लिये योग्य वर नहीं हूँ। कहाँ तो आप पण्डित, धनवान और परम कुलीन हैं और कहाँ मैं दरिद्र, मूर्ख, नीच और कुलहीन हूँ।' किन्तु तब भी इन ब्राह्मणने मुझसे बार-बार कहा था, - 'मैं तुम्हें ही अपनी कन्या-दान करूँगा, तुम बस स्वीकार करो।' तब मैंने कहा था, - 'सुनिये, मान्यवर ! आपके स्त्री, पुत्र और सगे-सम्बन्धी इस बातसे सहमत नहीं होंगे। आप अपनी कन्या मुझे नहीं दे पायेंगे और आपका वचन असत्य हो जायेगा।' किन्तु फिर भी इन्होंने ज़ोर देकर कहा था, - 'मैं तुम्हें 148 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/64-85 ]

अपनी कन्याका दान करूँगा, मनमें कोई दुविधा मत रखो। मैं अपनी कन्याका दान करूँगा, ऐसा करनेसे मुझे कौन रोक सकता है?' ॥ 64-71 ॥

तबे आमि कहिलाङ दृढ़ करि' मन। 'गोपालेर आगे कह ए-सत्य-वचन ॥' 72 ॥

तबे इँहो गोपालेर आसिया कहिल। 'तुमि जान, एइ विप्रे कन्या आमि दिल ॥' 73 ॥

तबे आमि गोपालेरे साक्षी करिञा। कहिलाङ ताँर पदे प्रणत हइञा ॥ 74 ॥

'यदि एइ विप्र मोरे ना दिबे कन्यादान। साक्षि बोलाइमु तोमाय, हइओ सावधान ॥' 75 ॥

एइ वाक्ये साक्षी मोर आछे महाजन। याँर वाक्य सत्य करि' माने त्रिभुवन ॥' 76 ॥

अनुवाद-तब मैंने भी निश्चय करके कहा, - 'आप गोपालजीके सामने यह सत्य प्रतिज्ञा करो।' तब गोपालजीके सामने इन्होंने कहा था, - 'हे प्रभो! आप साक्षी हों कि मैंने इस ब्राह्मणको अपनी कन्या दान की है।' तब मैंने भी गोपालजीको साक्षी बनाकर उनके चरणोंमें प्रणत होकर कहा था, - 'यदि ये ब्राह्मण मुझे अपनी कन्यादान नहीं करेंगे, तो मैं आपको साक्षी देनेके लिये बुलाऊँगा, आप इस बातका ध्यान रखना।' मेरे इन वचनोंके साक्षी वे परदेवता श्रीगोपाल हैं, जिनके वचनोंको त्रिभुवन सत्य मानता है ॥' 72-76 ॥

अनुभाष्य- 'महाजन' - देवता ॥ 76 ॥

तबे बड़विप्र कहे, - 'एइ सत्य कथा। गोपाल यदि साक्षी देन, आपने आसिं' एथा ॥ 77 ॥

तबे कन्या दिब आमि, जानिह निश्चय।' ताँर पुत्र कहे, - 'एइ भाल बात हय ॥' 78 ॥

अनुवाद-यह सुनकर बड़े ब्राह्मणने कहा,- “यह बात ठीक है। यदि गोपालजी स्वयं यहाँ आकर साक्षी देंगे, तब मैं अवश्य ही इस ब्राह्मणको अपनी कन्याका दान दूँगा।” बड़े ब्राह्मणके पुत्रने भी इसमें सहमति जताते हुए कहा,- “यही बात ठीक है॥” 77-78 ॥

बड़विप्रेर मने, - 'कृष्ण बड़ दयावान्। अवश्य मोर वाक्य तँहो करिबे प्रमाण ॥' 79 ॥

पुत्रेर मने, - 'प्रतिमा ना आसिबे साक्षी दिते।' एइ बुद्धये दुइजन हइला सम्मते ॥ 80 ॥

अनुवाद-बड़े ब्राह्मणके मनमें विश्वास था, - 'श्रीकृष्ण बड़े दयावान् हैं, वे आकर अवश्य ही साक्षी देकर मेरे वाक्योंकी सत्यताको प्रमाणित करेंगे।' बड़े ब्राह्मणके पुत्रके मनमें विचार था, - 'प्रतिमा कभी भी साक्षी देनेके लिये यहाँ नहीं आयेगी।' इस प्रकार मन-ही-मन विचार करके दोनों ही इस बातपर सहमत हो गये ॥ 79-80 ॥

छोटविप्र बले,- 'पत्र करह लिखन। पुनः येन नाहि चले एसब वचन ॥' 81 ॥

तबे सब लोक मेलि' पत्र त' लिखिल। दुँहार सम्मति लञा मध्यस्थ राखिल ॥ 82 ॥

अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने कहा, - “अपने जो अभी कहा है, उसे लिखकर दें, जिससे आप फिर अपने वचनोंसे मुकर न जाँय ।” तब सभी लोगोंने मिलकर इस आशयका एक पत्र लिखा तथा उन दोनों ब्राह्मणोंके हस्ताक्षर करवाकर उनकी सहमतिसे गाँवके सभी लोग बिचौलिये बन गये ॥ 81-82 ॥

तबे छोटविप्र कहे, - 'शुन, सर्वजन। एइ विप्र - सत्य-वाक्, धर्मपरायण ॥ 83 ॥

स्ववाक्य छाड़िते इँहार नाहि कभु मन। स्वजन-मृत्यु-भये कहे असत्य-वचन ॥ 84 ॥

इँहार पुण्ये कृष्णे आनि' साक्षी बोलाइब। तबे एइ विप्रेर सत्य-प्रतिज्ञा राखिब ॥' 85 ॥

अनुवाद-तब छोटे ब्राह्मणने कहा, - “आप सभी

॥ 149

[ 5/83-94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला लोग सुनिये ! ये ब्राह्मण सत्यवादी और धर्मपरायण हैं। अपनी प्रतिज्ञाको तोड़नेकी इनकी कभी इच्छा नहीं थी, किन्तु अपने स्वजनोंकी मृत्युके भयसे ही इन्होंने असत्य वचन कहे हैं। मैं इनके पुण्यके प्रभावसे श्रीकृष्णको साक्षी देनेके लिये यहाँ लाऊँगा, तब इन ब्राह्मणकी प्रतिज्ञाकी सत्यताकी रक्षा करूँगा॥" 83-85 ॥ एत शुनि' नास्तिक लोक उपहास करे। केह बोले, 'ईश्वर-दयालु, आसितेह पारे ॥' 86 ॥ अनुवाद-छोटे ब्राह्मणकी बातको सुनकर कुछ नास्तिक लोग उसका उपहास करने लगे। परन्तु किसीने कहा, - 'ईश्वर बहुत दयालु हैं, वे आ भी सकते हैं ॥' 86 ॥ अनुभाष्य- 'नास्तिक' - क्योंकि श्रीकृष्णकी परमेश्वरता और भक्तवात्सल्यताके ऊपर विश्वास न करके उनकी अर्च्चाविग्रहमें भौम-बुद्धि थी अर्थात् वे उन्हें एक पत्थर-काठ आदिसे बनी जड़वस्तु माननेवाले थे ॥ 86 ॥ तबे सेइ छोटविप्र गेला वृन्दावन। दण्डवत् करि' कहे सब विवरण ॥ 87 ॥ “ब्रह्मण्यदेव ! तुम्मि-बड़ दयामय। दुइ विप्रेर धर्म राख हञा सदय ॥ 88 ॥ कन्या पाब,-मोर मने इहा नाहि सुख। ब्राह्मणेर प्रतिज्ञा याय, - एइ बड़ दुःख ॥ 89 ॥ एत जानि' तुमि साक्षी देह, दयामय। जानि' साक्षी नाहि देय, तार पाप हय ॥” 90 ॥ अनुवाद-तब छोटा ब्राह्मण वृन्दावनकी ओर चल दिया। वहाँ पहुँचकर गोपालजीके सामने दण्डवत् प्रणाम करके वह सब वृत्तान्त सुनाने लगा, - "आप ब्राह्मणोंके रक्षक और परम दयालु हो। कृपा करके हम दोनों ब्राह्मणोंके धर्मकी रक्षा कीजिये। मेरे मनमें ऐसी बात नहीं है कि उनकी कन्या पाकर मैं संसार-सुख भोग करूँगा। उन ब्राह्मणकी प्रतिज्ञा भङ्ग होगी, यही मेरे लिये बड़े दुःखकी बात है। हे दयामय ! यह जानकर आप चलकर साक्षी दीजिये, क्योंकि जो किसी बातको जानकर भी समय आनेपर जान-बूझकर साक्षी नहीं देता, उसे पाप लगता है [आपको तो कोई पाप स्पर्श नहीं कर सकता, परन्तु यदि आप साक्षी नहीं देंगे, तो उन ब्राह्मणको पाप लगेगा, इसलिये आप अवश्य ही चलिये]॥" 87-90 ॥ अनुभाष्य-मैं बड़े ब्राह्मणकी कन्यासे विवाह करके अपने इन्द्रिय-भोगसुख वर्धनकी लालसासे आपको साक्षी देनेके लिये नहीं कह रहा हूँ, अपितु आपके भक्त उन ब्राह्मणकी प्रतिज्ञा-भङ्ग होनेसे उनको लगनेवाले पापसे उद्धार करके उनके वाक्योंकी रक्षाके लिये ही आपसे साक्षी देनेके लिये कह रहा हूँ ॥ 89 ॥ कृष्ण कहे, - “विप्र, तुमि याह स्वभवने। सभा करि' मोरे तुमि करिह स्मरणे ॥ 91 ॥ आविर्भाव हञा आमि ताँहा साक्षी दिब। तबे दुइ विप्रेर सत्य-प्रतिज्ञा राखिब ॥” 92 ॥ अनुवाद-छोटे ब्राह्मणकी बातको सुनकर श्रीकृष्णने कहा,- 'हे ब्राह्मण ! तुम अपने घर लौट जाओ। वहाँ सबको बुलाकर एक सभा करना और तुम मेरा स्मरण करना। मैं वहाँ सबके सामने आविर्भूत होऊँगा तथा साक्षी देकर तुम दोनों ब्राह्मणोंकी प्रतिज्ञाकी रक्षा करूँगा॥" 91-92 ॥ विप्र बले, - “यदि हओ चतुर्भुज-मूर्त्ति। तबु तोमार वाक्य कारु ना हबे प्रतीति ॥ 93 ॥ एइ मूर्त्ति गिया, यदि एइ श्रीवदने। साक्षी देह यदि, तबे सर्व लोक सुने ॥” 94 ॥ अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने कहा, - "यदि आप चतुर्भुज रूपमें प्रकट होकर साक्षी देंगे, तो भी आपके वाक्योंपर किसीको विश्वास न होगा। परन्तु यदि आप अपने 150 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/93-105 ]

इसी श्रीगोपालरूपसे वहाँ आयेंगे और श्रीमुखसे साक्षी ब्राह्मण! मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा। परन्तु तुम कभी देंगे, तभी सब लोग विश्वास करेंगे॥"93-94॥ भी मुझे मुड़कर मत देखना। यदि तुम मुझे पीछे कृष्ण कहे, — "प्रतिमा चले, कोथाह ना शुनि।" मुड़कर देखोगे, तो मैं उसी स्थानपर ही रह जाऊँगा। विप्र बले, — "प्रतिमा हञा कह केने वाणी॥95॥ केवल मेरे नूपुरकी ध्वनिको सुनकर समझना कि मैं प्रतिमा नह तुमि, — साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन। तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा हूँ। प्रतिदिन एक सेर विप्र लागि' कर तुमि अकार्य-करण॥"96॥ (लगभग एक किलो) चावल पकाकर मुझे भोग लगाना, अनुवाद - श्रीकृष्णने कहा, — "प्रतिमा चलकर जाती उसे खाकर मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चलता रहूँगा॥"97-100॥ है, ऐसा तो कहीं नहीं सुना है।" छोटे ब्राह्मणने आर दिन आज्ञा मागि' चलिला ब्राह्मण। कहा, — "तो प्रतिमा होकर आप बोल कैसे रहे हैं? तार पाछे पाछे गोपाल करिला गमन॥101॥ आप जड़मय प्रतिमा नहीं, बल्कि साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन नूपुरेर ध्वनि शुनि' आनन्दित मन। हैं। अपने भक्त ब्राह्मणके धर्मकी रक्षाके लिये आप वह उत्तमान्न पाक करि' कराय भोजन॥102॥ कार्य कर सकते हैं जिसे आपने पहले कभी नहीं अनुवाद - अगले दिन श्रीगोपालकी अनुमति लेकर किया [अर्थात् मेरे साथ चलकर साक्षी दीजिये]॥"95-96॥ ब्राह्मण अपने घरकी ओर चल पड़ा और गोपालजी भी अमृतप्रवाह भाष्य-ब्राह्मणके उपकारके लिये आप उसके पीछे-पीछे चलने लगे। गोपालजीके नूपुरकी न करनेवाले कार्योंको भी करते हो॥96॥ ध्वनिको सुनकर ब्राह्मणके मनमें बहुत आनन्द हो रहा अनुभाष्य-छोटे ब्राह्मणको कोई विष्णुके अर्चाविग्रहमें था और वह प्रतिदिन उत्तम कोटिके चावल पकाकर पत्थर-काष्ठादि बुद्धि रखनेवाला मूर्तिपूजक न समझ ले, गोपालजीको भोग लगाता॥ 101-102॥ इसलिये इस प्रकारके अपयशसे बचानेके लिये ही एइमते चलि' विप्र निज-देशे आइला। उसकी परीक्षाके लिये भगवान्ने ऐसा प्रश्न किया। और ग्रामेर निकट आसि' मनेते चिन्तिला॥103॥ ब्राह्मणने भी सर्वेश्वरके ईश्वर विष्णुकी ईश्वरतामें पूर्ण 'एबे मुञि ग्रामे आइनु, याइमु भवने। विश्वास रखनेवाले भक्तके समान ही उत्तर दिया॥95-96॥ लोकेरे कहिब गिया साक्षीर गमने॥104॥ हासिञा गोपाल कहे, — "शुनह ब्राह्मण। साक्षाते ना देखिले मने प्रतीति ना हय। तोमार पाछे पाछे आमि करिब गमन॥97॥ इँहा यदि रहेन, तबु नाहि किछु भय॥'105॥ उलटिया आमा ना करिह दर्शने। अनुवाद - इस प्रकार चलते-चलते छोटा ब्राह्मण आमाके देखिले, आमि रहिब सेइ स्थाने॥98॥ अपने देशमें आ गया। अपने गाँवके निकट आकर नूपुरेर ध्वनिमात्र आमार शुनिबा। उसने मनमें सोचा,- 'अब मैं अपने गाँवमें आ गया हूँ सेइ शब्दे आमार गमन प्रतीति करिबा॥99॥ और अपने घरमें जाऊँगा। फिर सभी लोगोंको जाकर एकसेर अन्न रान्धि' करिह समर्पण। साक्षीके आनेकी बातको कहूँगा। परन्तु लोग यदि ताहा खाञा तोमार सङ्गे करिब गमन॥" 100॥ गोपालजीको साक्षात् रूपमें नहीं देखेंगे, तो उन्हें अनुवाद - तब श्रीगोपालने हँसते हुए कहा, — "सुनो विश्वास नहीं होगा। और यदि मेरे मुड़कर देखनेपर

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[ 5/103-118 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला गोपालजी यहाँ रह भी जाँय, तो भी किसी प्रकारका भय नहीं है।' 103-105 ॥ एत भावि' सेइ विप्र फिरिया चाहिल। हासिञा गोपालदेव तथाय रहिल ॥ 106 ॥ ब्राह्मणेरे कहे, - "तुमि याह निज-घर। एथाय रहिब आमि, ना याब अतःपर ॥" 107 ॥ अनुवाद-यह विचार करके छोटे ब्राह्मणने जैसे ही घूमकर पीछे देखा, श्रीगोपाल मुस्कुराते हुए वहीं खड़े हो गये। तब गोपालजीने ब्राह्मणको कहा, - "अब तुम अपने घर जाओ, मैं यहीं रहूँगा, इससे आगे नहीं जाऊँगा।" 106-107 ॥ तबे सेइ विप्र याइ' नगरे कहिल। शुनिञा सकल लोक चमत्कार हैल ॥ 108 ॥ आइल सकल लोक साक्षी देखिबारे। गोपाल देखिञा लोक दण्डवत् करे ॥ 109 ॥ गोपाल-सौन्दर्य देखि' लोके आनन्दित। प्रतिमा चलिञा आइला, - शुनिया विस्मित ॥ 110 ॥ अनुवाद-तब उस ब्राह्मणने जाकर गाँवमें सबको गोपालजीके आनेका समाचार दिया। इसे सुनकर सभी लोग बड़े आश्चर्यचकित हो गये और श्रीसाक्षी-गोपालको देखनेके लिये गाँवके बाहर आ गये। श्रीगोपालके दर्शन करके सब उनको दण्डवत् प्रणाम करने लगे और उनके सौन्दर्यको देखकर सबको बहुत आनन्द हुआ। प्रतिमा स्वयं चलकर आयी है, यह सुनकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 108-110 ॥ तबे सेइ बड़विप्र आनन्दित हञा। गोपालेर आगे पड़े दण्डवत् हञा ॥ 111 ॥ सकल लोकेर आगे गोपाल साक्षी दिल। बड़विप्र छोटविप्रे कन्यादान कैल ॥ 112 ॥ अनुवाद-यह समाचार सुनकर वृद्ध ब्राह्मणको बहुत आनन्द हुआ और उन्होंने शीघ्रतासे आकर गोपालजीके आगे गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया। सभी लोगोंके सामने गोपालजीने साक्षी दी, तब बड़े ब्राह्मणने निर्भय होकर छोटे ब्राह्मणको कन्यादान की ॥ 111-112 ॥ तबे सेइ दुइ विप्रे कहिल ईश्वर। “तुमि-दुइ-जन्मे-जन्मे आमार किङ्कर ॥ 113 ॥ दुँहार सत्ये तुष्ट हइलाङ, दुँहे माग' वर।” दुइ विप्र वर मागे आनन्द-अन्तर ॥ 114 ॥ “यदि वर दिबे, तबे रह एइस्थाने। किङ्करेरे दया तब सर्वलोके जाने ॥" 115 ॥ अनुवाद-तब श्रीगोपालने उन दोनों ब्राह्मणोंसे कहा, - “तुम दोनों जन्म-जन्मान्तरसे मेरे सेवक हो। मैं तुम दोनोंकी सत्यतासे बहुत सन्तुष्ट हुआ हूँ, तुम दोनों मुझसे वर माँग लो।" मनमें आनन्दित होते हुए दोनों ब्राह्मणोंने यही वर माँगा, - "यदि आप वर देना चाहते हैं, तो आप इसी स्थानपर रहिये, जिससे आपकी अपने सेवकोंके प्रति दयाको सभी लोग जान सकें॥" 113-115 ॥ गोपाल रहिला, दुँहे करेन सेवन। देखिते आइला सब देशेर लोक-जन ॥ 116 ॥ अनुवाद-तब श्रीगोपाल वहीं रह गये और वे दोनों ब्राह्मण उनकी सेवा करने लगे। इस अद्भुत घटनाके विषयमें सुनकर अनेक देशोंसे लोग श्रीगोपालके दर्शनके लिये वहाँ आने लगे ॥ 116 ॥ श्रीगोपाल और उत्कलके राजा पुरुषोत्तमकी कथा :- से देशेर राजा आइल आश्चर्य शुनिञा। परम सन्तोष पाइल गोपाले देखिञा ॥ 117 ॥ मन्दिर करिया राजा सेवा चालाइल। 'साक्षिगोपाल' बलि' ताँर नाम ख्याति हैल ॥ 118 ॥ 152

पाँचवाँ अध्याय 5/117-127 ] एइ मत विद्यानगरे साक्षिगोपाल। सेवा अङ्गीकार करियाछेन चिरकाल॥ 119॥ अनुवाद - उस देशका राजा भी इस आश्चर्यमय घटनाको सुनकर वहाँ आया और श्रीगोपालके दर्शन करके परम प्रसन्न हुआ। तब राजाने वहाँ एक विशाल मन्दिरका निर्माण करवाया और श्रीगोपालकी सेवाकी सुन्दर व्यवस्था कर दी। तभीसे श्रीगोपाल 'श्रीसाक्षी- गोपाल'के नामसे प्रसिद्ध हो गये। इस प्रकार विद्यानगरमें श्रीसाक्षी-गोपालने बहुत समय तक सेवा ग्रहण की॥ 117-119॥ अनुभाष्य - 'विद्यानगर'- त्रैलिङ्गदेशमें गोदावरी नदी बङ्गालकी खाड़ीमें जहाँ मिलती है, वह स्थान 'कोटदेश'के नामसे प्रसिद्ध है। उड़ीसा राज्यके उस प्रदेशकी प्रादेशिक राजधानी 'विद्यानगर' थी। यह नगर गोदावरी नदीके दक्षिण दिशामें स्थित था। उत्कलके राजा पुरुषोत्तम उस स्थानको अपने अधिकारमें लेकर प्रादेशिक शासनकर्त्ताके द्वारा उसपर शासन करते थे। वर्तमान गोदावरीके उत्तर तटपर स्थित राजमहेन्द्रीसे विद्यानगर 20-25 मील पूर्व-दक्षिणमें स्थित है। राजा प्रतापरुद्रके समयमें श्रीरामानन्द राय वहाँके शासनकर्त्ता थे। 'भिजियानगरम् या भिजियाना-ग्राम या विजयनगर' यह विद्यानगर नहीं है॥ 119॥ उत्कलेर राजा - श्रीपुरुषोत्तम - नाम। सेइ देश जिनि' निल करिया संग्राम ॥ 120 ॥ सेइ राजा जिनि' निल ताँर सिंहासन। 'माणिक्य-सिंहासन' नाम अनेक रतन॥ 121 ॥ अनुवाद-तब एक समय उत्कल देशके राजा श्रीपुरुषोत्तमने विद्यानगरपर चढ़ायी करके युद्धमें उस देशपर विजय प्राप्त कर ली। राजा श्रीपुरुषोत्तमने विद्यानगरको जीतकर वहाँके राजाके सिंहासनको ले लिया। अनेक रत्न जड़े होनेके कारण उस सिंहासनका नाम 'माणिक्य-सिंहासन' था ॥ 120-121 ॥ पुरुषोत्तम-देव सेइ बड़ भक्तराज। गोपाल-चरणे मागे, - 'चल मोर राज ॥ '122 ॥ ताँर भक्तिवशे गोपाल ताँरे आज्ञा दिल। गोपाल लइया सेइ कटके आइल ॥ 123 ॥ जगन्नाथे आनि' दिल माणिक्य-सिंहासन। कटके गोपाल-सेवा करिल स्थापन ॥ 124 ॥ अनुवाद - राजा श्रीपुरुषोत्तमदेव उत्तम कोटिके भक्त थे। उन्होंने श्रीसाक्षी-गोपालके चरणोंमें गिरकर प्रार्थना की, - 'आप कृपा मेरे राज्यमें चलिये।' उनकी भक्तिके वशीभूत होकर श्रीगोपालने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब राजा श्रीगोपालको लेकर कटक आ गये। राजाने उस 'माणिक्य-सिंहासन' को श्रीजगन्नाथदेवजीको भेंट किया और कटकमें श्रीगोपालकी सेवा स्थापित कर दी ॥ 122-124 ॥ अनुभाष्य - 'राज'- राज्यमें ॥ 122 ॥ श्रीगोपाल और रानीकी कथा :- ताँहार महिषी आइला गोपाल-दर्शने। भक्ति करि' बहु अलङ्कार कैल समर्पणे ॥ 125 ॥ ताँहार नासाते बहुमूल्य मुक्ता हय। ताहा दिते इच्छा हैल, मनेते चिन्तय ॥ 126 ॥ 'ठाकुरेर नासाते यदि छिद्र थाकित। तबे एइ दासी मुक्ता नासाय पराइत ॥ '127 ॥ अनुवाद - एक दिन राजा श्रीपुरुषोत्तमदेवकी महारानी श्रीगोपालजीका दर्शन करने आयी और उसने भक्तिपूर्वक श्रीगोपालजीको बहुतसे आभूषण समर्पित किये। महारानीके नाकमें एक बहुत मूल्यवान मुक्ता था और उस मुक्ताको भी श्रीगोपालको देनेकी उनकी इच्छा हुई। तब वह मनमें विचार करने लगी, - 'यदि ठाकुरजीके नाकमें छेद होता, तो यह दासी इस मुक्ताको उनके नाकमें पहनाती ॥ '125-127 ॥ । 153

[ 5/128-139 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला एत चिन्ति' नमस्करि' गेला स्वभवने। रात्रिशेषे गोपाल ताँरे कहेन स्वप्ने ॥ 128 ॥ “बाल्यकाले माता मोर नासा छिद्र करि'। मुक्ता पराञाछिल बहु यत्न करि' ॥ 129 ॥ सेइ छिद्र अद्यापिह आछये नासाते। सेइ मुक्ता पराह, याहा चाहियाछ दिते ॥” 130 ॥ अनुवाद—मनमें ऐसी इच्छा करके महारानी श्रीगोपालको प्रणाम करके अपने महलमें चली गयी। उस रातके अन्तमें श्रीगोपालने उसे स्वप्नमें आकर कहा,—“बाल्यकालमें मेरी माताने मेरी नाकमें छेद करके बहुत प्रेमसे उसमें मुक्ता पहनाया था। वह छेद आज भी मेरे नाकमें है। जिस मुक्ताको मुझे देना चाहती हो, उसे तुम मेरे नाकमें पहना सकती हो॥” 128-130 ॥ स्वप्ने देखि' सेइ वाणी राजाके कहिल। राजासह मुक्ता लञा मन्दिरे आइल ॥ 131 ॥ पराइल मुक्ता नासाय छिद्र देखिञा। महामहोत्सव कैल आनन्दित हञा ॥ 132 ॥ सेइ हैते गोपालेर कटकेते स्थिति। एइ लागि' 'साक्षिगोपाल' नाम हैल ख्याति ॥ 133 ॥ अनुवाद—तब महारानीने उस स्वप्नकी बात राजाको बतलायी और राजाके साथ मुक्ता लेकर मन्दिरमें आ गयी। श्रीगोपालके नाकमें छेद देखकर उन्हें मुक्ता पहना दिया और परम आनन्दित होकर उन्होंने एक महामहोत्सव किया। तभीसे श्रीगोपालजी कटकमें विराजमान हैं और वे 'साक्षी-गोपाल'के नामसे प्रसिद्ध हैं॥ 131-133 ॥ श्रीनिताइके मुखसे साक्षिगोपालके वृत्तान्तको सुनकर भक्तोंके साथ महाप्रभुको आनन्द :— नित्यानन्द-मुखे शुनि' गोपाल-चरित। तुष्ट हैला महाप्रभु स्वभक्त-सहित ॥ 134 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके श्रीमुखसे श्रीसाक्षी- गोपालका लीला-चरित्र सुनकर महाप्रभु और उनके भक्त बहुत प्रसन्न हुए ॥ 134 ॥ भक्तोंका महाप्रभु और श्रीगोपालमें अभेद-दर्शन :— गोपालेर आगे यबे प्रभुर हय स्थिति। भक्तगणे देखे—येन दुँहे एकमूर्त्ति ॥ 135 ॥ दुँहे-एक वर्ण, दुँहे-प्रकाण्ड-शरीर। दुँहे-रक्ताम्बर, दुँहार स्वभाव-गम्भीर ॥ 136 ॥ महा-तेजोमय दुँहे कमल-नयन। दुँहार भावावेश, दुँहे-चन्द्रवदन ॥ 137 ॥ उनके दर्शनोंसे भक्तोंके साथ श्रीनिताइका परिहास करना :— दुँहा देखि' नित्यानन्दप्रभु महारङ्गे। ठाराठारि करि' हासे भक्तगण-सङ्गे ॥ 138 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जब श्रीसाक्षी-गोपालके सामने खड़े थे, तब सभी भक्तोंने देखा महाप्रभु और साक्षी-गोपाल दोनों एक ही समान हैं। उन दोनोंका वर्ण एक जैसा था और दोनोंका शरीर विशाल था। दोनोंने ही लाल वस्त्र पहने हुए थे और दोनोंका ही स्वभाव अत्यन्त गम्भीर था। दोनों ही महा-तेजवान थे तथा दोनोंके नेत्र कमलके समान थे। दोनों ही भावमें आविष्ट थे और दोनोंके मुख ही पूर्णचन्द्रके समान उज्ज्वल और सुशीतल थे। दोनोंके दर्शन करके श्रीनित्यानन्द प्रभु बहुत आनन्दित हुए और नेत्रोंसे इशारे करते हुए भक्तोंके साथ स्वयं भी हँसने लगे ॥ 135-138 ॥ प्रातःकाल सभीकी पुरीकी ओर यात्रा :— एइमत महारङ्गे से रात्रि वञ्चिञा। प्रभाते चलिला मङ्गल-आरति देखिञा ॥ 139 ॥ अनुवाद—इस प्रकार सभीने बड़े आनन्दमें वह रात्रि बितायी। प्रातःकालमें श्रीगोपालकी मङ्गल-आरतीका दर्शन करके सभी पुरीकी ओर चल दिये ॥ 139 ॥ 154 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/140-143 ] चैतन्यभागवतमें भुवनेश्वर-दर्शन आदिका वर्णन है :- भुवनेश्वर-पथे यैछे कैल दरशन। विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 140 ॥ अनुवाद-भुवनेश्वरके मार्गमें महाप्रभुने जिन-जिन स्थानोंका दर्शन किया, उसका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने श्रीचैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णन किया है॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चैतन्यभागवत अन्त्यलीलाका दूसरा अध्याय देखें। कटकसे राजमार्गसे बाहर होकर बलिहस्ता या बालकाटिचाटिसे भुवनेश्वर दो-तीन कोसकी दूरीपर है ॥ 140 ॥ अनुभाष्य-चैःभाः अन्त्य, दूसरा अध्याय- "तबे प्रभु आइलेन श्रीभुवनेश्वर। गुप्तकाशी-वास यथा करेन शङ्कर ॥ 307 ॥ सर्वतीर्थ-जल यथा बिन्दु-बिन्दु आनि'। 'बिन्दुसरोवर' शिव सृजिला आपनि ॥ 308 ॥ 'शिवप्रिय सरोवर जानि' श्रीचैतन्य। स्नान करि' विशेषे करिला अति धन्य ॥ "309॥ अर्थात् "तब महाप्रभु श्रीभुवनेश्वर पहुँचे। श्रीभुवनेश्वर गुप्त काशी है, जहाँ शङ्कर निवास करते हैं। सभी तीर्थोंसे बिन्दु-बिन्दु भर जल लाकर स्वयं शिवजीने यहाँ 'बिन्दुसरोवर'का निर्माण किया है। इस सरोवरको शिवजीका प्रिय सरोवर जानकर महाप्रभुने इसमें स्नान करके इसे कृतार्थ किया।" स्कन्दपुराणमें शिवजीका एकाम्रकानन (श्रीभुवनेश्वर) को प्राप्त करनेके इतिहासका वर्णन है। 'काशीराज'-नामक एक राजाने पूजा करके शिवजीको सन्तुष्ट किया। जब काशीराज श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेमें प्रवृत्त हुआ, तब शिवजीने उसकी सहायता की। श्रीकृष्णने सुदर्शन चक्रके द्वारा काशीराजका वध करके काशीको जला दिया। काशीको जलते देखकर शिवजीने पाशुपत अस्त्रका प्रयोग किया, परन्तु श्रीसुदर्शनके आगे वह भी विफल हो गया। तब शिवजीने श्रीकृष्णकी महिमाको जानकर अपने द्वारा किये गये अपराधके लिये क्षमा-याचना की। श्रीकृष्णने उन्हें क्षमा करके नीलाचलके निकट एकाम्रकानन स्थान प्रदान किया। एकाम्रकाननको केशरीवंशीय राजाओंने राजधानी बनाकर कुछेक शताब्दी उत्कलदेशपर राज्य किया॥ 140 ॥ महाप्रभुका श्रीनिताइको संन्यास-दण्ड देना और कमलपुरमें भार्गीनदीमें स्नान :- कमलपुरे आसि भार्गीनदी-स्नान कैल। नित्यानन्द-हाते प्रभु दण्ड धरिल ॥ 141 ॥ महाप्रभु द्वारा कपोतेश्वर-दर्शन और पीछेसे श्रीनिताइके द्वारा महाप्रभुके दण्डको तोड़ना :- कपोतेश्वर देखिते गेला भक्तगण-सङ्गे। एथा नित्यानन्दप्रभु कैल दण्ड भङ्गे ॥ 142 ॥ तिन खण्ड करि' दण्ड दिल भासाञा। भक्त-सङ्गे आइला प्रभु महेश देखिञा ॥ 143 ॥ अनुवाद-कमलपुरमें आकर महाप्रभुने भार्गीनदीमें स्नान किया। श्रीनित्यानन्द प्रभुके हाथोंमें अपने संन्यास-दण्डको पकड़ाकर महाप्रभु भक्तोंके साथ कपोतेश्वरका दर्शन करने चले गये। इधर श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुके दण्डको तोड़कर उसके तीन टुकड़े करके उसे भार्गी नदीमें बहा दिया। तभी श्रीशिवका दर्शन करके महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ लौट आये ॥ 141-143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'भार्गीनदी'-आजकल 'दण्डभाङ्गा'- नदीके नामसे विख्यात है; यह पुरीसे तीन कोस उत्तरमें है। 'कपोतेश्वर'-दण्डभाङ्गा नदीके निकटमें है। 'दण्ड'-संन्यासके समय महाप्रभुने जिस दण्डको प्राप्त किया था, उसे श्रीनित्यानन्द प्रभुके हाथमें देकर वे कपोतेश्वर गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस दण्डके तीन टुकड़े करके भार्गी नदीके जलमें बहा दिये, तबसे भार्गी नदीका नाम 'दण्डभाङ्गा' हो गया है। काय, वाक् और मनको दण्डित (शासन) करनेके लिये संन्यासी त्रिदण्ड धारण करते हैं। शङ्कराचार्यकी एकदण्ड धारण करनेकी विधि है। श्रीमहाप्रभुको उस प्रकार दण्ड धारण करनेकी । 155

[ 5/141-143 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कोई आवश्यकता नहीं है, ऐसा विचार करके श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस दण्डको तोड़कर फेंक दिया ॥ 141-143 ॥ अनुभाष्य- 'कपोतेश्वर' - शिवलिङ्ग। 'दण्ड'— श्रीगौरसुन्दरने काटोयामें शाङ्कर-भारती-सम्प्रदायमें एकदण्ड-संन्यास ग्रहण किया। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस संन्यास दण्डके तीन टुकड़े करके भार्गी (वर्तमान 'दण्डभाङ्गा') नदीमें फेंक दिया। संन्यासाश्रममें 'कुटीचक' और 'बहूदक' - अवस्थामें दण्डकी रक्षा करनेकी आवश्यकता है, किन्तु 'हंस' और 'परमहंस' अवस्थामें दण्डका त्याग करना ही विधि है। श्रीगौरहरि तो चौदह भुवनोंके पति (स्वामी) हैं, इसलिये उन्हें दूसरे संन्यासियोंकी भाँति न्यून-अधिकार प्रदर्शनकी कोई आवश्यकता नहीं है, ऐसा जानकर श्रीनित्यानन्द-स्वरूपने उस दण्डको तोड़कर फेंक दिया ॥ 142-143 ॥ अमृतानुकणा-चैतन्यभागवत अन्त्यखण्ड, दूसरा अध्याय- “दण्ड हाते करि' हासे नित्यानन्द-राय। दण्डेर सहित कथा कहेन लीलाय ॥ 206 ॥ 'अहे दण्ड, आमि याँरे बहिये हृदये। से तोमारे बहिबेक ए'त युक्त नहे ॥'207॥ एत बलि' बलराम परम प्रचण्ड। फेलिलेन दण्ड भाङ्गि' करि तीन खण्ड ॥ ”208 ॥ इनकी टीका 'गौड़ीय भाष्य'में जगद्गुरु श्रीश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने जनाया है, - “श्रीनित्यानन्द प्रभुने दण्डको सम्बोधित करते हुए कहा, - 'चौदह भुवनोंके पति श्रीकृष्णको हम सब सर्वदा हृदयमें धारण करते हैं; हम उनके नित्य सेवक हैं; तुम हमारे उन नित्य प्रभुको अपने वाहकके रूपमें बनाकर अपराध कर रहे हो। इसलिये श्रीकृष्णने भक्तभावको अङ्गीकार करके जिन सब विधि-ग्रहण या निषेध-त्यागके चिह्न (दण्ड) को अपने हाथों और कन्धोंपर वहन किया है, वह वहनकार्य केवल हम सबको ही शोभा देता है। हे दण्ड ! तुम मेरे प्रभुके प्रभु मत बनो, महाप्रभुके द्वारा तुम स्वयंको मत उठवाओ।' 'प्राकृत सहजिया भक्तब्रुव' अर्थात् प्राकृत-जो भगवान्‌की अप्राकृत लीलाओंको प्राकृत काम-क्रीड़ाकी भाँति समझते हैं; सहजिया-जो भक्त होनेका अभिनय करते हैं; भक्तब्रुव-जो दिखनेमें तो भक्त हैं, परन्तु वास्तवमें भक्त नहीं हैं, वे श्रीकृष्णसे धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष-आदिकी इच्छा करके उनके द्वारा सेवा करवाकर अपने इन्द्रिय-भोग करते हैं। (वास्तविक) भक्तोंका इस प्रकार मनका भाव नहीं होता। “केवलाद्वैतवादी तथाकथित परमहंस एकदण्डी संन्यासी त्रिदण्डी संन्यासियोंका सदा ही अनादर करते हैं। श्रीगौरसुन्दरके द्वारा एक-दण्ड ग्रहण करनेकी छलनेवाली लीला प्रदर्शित करनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस दण्डको तीन भागोंमें खण्डित करके उसको त्रिदण्डके रूपमें परिणत कर दिया और इस दण्डको वहन करनेका भार भगवद्-सेवकोंके ऊपर दे दिया (अर्थात् भगवान् दण्डको वहन नहीं करेंगे)। इसलिये अति प्राचीनकालसे महाभारतमें जो हंस-गीति है, उसमें “वाचो वेगम्” श्लोक त्रिदण्ड-ग्रहणके प्रमाण और योग्यताको सूचित करता है। और त्रिदण्डिगणोंमें जो रूपानुगत्व है, इसे श्रीरूपगोस्वामी प्रभुने 'उपदेशामृत'में लिपिबद्ध किया है। ब्रह्ममें लीन होनेके इच्छुक सम्प्रदाय आदिमें दीक्षित प्रच्छन्न बौद्ध-मतावलम्बी मायावादियोंने त्रिदण्डके विरुद्ध 'परिमल' नामकी टीकाममें प्रचुर गाली-गलौज की है। भविष्यमें मायावादी मतमें दीक्षित 'न्यायरक्षामणि', शिवार्क-मणिदीपिका'-आदि ग्रन्थोंके भीतरमें जो भक्ति-विरोधी मतवाद लिखेंगे, उनकी अयोग्यता दिखानेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीगौरसुन्दरके एकदण्डको त्रिदण्डमें परिणत कर दिया। (और) 'शुद्धाद्वैत'-मतावलम्बियोंकी (जैसे श्रीमाध्व-सम्प्रदायकी) शिष्य-परम्परामें जो एकदण्ड ग्रहणकी प्रथा प्रचलित थी और प्रचलित है, वह श्रीमाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायमें अनुमोदित नहीं है। इसे ही समझानेके लिये श्रीबलदेवप्रभुने (श्रीनित्यानन्द प्रभुने) संन्यास-वेषधारी श्रीचैतन्यदेवके एकदण्डको त्रिदण्डमें परिणत किया है—यही श्रीमद्भागवत-सम्मत एवं गौड़ीय 156 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/142-151 ] वैष्णवोंका एकमात्र विचार है। 'त्रिदण्डी' न होनेसे कोई भी आत्मसंयम करनेमें समर्थ नहीं होता। कर्मकाण्डीय त्रिदण्डमें इन्द्रदण्ड, वज्रदण्ड और ब्रह्मदण्डके साथ जीवदण्डका समावेश है। श्रीरूपगोस्वामी प्रभुने त्रिदण्डकी व्याख्यामें काय-मनोवाक्-दण्डकी बात पारमार्थिक त्रिदण्डिगणोंको बतलायी है। त्रिदण्डके साथ जीवदण्डके संयोगमें प्राकृत बुद्धिसे चालित विचारसे त्रिदण्डका पारमहंस-धर्ममें एकदण्ड ही परिलक्षित होता है। किन्तु जिस एकदण्डमें जड़ीय मायाके तीन गुणोंके सम्मिलनमें 'गुणविधौत अवस्था' अर्थात् गुणोंको सम्पूर्ण रूपसे धोनेकी अवस्था नामक एकदण्ड है, वह एकायन पद्धतिमें कलङ्क आरोपित करता है, इसलिये त्रिदण्ड-सम्मिलनमें एकदण्ड ही एकायन पद्धतिमें स्वीकृत हुआ है। ब्रह्मसम्प्रदायमें, ब्रह्म-माध्व-सम्प्रदायमें और ब्रह्म-माध्व-गौड़ीय-सार्वजनिक-वैष्णव-समाजमें वह प्रथा चिरकालसे ही व्यक्त एवं अव्यक्तभावसे विद्यमान है॥ 142-143॥

तीन कोसकी दूरी भी उन्हें हजार योजन जितनी लम्बी लगने लगी॥ 144-146॥ अनुभाष्य—देउल—देवालय। अनङ्गभीम नामक राजाके द्वारा निर्मित वर्तमान श्रीजगन्नाथजीका मन्दिर। उपलभोगका मन्दिर, भोगवर्द्धन खण्ड एवं बाहर बना हुआ ऊँचा चबूतरा उस समयमें नहीं बना था। 'राजमार्ग'—श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये यात्री बङ्गालसे जिस रास्तेसे होते हुए पुरुषोत्तम आते थे। तीन कोस दूरसे श्रीजगन्नाथ मन्दिरके दर्शन करके श्रीमन्महाप्रभुमें अत्यधिक विरहके कारण सात्त्विक विकार उदित हो गये और वे भगवद्दर्शनके लिये अत्यन्त व्याकुल और उत्कण्ठित हो उठे। बहुत तीव्र विप्रलम्भमें (विरहमें) जिस प्रकार क्षणकालका विरह भी युगके समान प्रतीत होता है, नेत्रोंपर पलकें होनेके कारण गोपियाँ जिस प्रकार विधिकी (सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माकी) मूर्खता बताती हैं, उसी प्रकार तीन कोसका रास्ता महाप्रभुको सुदूर सैकड़ों योजनका लगने लगा॥ 144-146॥

पुरीके मन्दिरको देखकर श्रीकृष्णविरहमें आतुर महाप्रभुका नृत्य और आवेश :— जगन्नाथेर देउल देखि' आविष्ट हैला। दण्डवत् हञा प्रेमे नाचिते लागिला ॥ 144 ॥ भक्तगण आविष्ट हञा, सबे नाचे गाय। प्रेमावेशे प्रभु-सङ्गे राजमार्गे याय ॥ 145 ॥ हासे, कान्दे, नाचे प्रभु हुङ्कार गर्जन। तिनक्रोश पथ हैल—सहस्र-योजन ॥ 146 ॥

अनुवाद—दूरसे ही श्रीजगन्नाथदेवके मन्दिरको देखकर महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये और वहींसे दण्डवत् प्रणाम करके वे प्रेममें आविष्ट होकर नृत्य करने लगे। भक्तगण भी प्रेमाविष्ट होकर नाचने और गाने लगे और महाप्रभुके साथ राजमार्गपर चलने लगे। कभी हँसते, कभी रोते, कभी नृत्य करते और कभी हुँकार-गर्जन करते हुए महाप्रभु प्रेमावेशमें चल रहे थे। मन्दिरकी

आठारनालामें आकर महाप्रभुकी बाह्य दशा :— चलिते चलिते प्रभु आइला 'आठारनाला'। ताँहा आसि' प्रभु किछु बाह्य प्रकाशिला ॥ 147 ॥

श्रीनिताइसे अपने संन्यास-दण्डकी याचना :— नित्यानन्दे कहे प्रभु,—"देह मोर दण्ड।" नित्यानन्द बले,—"दण्ड हैल तिनखण्ड ॥ 148 ॥

निताइकी चतुरता ओर दण्डभङ्ग-वार्त्ता-निवेदन :— प्रेमावेशे पड़िला तुमि, तोमारे धरिनु। तोमा-सह तेरछे दण्ड-उपरे पड़िनु ॥ 149 ॥ दुइजनार भरे दण्ड खण्ड खण्ड हैल। सेइ दण्ड काँहा पड़िल, किछु ना जानिल ॥ 150 ॥ मोर अपराधे तोमार दण्ड हइल खण्ड। ये उचित हय, मोर कर तार दण्ड ॥" 151 ॥

अनुवाद—चलते-चलते महाप्रभु 'आठारनाला' नामक स्थानपर पहुँचे और वहाँ कुछ बाहरी-ज्ञान प्रकाशित

। 157

[ 5/147-157 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करते हुए उन्होंने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे कहा, - "मेरा संन्यास दण्ड दो।" श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,- "उस दण्डके तो तीन टुकड़े हो गये हैं। प्रेमके आवेशमें जब आप गिर रहे थे, तब मैंने आपको पकड़ा, किन्तु हम दोनों ही दण्डके ऊपर गिर पड़े। हम दोनोंके भारसे दण्ड टुकड़े-टुकड़े हो गया। अब उस दण्डके टुकड़े कहाँ हैं, मुझे कुछ पता नहीं। मेरे अपराधके कारण ही आपका दण्ड टूट गया, इसलिये अब आप जैसा भी उचित समझे, वैसा दण्ड मुझे दे सकते हैं।" 147-151 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आठारनाला'-पुरीमें प्रवेश करनेके लिये जो पुल है, उसका नाम 'आठारनाला' है; उस पुलके नीचे अठारह मेहराब (दो खम्बोंके ऊपर अर्द्ध-मण्डलाकार भाग) हैं॥ 147 ॥ पाँचवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। महाप्रभुका दुःख और थोड़ा क्रोध :- शुनि' किछु महाप्रभु दुःख प्रकाशिला। ईषत् क्रोध करि' किछु कहिते लागिला ॥ 152 ॥ महाप्रभुकी डाँट और अकेले श्रीजगन्नाथके दर्शनकी इच्छाका प्रकाश :- “नीलाचले आसि' मोर सबे हित कैला। सबे दण्डधन छिल, ताहा ना राखिला ॥ 153 ॥ तुमि-सब आगे याह ईश्वर देखिते। किवा आमि आगे याइ, ना याह सहिते ॥” 154 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुकी बात सुनकर महाप्रभुने थोड़ा दुःख प्रकाशित किया और थोड़ा क्रोध करते हुए कुछ कहने लगे, - "मेरे साथ नीलाचल तक आकर आप सबने मेरा बहुत उपकार किया है। संन्यास-दण्ड मेरा एकमात्र धन था, उसे भी आपने सम्भालकर नहीं रखा। अब आप सब आगे चलकर श्रीजगन्नाथका दर्शन करो अथवा मैं आगे जाऊँगा, अब मैं आपके साथ नहीं जाऊँगा॥”152-154 ॥ अनुभाष्य-वैध-संन्यासके योग्य एकदण्ड धारण करना महाप्रभुके लिये अनावश्यक है, क्योंकि महाप्रभु किसी विधिके अधीन नहीं हैं, श्रीनित्यानन्द प्रभुने ऐसा जानकर कि उस दण्डको ढोनेसे महाप्रभुको छुट्टी दे दी। महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुपर क्रोध इसलिये दिखलाया कि उनके द्वारा दण्डत्यागको देखकर भविष्यमें संन्यास लेनेवाले अयोग्य संन्यासी योग्यता प्राप्त करनेसे पहले ही अपने दण्डको तोड़ देंगे और इससे वैदिक-विधि शिथिल हो जायेगी। श्रेष्ठ व्यक्तिके आचरणका जगत्के अन्यान्य लोग अनुसरण करते हैं। भ्रान्त चित्तवाले व्यक्ति श्रुति-स्मृति-पुराणादिमें कहे गये भक्तिके अनुकूल वैधमार्गके तात्पर्यको नहीं समझनेसे उसकी अवहेलना करके मनोकल्पित-मार्गको अनुराग-मार्ग अथवा अवधूताचार मानते हैं। ऐसे लोगोंको भक्तिमें बहुत असुविधा होगी, इसी कारणसे महाप्रभुकी यह क्रोध- प्रदर्शन-लीला है॥ 152 ॥ मुकुन्दका महाप्रभुको पहले जानेका अनुरोध :- मुकुन्द दत्त कहे,-"प्रभु, तुमि याह आगे। आमि-सब पाछे याब, ना याब तोमार सङ्गे ॥” 155 ॥ अनुवाद-श्रीमुकुन्द दत्तने कहा, - "प्रभो! आप आगे चलिये। हम सब आपके पीछे चलेंगे। हम आपके साथ नहीं जायेंगे॥" 155 ॥ दोनों प्रभुओंका भाव-अचिन्त्य :- एत शुनि' प्रभु आगे चलिला शीघ्रगति । बुझिते ना पारे কেহ दुइ प्रभुर मति ॥ 156 ॥ इँहो केने दण्ड भाङ्गे, तँहो केने भाङ्गाय। भाङ्गाञा क्रोधे तँहो इँहाके दोषाय ॥ 157 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभु तेज़ीसे आगे चल पड़े। महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु-इन दोनोंके गूढ़ भावोंको कोई नहीं जान सकता। श्रीनित्यानन्द प्रभुने दण्डको क्यों तोड़ा अथवा महाप्रभुने ही उन्हें दण्ड तोड़नेकी अनुमति क्यों दी? और अनुमति देकर फिर क्रोध करके श्रीनित्यानन्द प्रभुको दोष क्यों दे रहे हैं? ॥ 156-157 ॥ 158 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/158-161 ] दोनोंमें अभेद-दर्शनकारी भक्त ही इस लीलाको समझनेमें समर्थ :- दण्डभङ्ग-लीला एइ-परम गम्भीर। सेइ बुझे, दुँहार पदे याँर भक्ति धीर ॥ 158 ॥ अनुवाद-दण्डभङ्ग-लीला अत्यन्त गम्भीर है। जिसकी महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनोंके चरणकमलोंमें अचला भक्ति है, वही इस लीलाको समझ सकता है॥ 158 ॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको वास्तविक रूपमें धीर होकर जिन्होंने समझा है, वे ही दोनों प्रभुओंके स्वरूप और इस दण्डभङ्ग-लीलाके तात्पर्यको समझ पायेंगे। पूर्व महाजनोंने श्रीकृष्ण-चरणसेवाके लिये दण्ड ग्रहणकर संसारके अभिनिवेशको त्याग किया है। साधकरूपसे महाजनोंके मार्गका अनुगमन करके वैध-संन्यासकी जो आवश्यकता है, उसको महाप्रभुने भी स्वीकार किया। यद्यपि विद्वत-संन्यासमें (परमहंस अवस्थामें) दण्डकी आवश्यकता नहीं रहती, तथापि लोकशिक्षाके लिये महाप्रभुने दिखलाया कि वर्णाश्रमके अन्तर्गत संन्यास अथवा विषय-त्याग करते हुए भक्तिके अनुकूल अनुष्ठानके लिये साधक जीवनमें यह आवश्यक है। दास श्रीनित्यानन्द प्रभु इस बातको जानते हैं कि संन्यासकी प्रारम्भिक अवस्थामें जो दण्ड वहनका कार्य है, वह वास्तवमें महाप्रभुका उच्च परमहंसका अधिकार होनेके कारण उनके लिये आवश्यक नहीं है। परन्तु दूसरे जड़बुद्धिवाले व्यक्ति महाप्रभुको 'कुटीचक' या 'बहुदक' संन्यासकी अवस्थामें स्थित समझकर कहीं भ्रमित होकर अपराध ना करें, इसलिये परम उच्चतम अवस्थाका आदर्श दिखलानेके लिये महाप्रभुसे दण्ड-त्याग करवाया ॥ 158 ॥ वक्ता और श्रोता, दोनोंके ही भगवान् होनेके कारण श्रीसाक्षी-गोपालका वृत्तान्त-अलौकिक :- ब्रह्मण्यदेव-गोपालेर महिमा एइ धन्य। नित्यानन्द-वक्ता यार, श्रोता-श्रीचैतन्य ॥ 159 ॥ अनुवाद-ब्रह्मण्यदेव श्रीगोपालकी महिमा भी धन्य है, जिसके वक्ता श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रोता महाप्रभु हैं॥ 159 ॥ अनुभाष्य-श्रीसाक्षी-गोपालकी कथामें चार निर्देशोंपर विचार करना चाहिये-1) श्रीगोपालमूर्ति नित्यसत्य विग्रह है; 2) 'स्वयंसत्य विग्रह'-जड़जगत्की लौकिक विधिको लाँघकर सदैव सत्यकी मर्यादा स्थापित करते हैं; 3) ब्राह्मण-जीवनमें सत्यमें स्थित होना विशेष रूपसे आवश्यक है; 4) श्रीकृष्णभक्त स्वतः ही ब्राह्मण हैं और ऐसे ब्राह्मणके वशीभूत स्वयं श्रीकृष्ण हैं, इसलिये श्रीकृष्णाश्रित ब्राह्मण केवल मायाबद्ध जीव नहीं हैं॥ 159 ॥ पाँचवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रद्धावान श्रोताको श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति :- श्रद्धायुक्त हञा इहा शुने येइ जन। अचिरे मिलये तारे गोपाल-चरण ॥ 160 ॥ अनुवाद-जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस साक्षी-गोपालकी लीलाको श्रवण करता है, उसे शीघ्र ही श्रीगोपालके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है॥ 160 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 161 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे साक्षिगोपाल-चरित्र-वर्णनं नाम पञ्चम-परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस चैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 161 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें साक्षिगोपाल-चरित्र-वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त। । 159

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छठा अध्याय

कथासार-श्रीमन्महाप्रभुमें श्रीजगन्नाथके दर्शनसे महाप्रेममें महाभावरूप सात्त्विक विकार उदित होनेपर श्रीसार्वभौम उन्हें उठवाकर अपने घर ले गये। श्रीसार्वभौमके बहनोई श्रीगोपीनाथाचार्यने पूर्व परिचित श्रीमुकुन्दसे मिलकर उनसे श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करने और नीलाचलमें आगमनकी बातको सुना। लोगोंके मुखसे महाप्रभुके महाभावकी बातको सुनकर सभी श्रीसार्वभौमके घरमें गये। श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि सभी भक्त श्रीसार्वभौमके पुत्र चन्दनेश्वरके साथ श्रीजगन्नाथके दर्शन करके आये, और तृतीय प्रहरमें महाप्रभुकी चैतन्य (बाह्यदशा) हुई। श्रीसार्वभौमने आदरपूर्वक सभीको महाप्रसाद सेवन करवाया। श्रीसार्वभौमके साथ महाप्रभुका परिचय होनेपर श्रीसार्वभौमने उनको अपनी मौसीसासके घरपर रहने योग्य स्थान दे दिया। श्रीगोपीनाथाचार्यने जब महाप्रभुको 'ईश्वर' बतलाया, तब श्रीसार्वभौम और उनके शिष्योंके साथ उनका बहुत तर्क-वितर्क हुआ। परमेश्वरकी कृपाके बिना परमेश्वरके तत्त्वको नहीं जाना जा सकता और पाण्डित्यके द्वारा भी ईश्वरको जाना नहीं जा सकता,—ये सब बातें श्रीगोपीनाथने अच्छी तरहसे समझा दीं। उन्होंने भागवत और महाभारतके आधारपर प्रमाणित किया कि महाप्रभु साक्षात् भगवान् हैं, तो भी श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उनकी बातोंका मजाक उड़ाया। महाप्रभुने उनकी सब बातें सुनी और उन्होंने कहा,—श्रीभट्टाचार्य हमारे गुरु हैं, स्नेहपूर्वक वे जो कुछ बोलते हैं, वह हमारे मङ्गलके लिये है। श्रीभट्टाचार्यके साथ जब महाप्रभुकी आमने-सामने बात होनेपर श्रीभट्टाचार्यने उन्हें वेदान्त श्रवण करनेकी आज्ञा दी। महाप्रभुने उसे स्वीकार करके सात दिन तक मौन रहकर वेदान्त श्रवण किया। श्रीभट्टाचार्यने कहा,—हे कृष्णचैतन्य, क्या तुम वेदान्त नहीं समझ रहे हो?' महाप्रभुने उत्तर दिया,—'आपने श्रवण करनेके लिये कहा था, मैं श्रवण कर रहा हूँ; श्रीव्यासदेवके द्वारा लिखे गये सूत्रोंको तो मैं बहुत अच्छी तरहसे समझता हूँ, केवल आप जिस मायावादी-भाष्यको पढ़ रहे हैं, उसको नहीं समझ पा रहा हूँ।' श्रीभट्टाचार्यके प्रश्नोंके उत्तरमें महाप्रभुने उपनिषद् और वेदान्तकी व्याख्या करते हुए 'सविशेषवाद'को स्थापित किया। उन्होंने कहा,—'मायावादियोंके मतानुसार, ब्रह्म-निराकार और शक्तिहीन है। मायावादियोंके यह दो महाभ्रम हैं। वेदमें सर्वत्र ब्रह्मकी शक्तिको स्वीकार किया गया है और उनके सच्चिदानन्द, अप्राकृत विग्रहको स्वीकार किया गया है। वेदके मतानुसार ईश्वर और जीव-युगपत् (एक ही साथ) स्वरूपतः और स्वभावतः नित्य भिन्न और नित्य अभिन्न हैं। फलस्वरूप अचिन्त्यभेदाभेद-सिद्धान्त ही वेद और वेदान्तका मत है। मायावादी वास्तवमें नास्तिक हैं।' श्रीभट्टाचार्य बहुत विचार करके हार गये। (उसके बाद महाप्रभुने) श्रीभट्टाचार्यकी प्रार्थनापर 'आत्माराम' श्लोकके अठारह प्रकारके अर्थ किये। श्रीभट्टाचार्यमें जब ज्ञानका उदय हुआ, तब महाप्रभुने उन्हें अपना रूप दिखाया। श्रीभट्टाचार्यने एक सौ श्लोक उच्चारण करके उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुकी अलौकिक कृपाको देखकर श्रीगोपीनाथ आदि सभी बहुत प्रसन्न हुए। बादमें एकदिन महाप्रभुने अरुणोदयके समय (श्रीजगन्नाथजीके) शय्योत्थान लीला (मङ्गल आरती)के दर्शन करनेके बाद 'पाकाल' प्रसादको लाकर श्रीभट्टाचार्यको दिया। श्रीभट्टाचार्यने तब पूर्व संस्कारोंका त्याग करके अत्यधिक आनन्दसे 'महाप्रसाद'को प्राप्त किया। और किसी दिन श्रीभट्टाचार्यके द्वारा भक्तिके श्रेष्ठ साधन-अङ्गको जाननेकी इच्छा करनेपर महाप्रभुने उन्हें 'नाम-सङ्कीर्तन'

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[ 6/1-5 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

करनेका उपदेश दिया। और एक दिन श्रीसार्वभौमने ‘तत्तेऽनुकम्पां’ श्लोकके अन्तिम अंशमें ‘मुक्ति-पद’के स्थानपर ‘भक्ति-पद’ शब्द लगाकर महाप्रभुको सुनाया। महाप्रभुने कहा,–‘श्रीमद्भागवतके श्लोकमें परिवर्तन करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। ‘मुक्तिपद’-शब्दसे श्रीकृष्णको समझना चाहिये।’ श्रीभट्टाचार्यने उस समय शुद्धभक्तिका पात्र बनकर कहा,–‘यद्यपि ‘मुक्तिपद’-शब्दका अर्थ ‘श्रीकृष्ण’ होता है, तथापि आश्लिष्य-दोषके कारण ‘मुक्तिपद’-शब्द प्रयोग करनेकी रुचि नहीं होती; ‘भक्तिपद’ कहनेसे भक्तोंको बहुत सुख होता है।’ श्रीभट्टाचार्यके मायावादके चङ्गुलसे छूटनेकी बातको सुनकर नीलाचलवासी पण्डित महाप्रभुके शरणागत हुए। –(अमृतप्रवाहभाष्य)

सार्वभौम-विजयी श्रीगौरको प्रणाम :– नौमि तं गौरचन्द्रं यः कुतर्क-कर्कशाशयम्। सार्वभौमं सर्वभूमा भक्तिभूमानमाचरत्॥1॥

अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य–जिन सर्वभूमा पुरुषने कुतर्क-कर्कश हृदयवाले श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको भक्तिपूर्ण कर दिया था, उन श्रीगौरचन्द्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥1॥ अनुभाष्ययः सर्वभूमा (सर्वेभ्यः देवीधामान्तर्गत-सर्वोपाधिधारिभ्यः देव-नरेभ्यः ब्रह्मलोक-वैकुण्ठगोलोकाद्यवस्थितेभ्यः कृष्णोतर-सर्ववस्तुभ्यः भूमा महत्त्वं यस्य सः परमपरमात्मा गौरचन्द्रः) कुतर्क-कर्कशाशयं (कुतर्केन स्वरूपस्ववृत्त्यादिभ्रान्त्य कृष्ण-सेवनेतर-चेष्टया कुज्ञानाश्रितेन कर्कशः जड़ाभिमानपूर्णः आशयः चित्तं यस्य तं) सार्वभौमं (वासुदेवाख्यं पण्डितराजं) भक्तिभूमानं (शुद्धभक्तिपूर्णं पात्रम्) आचरत् (कारयामास, स्वपदसेवकं चकार इत्यर्थः) तं (गौरचन्द्रं) नौमि। श्लोक-भावानुवाद–देवीधामके अन्तर्गत सभी देवता-नरादि उपाधिधारी, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, गोलोकादिमें अवस्थित कृष्णेतर-सभी वस्तुओंसे भी श्रेष्ठ जिन परमपरमात्माने स्वरूप-स्ववृत्तिसे भ्रान्त अर्थात् श्रीकृष्णसेवासे इतर चेष्टाओंके द्वारा कुज्ञानका आश्रय करके जड़ाभिमानपूर्ण चित्तवाले वासुदेव सार्वभौम पण्डितराजको शुद्धभक्तिका पात्र बनाया, उन श्रीगौरचन्द्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥1॥

जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥

अनुवाद–श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥2॥

प्रेमके आवेशमें श्रीजगन्नाथको आलिङ्गन करनेके लिये जाते हुए महाप्रभुकी मूर्च्छा :– आवेशे चलिला प्रभु जगन्नाथ-मन्दिरे। जगन्नाथ देखि' प्रेमे हइला अस्थिरे॥3॥ जगन्नाथ आलिङ्गिते चलिला धाञा। मन्दिरे पड़िला प्रेमे आविष्ट हञा॥4॥

अनुवाद–[नित्यानन्द प्रभु आदिको पीछे छोड़कर आठारनालासे अकेले] महाप्रभु प्रेमके आवेशमें श्रीजगन्नाथ मन्दिरकी ओर चल पड़े और श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करके वे प्रेममें आविष्ट हो गये। महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवका आलिङ्गन करनेके लिये दौड़े, परन्तु प्रेममें आविष्ट होकर वे मन्दिरमें मूर्च्छित होकर गिर पड़े॥3-4॥

दैववशतः श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुका दर्शन और महाप्रभुको चोट लगनेसे रक्षा करना :– दैवे सार्वभौम ताँहाके करे दरशन। पड़िछा मारिते तँहो कैल निवारण॥5॥

अनुवाद–श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको गिरते हुए देखा। पड़िछा जब महाप्रभुको मारने जा रहे थे, तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया॥5॥ अमृतप्रवाह भाष्य–‘पड़िछा’–श्रीमन्दिरका दारोगा जैसा

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छठा अध्याय 6/5-12 ] विशेष कर्मचारी। वे पड़िछा श्रीसार्वभौमके शिक्षा-शिष्य थे॥5॥ श्रीसार्वभौमका विस्मय :- प्रभुर सौन्दर्य आर प्रेमेर विकार। देखि' सार्वभौम हैला विस्मित अपार॥6॥ अनुवाद—महाप्रभुके सौन्दर्य और उनके प्रेमके विकारोंको देखकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य आश्चर्यचकित हो गये॥6॥ महाप्रभुकी चेतनता आनेमें विलम्ब देखकर महाप्रभुको अपने घरमें लाना :- बहुक्षणे चैतन्य नहे, भोगेरा काल हैल। सार्वभौम मने तबे उपाय चिन्तित॥7॥ शिष्य पड़िछा-द्वारा निल बहाञा। घरे आनि' पवित्र-स्थाने राखिल शोयाञा॥8॥ अनुवाद—बहुत देरतक भी जब महाप्रभुकी चेतनता नहीं आयी और उधर श्रीजगन्नाथदेवको भोग लगानेका समय भी हो गया, तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने मनमें एक उपाय सोचा। वे अपने पड़िछा शिष्योंके द्वारा महाप्रभुको उठवाकर अपने घरमें ले गये और वहाँ उन्हें एक पवित्र स्थानपर लिटा दिया॥7-8॥ अनुभाष्य—'घरे'—श्रीवासुदेव सार्वभौम उस समय श्रीमन्दिरके दक्षिणकी ओर स्थित बालूखण्डपर मार्कण्डेय-सरोवरके तटपर वास करते थे। आजकल उनका वह घर 'गङ्गामातामठ'के नामसे प्रसिद्ध है॥8॥ महाप्रभुको मृतकी भाँति अचेतन देखकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको आशङ्का :- श्वास-प्रश्वास नाहि उदर-स्पन्दन। देखिया चिन्तित हैल भट्टाचार्येर मन॥9॥ अनुवाद—महाप्रभुकी श्वास भी नहीं चल रही थी और उनके उदरमें भी किसी प्रकारके स्पन्दनको न देखकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य चिन्तित हो गये॥9॥ महाप्रभुकी चेतनताकी परीक्षा और भट्टाचार्यको कुछ धैर्यकी प्राप्ति :- सूक्ष्म तुला आनि' नासा-अग्रेते धरिल। ईषत् चलये तुला देखि' धैर्य हैल॥10॥ अनुवाद—तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने रुईकी पतली बत्ती महाप्रभुके नाकके आगे रखी और उस रुईको थोड़ा-सा हिलता हुआ देखकर उनको कुछ धैर्य हुआ कि श्वास कुछ चल रही है॥10॥ भट्टाचार्यको महाप्रभुके देहमें महाप्रेमके विकारका ज्ञान :- बसि' भट्टाचार्य मने करेन विचार। 'एइ कृष्ण-महाप्रेमेर सात्त्विक विकार॥11॥ अनुवाद—महाप्रभुके पास बैठकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने मनमें विचार किया,—'ये तो कृष्ण-महाप्रेमके सात्त्विक विकार हैं॥11॥ अनुभाष्य—मध्यलीला, 3/162 संख्या देखें॥11॥ 'सुदीप्त भाव' :- 'सुदीप्त सात्त्विक' एइ नाम ये 'प्रणय'। नित्यसिद्ध-भक्ते से 'सुदीप्त भाव' हय॥12॥ अनुवाद—इसमें जो सुदीप्त सात्त्विकभाव दिख रहे हैं, इसका नाम 'प्रणय' है। केवल भगवान्‌के नित्यसिद्ध भक्तोंमें ये 'सुदीप्त भाव' देखे जाते हैं॥12॥ अनुभाष्य—'सुदीप्त'—(भःरःसिः दःविः तीसरी लहरी)—अष्टसात्त्विक विकारोंको गोपन करनेकी चेष्टा दो प्रकार की है—'धूमायिता' और 'ज्वलिता'। 'धूमायिता'— “अद्वितीया अमी भावा अथवा सद्वितीयकाः। ईषद्व्यक्ता अपहोतुं शक्या धूमायिता मताः॥ अर्थात् “एक या दो भाव सहज-भावुकके शरीरमें थोड़ेसे प्रकाशित होनेपर जिन भावोंको छिपाया जा सकता है, उन भावोंको 'धूमायिता' कहते हैं। 'ज्वलिता'— “द्वौ वा त्रयो वा युगपद् यान्तः सुप्रकटां दशाम्। शक्याः कृच्छ्र । 163