भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

३. मध्य-लीला (उत्तरार्ध): रामानन्द राय संवाद, वृन्दावन यात्रा, रूप-सनातन शिक्षा

आठवाँ अध्याय 8/190–192 ]

उनके मुखको ढक दिया। गीत-विरहकालमें श्रीमतीजीकी उक्ति है, इसलिये विप्रलम्भदशामें सम्भोगकी स्फूर्ति हुई॥ 190–192 ॥

अनुभाष्य- “व्यतीत्य भावनावर्त्म यश्चमत्कार-भारभूः। हृदि सत्त्वोज्ज्वले बाढं स्वदते स रसो मतः॥”

विशुद्ध-सत्त्वसे उज्ज्वल चित्तमें ही 'रस'का आस्वादन होता है। वह बाह्य-जगत् या अन्तर्जगत्के स्थूल-सूक्ष्म-उपाधियुक्त देह और मनके आस्वादन योग्य कार्य नहीं है। गौण स्थूल-सूक्ष्म-जगत्में जो अस्मिताका आभास लक्षित होता है, उसे अनात्म 'बुद्धि' और 'मनः' कहा जाता है। रसमय विषय रससे परिपूर्ण इन्द्रियोंके द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है। रसपूर्ण-इन्द्रियाँ रसमय-दर्शन-स्पर्शनादिके द्वारा रसिकशेखर, रसस्रोत, विषयविग्रह श्रीनन्दनन्दनकी प्रेममय सेवा करती हैं। यह निर्विशेषवादियोंकी प्राकृत-जगत्से परे जड़रहित अवस्था मात्र नहीं है, इसलिये 'रस'की संज्ञामें भावनावथका विशेष रूपसे अतिक्रमण लिखा गया है। भौतिकवादी लोग जड़जगत्में इन्द्रियभोगसे जो अनुभूति प्राप्त करते हैं, वे केवल उसके विपरीत भावका चिन्तन कर सकते हैं, परन्तु इस प्रकारके विचारोंसे वे अप्राकृत रसको नहीं समझ सकते। देह और मनके धर्मोंसे जो चमत्कारिता उत्पन्न होती है, वह असम्पूर्ण, लघु और नश्वर है, इसलिये ही कहा गया है कि चिन्मय-रस चमत्कारके गुरुत्वको प्रकाशित करता है। प्रेमा-शुद्ध और चिन्मय वस्तु है। अचित् वस्तुओंमें प्रीति-नश्वर है। तुच्छ-धर्म काममें ही अवस्थित है। जड़जगत्में इन्द्रियसुखमें बाधा होनेसे जो दुःख आता है, वह जड़-प्रीतिका 'विवर्त्त' है। दूसरी ओर प्रेमविलास और विलास-विवर्त्त किसी भी प्रकारका अभाव, निकृष्टता और अमङ्गल उत्पन्न नहीं करते। अप्राकृत-रस-रसिक श्रीरायरामानन्दने स्व-रचित जिस गीतका कीर्तन किया है, वह श्रीगौरसुन्दरके द्वारा अनुमोदित है या नहीं, ऐसी लीलाका अभिनय करते हुए उन्होंने प्रेम-विलास-विवर्त्तका वर्णन किया।

भक्तदास बाउल-कृत 'विवर्त्तविलास' ग्रन्थ—श्रीजगदानन्दके 'प्रेमविवर्त्त' और श्रीरामानन्दके प्रेमविलास-विवर्त्तसे सम्पूर्ण विपरीत ग्रन्थ है। आजकलके शिक्षित-अभिमानी व्यक्ति प्रेमविलास-विवर्त्तके विपरीत बुद्धि रखते हुए जड़ीय 'विवर्त्तविलास'के विचारोंका अनुसरण करके 'प्राकृत विद्यामन्दिर' (सांसारिक शिक्षा संस्थानों) से प्राकृत विद्यासागरगणों (सांसारिक विद्वानों) से 'पी.एच.डी.' की उपाधि प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु 'परविद्यामन्दिर' (अप्राकृत शिक्षा संस्थान) से 'पी.एच. डी.' की उपाधि प्राप्त करनेके लिये जड़ीय-अहङ्कारको छोड़कर अपने नित्य स्वरूपमें अवस्थित होना पड़ेगा। मनुष्योंके द्वारा रचित धर्मशास्त्र और अप्राकृत दर्शन-शास्त्रमें आकाश-पातालका भेद है। इस भेदको श्रीमन्मध्वाचार्यने परम आदरणीय विचारोंके द्वारा सुन्दर रूपसे दिखाया है। जड़-दार्शनिक लोग जड़ीय-धारणामें ही अवस्थित हैं, इसलिये वे प्रेम-विवर्त्तको अपनी मनघड़न्त अनुभूतिके द्वारा समझनेमें समर्थ नहीं होंगे। थालीके बीचमें जिस प्रकार हाथी नहीं बैठ सकता, उसी प्रकार आरोहवादी कितना भी प्रयास कर लें, उनमें सामर्थ्य नहीं होनेके कारण उनके लिये अप्राकृत अनुभूति असम्भव है।

श्रीरामानन्द रायकी उक्तिसे जिस 'प्रेम-वैचित्त्य'के अन्तर्गत 'मोहन-मादनादि अधिरूढ़ महाभावका विलास-वैचित्र्य और विलास-विवर्त्त कहा गया है, उसको समझनेमें प्राकृत-सहजिया असमर्थ हैं। प्राकृत सहजिया श्रीरामानन्दके गीतका निर्विशेषवादी अर्थ करनेमें लगे रहेंगे, किन्तु वह (निर्विशेषवाद) न तो श्रीरामानन्दके कहनेका और न ही श्रीगौरसुन्दरके श्रवणका विषय था। आजकलके जड़ीय दार्शनिक समाजमें भजनकी निगूढ़ चमत्कारिता और अपूर्वताका प्रचार अविधिपूर्वक है, ऐसा विचार करके ही श्रीगौरसुन्दरने अपने हाथसे श्रीरामानन्दके श्रीकृष्णगानमें रत मुखकमलको ढक दिया था। इसके द्वारा यह स्थापित हुआ है कि यह गीत

। 303

[ 8/190-192 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

जड़-दार्शनिकोंके अनुभवकी वस्तु नहीं है। तो भी, पूर्वोक्त विचारका अवलम्बन करनेसे ही केवलाद्वैतवादके स्थानपर शुद्धाद्वैतवादियोंका मत स्थापित हो सकता है। शुद्धाद्वैतवादी कहते हैं, — द्वैतजगत्में जो निकृष्टता है, उसके विपरीत जिस काल्पनिक अद्वयज्ञानको निर्देश किया जाता है, उसमें प्रेम-विलासका अभाव है। जड़-विवर्त्तवादी “ना सो रमण, ना हाम रमणी” इस पद्यकी व्याख्या विपरीत रूपसे करनेपर विषय-आश्रय-राहित्यरूपी कैवलाद्वैत-सिद्धिको 'अद्वयज्ञान' कहते हैं। ऐसी व्याख्या उन्हें पुनः जड़ीय-विवर्त्तमें ही धकेल देती है। इस विषयमें शुद्धाद्वैतवादी कहते हैं, — “ना सो रमण, ना हाम रमणी”—इस वाक्यमें वास्तव सत्यको ध्वंस नहीं किया गया है, किन्तु वस्तुमें वस्तु-शक्तिके परिचयसे जो अशुद्धाद्वैत-आशङ्का प्रवर्त्तित हुई है, उसका खण्डन ही उद्दिष्ट हुआ है। विशिष्टाद्वैतवादियोंकी भाषामें यह बात इस प्रकार है, — वस्तुका परिचय दुर्ज्ञेय है, किन्तु शक्ति और शक्तिमान्‌को अभिन्न माननेसे शक्तिके परिचयसे ही वस्तुकी जानकारी प्राप्त होती है। जो वस्तुकी शक्तिको वस्तुसे अलग करके, 'रमण' और 'रमणी', — दो वस्तुओंकी कल्पना करते हैं, उनके विचारसे श्रीरामानन्दकी यह उक्ति केवल जड़ीय-शक्तिमान् और जड़ीय-शक्तिके भेदका खण्डन करनेवाली है।

जड़भोक्ता रमणके साथ जड़भोग्या रमणीका भेद है, ऐसा समझकर प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदायके लोग अशुद्ध द्वैत विचारका आदर करते हैं। उससे बचनेके लिये चिन्त्यद्वैताद्वैत विचार प्रवर्तित हुआ है। इस विचारसे श्रीरामानन्दका अथवा श्रीगौरसुन्दरका अचिन्त्यभेदाभेद-विचार थोड़ा पृथक् है। शुद्धाद्वैत-विचार और अचिन्त्यभेदाभेद-विचारको इस स्थानपर एक ही तात्पर्यमय समझना चाहिये। शुद्धाद्वैतवादियोंके विचार, शुद्धद्वैतवादियोंके विचार, चिन्त्य-द्वैताद्वैतवादियोंके विचार, विशिष्टाद्वैतवादियोंके विचारसे अचिन्त्यभेदाभेद-विचार पृथक् है, इसीको अचिन्त्यभेदाभेद-आचार्य स्वयं अभिन्न व्रजेन्द्रनन्दन (श्रीचैतन्यदेव)ने अप्राकृत-साहजिक श्रीरामानन्द रायके श्रीमुखसे इस बातका प्रचार किया है। इन श्रीरामानन्दके विषयमें ही श्रीगौरसुन्दरने कहा है, — “सम्पूर्ण दक्षिण देश (भारत)में तुम्हारे समान अप्राकृत-सहज-धर्मावलम्बी मैंने नहीं देखा है; मैं एक पागल हूँ और तुम दूसरे पागल हो। इसलिये तुम और मैं एक समान हैं॥” यह बात कहकर श्रीगौरसुन्दरने अचिन्त्यभेदाभेद विचारका प्रदर्शन किया है, इसलिये श्रीजीवपादने अपनी 'सर्वसम्वादिनी'में गौड़ीयके वेदान्त दर्शनको ही 'अचिन्त्यभेदाभेद' कहकर स्वीकार किया है। अचिन्त्यभेदाभेद-विचारके विषयमें प्राकृत-साहजिक सम्प्रदाय जिस 'तेल लगायी हुई देहसे गंगा-स्नान'की कहानीका उदाहरण देते हैं, वह जड़जगत्का विवर्त्तमात्र है। इस उदाहरणके द्वारा भेदाभेदप्रकाश-तत्त्व नहीं जाना जा सकता।

शक्ति-शक्तिमान्-तत्त्वके अभेदके प्रतिपादनमें विषयका आश्रयके लिये उद्दीपन और आश्रयका विषयके लिये उद्दीपन-भाव सुन्दर रूपसे समझानेके लिये ही श्रीरामानन्दके गीतमें रमण-रमणीका परस्परके स्वरूप-ज्ञानका यथायथ भाव है। अहंग्रहोपासना-चिन्मात्रवादियोंकी मूढ़ता एवं चिद्-विलासका वैपरीत्य मात्र है। 'अद्वयज्ञानवस्तुमें आश्रयजातीय भावका अभाव है', जो ऐसा विचार रखते हैं, उनके लिये ही गोलोकमें स्थित औदार्यमय-प्रकोष्ठमें श्रीकृष्णकी नित्य गौरलीला प्रपञ्चमें अवतीर्ण (प्रकट) हुई है। प्रपञ्चमें अवतीर्ण गौरलीला कभी भी जड़सम्भोगवादी गौरनागरी वालोंकी भोगकी वस्तु नहीं है, इसीको बतानेके लिये ही यह प्रेम-विलास-विवर्त्तकी उदाहरण-लीला है। 'काञ्चना' आदि काल्पनिक दूतियोंकी अप्राकृत प्रेम विलासकी आवश्यकता नहीं है। प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदायमें अपने-आपको शुद्ध भक्तोंके समान प्रकाशित करनेकी वासना है। इसलिये श्रीकृष्ण-भजन रसकी कथाको श्रीकृष्णकथाके अकालमय जगत्में प्रचार करनेकी इच्छा करनेपर वे नानामतवाद-विवर्त्तमें पतित हो सकते हैं, ऐसा जानकर यह सब व्याख्या शुद्धभक्तिमान् लोगोंके लिये ही संरक्षित हुई है॥ 190-192॥

304 ।

आठवाँ अध्याय 8/193 ] श्रीराय रामानन्दका स्वकृत गान :- गीत “पहिलेहि राग नयनभङ्गे भेल। अनुदिन बाढ़ल, अवधि ना गेल॥ ना सो रमण, ना हाम रमणी। दुँहु-मन मनोभव पेषल जानि'॥ ए सखि, से-सब प्रेमकहिनि। कानुठामे कहबि बिछुरल जानि'॥ ना खोंजलुँ दूती, ना खोंजलुँ आन। दुँहुको मिलने मध्ये पाँचबाण॥ अब् सोहि विराग, तुँहु भेलि दूति। सु-पुरुष-प्रेमक ऐछन रीति॥”193॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥193॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“आहा, मिलनके पूर्वरागके समय परस्परके नयन-ईक्षणसे 'राग' नामक एक भावका उदय होता है; वही राग बढ़ते-बढ़ते 'अवधि' अथवा चरम सीमाको प्राप्त नहीं हुआ; वह राग-हम दोनोंके स्वभावसे ही उत्पन्न हुआ है। रमणस्वरूप कृष्ण ही उसके कारण हैं, ऐसा नहीं है, अथवा रमणीस्वरूपा मैं ही उसका कारण हूँ, वैसा भी नहीं है। परस्पर दर्शनसे जो 'राग' उदित हुआ, वही मनोभव अर्थात् मदन हुआ और उसने हमारे मनको पीसकर एक कर दिया था। अब विरहके समय, वे सब प्रेमकी बातें, हे सखी! कृष्ण यदि भूल भी गये हों, तुम तो यह समझ सकती हो, इसलिये उनको कहना, - मिलनके समय हमने किसी दूतीको नहीं ढूँढ़ा था, अथवा और किसीसे भी कोई अनुरोध नहीं किया था, अनङ्गरूपी पाँच बाण ही हमारे मिलनके मध्यस्थ थे। और, अब विरहके समय वही राग 'विराग' होकर अर्थात् विशिष्टराग अथवा विच्छेदगत-राग अथवा अधिरूढ़भावरूपमें, हे सखि, तुम दूतीके रूपमें कार्य कर रही हो! सुन्दर-पुरुषके प्रेममें यही रीति सर्वत्र देखोगी।' तात्पर्य यह है कि, - सम्भोगके समय 'राग' जैसे अनङ्गरूपमें मध्यस्थ होता है, विप्रलम्भके समय वह (राग) उसी प्रकार प्रेमविलास-विवर्त्तमें अधिरूढ़-भावयुक्त दूती होता है अर्थात् विप्रलम्भमें सम्भोग-स्फूर्ति कार्यमें दूतीस्वरूप बननेपर उसको श्रीमती 'सखी' कहकर सम्बोधन करते हुए यह बात कह रही हैं। मूल तात्पर्य यह है कि, - प्रेमविलास-सम्भोगमें भी जैसा आनन्द है, विप्रलम्भमें भी वैसा ही है; विशेषतः विप्रलम्भमें (सेवाकी पराकाष्ठासे कृष्णमें तन्मयभावके कारण) सर्पमें रस्सीके भ्रमके समान तमालवृक्षादिमें श्रीकृष्णभ्रमजनित विवर्त्त-भावयुक्त अधिरूढ़-महाभावरूपी एक प्रकारका सम्भोग उदित होता है॥193॥ अनुभाष्य- 'पहिलेहि'- सर्वप्रथम। 'राग'- पूर्वराग। “रतियाॅ सङ्गमात् पूर्वं दर्शनश्रवणादिजा। तयोरुन्मीलति प्राज्ञैः पूर्वरागः स उच्यते॥” (उःनीः 15/5) “नायक और नायिकाके मिलनसे पूर्व दर्शन, श्रवणादिसे उत्पन्न जिस रतिका आविर्भाव होता है, उसे पूर्वराग कहते हैं।” 'नयन-भङ्गे'-परस्पर दर्शन-विनिमयसे; नयन-भङ्गीसे अर्थात् अपाङ्गदर्शनसे परस्परके चित्तवृत्ति-संयोजक इशारेसे। 'अनुदिन बाढ़ल'- दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा। 'अवधि ना गेल'-सीमा नहीं रही। 'प्रौढ़ा समर्था-रति'में लालसा, उद्वेग, जागर्य (निद्राका अभाव), तानव (शरीरकी कृशता, दुर्बलता), जड़ता, व्यग्रता, व्याधि, उन्माद, मोह और मृत्यु; अर्थात् चिन्ता, जागर, उद्वेग, अमर, मलिनाङ्गता, प्रलाप, व्याधि, उन्माद, मोह और मृत्यु-ये दस दशाएँ हैं। 'समञ्जसा-रति'में अभिलाष, चिन्ता, स्मृति, गुण-कीर्तन, उद्वेग, सविलाप उन्माद,-ये छह प्रकारकी दशाएँ हैं। 'साधारणी-रति'में सोलह प्रकारकी दशाएँ अर्थात् प्रौढ़ा समर्था-रति और समञ्जसा-रतिके सविलाप उन्माद तक। '(उज्ज्वलनीलमणि पृः 828 से 852 देखें)। 'सो'-वे रमण श्रीकृष्ण; 'हाम'-मैं राधिका रमणी; । 305

[ 8/190-194 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हम दोनों ही उसके कारण नहीं हैं अथवा हमारी पार्थक्य-बुद्धि नहीं है अर्थात् हम दो हैं—ऐसी बुद्धि नहीं है। 'मनोभव'—अर्थात् कन्दर्पने इसे जानकर, रमण और रमणी, दोनोंके मनको पीसकर एक कर दिया। प्रेम-काहिनी'—प्रेमविलाससमूह। 'कानुठामे'—कृष्णके स्थानमें या निकटमें। 'कहबि'—बोलना। 'विछुरल'—भूल गये हैं। 'जानि'—जानकर। 'खौजलुँ'—ढूँढ़ा था। 'दूती'—जो मध्यस्थ होकर नायक और नायिकाका मिलन कराती है; दूती दो प्रकारकी हैं—'स्वयं-दूती' और 'आप्तदूती'। 'स्वयं-दूती'—कटाक्ष और वंशीध्वनि है; 'आप्तदूती'—वीरा, वृन्दा आदि हैं। 'साधारण-दूती'—शिल्पकारिणी, दैवज्ञा, लिङ्गिनी आदि। 'ना खौजलुँ आन्'—और किसीको भी अनुरोध अथवा अन्वेषण नहीं किया। 'दुहुँके'—श्रीराधा और कृष्ण, इन दोनोंके। 'मिलने'—दोनोंके मिलनसे; 'मध्ये पाँचबाण'—रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्शसे प्रकटित पाँच बाण। 'अबु'—इस समय। 'सोहि'—वही राग, 'विराग'—विप्रलम्भमें अधिरूढ़-महाभाव। 'तुहुँ'—तुम। 'भेलि'—होनेपर। 'सु-पुरुख'—उत्तम-नायकके। 'प्रेमक'—प्रेमके। 'ऐछन'—इस प्रकार॥ 193॥ परस्परके भेद-भ्रम-दूरीभूत अवस्था :— उज्ज्वलनीलमणि (14/155)— राधाया भवतश्च चित्तजतुनी स्वेदैर्विलाप्य क्रमाद्- युञ्जन्नद्रि-निकुञ्ज-कुञ्जरपते निर्धूत-भेदभ्रमम्। चित्राय स्वयमन्वरञ्जयदिह ब्रह्माण्डहर्म्योदरे भूयोभिर्नव-राग-हिङ्गुलभरैः शृङ्गार-कारुकृती॥ 194॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 194॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे गोवर्धनपर्वत-निकुञ्जवासि- गजराज, शृङ्गारशिल्प-शास्त्रमें निपुण विधाताने राधिका और तुम्हारे चित्तरूपी लाक्षाको सात्त्विक-विकाररूपी धर्मके द्वारा द्रवीभूत करके [धीरे-धीरे दोनोंको एकत्रकर] भेदभ्रमको दूर करके ब्रह्माण्डरूप देवगृहमें नवराग-कुङ्कुमके द्वारा स्वयं जगत्के आश्चर्यको सम्वर्धित करनेके उद्देश्यसे दोनोंके उन दो चित्तोंको अतिशय रञ्जित किया है॥ 194॥ अनुभाष्य— हे अद्रिनिकुञ्जकुञ्जरपते, (गिरि-गोवर्धन-निकुञ्जारण्य-गजपते, गोवर्धनकुञ्जविहारिन्), शृङ्गार-कारुकृति (शृङ्गार-कारुकर्मणि सुनिपुणः) राधायाः भवतश्च चित्तजतुनी (चित्ते एव जतुनी लाक्षे) स्वेदैः (अन्तर्बहिर्द्रवरूपैः विकारैः अग्नितापैर्वा) क्रमात् (शनैः शनैः) विलाप्य (द्रवीकृत्य) निर्धूतभेदभ्रमं (भेद एव भ्रमः, तं निर्धूतं दूरीभूतं) युञ्जन् (कुर्वन्) इह ब्रह्माण्ड- हर्म्योदरे (ब्रह्माण्डमेव हर्म्यं तस्योदरे) चित्राय (चित्रार्थं, विस्मयवर्द्धनार्थं) भूयोभिः (नानाविधैः) नवराग-हिङ्गुलभरैः (नवानुरागरूप-हिङ्गुल-रञ्जनैः) स्वयम् अन्वरञ्जयत्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 194॥ अमृतानुकणिका—"महाप्रभु श्रीराय रामानन्दसे श्रीराधाकृष्णके विलासकी महिमाको श्रवण करना चाहते हैं। श्रीरायने कहा कि श्रीकृष्ण 'धीर-ललित' नायक हैं और उसी रूपमें विलास करते हैं। धीर-ललित नायक नवयौवनयुक्त, विदग्ध अर्थात् चतुर, परिहास-पटु अर्थात् परिहास करनेमें अत्यन्त कुशल, निश्चिन्त और अपनी प्रेयसीके वशीभूत होता है। 'परिहास-विशारद'— श्रीकृष्णने शरद पूर्णिमाकी रात्रिमें वंशी बजाकर गोपियोंको बुलाया और जब वे सब कुछ त्यागकर वहाँ आयीं, तो श्रीकृष्ण कहने लगे—'आपका स्वागत है। मैं आपका कौनसा प्रिय कार्य करूँ? आप कैसे पधारीं? ओह! लगता है, आप सब पूर्णिमामें वनकी शोभा और यमुनाका सौन्दर्य देखने आयी हैं? अब आपने यह सब देख लिया है, इसलिये वापिस लौट जाओ, क्योंकि रात्रिके समय स्त्रियोंका वनमें आना उचित नहीं है। वनमें हिंसक प्राणी हैं और यह घोर रात्रि है। आप अपने-अपने घरोंको लौट जाओ। घरमें जाकर पति-सास- ससुर-बच्चोंकी सेवा करो, अन्यथा जघन्य अपराध, पाप होगा और समाजमें निन्दा भी होगी।' पहले तो गोपियाँ कृष्णके आन्तरिक मन्तव्यको समझनेके लिये चुप रहीं, अन्तमें गोपियोंने उनके इस परिहासका उत्तर दिया और रास आरम्भ हुआ। रासके मध्य भी श्रीकृष्ण 306

आठवाँ अध्याय 8/190-194 ] गोपियोंके प्रेम-वर्धन हेतु छिप जाते हैं। यह श्रीकृष्णका प्रेमविलास-विवर्त्तमें यह ऐक्य भावगत है, वस्तुगत नहीं परिहास-कौशल और विदग्धता है। 'नवतारुण्य'— है, अर्थात् देह-मन-प्राणका पृथक् अस्तित्व बना रहता नवयौवनावस्था विलासके योग्य है। श्रीकृष्ण रात-दिन है, भाव तथा मननमें ऐक्य होता है। जिस प्रकार श्रीराधाके साथ हास-परिहास और कुञ्जोंमें विभिन्न लाखके दो टुकड़े अग्निके प्रभावसे पिघलकर एक हो प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं। वे निश्चिन्त हैं, क्योंकि जाते हैं, उसी प्रकार श्रीराधाकृष्णका मन प्रेमके प्रभावसे अत्यन्त प्रेमवशतः माता-पिताने उन्हें किसी कार्यका पिघलकर एक हो जाता है। मनका भेद मिट जानेपर दायित्व नहीं दिया। इस प्रकार वे अपनी किशोरावस्थाको दोनोंको अपने पृथक् अस्तित्वका ज्ञान नहीं रहता, सफल कर रहे हैं। धीर-ललित नायक अपनी प्रेयसीके किन्तु पृथक् अस्तित्व बना रहता है; विलास-सुख अधीन रहता है, यह उसका एक विशेष गुण है। ऐक्यताकी अनुभूति रहती है और विलास-सम्बन्धी प्रेमविलास-विवर्त्त—विवर्त्तका अर्थ है विशेष रूपसे चेष्टा भी रहती है। यही प्रेमविलासकी चरमोत्कर्ष आवर्त्त। जब प्रेम अपनी चरम अवस्थापर उपस्थित हो अवस्था है। जाता है, तब उसे प्रेम-विवर्त्त कहते हैं। अनुरागका प्रेमविलास-विवर्त्तके दो बाह्य लक्षण हैं—भ्रम और आश्रय या नींव है राग; रागकी नींव है प्रणय, जिसमें विपरीतता। तन्मयताके कारण भ्रम या आत्म-विस्मृति नायक और नायिकामें विश्रम्भभाव उदित होता है हो जाती है। इस अवस्थामें परस्परका सुख वर्धन अर्थात् दोनोंमें अपने देह-प्राणादिको एक माननेकी करनेकी चरम उत्कण्ठाके कारण उनकी चेष्टाओंमें प्रवृत्ति जन्मती है। प्रणयका विकास जब अनुरागमें होता विपरीतता आ जाती है, अर्थात् कान्ताका भाव और है, तब यह अपनी चरम सीमामें पहुँचकर 'यावदाश्रय आचरण कान्तमें और कान्तका भाव और आचरण वृत्ति' लाभ करता है। प्रेमसे लेकर महाभाव तक कान्तामें सञ्चरित होता है। किन्तु यह विपरीतता जितनी प्रकारकी आश्रय-वृत्तियाँ हैं, उनमें जब सभी अबुद्धिपूर्वक ही होती है। सात्त्विक भावादि पूर्णरूपसे सुद्दीप्त अवस्थाको प्राप्त होते श्रीराधा कह रही हैं—'पहिलहि राग नयनभङ्गे भेल' हैं, तब उस परिपक्व अवस्थाको 'यावदाश्रय वृत्ति' अर्थात् पलक गिरनेमें जितना समय लगता है, उतनी कहते हैं। इसमें आश्रय और विषय अपने प्रेमकी चरम देरमें कृष्णसे मेरा प्रथम राग हो गया। यही पूर्वराग पराकाष्ठा तक पहुँचते हैं, प्रेमका आगे बढ़नेका कोई प्रेमकी प्रथम स्थिति है। स्थान नहीं रहनेपर भी वह बढ़ता रहता है। महाभावकी विदग्धमाधवमें यह प्रसङ्ग वर्णित है—श्रीराधाने पहले दूसरी विशेषता है—उसकी स्वसंवेद्य दशा। इस अवस्थामें तो श्रीकृष्णका नाम सुना, फिर वंशी ध्वनि सुनी और मिलनमें प्रेम एक ऐसी स्थितिमें पहुँचता है जिसमें तत्पश्चात् उनका चित्रपट देखा। वे तीनोंपर ही मोहित केवल मिलनके आनन्दकी ही अनुभूति रह जाती है, हो गईं। किन्तु फिर सोचने लगीं कि 'तीन पुरुषोंमें मेरी आस्वादक और आस्वाद्यका ज्ञान लुप्त हो जाता है। रति कैसे हुई! अब मैं प्राण त्याग दूँगी।' तब ललिताने 'न सो रमण, न हाम रमणी'—अनुरागकी ऐसी अवस्थाको उन्हें समझाया कि ये तीन पुरुष नहीं हैं। जिनका नाम इङ्गित करता है जिसमें केवल रसका ही अनुभव होता कृष्ण है, उन्हींकी वंशी-ध्वनि तुमने सुनी और यह है। इस मादनाख्य भावमें अनुरागकी जो चरम पराकाष्ठा चित्र भी उन्हींका ही है। ये तीनों व्यक्ति एक (कृष्ण) है, उसमें विषय और आश्रय—दोनोंके प्राण, देह, मन ही हैं। आदिका भी ऐक्य हो जाता है, जिसका इङ्गित 'ये सब प्रेमकाहिनी कानुठामे कहबि बिछुरल 'दुहुँ-मन मनोभव पेषल जानि' में किया गया है। जानि' अर्थात् अब हम बिछुड़ गये हैं, तो क्या कृष्ण । 307

[ 8/190–204 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

वह सब प्रेम कहानी भूल गये हैं?' 'न खोंजलुँ दूती, न खोंजलुँ आन' अर्थात् हे सखी! तुम उनसे कहना कि हमारे मिलनके समय दूती केवल हमारी दृष्टि थी, कन्दर्पके पाँच बाणोंने ही हमारी मध्यस्थता की थी, किन्तु अब मैं बड़ी विचित्र बात देख रही हूँ कि वे सब भूल गये हैं। उसीको याद दिलानेके लिये मैं तुम्हें भेज रही हूँ। 'अब् सोहि विराग', यहाँ श्रीराधामें अधिरूढ़ महाभाव उदित हुआ है। पहले मिलनमें कन्दर्प मध्यस्थ था, अब विरहमें अधिरूढ़ भाव दूती बन गया। श्रीराधा उसीको 'सखी' कहकर सम्बोधित कर रही हैं और कह रही हैं-'क्या सुपुरुषके प्रेमकी ऐसी ही गति होती है, जिससे प्रेम किया उसीको भूल जाना?' यह सब वार्तालाप वे स्वयंसे कर रही हैं। उनके कर-कमलोंमें कोई पत्र भी नहीं है, वे तो प्रेमकी चरमावस्थामें हैं-यही प्रेम-विलास विवर्त्त है। यह सब श्रवणकर महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दके मुखको अपने हस्तकमलसे ढक दिया और कहा—'साध्य वस्तु यही है और आगे मत कहो।' महाप्रभुको अपने कृष्ण-स्वरूपका स्मरण हो आया और श्रीरामानन्दके आगे कहनेसे उनका कृष्ण-स्वरूप प्रकट हो जायेगा, इसलिये महाप्रभु उन्हें आगे कहने नहीं दिया। यह अन्तरङ्ग कारण है और इसका बहिरङ्ग कारण यह है कि इस गूढ़ रहस्यको जगत्में प्रकाशित नहीं किया जा सकता। इसे सुनने और समझनेवाले इस जगत्में विरले ही हैं।"–श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 190–194॥

यहाँ तक साध्यकी सीमा :- प्रभु कहे, —“'साध्यवस्तुर अवधि' एइ हय। तोमार प्रसादे इहा जानिलुँ निश्चय ॥ 195 ॥

साधनके द्वारा ही साध्यकी प्राप्ति :- 'साध्यवस्तु' 'साधन'-बिना केह नाहि पाय। कृपा करि' कह, राय, पावार उपाय ॥" 196 ॥

अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “यही साध्य वस्तुकी अन्तिम सीमा है। तुम्हारी कृपासे मैंने इस साध्य वस्तुके तारतम्यको समझा है। किन्तु ऐसी दुर्लभ साध्य वस्तुकी उपलब्धि, बिना साधनके नहीं हो सकती। इसलिये कृपा करके इस साध्य वस्तुकी प्राप्तिका उपाय भी बतलाइये॥" 195–196 ॥

महाप्रभुकी इच्छासे श्रीराय वशीभूत :- राय कहे, —“येइ कहाओ, सेइ कहि वाणी। कि कहिये भाल-मन्द, किछुइ ना जानि ॥ 197 ॥

त्रिभुवन-मध्ये ऐछे हय कोन् धीर। ये तोमार माया-नाटे हइबेक स्थिर ॥ 198 ॥

श्रीरायके मुखसे महाप्रभु स्वयं ही वक्ता, स्वयं ही श्रोता :- मोर मुखे वक्ता तुमि, तुमि हओ श्रोता। अत्यन्त रहस्य, शुन, साधनेर कथा ॥ 199 ॥

साधनके रहस्यका वर्णन; केवल मधुर-रसमें 'कान्तभाव'की प्राप्ति :- राधाकृष्णेर लीला एइ अति गूढ़तर। दास्य-वात्सल्यादि-भावे ना हय गोचर ॥ 200 ॥

अनुगत सखियोंके द्वारा ही राधाकृष्णविलासकी पुष्टि :- सबे एक सखीगणेर इँहा अधिकार। सखी हैते हय एइ लीलार विस्तार ॥ 201 ॥

सखी बिना एइ लीला पुष्ट नाहि हय। सखी लीला विस्तारिया, सखी आस्वादय ॥ 202 ॥

सखी बिना एइ लीलाय अन्येर नाहि गति। सखीभावे ये ताँरे करे अनुगति ॥ 203 ॥

राधाकृष्ण-कुञ्जसेवा साध्य सेइ पाय। सेइ साध्य पाइते आर नाहिक उपाय ॥ 204 ॥

अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने विनम्र भावसे कहा, – “जो आप मेरी वाणीसे कहलवा रहे हैं, मैं वही कहता जा रहा हूँ। इसमें क्या अच्छा है और क्या बुरा-इस विषयमें मैं कुछ नहीं जानता। इन तीन लोकोंमें कौन ऐसा धैर्यवान् पुरुष है, जो आपकी इस मायाके

308 ।

नाटकको देखकर स्थिर रह सके? मेरे मुखसे आप ही वक्ता हैं और आप ही श्रोता बने हुए हैं। आप इस अत्यन्त रहस्यमय साधनके विषयमें सुनिये। श्रीराधाकृष्णकी यह लीला अति रहस्यमयी है। दास्य, सख्य, वात्सल्यादि भावाश्रित परिकरोंके द्वारा भी यह नहीं समझी जा सकती। एकमात्र श्रीराधाजीकी सखियोंका ही इस लीलामें अधिकार है और सखियोंसे ही लीलाका विस्तार होता है। सखियोंके बिना लीलाकी पुष्टि नहीं होती। सखियाँ ही इस लीलाका विस्तार करती हैं और वे ही इसका आस्वादन करती हैं। सखीके अतिरिक्त अन्य किसीका इस लीलामें प्रवेश करनेका अधिकार नहीं है। जो सखीभावसे सखीका आनुगत्य करता है, वही श्रीराधाकृष्णकी कुञ्जसेवारूप साध्य-वस्तुकी प्राप्ति कर सकता है—इसके अतिरिक्त इस साध्यकी प्राप्तिका और कोई उपाय नहीं है ॥ 197–204 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने इतना श्रवण करके कहा,—साध्यवस्तुके विषयमें सब कुछ कहना हो गया, अब इस चरमसाध्य-वस्तुको प्राप्त करनेका जो साधन अथवा उपाय है, उसे कहो। श्रीराय रामानन्दने उसके उत्तरमें कहा,—दास्य-वात्सल्यादि रसोंमें यह गूढ़तत्त्व प्राप्त नहीं होता, व्रजसखीके बिना इस लीलामें दूसरोंका प्रवेश असम्भव है; व्रजसखीका भाव ग्रहण करके सखीके आनुगत्यमें साधन कर पानेसे श्रीराधाकृष्ण- कुञ्जसेवारूप साध्यवस्तु प्राप्त होती है, इसको पानेका अन्य कोई उपाय नहीं है॥ 202–204 ॥ अनुभाष्य—'सखी',—उज्ज्वलनीलमणिमें जैसे— “प्रेमलीलाविहारिणां सम्यग्विस्तारिका सखी। विश्रम्भरत्नपेटी च॥” श्रीकृष्णकी प्रेमलीला और विहारादिका सम्पूर्णरूपसे विस्तार करनेवालीको 'सखी' कहते हैं। सखियाँ—श्रीकृष्णकी विश्वासरूपी रत्नोंकी पेटीस्वरूपा हैं। सखियोंकी वृत्ति— “मिथः प्रेमगुणोत्कीर्त्तिस्तयोरासक्तिकारिता। अभिसारो द्वयोरेव सख्याः कृष्णे समर्पणम्। नर्माश्वासन-नेपथ्यं हृदयोद्घाटनपाटवम्। छिद्रसंवृत्तिरेतस्याः पत्यादेः परिवञ्चना। शिक्षा सङ्गमनं काले सेवनं व्यजनादिभिः। तयोर्द्वयोरापालम्भः सन्देशप्रेषणं तथा। नायिकाप्राणसंरक्षा प्रयत्नाद्याः सखीक्रियाः॥” (1) नायक और नायिकाके परस्परके प्रेम-गुणोंका कीर्त्तन, (2) एककी दूसरेके प्रति आसक्तिको वर्धित करना, (3) दोनोंको अभिसार कराना, (4) कृष्णके प्रति सखीको समर्पित करना, (5) परिहास, (6) आश्वासन-प्रदान, (7) नेपथ्य अर्थात् नायक-नायिकाकी वेशरचना या उनका शृङ्गार, (8) हृदयके भावोंको प्रकाशित करनेकी निपुणता, (9) नायिकाके दोषोंको छिपाना, (10) पति आदिकी वञ्चना, (11) शिक्षा, (12) उचित कालमें नायक-नायिकाका मिलन कराना, (13) चामर आदि डुलाना, (14) आवश्यक होनेपर दोनोंके प्रति तिरस्कार, (15) संवाद भेजना, (16) नायिकाके प्राणोंकी रक्षाके लिये यत्न करना। आदिलीला 4/211, 217-218 संख्या देखें। 'सखीभेकी' और 'गौरनागरी' आदि प्राकृत सहजिया सम्प्रदायके लोग देहात्म-बुद्धि होनेके कारण इस जड़ शरीर, जो मरनेके बाद कुत्ते-सियारका भोजन बन जायेगा, उसकी और चमड़ीकी शोभा बढ़ाकर श्रीकृष्णको आनन्द देना चाहते हैं, परन्तु श्रीकृष्णसे इतर ये सब कृत्रिम चेष्टाएँ जड़ेन्द्रियोंकी ही तृप्ति करनेवाली हैं, इसलिये श्रीकृष्ण उनका उपभोग करके आनन्द प्राप्त नहीं करते। चिन्मयी श्रीराधा और उनकी सखियोंकी देह, गेह, वेश-भूषणादि तथा सभी क्रियाएँ अथवा चेष्टाएँ चिन्मय हैं, वे कृष्णेन्द्रिय-प्रीतिकर और श्रीकृष्णको वशीभूत करनेवाली हैं। वे देवीधामके अन्तर्गत चौदह भुवनोंकी कोई क्रिया अथवा वस्तु नहीं है। श्रीकृष्ण भुवनमोहन होनेपर भी वे (गोपियाँ) भुवनमोहिनी नहीं, भुवनमोहन-मनोमोहनी हैं। भोगपरायण मनोधर्मके वशीभूत होकर अपनी । 309

[ 8/202–205 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला काल्पनिक सिद्धदेहमें अपनेको 'सखी' मानकर अभिमान करना भी अहंग्रहोपासना ही हो जाता है; फलस्वरूप, कल्पनाकारीका देवीधाममें (इस संसारमें) ही वास होता है (भगवद्धामकी प्राप्ति नहीं होती)। श्रील जीवगोस्वामी प्रभुने प्राकृत-जीवोंको इस विषयमें सतर्क भी किया है—जैसे, भः रः सिः पूर्व विभाग द्वितीय लहरी— “लुब्धैर्वात्सलसख्यादौ”—श्लोककी 'दुर्गमसङ्गमनी' टीका— 'न तु व्रजेन्द्रादित्वाभिमानेनापीत्यर्थः। पितृत्वाद्यभिमानो हि द्विधा सम्भवति—स्वतन्त्रत्वेन, तत्पित्रादिभिरभेदभावनया च। तत्रान्त्यमनुचितं भगवदभेदोपासनावत्तेषु भगवद्वदेव नित्यत्वेन प्रतिपादयिष्यमाणेषु तदनौचित्यात्; तथा तत्परिकरेषु तदुचितभावना-विशेषेणापराधापातात्॥' श्रील जीवगोस्वामीने 'दुर्गम-सङ्गमनी'-टीकामें कहा है,—'वात्सल्य-सख्यादिभावोंसे लुब्ध साधकगण किन्तु व्रजराज श्रीनन्दादि-अभिमानके द्वारा भक्ति साधन नहीं करेंगे, यह अर्थ है। पिता होनेका अभिमान दो प्रकारका होता है—स्वतन्त्ररूपसे और श्रीकृष्णके पिता श्रीनन्दादिके साथ अभेद-भावनारूपसे। इनमेंसे बादमें कहा गया अभिमान अनुचित है, क्योंकि भगवान्‌के साथ अभेद होनेके लिये उपासनाके जैसे ही भगवान्‌के सदृश ही नित्यत्वरूपसे (श्रीनन्दादि नित्यसिद्धरूपसे) प्रतिपादन करेंगे, इस प्रकारका अभिमान अनुचित है। परन्तु [स्वतन्त्ररूपसे] भगवान्‌के पिता-सखादिरूप परिकर-अभिमानसे उसके उपयोगी विशेष भावनाके द्वारा अपराध नहीं होता।' इसलिये ही (भःरःसिः, पूःविः, 2लः)में श्रील रूप गोस्वामी प्रभुने कहा है,— “कृष्णं स्मरन् जनञ्चास्य प्रेष्ठं निज-समीहितम्। तत्तत्कथारतश्चासौ कुर्याद्वासं व्रजे सदा। सेवा साधकरूपेण सिद्धरूपेण चात्र हि। तद्भावलिप्सुना कार्या व्रजलोकानुसारतः॥” इस श्लोककी दुर्गमसङ्गमनी टीका— “व्रजलोकास्त्वत्र कृष्णप्रेष्ठजनास्तदनुगताश्च तदनुसारतः॥” श्लोकार्थ,—'श्रीकृष्णको और निज-अभीष्ट श्रीकृष्णप्रेष्ठ-जनको स्मरण करते-करते उन-उन कथामें रत होकर सर्वदा व्रजमें वास करेंगे। इस भावके लोभीगण साधकरूपमें और अन्तश्चिन्तित सिद्ध-स्वरूपसे व्रजवासियोंके अनुगामी होकर सेवा करेंगे।' दुर्गमसङ्गमनी टीकाार्थ,—'यहाँपर 'व्रजवासियों' अर्थात् श्रीकृष्णप्रेष्ठजन और उनके अनुगतगण,—उनके अनुसरणके द्वारा, यह अर्थ है।' मध्यलीला 22/155 और 157 संख्या देखें॥ 202–204॥ सखियोंके द्वारा शृङ्गार-रसकी पुष्टि :— श्रीगोविन्द-लीलामृत (10/17)— विभुरपि सुखरूपः स्वप्रकाशोऽपि भावः क्षणमपि न हि राधाकृष्णयोर्या ऋते स्वाः। प्रवहति रसपुष्टिं चिद्विभूतीरिवेशः श्रयति न पदमासां कः सखीनां रसज्ञः॥ 205॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 205॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राधा-कृष्णका भाव स्वप्रकाश होनेपर भी और सुख विभु अर्थात् अनन्त होनेपर भी सखियोंके बिना एक क्षणके लिये भी रसपुष्टि लाभ नहीं कर सकता, जिस प्रकार ईश्वरकी चिद्-विभूतिके बिना ईश्वरत्व पुष्टि प्राप्त नहीं करता, उसी प्रकार। इसलिये उसमें प्रविष्ट कौन रसज्ञ सखियोंका पदाश्रय नहीं करेगा?॥ 205॥ अनुभाष्य— राधाकृष्णयोः (व्रजनवयुवद्वन्द्वयोः) भावः (चिद्विलासः) विभुः (परममहान्) अपि, सुखरूपः (सच्चिदानन्दमयः) स्वप्रकाशः (स्वयंप्रकाशरूपः) अपि स्वाः (निजसम्बन्धिन्यः कायव्यूह- स्वरूपिण्यः याः सखीः) ऋते (बिना) रसपुष्टिं न हि प्रवहति; यथा ईशः (ईश्वरः) चिद्विभूतीः इव, [सच्चिदानन्दः ईश्वरः यथा निजनित्यचिदैश्वर्यादिकं बिना पुष्टिं न प्राप्नोति, तथेत्यर्थः अतः कारणात्] कः रसज्ञः (कृष्णतत्त्ववित् कृति) आसां सखीनां पदं न श्रयति? (आश्रयति? सर्वे सनिपुणाः मधुररसज्ञाः भक्ताः सखीपदं आश्रयन्तीत्यर्थः)। 310 ।

आठवाँ अध्याय 8/205-210 ] [बायाँ स्तम्भ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (यथा केवलाद्वैतवादिनां कल्पनाङ्गितविग्रहः अज्ञान- समष्ट्यधिष्ठातृदेव ईश्वरः अज्ञान-व्यष्ट्यधिष्ठातृ-मलिनसत्त्व- विकाराख्य-जीवादि-विभूतिमयोऽपि षण्ढवत् नित्यसत्यविलास-रहितः, विशिष्टाद्वैतवादिनामाराध्यो नित्यसच्चिदानन्दविग्रह ईश्वरो नित्यचिदानन्दमयः स्वगत-सजातीय-विजातीय-नित्यविशेष- विभूतिभिः शान्त-दास्य-सख्य-सार्द्धद्वय-रसपुष्टिं करोति, तथा परिपूर्णौ सुखरूपौ श्रीवार्षभानवी-व्रजेन्द्रनन्दनौ स्वयं-प्रकाशरूपौ सन्तावपि सखीभिः नित्यरसपुष्टिं कुरुत इति भावः।) केवलाद्वैतवादियोंके कल्पना-निर्मित-विग्रह 'अज्ञान-समष्टि'के अधिष्ठातारूप ईश्वर हैं—'अज्ञान- व्यष्टि'के अधिष्ठाता और मलिन-सत्त्वके विकाररूप जीव आदि विभूतियुक्त होनेपर भी वे क्लीववत् नित्य-सत्य-विलाससहित हैं। विशिष्टाद्वैतवादिगणोंके आराध्य नित्य सच्चिदानन्दविग्रह ईश्वर—नित्य चिदानन्दमय और स्वगत-सजातीय-विजातीय नित्य-सविशेष समस्त विभूतियोंके साथ शान्त, दास्य और आधे सख्यकी (अड़ाई) रस पुष्टि करते हैं। परिपूर्ण-सुखस्वरूप श्रीवृषभानुनन्दिनी और श्रीव्रजेन्द्रनन्दन स्वयं प्रकाशित रूप होनेपर भी (अर्थात् अन्य-अपेक्षारहित होनेपर भी) सखियोंके साथ नित्यरसकी पुष्टि करते रहते हैं,—यही अर्थ है॥205॥ सखियोंका श्रीराधाप्रेम :— सखीर स्वभाव एक अकथ्य-कथन। कृष्ण-सह निजलीलाय नाहि सखीर मन॥ 206 ॥ कृष्णसह राधिकार लीला ये कराय। निज-सुख हैते ताते कोटि सुख पाय॥ 207 ॥ अनुवाद—सखियोंका स्वभाव अपूर्व और अवर्णनीय है। वे स्वयं कभी भी श्रीकृष्णके सङ्गरूपी सुखको प्राप्त करनेकी अभिलाषा नहीं करतीं। श्रीकृष्णके साथ श्रीराधिकाकी लीलाएँ करानेमें उनको जिस सुखकी अनुभूति होती है, उस सुखको वे स्वयं श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ाविलास करनेसे भी कोटि गुणा अधिक मानती हैं॥ 206-207 ॥ [दायाँ स्तम्भ] राधा और सखियोंका परस्परका प्रेम-सम्बन्ध :— राधार स्वरूप—कृष्णप्रेम-कल्पलता। सखीगण हय तार पल्लव-पुष्प-पाता॥ 208 ॥ कृष्णलीलामृत यदि लताके सिञ्चय। निज-सुख हैते पलवाद्येर कोटि-सुख हय॥ 209 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 208-209 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी प्रेम-कल्पलतास्वरूपा हैं और सखियाँ उस लताके पल्लव, पुष्प एवं पत्र हैं। लतारूप श्रीराधिकाका पदाश्रय लेकर लताका जलसे सिञ्चन करनेपर पल्लवादि अत्यन्त प्रफुल्लित हो जाते हैं। पल्लवादिमें जल देनेसे जैसे पल्लवादि प्रफुल्लित नहीं होते, उसी प्रकार गोपियोंको श्रीकृष्ण-मिलन सुखसे भी श्रीराधाकृष्ण-मिलनके द्वारा ही अधिक सुख होता है॥ 208-209 ॥ श्रीगोविन्द-लीलामृत (10/16) :— सख्यः श्रीराधिकाया व्रजकुमुदविधोर्ह्लादिनी-नामशक्तेः सारांश-प्रेमवल्याः किशलयदलपुष्पादितुल्याः स्वतुल्याः। सिक्तायाः कृष्णलीलामृतरसनिचयैरूल्लसन्त्याममुष्यां जातोल्लासां स्वसेकाच्छतगुणमधिकं सन्ति यत्तन्न चित्रम्॥ 210 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 210 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—व्रजकी सखियाँ श्रीराधाके तुल्य और व्रजकुमुदचन्द्रकी ह्लादिनी नामक शक्तिस्वरूपा श्रीराधिकाकी सारांश-प्रेमलताके कोंपल, पत्र, पुष्पादि स्वरूप हैं। श्रीकृष्णलीलामृतरस-समूहके द्वारा परमोल्लासमयी श्रीराधिकाके सिञ्चित होनेपर ही सखियाँ अपने सिञ्चनसे सौ गुणा अधिक उल्लसित होती हैं—यह कोई विचित्र बात नहीं है॥ 210 ॥ अनुभाष्य— व्रजकुमुदविधोः (व्रजवासिकुमुदानन्दकृष्णचन्द्रस्य) ह्लादिनीनामशक्तेः (ह्लादिन्याख्यशक्तेः) श्रीराधिकायाः सारांश-प्रेमवल्याः (सारांशः यः प्रेमा सः एव वल्ली लता तस्याः) किशलय-दल-पुष्पादितुल्याः । 311

[ 8/200-214 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (नवीनपत्रकुसुमादिसमाः), अतएव स्वतुल्याः सख्यः (ललितादिप्रियनर्मसख्यः) कृष्णलीलामृत-रस-निचयैः सिक्तायां अमुष्यां (राधायाम्) उल्लसन्त्यां च [सत्यां ताः] सख्यः स्वसेकात् (स्व-सेचनात्) शतगुणम् अधिकं जातोल्लासाः (हर्षान्विताः) भवन्ति, इति यत्, तत् न चित्रं (विस्मयकरम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥210॥ श्रीराधिकाकी सखियोंके प्रति प्रीति :- यद्यपि सखीर कृष्ण-सङ्गमे नाहि मन। तथापि राधिका यत्ने करान सङ्गम॥211॥ नाना-छले कृष्णे प्रेरि' सङ्गम कराय। आत्मसुख-सङ्ग हैते कोटि-सुख पाय॥212॥ श्रीराधा और सखियोंकी परस्पर प्रीतिमें कृष्णका सुख :- अन्योन्ये विशुद्ध प्रेमे करे रस पुष्ट। ताँ-सबार प्रेम देखि' कृष्ण हय तुष्ट॥213॥ सहज गोपीर प्रेम,—नहे प्राकृत काम। कामक्रीड़ा-साम्ये तार कहि 'काम'-नाम॥214॥ अनुवाद—यद्यपि सखियोंकी श्रीकृष्णके साथ सङ्गमकी थोड़ीसी भी इच्छा नहीं होती, तथापि श्रीराधाजी बड़े प्रयत्नके साथ उनका श्रीकृष्णसे सङ्गम करा ही देती हैं। श्रीराधाजी अनेक प्रकारके छल, चतुरायी, युक्तियोंसे उन्हें श्रीकृष्णके पास भेजती हैं। श्रीराधाजीको भी अपने सङ्गम-सुखसे जितना आनन्द होता है, उससे भी करोड़ों गुणा अधिक सखियोंको श्रीकृष्णसे मिलानेमें प्रसन्नता होती है। राधाजी और सखियोंका एक दूसरेके प्रति विशुद्ध प्रेम रसका निरन्तर पोषण करता रहता है। इनके परस्पर प्रेमकी परिपाटीको देखकर श्रीकृष्ण बड़े सन्तुष्ट होते हैं। गोपियोंका श्रीकृष्णप्रेम सहज-स्वाभाविक है, इसमें प्राकृत कामकी लेशमात्र गन्ध भी नहीं है। लौकिक कामक्रीड़ाके समान प्रतीत होनेके कारण ही इस प्रेमको 'काम' कहा गया है॥211-214॥ अनुभाष्य—'अन्योन्थे'—परस्पर। श्रीराधिका और उनकी सखियाँ अपने-अपने सुखकी अभिलाषामें किसी प्रकारसे चेष्टाशीला न होकर एक-दूसरेके द्वारा श्रीकृष्ण सेवा करवाकर प्रेमको पुष्ट कराती है, उसको देखकर श्रीकृष्ण सन्तुष्ट होते हैं॥213॥ अमृतानुकणिका—'प्रेम विलास विवर्त्त'के विषयमें श्रवण करके महाप्रभुने सन्तोष व्यक्त किया कि साध्य वस्तुकी अवधि यही है, अब आप इसे प्राप्त करनेका साधन बताइये। तब श्रीरायने कहा—'साधनकी कथा अत्यन्त रहस्यपूर्ण है। सखियोंके अतिरिक्त श्रीराधाकृष्णकी लीलामें किसीका अधिकार नहीं है। क्योंकि वे श्रीराधाकी समतजातीय हैं, उनकी भावनाओंको समझती हैं, उन्हींके समान महाभाव-स्वरूपा है तथा प्रेम और सेवाकी परिपाटीमें सुदक्ष हैं। वे ही अभिसार करवाना, शृङ्गार रचना, संवाद भेजना आदि लीला-विस्तारक सेवाओंमें कुशल हैं। वे श्रीराधा और श्रीकृष्ण—दोनोंकी ही परम विश्वासपात्री हैं। श्रीराधाकृष्णकी कुञ्जलीलाओंमें उन्हींका आश्रय ग्रहण करके प्रवेश सम्भव है। कुञ्ज-सेवा प्राप्तिका लोभ और रसिक वैष्णवोंका सङ्ग ही इसका हेतु है। परन्तु जो अभी जड़देहमें आबद्ध हैं, उन्हें मनके द्वारा भी कदापि ऐसा विचार या आचरण नहीं करना चाहियें। समुद्र-मन्थनसे उत्पन्न विषका पान केवल श्रीरुद्र ही कर सकते हैं, अन्य कोई करे तो वह निश्चय ही विनाश को प्राप्त होगा। श्रीराधाकृष्णकी लीलाएँ चिन्मय एवं विशुद्ध हैं। सम्पूर्ण रूपसे स्थूल देहगत सुखोंसे अपरिचित होकर इनमें प्रवेश प्राप्त होगा, अन्यथा जीव अधःपतित होकर नरकगामी हो जाता है। गोविन्दलीलामृत (10/17)—'विभुरपि सुखस्वरूप' —सर्वव्यापी ईश्वर जिस प्रकार निज चिदैश्वर्यके बिना पूर्ण नहीं होते, उसी प्रकार अति महान स्वप्रकाश और सुख स्वरूप अर्थात् अनन्त होनेपर भी श्रीराधाकृष्णका भाव सखियोंके बिना क्षणमात्रके लिए भी रसयुक्त नहीं हो सकता। कौन ऐसा रसिक व्यक्ति होगा जो परम रसिक-रसज्ञ गोपियोंका आश्रय ग्रहण नहीं करेगा, 312 ।

आठवाँ अध्याय 8/200-217 ] अर्थात् जितने भी रस लोलुप रसिक भक्त हैं, वे करेंगे ही, क्योंकि उन्हें कुञ्जसेवा प्राप्तिका लोभ हो गया है। यही लोभ कुञ्जसेवा प्राप्तिका प्रथम सोपान है। 'सखीर स्वभाव एक अकथ्य-कथन'—सखियोंका एक ऐसा सुन्दर, मधुर और रहस्यपूर्ण स्वभाव है, जो अकथ्य कथन है, जिसे कहना उचित नहीं है। परन्तु महाप्रभु श्रीरामानन्दके श्रीमुखसे यह इसलिये कहलवा रहे हैं कि नहीं कहनेसे यह विद्या ही लोप हो जायेगी और जो इसके लिए योग्य व्यक्ति हैं, वे वञ्चित रह जायेंगे। भागवतमें लिखा है—'कर्मण्या एव दुःख....' सभी व्यक्ति अपने दुःखको दूर करनेके लिये और सुखको पानेके लिये कार्य करते हैं। श्रीकृष्णकी सेवा भी एक महत्-स्वार्थके लिये करते हैं, स्वर्गसे ऊपर दो प्रकारकी मुक्तियाँ हैं—सुखैश्वर्य-उत्तरा और प्रेमसेवा-उत्तरा। सुखैश्वर्य-उत्तरा मुक्ति भी दुःखोंसे परे निजसुखके लिये ही है। मुखसे कहनेपर कि वे श्रीकृष्णको सुखी करनेके लिये भजन कर रहे हैं, तो भी सब लोग श्रीकृष्णका भजन करके श्रीकृष्णको ही प्राप्त करना चाहते हैं जिससे उन्हें सुख मिलेगा। अभी उन्हें श्रीकृष्णके सुखकी अनुभूति नहीं है, वे अपने ही सुखके लिये ही सब कुछ करते हैं। परन्तु इन सखियोंकी श्रीकृष्णसे मिलन करनेकी कोई कामना नहीं है, वे तो श्रीकृष्णके साथ श्रीराधाका मिलन करानेमें निज मिलनसे कोटि गुणा सुख पाती हैं—यही अकथ्य कथन है। इनका शरीर, मन और वाणी सदा श्रीकृष्णको सुखी करनेमें तत्पर है, इसलिये वे उनके सुखको भली प्रकार समझती और आस्वादन करती हैं। श्रीराधाकृष्ण-युगलके सुखका अनुभव करके इनमें भाव-विकार उदय हो जाते हैं। श्रीराधाका सुख इन लोगोंका स्वाभाविक सुख है। स्वर्ण कल्पलता श्रीराधाको ये सखियाँ श्रीकृष्ण लीला कथासे सींचती हैं। श्रीरूप मञ्जरी श्रीराधाका शृङ्गार कर रही हैं, गलेमें स्यमन्तक मणि पहना रही हैं और साथ ही कह रही हैं—'कौस्तुभ मणि इसका मित्र है। वह प्रतिक्षण स्यमन्तक मणिसे मिलनेके लिये लालायित रहता है। ये मिलते ही दोनों तरल हो जाते हैं। देखो, इसपर श्रीकृष्णकी प्रतिच्छवि पड़ती है और उनके कौस्तुभमें तुम्हारी छवि पड़ती है। फिर ये दोनों गर्वसे गर्वित होकर इतना वाद-विवाद करते हैं, जैसे तुम दोनों करते हो।' श्रीराधा श्रीकृष्ण-प्रसङ्ग सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होती हैं। सखियाँ शृङ्गार करते समय उसका पूर्वलीलासे सम्बन्ध स्मरण करवाकर श्रीराधाके कानोंमें अमृत-सिंचन करती हैं। श्रीराधाकी श्रीकृष्णसे मिलनकी तीव्र उत्कण्ठा हो जाती है और अनेकों-अनेकों मधुर स्मृतियाँ छा जाती हैं। यही लताको सींचना है। इसके द्वारा पत्र-पुष्प-मञ्जरी सभी आनन्दित हो जाते हैं और पुष्ट होते हैं। इसीसे लता भी पुष्ट होती है। इसलिये सखियोंके बिना लीला नहीं हो सकती, रास नहीं हो सकता। वे ही रसकी पुष्टि करती हैं।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 200-213 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/285) गौतमीय तन्त्र वाक्य :- प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्। इत्युद्धवादयोऽप्येतं वाञ्छन्ति भगवत्प्रियाः ॥ 215 ॥ निजेन्द्रिय-सुखहेतु कामेर तात्पर्य। कृष्णसुख-तात्पर्य गोपीभाव-वर्य ॥ 216 ॥ निजेन्द्रिय-सुखवाञ्छा नाहि गोपीकार। कृष्णे सुख दिते करे सङ्गम-विहार ॥ 217 ॥ अनुवाद-गोपियोंके शुद्धप्रेमको ही 'काम' नामसे अभिहित करनेकी प्रथा हुई है। भगवद्भक्त उद्धवादि भी इस प्रेमके पिपासु हैं। अपनी इन्द्रियको सुखी करना ही कामका तात्पर्य है। गोपियोंका जो श्रेष्ठ भाव अर्थात् प्रेम है, उसका तात्पर्य केवलमात्र श्रीकृष्णका सुख है। गोपियोंमें अपनी इन्द्रियोंको सुखी करनेकी कोई वाञ्छा कभी नहीं होती है। उनका श्रीकृष्णके साथ सङ्गम और विहार भी श्रीकृष्णको सुख प्रदान करनेके लिये ही होता है॥ 215-217 ॥ । 313

[ 8/214–222 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—'काम'—यह सम्बिद्विग्रह-श्रीकृष्णकी सेवापरायण वृत्ति नहीं है, अपितु श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य वस्तुका सुख इसका लक्ष्य है। 'प्रेम'—यह केवलमात्र श्रीकृष्णके सुखतात्पर्य और श्रीकृष्ण-सेवामय होता है। गोपियोंके कामका नाम ही 'प्रेम' है, क्योंकि गोपियाँ अपनी इन्द्रियोंका सुख नहीं चाहतीं, केवल श्रीकृष्णके सुखके लिये सजातीय-सखीके द्वारा सेवा करवाकर एवं वैसी सखीके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवामें नियुक्त होकर मात्र श्रीकृष्ण-काम स्वीकार करती हैं। आदिलीला 4/161-166 संख्या देखें ॥ 214-217 ॥ श्रीमद्भागवत(10/31/19) :- यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥ 218 ॥ अनुवाद—विरहणी गोपियाँ विलाप करती हुई कह रही हैं—"हे प्रिय ! हम तुम्हारे सुकोमल चरणकमलोंको अपने कठोर स्तनोंपर धीरे-धीरे धारण करतीं हैं, उन्हीं चरणोंके द्वारा तुम अभी वनमें भ्रमण कर रहे हो, वहाँ छोटे-छोटे कङ्कड़-पत्थरादि चुभनेके द्वारा अवश्य ही तुम्हें कष्ट हो रहा होगा। तुम हमारे जीवन स्वरूप हो, इसलिये तुम्हारी चिन्तामें व्याकुल होकर हम सबकी बुद्धि भ्रमित हो रही है॥" 218 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/173 संख्या देखें ॥ 218 ॥ रागानुगा भक्तिका परिचय :- सेइ गोपीभावामृते याँर लोभ हय। वेदधर्म त्यजि' से कृष्णके भजय ॥ 219 ॥ रागानुग-मार्गे ताँरे भजे येइ जन। सेइ जन पाय व्रजे व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 220 ॥ व्रजलोकेर कोन भाव लञा येइ भजे। भावयोग्य देह पाञा कृष्ण पाय व्रजे ॥ 221 ॥ रागमार्गके द्वारा श्रुतियोंकी कृष्णप्राप्ति :- ताहाते दृष्टान्त—उपनिषद् श्रुतिगण। रागमार्गे भजि' पाइल व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 222 ॥ अनुवाद—जिन्हें पूर्वकथित गोपीभावामृत प्राप्त करनेका लोभ होता है, वे वेद-धर्मका (इहलोक और परलोकके सुखकी कामनाका) सम्पूर्ण रूपसे त्याग करके श्रीकृष्णका भजन करते हैं। जो रागानुग-मार्गमें भजन करते हैं, वे ही व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको प्राप्त करते हैं। जो व्रजमण्डलके परिकरोंके किसी एक विशेष भावको लेकर भजन करते हैं, वे भाव योग्य सिद्धदेहकी प्राप्ति करके व्रजमें श्रीकृष्णकी सेवा प्राप्त करते हैं। इसका दृष्टान्त उपनिषद् अथवा श्रुतियाँ हैं, जिन्होंने रागमार्गमें भजन करके श्रीव्रजेन्द्रनन्दनकी सेवा प्राप्त की थी ॥ 219-222 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—विधि-मार्गमें भजनके चौंसठ अङ्ग हैं, निर्मल श्रद्धाके साथ इन अङ्गोंका पालन करनेपर ही भक्तिमें अधिकार उत्पन्न होता है। परन्तु व्रजवासियोंका श्रीकृष्णके प्रति जो स्वाभाविक राग है, उसे देखकर जिन्हें उस मार्गपर चलनेके लिये लोभ होता है, उन्हें वही गोपीभावामृत-लोभ ही रागानुग-मार्गमें अधिकार प्रदान करता है। रागानुगमार्गमें प्रवेशकर भजन करनेसे वर्णाश्रमादि-वैदिकधर्ममें आसक्तिका सहज ही त्याग हो जाता है। व्रजमें रक्तक-पत्रकादि श्रीकृष्णके दास, श्रीदाम-सुबलादि श्रीकृष्णके सखा, श्रीनन्द-यशोदादि श्रीकृष्णके पिता-माता,—ये सब अपने-अपने रसके अनुसार श्रीकृष्णका भजन अर्थात् उनकी सेवा करते हैं। व्रजरसके भजनमें प्रवृत्ति होनेपर उक्त किसी विशेष रसमें जिन्हें लोभ होता है, वे उस भावके योग्य चित्स्वरूप प्राप्त करके सिद्धिकालमें श्रीकृष्णको प्राप्त होते हैं;—उपनिषद् अथवा श्रुतियाँ ही इसका दृष्टान्त हैं। श्रुतियोंने देखा कि गोपियोंका आनुगत्य नहीं करनेसे व्रजमें श्रीकृष्ण भजनका अधिकार प्राप्त नहीं होता, तब उन्होंने गोपियोंके आनुगत्यको ग्रहण करके रागमार्गमें 314 ।

आठवाँ अध्याय 8/219-223 ] गोपीदेहसे [अपने सिद्धदेहसे] व्रजेन्द्रनन्दनका भजन किया था॥219-222॥ अनुभाष्य—‘रागानुग-मार्ग’—आदिलीला 4/167-169, 175 संख्या तथा मध्यलीला 22/145-162 संख्या देखें॥220-222॥ गोपियोंके आनुगत्यमें श्रुतियोंको श्रीकृष्णकी मधुर सेवाकी प्राप्ति :— श्रीमद्भागवत (10/87/23)— निभृतमरुन्मनोऽक्षदृढ़योगयुजो हृदि य- न्मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात्। स्त्रिय उरगेन्द्रभोगभुजदण्डविषक्त-धियो वयमपि ते समाः समदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाः॥223॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥223॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मुनि लोगोंने प्राणायामके द्वारा निश्वासको जीतकर मन और इन्द्रियोंको दृढ़रूपसे योगयुक्त करके हृदयमें जिस ब्रह्मकी उपासना की थी, भगवान्‌के सभी शत्रुओंने भी उनके निरन्तर ध्यानके बलसे उस ब्रह्ममें प्रवेश किया था। व्रजस्त्रियोंने श्रीकृष्णके सर्प-शरीरतुल्य भुजाओंके सौन्दर्यरूप तीव्र विषके द्वारा हतबुद्धि होकर उनके चरणकमलोंकी सुधाको प्राप्त किया था। हमने भी वैसी गोपीदेह प्राप्त करके गोपीभावसे उनके चरणकमलोंकी सुधाका पान किया है॥223॥ अनुभाष्य—जनलोकमें ब्रह्मसत्र-यज्ञमें श्रोता ऋषियोंको सनन्दनका श्रुतियोंके द्वारा किये गये भगवान्‌के स्तवका वर्णन— निभृतमरुन्मनोऽक्षदृढ़योगयुजः (मरुत् प्राणश्च मनः च अक्षाणि इन्द्रियाणि च निभृतानि संयमितानि यैः ते संयतवायुहृदयैन्द्रियाः, दृढ़योगं युञ्जन्तीति दृढ़योगयुजश्च ते तथाभूताः अविचलितपरानुरक्ताः) मुनयः यत् (तत्त्वं) हृदि उपासते (अनुभवन्ति), तत् अरयः (कृष्णविद्वेषिणः) अपि [तव] स्मरणात् (वैरभावेन चिन्तनात्) ययुः (निर्विशेषतां प्रापुः); उरगेन्द्रभोगभुजदण्डविषक्तधियः (उरगेन्द्रस्य सर्पस्य भोगः देहः तत्तुल्ययोर्भुजदण्डयोः विषक्ता धीः यासां ताः) स्त्रियः, वयम् अपि समाः (गोपीकायव्यूहेन तत्तुल्यरूपाः) समदृशः (तद्भावानुगत-भावमयाः) ते (तव) अङ्घ्रिसरोजसुधाः (पादपद्मं सुष्ठु धारयन्त्यः सत्यः) [तत् त्वद्रूपं तत्त्वं ययिमिति शेषः]। श्लोक-भावानुवाद—मुनि लोगोंने प्राणायामके द्वारा निश्वासको जीतकर मन और इन्द्रियोंको दृढ़रूपसे योगयुक्त करके अविचलित अनुरक्त हृदयमें जिस ब्रह्मकी उपासना की थी, भगवान्‌के सभी शत्रुओंने भी उनके निरन्तर ध्यानके बलसे उस ब्रह्ममें प्रवेश किया था। श्रीकृष्णके सर्प-शरीरतुल्य भुजाओंके सौन्दर्यमें आसक्त जिन गोपियोंकी बुद्धि है, हमने भी वैसी गोपीदेह प्राप्त करके उन गोपियोंके भावोंके अनुगत होकर श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सुष्ठु रूपसे [हृदयपर] धारण किया है। [श्रीकृष्णके ऐसे रूपकी हम शरणागति ग्रहण करती हैं।]॥223॥ अमृतानुकणिका—“जिन श्रुतियोंने गोपी बनकर श्रीकृष्णको प्राप्त किया, वे स्वयं ही श्रीमद्भागवतमें श्रुति-स्तवमें अपने साधनका वर्णन कर रही हैं। श्रुतिमन्त्र श्रीकृष्णके मुखारविन्द या उनकी श्वाससे निकले हैं; वे चेतन हैं, आत्मभूत हैं अर्थात् कृष्णने ही उनके रूपमें अवतार लिया है। इन श्रुतिचरी गोपियोंका प्रमाण श्रीबृहद्वामनपुराणके श्रुति-स्तवमें उल्लिखित है—उन्होंने श्रीकृष्णके कोटि कन्दर्पके लावण्यको विजय करनेवाले रूपके दर्शनसे कामिनी भावमें विभावित होकर गोपीभावसे कृष्णको पानेकी तीव्र अभिलाषा की थी। ‘निभृतमरुन्मनो’—मुनिजन और श्रीकृष्णके शत्रुओंने श्रीकृष्णके निर्विशेष भावको प्राप्त किया। उन्हीं श्रीकृष्णको गोपियोंने उरगेन्द्रके अर्थात् श्रेष्ठ सर्पके तुल्य भुजाओंके सौन्दर्यके द्वारा अत्यधिक रूपमें आकर्षित होकर प्राप्त किया। सर्पका सुचिक्कण, सुशीतल और सुगोल होता है। गोपियाँ कहती हैं—‘कृष्णकी भुजाएँ भी ऐसी ही सुगोल, सुशीतल और कोमल हैं। इन सर्पाकार भुजाओंका आलिङ्गन-पाश कामनाओंका प्रवाह उत्पन्न करता है। जिस प्रकार सर्पका विष अति तीव्र होता है, इन भुजाओंके सौन्दर्यने तीव्र विषके समान कार्य । 315

[ 8/219-225 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करके हमारी विचार-विवेक बुद्धिको कुण्ठित कर दिया है।' रासके समय नृत्य करते हुए श्रीकृष्ण ये हस्तकमल गोपियोंके गलेमें डाल देते हैं, अपने पीताम्बरसे गोपियोंके मुखारविन्दपर नृत्य-परिश्रमके द्वारा आये स्वेद-कणोंको पोंछ देते हैं। गोपियाँ दिवा-रात्रि इसी मिलनकी चिन्ता करती हैं। श्रीकृष्णके हस्त एवं चरणकमल ब्रह्मादिके ध्यानमें भी नहीं आते और गोपियाँ इन्हें साक्षात् रूपमें प्राप्त करती हैं। वे श्रीकृष्णको परब्रह्म नहीं, अपने प्राणप्रियतमके रूपमें जानती हैं और उनके पद्मके समान सुगन्धित हाथोंको अपने शीशपर धारण करना चाहती हैं। भागवत (10/31/5)-'शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्' अर्थात् अपने कमनीय और कामप्रद करकमल हमारे सिरपर अर्पण करो। गोपियाँ इन सर्पाकार भुजाओंके प्रति अत्यन्त आसक्त हैं और उनकी सेवा करती हैं। 'वयमपि ते समाः समदृशः'-इन्हीं गोपियोंके भावोंके अनुगत होकर हम वेदमन्त्रकी ऋचाओंने गोपीदेह प्राप्तकर गोपीभावसे आपके 'अंघ्रिसरोजसुधाः' अर्थात् आपके चरणकमलोंकी सुधाका पान किया है। ये श्रुतिचरी गोपियाँ साधन-सिद्धा हैं। इन्होंने एकान्त निर्जन स्थानमें गोपाल-मन्त्र और कामगायत्रीके द्वारा कठोर तपस्या की। तब श्रीकृष्णने आकाशवाणीके द्वारा पूछा,-'तुम लोग क्या चाहती हों? वर माँगो। मैं तुम्हारा अभीष्ट पूर्ण करूँगा।' श्रुतियोंने कहा-'हे कृष्ण! कोटि-कोटि कामदेवोंके लावण्यपर विजय प्राप्त करनेवाले आपके सौन्दर्यके कारण हमारा मन कामिनी भावमें विभावित होकर निश्चय ही कामसे मोहित हो रहा है। गोकुलवासिनी गोपरमणियाँ जिस प्रकार आपको 'रमण' समझकर आपका भजन करती हैं, हम भी आपको उसी भावसे पानेके लिए तीव्र वासनाका पोषण कर रही हैं।' तब श्रीकृष्णने कहा-'हे श्रुतियों! तुम्हारा मनोरथ उत्तम है। यद्यपि तुम्हारी वासना अत्यन्त दुर्लभ और दुर्घट है, तथापि मेरे अनुमोदनसे यह भली-भाँति फलीभूत होगी। अब तुम लोग गोपियोंका भाव ग्रहण करो और उस भावसे भजन करो।' इन श्रुतिचरी गोपियोंने इसी प्रकार गोपियोंका आश्रय ग्रहण करके भजन किया, तब उनकी स्वरूप-सिद्धि हुई। इसके बाद वस्तु-सिद्धि होनेपर उनको प्रकट ब्रजमें जन्म प्राप्त हुआ, जहाँ उन्हें नित्य-सिद्ध गोपियोंका सङ्ग मिला और उनके आनुगत्यमें उन्हें श्रीकृष्ण-सेवाकी शिक्षा मिली तथा वे गोपी बनकर सेवा करने लगीं। श्रीकृष्णकी प्रेयसियोंमें नित्य-सिद्ध गोपियोंका नित्य-सिद्धत्त्व अष्टादशाक्षर मन्त्रादिमें प्रकाशित है। इस मन्त्रमें 'गोपीजनवल्लभ' पदसे नित्य-सिद्धा श्रीराधिका आदि गोपियोंके साथ एकत्र भावसे ही श्रीकृष्णकी आराधनाका अनादि कालसे विधान है और यही विधि प्रचलित है।"-श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 219-223 ॥ श्लोकमें वर्णित शब्दोंका अर्थ :- 'समदृशः'-शब्दे कहे 'सेइ भावे अनुगति'। 'समाः'-शब्दे कहे श्रुतिर गोपीदेह-प्राप्ति ॥ 224 ॥ 'अङिघ्रपद्मसुधाय' कहे 'कृष्णसङ्गआनन्द'। विधिमार्गे ना पाइये व्रजे कृष्णचन्द्र ॥ 225 ॥ अनुवाद-उपरोक्त श्लोकमें 'समदृशः' शब्दका तात्पर्य गोपियोंके भावोंके आनुगत्य होकर। 'समाः' शब्द श्रुतियोंके द्वारा गोपी देहकी प्राप्तिको सूचित करता है। तथा 'अङ्घ्रि-पद्मसुधा'का तात्पर्य है-श्रीकृष्णके श्रीचरणकमलोंका अमृत अर्थात् श्रीकृष्णसङ्ग और श्रीकृष्णसेवाजनित आनन्द। विधिमार्गसे कभी भी ब्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको नहीं पाया जा सकता ॥ 224-225 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्लोकके चौथे पादमें 'समदृशः'- शब्दसे 'गोपीभावमें आनुगत्य' की व्याख्या की है और 'समाः'-शब्दसे श्रुतियोंकी 'गोपीदेह-प्राप्ति' की व्याख्या है। 'अङ्घ्रिसरोजसुधा'-शब्दसे 'कृष्णसङ्ग-आनन्द' की व्याख्या है ॥ 224-225 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 9/133-134 संख्या देखें ॥ 223-225 ॥ 316 ।

आठवाँ अध्याय 8/226-230 ] रागात्मिका भक्तिकी महिमा :- श्रीमद्भागवत (10/9/21)- नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः। ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 226 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 226 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यशोदानन्दन भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान् देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं॥ 226 ॥ अनुभाष्य-यशोदाके श्रीकृष्णको वशीभूत करनेवाले गुणोंको देखकर श्रीशुकदेव परीक्षितके निकट व्रजललनाओंके अप्राकृत सहज रागात्मिका भक्तिके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं,- अयं (गोपिकासुतः यशोदानन्दनः) भगवान् इह यथा भक्तिमतां (रागमार्गेण भजनकारिणां) सुखापः (अनायासलभ्यः), देहिनां (देहाभिमानिनाम्) आत्मभूतानां (तपोव्रतपराणां जड़विरागयुक्तात्मारामार्णां) ज्ञानिनां च तथा न [सुखापः इति शेषः]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 226 ॥ अनर्थोंसे मुक्त भक्तोंकी रागानुगा-भजन-प्रणाली :- अतएव गोपीभाव करि' अङ्गीकार। रात्रि-दिन चिन्ते राधाकृष्णेर विहार ॥ 227 ॥ सिद्धदेहे चिन्ति' करे ताँहाञि सेवन। सखीभावे पाय राधाकृष्णेर चरण ॥ 228 ॥ अनुवाद-नित्यसिद्ध गोपियोंके सेवाभावको अङ्गीकार करके रात-दिन श्रीराधा-कृष्णकी लीलाओंका चिन्तन करे। इस प्रकार चिन्तनसे समस्त अनर्थ दूर हो जानेपर सिद्धदेहके द्वारा श्रीराधाकृष्ण-युगलकी मानसी सेवा करे। इस सखीभावसे श्रीराधा-कृष्णकी गोपी देहसे सेवा प्राप्त होती है॥ 227-228 ॥ अनुभाष्य-‘सिद्धदेह'—वर्तमान जड़देह और मानस सूक्ष्मदेहसे अलग चिन्मय श्रीराधाकृष्ण-सेवोपयोगी देह। जीवको जड़-कर्मोंके फलसे जड़देह प्राप्त होती है और कालके द्वारा वह देह परिवर्तित होकर स्थूल-भोगवासनासे दूसरी जड़देहकी प्राप्ति होती है। और जीव सूक्ष्म-जड़भोग-वासनासे मानस-लिङ्गदेह ग्रहण करके मनके द्वारा जड़विषय भोग करके पुनः वैसा परिवर्तित सूक्ष्म शरीर प्राप्त करता है। परन्तु शुद्ध-जीवात्मा नश्वर स्थूल-सूक्ष्म,-दोनों प्रकारकी देहोंको ग्रहण करनेके बदले चिन्मय गोलोकमें अथवा वैकुण्ठमें नित्यकालके लिये दोनों चिन्मय देह प्राप्त करता है। तब उसके द्वारा वह श्रीकृष्णको सुखी करनेके उद्देश्यसे श्रीराधाकृष्णकी अप्राकृत सेवा करता है। जड़ अथवा सूक्ष्म देह, जड़से अतीत अथवा अपने भोगोंसे अतीत वस्तुओंकी चिन्ता करनेमें सक्षम नहीं हैं। इसलिये त्रिगुणातीत भक्त श्रीकृष्णके अप्राकृत गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर उसके उपयोगी सिद्धदेहकी अप्राकृत इन्द्रियोंकी सहायतासे अप्राकृत-वस्तुकी चिन्ता करके अप्राकृत-सेवा करते-करते अप्राकृत सखीभावके आनुगत्यमें अप्राकृत श्रीराधा-कृष्णके चरणोंको प्राप्त करता है। मध्यलीला 22/152-156, 160 संख्या देखें ॥ 228 ॥ गोपियोंके आनुगत्य बिना श्रीकृष्णकी प्राप्ति असम्भव :- गोपी-आनुगत्य बिना ऐश्वर्यज्ञाने। भजिलेह नाहि पाय व्रजेन्द्रनन्दने ॥ 229 ॥ अनुवाद-गोपियोंके आनुगत्यके बिना ऐश्वर्यज्ञानसे युक्त होकर भजन करनेपर भी श्रीराधाकृष्णकी प्रेममयी सेवा प्राप्त नहीं हो सकती ॥ 229 ॥ अनुभाष्य-ऐश्वर्य बुद्धिसे विधिमार्गमें व्रजेन्द्रनन्दनका भजन नहीं होता। माधुर्यके आकर्षणसे गोपियोंके आनुगत्यमें भजन करनेसे ही श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है। आदिलीला 4/176 और मध्यलीला 9/130-135, 137 संख्या देखें ॥ 229 ॥ गोपियोंके आनुगत्यके बिना लक्ष्मीकी भी रास विलासकी प्राप्तिमें अयोग्यता :- ताहाते दृष्टान्त-लक्ष्मी करिल भजन। तथापि ना पाइल व्रजे व्रजेन्द्रनन्दन ॥ "230 ॥ । 317

[ 8/230-240 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इसका एक उदाहरण लक्ष्मीदेवी हैं,—गोपियोंके आनुगत्यके बिना कठोर तपस्या और उपासनाके द्वारा भी वे ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णकी गोपियों जैसी प्रेममयी सेवा प्राप्त नहीं कर सकीं॥" 230 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 9/111-155, 14/112-123 संख्या देखें ॥ 230 ॥ श्रीमद्भागवत (10/47/60)— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम्॥ 231 ॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरीयोंके प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो क्या कहूँ? ॥ 231 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/80 संख्या देखें ॥ 231 ॥ महाप्रभु और श्रीरायका प्रेम-क्रन्दन :— एत शुनि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन। दुइ जने गलागलि करेन क्रन्दन ॥ 232 ॥ दोनोंका रात्रिमें एक साथ वास और दूसरे दिन प्रातः स्वकार्यके लिये गमन :— एइमत प्रेमावेशे रात्रि गोङाइला। प्रातःकाले निज-निज-कार्ये दुँहे गेला ॥ 233 ॥ श्रीरायकी दीनता और महाप्रभुके सङ्गकी प्रार्थना :— विदाय-समये प्रभुर चरणे धरिया। रामानन्द राय कहे विनति करिया ॥ 234 ॥ “मोरे कृपा करिते तोमार इँहा आगमन। दिन दश रहि' शोध मोर दुष्ट मन ॥ 235 ॥ तोमा बिना अन्य नाहि जीव उद्धारिते। तोमा बिना अन्य नाहि कृष्णप्रेम दिते॥”236॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीराय रामानन्दके द्वारा कथित अपूर्व रससिद्धान्तको सुनकर महाप्रभु बड़े आनन्दित हुए और उनका आलिङ्गन किया। दोनों ही एक दूसरेके गले लगकर रोदन करने लगे। इसी प्रकार प्रेमाविष्ट होकर वार्तालाप करते-करते सम्पूर्ण रात्रि बीत गयी। प्रातःकाल होते ही दोनों अपने कार्योंके लिये चले गये। विदायीके समय श्रीराय रामानन्द महाप्रभुके श्रीचरणोंको पकड़कर विनती करते हुए कहने लगे,—“हे प्रभो! यहाँ आपका आगमन मुझपर कृपा करनेके लिये ही हुआ है। अतः दस दिन और रहकर मेरे कलुषित मनको शुद्ध कीजिये। आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी इस जीवका उद्धार नहीं कर सकता और न ही कृष्णप्रेम प्रदान कर सकता है॥”232-236 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायकी स्तुति और उनकी वश्यताको स्वीकार करना :— प्रभु कहे,—“आइलाङ शुनि' तोमार गुण। कृष्णकथा शुनि, शुद्ध कराइते मन ॥ 237 ॥ यैछे शुनिलुँ, तैछे देखिलुँ तोमार महिमा। राधाकृष्ण-प्रेमरस-ज्ञानेर तुमि सीमा ॥ 238 ॥ दश दिनेर का-कथा, यावत् आमि जीव'। तावत् तोमार सङ्ग छाड़िते नारिब ॥ 239 ॥ नीलाचलमें महाप्रभुको श्रीरायके सङ्गकी इच्छा :— नीलाचले तुमि-आमि थाकिब एकसङ्गे। सुखे गोङाइब काल कृष्णकथा-रङ्गे ॥” 240 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं तो श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके मुखसे आपके गुणोंको सुनकर आपसे कृष्णकथा सुनकर अपने मनको शुद्ध करनेके लिये आया था। मैंने जैसा सुना था, आपकी महिमाको वैसा ही देखा। श्रीराधातत्त्व, श्रीकृष्णतत्त्व, श्रीप्रेमतत्त्व एवं 318 ।

आठवाँ अध्याय 8/237-245 ] श्रीरसत्तत्त्वके ज्ञानकी आप ही अन्तिम सीमा हैं। दस विद्याओंका सार है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिनोंकी तो बात ही क्या? जीवन भर मैं आपका साथ दिया, - "श्रीकृष्णभक्ति ही सभी विद्याओंका सार है, छोड़ नहीं सकता। मैं और आप एक साथ ही जगन्नाथ इसके अतिरिक्त कोई और विद्या है ही नहीं ॥" 244 ॥ पुरीमें रहेंगे और सुखपूर्वक कृष्णकथाके आनन्दमें अनुभाष्य-विद्याकी श्रेष्ठता-विषयक प्रश्नका श्रीरायका अपना समय व्यतीत करेंगे ॥" 237-240 ॥ उत्तर यह है कि कृष्णभक्ति-विद्या ही सर्वोत्तम है। अनुभाष्य-राधाकृष्ण-प्रेमरसके स्वरूपको तुमने ही जड़भोग-जननी विद्या और जड़से अतीत ब्रह्मविद्याकी जाना है। उस ज्ञानमें तुम पारङ्गत सिद्ध हो, इसलिये अपेक्षा उन्नत विष्णुभक्ति-विद्यासे भी उन्नतस्तरकी तुम ही शेष (अन्तिम) सीमा हो ॥ 238 ॥ कृष्णभक्ति-विद्या है। (भाः 4/29/49) "तत् कर्म हरितोषणं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया" निज-निज कार्य समाप्तकर सन्ध्यामें दोनोंका मिलन :- जिसके द्वारा श्रीहरि सन्तुष्ट होते हैं, वही जीवका एत बलि' दुँहे निज-निज कार्ये गेला। एकमात्र कर्तव्य कर्म है और जिसके द्वारा श्रीहरिमें सन्ध्याकाले राय पुनः आसिया मिलिला ॥ 241 ॥ मति होती है, वही विद्या है। दोनोंकी इष्टगोष्ठी :- (भाः 7/5/23-24)-"श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं अन्योन्ये मिलि' दुँहे निभृते बसिया। पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं साख्यमात्मनिवेदनम् ॥ प्रश्नोत्तर-गोष्ठी कहे आनन्दित हञा ॥ 242 ॥ इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा ॥ क्रियेत भगवत्यद्धा अनुवाद-इतना कहकर दोनों ही अपने-अपने तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥" कार्यके लिये चले गये। सन्ध्या होनेपर श्रीरामानन्द राय श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, पुनः महाप्रभुसे आकर मिले। एक दूसरेसे मिलकर दोनों दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन-ऐसी नौ लक्षणोंवाली एकान्त स्थानपर बैठकर अति आनन्दके साथ परस्पर भक्तिको जो विष्णुमें साक्षात् अर्पण करते हैं, वे ही प्रश्नोत्तर गोष्ठीमें संलग्न हो गये ॥ 241-242 ॥ शास्त्रोंके उत्तम पण्डित हैं। अनुभाष्य-'गोष्ठी'-संलाप (बातचीत) ॥ 242 ॥ (भाः 11/19/40) – 'विद्यात्मनि भिदोबाधा:'" महाप्रभु-रामानन्दका वार्त्तालाप; जीवमें अविद्याके द्वारा किया गया जो भेद है महाप्रभुके प्रश्न, श्रीरायके उत्तर :- अर्थात् अनात्मत्व है, उसे दूर करना ही 'विद्या' प्रभु पुछे, रामानन्द करेन उत्तर। है ॥ 244 ॥ एइ मत सेइ रात्रे कथा परस्पर ॥ 243 ॥ (2) कृष्णदास्य ही सर्वश्रेष्ठ यश या प्रतिष्ठा :- अनुवाद-महाप्रभु प्रश्न करते और श्रीरामानन्द 'कीर्त्तिगण-मध्ये जीवेर कोन् बड़ कीर्त्ति?' राय उसका उत्तर देते। इस प्रकार उन्होंने वह सारी 'कृष्णभक्ति बलिया याँहार हय ख्याति ॥' 245 ॥ रात परस्पर प्रश्नोत्तरमें ही बिता दी ॥ 243 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूछा,-"समस्त कीर्त्तियोंमेंसे जीवकी (1) कृष्णभक्ति ही परा विद्या :- प्रधान कीर्त्ति क्या है?" श्रीरामानन्द रायने कहा,-"श्रीकृष्णका प्रभु कहे,-"कोन् विद्या विद्या-मध्ये सार?" भक्त कहलाना ही सबसे बड़ी कीर्त्ति है ॥" 245 ॥ राय कहे,-"कृष्णभक्ति-बिना विद्या नाहि आर ॥" 244 ॥ अनुभाष्य-'कृष्णभक्त' होनेकी ख्याति ही सबसे अनुवाद-महाप्रभुने पूछा,-"कौन-सी विद्या समस्त अधिक कीर्त्ति (यश) है। जड़विषयोंके प्रति लोभके । 319

[ 8/245 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कारण ही जीव जड़ीय-वैभवका आदर करते हैं। सांसारिक वैभवके द्वारा प्राप्त अनित्य यश अथवा जड़भोग-त्यागियोंके मध्यमें 'ब्रह्मज्ञ'के रूपमें प्राप्त ख्यातिकी अपेक्षा 'विष्णुभक्त'के रूपमें ख्यातिकी श्रेष्ठता है; उसीके उन्नत स्तरमें 'कृष्णभक्त'के रूपमें ख्याति है। (गरुड़ पुराणमें इन्द्रकी उक्ति)— "कलौ भागवतं नाम दुर्लभं नैव लभ्यते। ब्रह्मरुद्रपदोत्कृष्टं गुरुणा कथितं मम॥" मेरे श्रीगुरुदेवने कहा है कि ब्रह्मा-रुद्रादि पदकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट जो भागवत (शुद्धभक्त)-नामक पद है, वह कलियुगमें बहुत ही दुर्लभ है। (इतिहास-समुच्चयमें श्रीनारद-पुण्डरीक-संवादमें)— "जन्मान्तर-सहस्रेषु यस्य स्याद् बुद्धिरीदृशी। 'दासोऽहं वासुदेवस्य' सर्वलोकान् समुद्धरेत्॥" 'मैं श्रीवासुदेवका दास हूँ'—हजारों-हजारों जन्मोंके बाद जिनकी इस प्रकार बुद्धि हो गयी है, वे समस्त विश्वका उद्धार कर सकते हैं। (आदि-पुराणके श्रीकृष्ण-अर्जुन संवादमें)— “भक्तानामनुगच्छन्ति मुक्तयः श्रुतिभिः सह॥” श्रुतियोंके साथ सालोक्यादि मुक्तियाँ भक्तोंका अनुगमन करती हैं। (बृहन्नारदीयमें)— “अद्यापि च मुनिश्रेष्ठा ब्रह्माद्या अपि देवताः। प्रभावं न विजानन्ति विष्णुभक्तिरतात्मनाम्॥" विष्णुभक्तिमें रत रहनेवाले भक्तोंके प्रभावको आज तक भी श्रेष्ठ मुनिजन और ब्रह्मादि देवता पूर्णरूपसे नहीं जानते। (गरुड़ पुराणमें)— ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्टते। सत्रयाजि-सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः। सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णुभक्तो विशिष्यते। वैष्णवानां सहस्रेभ्या एकान्तेको विशिष्यते। एकान्तिनस्तु पुरुषा गच्छन्ति परमं पदम्॥" हजारों ब्राह्मणोंसे एक सावित्र्य ब्राह्मण श्रेष्ठ है, हजार सावित्र्य ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक सर्ववेदान्तका ज्ञाता ब्राह्मण श्रेष्ठ है, करोड़ों-करोड़ों वेदान्तके ज्ञाता ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक विष्णुभक्त श्रेष्ठ है, सैकड़ों वैष्णवोंसे एकान्तिक भक्त श्रेष्ठ है। एकान्तिक पुरुष ही परम पदको प्राप्त करते हैं। (भाः 3/13/4)— "श्रुतस्य पुंसां सुचिरश्रमस्य नन्वञ्जसा सूरिभिरीड़ितोऽर्थः। तत्तद्गुणानुश्रवणं मुकुन्द-पादारविन्दं हृदयेषु येषाम् ॥" हे मुने ! जिनके हृदयमें श्रीमुकुन्दके चरणारविन्द विराजमान हैं, उन भक्तजनोंके गुणोंको श्रवण करना ही मनुष्योंके बहुत दिनों तक किये हुए शास्त्राभ्यासके श्रमका मुख्य फल है, ऐसा विद्वानोंका मत है। (नारायणव्यूह स्तवमें)— "नाहं ब्रह्मापि भूयासं त्वद्भक्तिरहितो हरे। त्वयि भक्तस्तु कीटोऽपि भूयासं जन्मजन्मसु ॥" हे कृष्ण ! आपमें भक्तिसे रहित होकर मैं ब्रह्माका जन्म भी नहीं चाहता, अपितु जन्म-जन्मान्तरोंमें भी आपके प्रति भक्तियुक्त होकर मैं कीट जन्मकी ही इच्छा करता हूँ। तथा भागवतके 3/25/38, 4/24/29, 4/31/22, 7/9/24, 10/14/30 आदि श्लोक देखें। भक्तोंमें प्रह्लादकी ख्याति—जैसे (भाः 7/9/26 और 7/10/21) तथा स्कन्दपुराणमें श्रीरुद्रवाक्य— “भक्त एव हि तत्त्वेन् कृष्णं जानाति न त्वहम्। सर्वेषु हरिभक्तेषु प्रह्लादोऽतिमहत्तमः ॥" भक्त ही श्रीकृष्णको तत्त्व-सहित जानते हैं, मैं नहीं जानता। सभी हरिभक्तोंमें प्रह्लाद सर्वश्रेष्ठ हैं। उनसे पाण्डवोंकी श्रेष्ठता—(भाः 7/10/48-50, 7/15/75-77) में वर्णित है; भागवत (7/10/48)— यूयं नृलोके बत भूरिभागा लोकं पुनाना मुनयोऽभियन्ति। येषां गृहानाFlowसतीति साक्षाद् गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम् ॥ श्रीनारद राजा युधिष्ठिरको प्रह्लाद-चरित्र वर्णन करनेके बाद बोले, - "इस मनुष्यलोकमें तुम अति 320 ।

आठवाँ अध्याय 8/245-246 ] भाग्यवान् हो, क्योंकि तुम्हारे घर मनुष्यरूपी साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण गूढ़रूपमें वास करते हैं, यह जानकर संसारको पवित्र कर देनेवाले मुनिगण सदा तुम्हारे घरमें आते-जाते रहते हैं।” उनसे यादवोंकी श्रेष्ठता-(भाः 10/82/28,30); भागवत (10/82/29)— अहो भोजपते यूयं जन्मभाजो नृणामिह। यत् पश्यथासकृत् कृष्णं दुर्दर्शमपि योगिनाम्॥ पाण्डवोंने कहा,—“हे भोजराज उग्रसेन ! आप लोगोंका ही पृथ्वीपर मानवोंके मध्य जन्म सार्थक है, क्योंकि जिन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन योगियोंके लिये भी दुर्लभ है, उनके आप निरन्तर दर्शन करते हैं।” उनमेंसे उद्धवकी सर्वश्रेष्ठता-(भाः 3/4/31, 11/14/15, 11/16/29); भागवत (11/14/15)— न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः। न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥ श्रीकृष्णने उद्धवजीसे कहा,—“तुम मेरे जितने प्रियतम हो, ब्रह्मा, शङ्कर, सङ्कर्षण, लक्ष्मी, यहाँ तक कि मेरा अपना स्वरूप भी उतना प्रिय नहीं है।” उनकी अपेक्षा व्रजदेवियोंका श्रेष्ठत्व-(भाः 10/47/58)— एताः परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढ़भावाः। वाञ्छन्ति यद्भवभियो मुनयो वयञ्च किं ब्रह्मजन्मभिरनन्त-कथारसस्य॥ श्रीउद्धवजीने कहा,—“समस्त जीवोंके आत्मस्वरूप श्रीकृष्णमें परमप्रेमवती इन गोपियोंका ही जन्म सार्थक है। मुक्तिकामी मुनिगण और हम भक्तगण भी उस प्रकारके भावकी प्रार्थना करते रहते हैं। इसलिये श्रीकृष्णकथा-रसिकोंके लिये ब्रह्मादि जन्मका भी क्या मूल्य है?” तथा 'बृहद्वामन'में भृगु आदि ऋषियोंके प्रति ब्रह्माके वाक्य— “षष्टिवर्ष-सहस्राणि मया तप्तं तपः पुरा। नन्दगोपव्रजस्त्रीणां पादरेणूपलब्धये॥ तथापि न मया प्राप्तास्तासां वै पादरेणवः। नाहं शिवश्च शेषश्च श्रीश्च ताभिः समाः क्वचित्॥” श्रीनन्दगोपके व्रजमें रहनेवाली गोपरमणयोंके श्रीचरणोंकी रज प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें मैंने साठ हजार वर्षोंकी कठोर तपस्या की थी, तो भी मैं उनकी चरणरेणुको प्राप्त नहीं कर सका। मैं (ब्रह्मा) शङ्कर, शेष और लक्ष्मीजी किसी प्रकारसे उन व्रजगोपियोंके समान नहीं हैं। आदि पुराणमें श्रीभगवद्-वाक्य— “न तथा मे प्रियतमो ब्रह्मा रुद्रश्च पार्थिव। न च लक्ष्मीनं चात्मा च यथा गोपीजनो मम॥” हे पार्थ ! जिस प्रकार व्रजकी गोपियाँ मेरी प्रियतमा हैं, उस प्रकार ब्रह्मा, शङ्कर, लक्ष्मी और यहाँ तक कि मेरी आत्मा भी उतनी प्रिय नहीं है। गोपियोंमें भी श्रीराधिकाका ही सर्वश्रेष्ठत्व है। श्रीराधाके सबसे प्रिय सेवकवर, श्रीगौराङ्गके अत्यन्त अन्तरङ्ग सेवक श्रील रूपगोस्वामी प्रभुके जो एकान्त अनुगत हैं, वे ही रूपानुगके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनके ऐश्वर्यके सम्बन्धमें श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें— “आस्तां वैराग्यकोटिर्भवतु शम-दम-क्षान्ति-मैत्रादिकोटि- स्तत्त्वानुध्यान कोटिर्भवतु भवतु वा वैष्णवी भक्तिकोटिः। कोट्यांशोऽप्यस्य न स्यात्तदपि गुणगणो यः स्वतःसिद्ध आस्ते श्रीमच्चैतन्यचन्द्र-प्रिय-चरण-नख-ज्योतिरामोद-भाजाम्॥” कोटि वैराग्य रहे, कोटि शम, दम, क्षान्ति, मैत्रादि असंख्य गुण ही रहें, कोटि ब्रह्मध्यान हो या कोटि विष्णुभक्ति विद्यमान रहे, किन्तु श्रीचैतन्यचन्द्रके प्रिय भक्तोंकी चरण-नख ज्योतिके द्वारा आनन्द प्राप्त दासोंकी जो स्वतःसिद्ध गुणावली है, उनके कोटि भागका एक अंश भी ये सब नहीं हैं॥ 245 ॥ (3) राधागोविन्दमें प्रेमभक्ति ही परम धन :— 'सम्पत्तिर मध्ये जीवेर कोन् सम्पत्ति गणि?' 'राधाकृष्णे प्रेम याँर, सेइ बड़ धनी ॥' 246 ॥ । 321

[ 8/246-250 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "सम्पत्तियोंमें जीवकी सबसे बड़ी सम्पत्ति क्या है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया, — "जिनके पास श्रीराधाकृष्णप्रेम रूप सम्पत्ति है, वही सबसे बड़ा धनी है॥"246॥ अनुभाष्य-जड़ीय भोगोंमें लिप्त होकर जीव अधिक भोगवासनाओंकी पूर्ति करनेवाले धनको ही प्राप्य वस्तुओंमें सबसे श्रेष्ठ समझते हैं। किन्तु सम्पत्तिके तारतम्यके विचारमें सूक्ष्म अप्राकृत-बुद्धिके अनुसार श्रीराधाकृष्णप्रेमके समान सम्पत्ति और कुछ भी नहीं है। (भाः 10/39/2)— "किमलभ्यं भगवति प्रसन्ने श्रीनिकेतने। तथापि तत्परा राजन्न हि वाञ्छन्ति किञ्चन॥" "समस्त सम्पत्तिके मूलस्वरूप भगवान्‌के प्रसन्न होनेपर और क्या प्राप्त करना बाकी रह जाता है? तथापि हे राजन्! भक्त लोग श्रीकृष्णप्रेम-धनके अतिरिक्त उनसे और कुछ भी नहीं चाहते॥"246॥ (4) कृष्णभक्तका विरह ही तीव्रतम दुःख :- 'दुःख-मध्ये कोन् दुःख हय गुरुतर?' 'कृष्णभक्त-विरह बिना दुःख नाहि देखि पर॥'247॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "सब दुःखोंमेंसे कौनसा दुःख सबसे भारी है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया, — "श्रीकृष्णभक्तके विरहसे बढ़कर और कोई दुःख मैं नहीं देखता हूँ॥"247॥ अनुभाष्य—(भाः 3/30/6)— "मामणाराध्य दुःखार्त्तः कुटुम्बासक्तमानसाः। सत्सङ्ग-रहितो मर्त्यो वृद्धसेवा-परिच्युतः॥" "मेरी आराधना न करके कुटुम्बमें आसक्त चित्तवाले जीव साधुसङ्गरहित और पूर्व साधुसेवासे भ्रष्ट होकर दुःखों और कष्टोंमें पड़ जाते हैं।" (यह श्लोक उद्धृत संख्याके अनुसार मूलग्रन्थमें दिखायी नहीं देता) (बृः भाः 1/5/44)— 'स्वजीवनाधिकं प्रार्थ्यं श्रीविष्णुजनसङ्गतः। विच्छेदेन क्षणं चात्र न सुखांशं लभामहे॥" महाराज युधिष्ठिर श्रीनारदसे बोले, — "वास्तवमें भगवान् श्रीविष्णुके भक्तोंका सङ्ग हमें अपने जीवनसे भी अधिक प्रार्थनीय है, परन्तु अब उन्हीं भक्तोंके विच्छेदसे हम इस संसारमें एक क्षणके लिये तनिक भी सुख प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं॥"247॥ (5) कृष्णप्रेमी ही सर्वश्रेष्ठ मुक्त :- 'मुक्त-मध्ये कोन् जीव मुक्त करि' मानि?' 'कृष्णप्रेम याँर, सेइ मुक्त-शिरोमणि॥'248॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "मुक्तगणोंमेंसे किस जीवको मुक्त मानना चाहिये?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया, — "जिनमें श्रीकृष्णप्रेम है, वे ही मुक्त-शिरोमणि हैं॥"248॥ अनुभाष्य—(भाः6/14/4)— "मुक्तानामपि सिद्धानां नारायण परायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥" "हे महामुने! करोड़ों मुक्त और सिद्ध पुरुषोंमें भी प्रशान्तात्मा नारायण-परायण भक्त अत्यन्त दुर्लभ हैं॥"248॥ (6) कृष्णलीला-गान ही शुद्ध-जीवात्माका सहज धर्म :- 'गान-मध्ये कोन् गान—जीवेर निज धर्म?' 'राधाकृष्णेर प्रेमकेलि—येइ गीतेर मर्म॥'249॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "समस्त गानोंमें कौन-सा गान जीवका निज (स्वरूप) धर्म है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया, — "श्रीराधाकृष्णकी प्रेमकेलि लीलाओंका गान करना ही समस्त गीतोंका सार है॥"249॥ अनुभाष्य—(भाः 10/33/36)— "अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमाश्रितः। भजते तादृशीः क्रीड़ा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत्।" "भगवान् श्रीकृष्णने भक्तोंके प्रति अनुग्रह करनेके लिये जो गोलोककी रासलीला प्रपञ्चमें प्रकट की है, उसे श्रवण करके मनुष्य देहधारी प्राणीमात्र ही भगवत्-सेवामें तत्पर होंगे॥"249॥ (7) कृष्णभक्तका सङ्ग ही जीवका एकमात्र श्रेय :- 'श्रेयो-मध्ये कोन् श्रेयः जीवेर हय सार?' कृष्णभक्त-सङ्ग बिना श्रेयः नाहि आर॥'250॥ 322 ।