भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1012

छठा अध्याय 6/5-12 ] विशेष कर्मचारी। वे पड़िछा श्रीसार्वभौमके शिक्षा-शिष्य थे॥5॥ श्रीसार्वभौमका विस्मय :- प्रभुर सौन्दर्य आर प्रेमेर विकार। देखि' सार्वभौम हैला विस्मित अपार॥6॥ अनुवाद—महाप्रभुके सौन्दर्य और उनके प्रेमके विकारोंको देखकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य आश्चर्यचकित हो गये॥6॥ महाप्रभुकी चेतनता आनेमें विलम्ब देखकर महाप्रभुको अपने घरमें लाना :- बहुक्षणे चैतन्य नहे, भोगेरा काल हैल। सार्वभौम मने तबे उपाय चिन्तित॥7॥ शिष्य पड़िछा-द्वारा निल बहाञा। घरे आनि' पवित्र-स्थाने राखिल शोयाञा॥8॥ अनुवाद—बहुत देरतक भी जब महाप्रभुकी चेतनता नहीं आयी और उधर श्रीजगन्नाथदेवको भोग लगानेका समय भी हो गया, तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने मनमें एक उपाय सोचा। वे अपने पड़िछा शिष्योंके द्वारा महाप्रभुको उठवाकर अपने घरमें ले गये और वहाँ उन्हें एक पवित्र स्थानपर लिटा दिया॥7-8॥ अनुभाष्य—'घरे'—श्रीवासुदेव सार्वभौम उस समय श्रीमन्दिरके दक्षिणकी ओर स्थित बालूखण्डपर मार्कण्डेय-सरोवरके तटपर वास करते थे। आजकल उनका वह घर 'गङ्गामातामठ'के नामसे प्रसिद्ध है॥8॥ महाप्रभुको मृतकी भाँति अचेतन देखकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको आशङ्का :- श्वास-प्रश्वास नाहि उदर-स्पन्दन। देखिया चिन्तित हैल भट्टाचार्येर मन॥9॥ अनुवाद—महाप्रभुकी श्वास भी नहीं चल रही थी और उनके उदरमें भी किसी प्रकारके स्पन्दनको न देखकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य चिन्तित हो गये॥9॥ महाप्रभुकी चेतनताकी परीक्षा और भट्टाचार्यको कुछ धैर्यकी प्राप्ति :- सूक्ष्म तुला आनि' नासा-अग्रेते धरिल। ईषत् चलये तुला देखि' धैर्य हैल॥10॥ अनुवाद—तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने रुईकी पतली बत्ती महाप्रभुके नाकके आगे रखी और उस रुईको थोड़ा-सा हिलता हुआ देखकर उनको कुछ धैर्य हुआ कि श्वास कुछ चल रही है॥10॥ भट्टाचार्यको महाप्रभुके देहमें महाप्रेमके विकारका ज्ञान :- बसि' भट्टाचार्य मने करेन विचार। 'एइ कृष्ण-महाप्रेमेर सात्त्विक विकार॥11॥ अनुवाद—महाप्रभुके पास बैठकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने मनमें विचार किया,—'ये तो कृष्ण-महाप्रेमके सात्त्विक विकार हैं॥11॥ अनुभाष्य—मध्यलीला, 3/162 संख्या देखें॥11॥ 'सुदीप्त भाव' :- 'सुदीप्त सात्त्विक' एइ नाम ये 'प्रणय'। नित्यसिद्ध-भक्ते से 'सुदीप्त भाव' हय॥12॥ अनुवाद—इसमें जो सुदीप्त सात्त्विकभाव दिख रहे हैं, इसका नाम 'प्रणय' है। केवल भगवान्‌के नित्यसिद्ध भक्तोंमें ये 'सुदीप्त भाव' देखे जाते हैं॥12॥ अनुभाष्य—'सुदीप्त'—(भःरःसिः दःविः तीसरी लहरी)—अष्टसात्त्विक विकारोंको गोपन करनेकी चेष्टा दो प्रकार की है—'धूमायिता' और 'ज्वलिता'। 'धूमायिता'— “अद्वितीया अमी भावा अथवा सद्वितीयकाः। ईषद्व्यक्ता अपहोतुं शक्या धूमायिता मताः॥ अर्थात् “एक या दो भाव सहज-भावुकके शरीरमें थोड़ेसे प्रकाशित होनेपर जिन भावोंको छिपाया जा सकता है, उन भावोंको 'धूमायिता' कहते हैं। 'ज्वलिता'— “द्वौ वा त्रयो वा युगपद् यान्तः सुप्रकटां दशाम्। शक्याः कृच्छ्र । 163