भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1011

[ 6/1-5 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

करनेका उपदेश दिया। और एक दिन श्रीसार्वभौमने ‘तत्तेऽनुकम्पां’ श्लोकके अन्तिम अंशमें ‘मुक्ति-पद’के स्थानपर ‘भक्ति-पद’ शब्द लगाकर महाप्रभुको सुनाया। महाप्रभुने कहा,–‘श्रीमद्भागवतके श्लोकमें परिवर्तन करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। ‘मुक्तिपद’-शब्दसे श्रीकृष्णको समझना चाहिये।’ श्रीभट्टाचार्यने उस समय शुद्धभक्तिका पात्र बनकर कहा,–‘यद्यपि ‘मुक्तिपद’-शब्दका अर्थ ‘श्रीकृष्ण’ होता है, तथापि आश्लिष्य-दोषके कारण ‘मुक्तिपद’-शब्द प्रयोग करनेकी रुचि नहीं होती; ‘भक्तिपद’ कहनेसे भक्तोंको बहुत सुख होता है।’ श्रीभट्टाचार्यके मायावादके चङ्गुलसे छूटनेकी बातको सुनकर नीलाचलवासी पण्डित महाप्रभुके शरणागत हुए। –(अमृतप्रवाहभाष्य)

सार्वभौम-विजयी श्रीगौरको प्रणाम :– नौमि तं गौरचन्द्रं यः कुतर्क-कर्कशाशयम्। सार्वभौमं सर्वभूमा भक्तिभूमानमाचरत्॥1॥

अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य–जिन सर्वभूमा पुरुषने कुतर्क-कर्कश हृदयवाले श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको भक्तिपूर्ण कर दिया था, उन श्रीगौरचन्द्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥1॥ अनुभाष्ययः सर्वभूमा (सर्वेभ्यः देवीधामान्तर्गत-सर्वोपाधिधारिभ्यः देव-नरेभ्यः ब्रह्मलोक-वैकुण्ठगोलोकाद्यवस्थितेभ्यः कृष्णोतर-सर्ववस्तुभ्यः भूमा महत्त्वं यस्य सः परमपरमात्मा गौरचन्द्रः) कुतर्क-कर्कशाशयं (कुतर्केन स्वरूपस्ववृत्त्यादिभ्रान्त्य कृष्ण-सेवनेतर-चेष्टया कुज्ञानाश्रितेन कर्कशः जड़ाभिमानपूर्णः आशयः चित्तं यस्य तं) सार्वभौमं (वासुदेवाख्यं पण्डितराजं) भक्तिभूमानं (शुद्धभक्तिपूर्णं पात्रम्) आचरत् (कारयामास, स्वपदसेवकं चकार इत्यर्थः) तं (गौरचन्द्रं) नौमि। श्लोक-भावानुवाद–देवीधामके अन्तर्गत सभी देवता-नरादि उपाधिधारी, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, गोलोकादिमें अवस्थित कृष्णेतर-सभी वस्तुओंसे भी श्रेष्ठ जिन परमपरमात्माने स्वरूप-स्ववृत्तिसे भ्रान्त अर्थात् श्रीकृष्णसेवासे इतर चेष्टाओंके द्वारा कुज्ञानका आश्रय करके जड़ाभिमानपूर्ण चित्तवाले वासुदेव सार्वभौम पण्डितराजको शुद्धभक्तिका पात्र बनाया, उन श्रीगौरचन्द्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥1॥

जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥

अनुवाद–श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥2॥

प्रेमके आवेशमें श्रीजगन्नाथको आलिङ्गन करनेके लिये जाते हुए महाप्रभुकी मूर्च्छा :– आवेशे चलिला प्रभु जगन्नाथ-मन्दिरे। जगन्नाथ देखि' प्रेमे हइला अस्थिरे॥3॥ जगन्नाथ आलिङ्गिते चलिला धाञा। मन्दिरे पड़िला प्रेमे आविष्ट हञा॥4॥

अनुवाद–[नित्यानन्द प्रभु आदिको पीछे छोड़कर आठारनालासे अकेले] महाप्रभु प्रेमके आवेशमें श्रीजगन्नाथ मन्दिरकी ओर चल पड़े और श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करके वे प्रेममें आविष्ट हो गये। महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवका आलिङ्गन करनेके लिये दौड़े, परन्तु प्रेममें आविष्ट होकर वे मन्दिरमें मूर्च्छित होकर गिर पड़े॥3-4॥

दैववशतः श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुका दर्शन और महाप्रभुको चोट लगनेसे रक्षा करना :– दैवे सार्वभौम ताँहाके करे दरशन। पड़िछा मारिते तँहो कैल निवारण॥5॥

अनुवाद–श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको गिरते हुए देखा। पड़िछा जब महाप्रभुको मारने जा रहे थे, तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया॥5॥ अमृतप्रवाह भाष्य–‘पड़िछा’–श्रीमन्दिरका दारोगा जैसा

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