श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1010, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय
कथासार-श्रीमन्महाप्रभुमें श्रीजगन्नाथके दर्शनसे महाप्रेममें महाभावरूप सात्त्विक विकार उदित होनेपर श्रीसार्वभौम उन्हें उठवाकर अपने घर ले गये। श्रीसार्वभौमके बहनोई श्रीगोपीनाथाचार्यने पूर्व परिचित श्रीमुकुन्दसे मिलकर उनसे श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करने और नीलाचलमें आगमनकी बातको सुना। लोगोंके मुखसे महाप्रभुके महाभावकी बातको सुनकर सभी श्रीसार्वभौमके घरमें गये। श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि सभी भक्त श्रीसार्वभौमके पुत्र चन्दनेश्वरके साथ श्रीजगन्नाथके दर्शन करके आये, और तृतीय प्रहरमें महाप्रभुकी चैतन्य (बाह्यदशा) हुई। श्रीसार्वभौमने आदरपूर्वक सभीको महाप्रसाद सेवन करवाया। श्रीसार्वभौमके साथ महाप्रभुका परिचय होनेपर श्रीसार्वभौमने उनको अपनी मौसीसासके घरपर रहने योग्य स्थान दे दिया। श्रीगोपीनाथाचार्यने जब महाप्रभुको 'ईश्वर' बतलाया, तब श्रीसार्वभौम और उनके शिष्योंके साथ उनका बहुत तर्क-वितर्क हुआ। परमेश्वरकी कृपाके बिना परमेश्वरके तत्त्वको नहीं जाना जा सकता और पाण्डित्यके द्वारा भी ईश्वरको जाना नहीं जा सकता,—ये सब बातें श्रीगोपीनाथने अच्छी तरहसे समझा दीं। उन्होंने भागवत और महाभारतके आधारपर प्रमाणित किया कि महाप्रभु साक्षात् भगवान् हैं, तो भी श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उनकी बातोंका मजाक उड़ाया। महाप्रभुने उनकी सब बातें सुनी और उन्होंने कहा,—श्रीभट्टाचार्य हमारे गुरु हैं, स्नेहपूर्वक वे जो कुछ बोलते हैं, वह हमारे मङ्गलके लिये है। श्रीभट्टाचार्यके साथ जब महाप्रभुकी आमने-सामने बात होनेपर श्रीभट्टाचार्यने उन्हें वेदान्त श्रवण करनेकी आज्ञा दी। महाप्रभुने उसे स्वीकार करके सात दिन तक मौन रहकर वेदान्त श्रवण किया। श्रीभट्टाचार्यने कहा,—हे कृष्णचैतन्य, क्या तुम वेदान्त नहीं समझ रहे हो?' महाप्रभुने उत्तर दिया,—'आपने श्रवण करनेके लिये कहा था, मैं श्रवण कर रहा हूँ; श्रीव्यासदेवके द्वारा लिखे गये सूत्रोंको तो मैं बहुत अच्छी तरहसे समझता हूँ, केवल आप जिस मायावादी-भाष्यको पढ़ रहे हैं, उसको नहीं समझ पा रहा हूँ।' श्रीभट्टाचार्यके प्रश्नोंके उत्तरमें महाप्रभुने उपनिषद् और वेदान्तकी व्याख्या करते हुए 'सविशेषवाद'को स्थापित किया। उन्होंने कहा,—'मायावादियोंके मतानुसार, ब्रह्म-निराकार और शक्तिहीन है। मायावादियोंके यह दो महाभ्रम हैं। वेदमें सर्वत्र ब्रह्मकी शक्तिको स्वीकार किया गया है और उनके सच्चिदानन्द, अप्राकृत विग्रहको स्वीकार किया गया है। वेदके मतानुसार ईश्वर और जीव-युगपत् (एक ही साथ) स्वरूपतः और स्वभावतः नित्य भिन्न और नित्य अभिन्न हैं। फलस्वरूप अचिन्त्यभेदाभेद-सिद्धान्त ही वेद और वेदान्तका मत है। मायावादी वास्तवमें नास्तिक हैं।' श्रीभट्टाचार्य बहुत विचार करके हार गये। (उसके बाद महाप्रभुने) श्रीभट्टाचार्यकी प्रार्थनापर 'आत्माराम' श्लोकके अठारह प्रकारके अर्थ किये। श्रीभट्टाचार्यमें जब ज्ञानका उदय हुआ, तब महाप्रभुने उन्हें अपना रूप दिखाया। श्रीभट्टाचार्यने एक सौ श्लोक उच्चारण करके उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुकी अलौकिक कृपाको देखकर श्रीगोपीनाथ आदि सभी बहुत प्रसन्न हुए। बादमें एकदिन महाप्रभुने अरुणोदयके समय (श्रीजगन्नाथजीके) शय्योत्थान लीला (मङ्गल आरती)के दर्शन करनेके बाद 'पाकाल' प्रसादको लाकर श्रीभट्टाचार्यको दिया। श्रीभट्टाचार्यने तब पूर्व संस्कारोंका त्याग करके अत्यधिक आनन्दसे 'महाप्रसाद'को प्राप्त किया। और किसी दिन श्रीभट्टाचार्यके द्वारा भक्तिके श्रेष्ठ साधन-अङ्गको जाननेकी इच्छा करनेपर महाप्रभुने उन्हें 'नाम-सङ्कीर्तन'
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