श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1165, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/226-230 ] रागात्मिका भक्तिकी महिमा :- श्रीमद्भागवत (10/9/21)- नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः। ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 226 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 226 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यशोदानन्दन भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान् देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं॥ 226 ॥ अनुभाष्य-यशोदाके श्रीकृष्णको वशीभूत करनेवाले गुणोंको देखकर श्रीशुकदेव परीक्षितके निकट व्रजललनाओंके अप्राकृत सहज रागात्मिका भक्तिके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं,- अयं (गोपिकासुतः यशोदानन्दनः) भगवान् इह यथा भक्तिमतां (रागमार्गेण भजनकारिणां) सुखापः (अनायासलभ्यः), देहिनां (देहाभिमानिनाम्) आत्मभूतानां (तपोव्रतपराणां जड़विरागयुक्तात्मारामार्णां) ज्ञानिनां च तथा न [सुखापः इति शेषः]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 226 ॥ अनर्थोंसे मुक्त भक्तोंकी रागानुगा-भजन-प्रणाली :- अतएव गोपीभाव करि' अङ्गीकार। रात्रि-दिन चिन्ते राधाकृष्णेर विहार ॥ 227 ॥ सिद्धदेहे चिन्ति' करे ताँहाञि सेवन। सखीभावे पाय राधाकृष्णेर चरण ॥ 228 ॥ अनुवाद-नित्यसिद्ध गोपियोंके सेवाभावको अङ्गीकार करके रात-दिन श्रीराधा-कृष्णकी लीलाओंका चिन्तन करे। इस प्रकार चिन्तनसे समस्त अनर्थ दूर हो जानेपर सिद्धदेहके द्वारा श्रीराधाकृष्ण-युगलकी मानसी सेवा करे। इस सखीभावसे श्रीराधा-कृष्णकी गोपी देहसे सेवा प्राप्त होती है॥ 227-228 ॥ अनुभाष्य-‘सिद्धदेह'—वर्तमान जड़देह और मानस सूक्ष्मदेहसे अलग चिन्मय श्रीराधाकृष्ण-सेवोपयोगी देह। जीवको जड़-कर्मोंके फलसे जड़देह प्राप्त होती है और कालके द्वारा वह देह परिवर्तित होकर स्थूल-भोगवासनासे दूसरी जड़देहकी प्राप्ति होती है। और जीव सूक्ष्म-जड़भोग-वासनासे मानस-लिङ्गदेह ग्रहण करके मनके द्वारा जड़विषय भोग करके पुनः वैसा परिवर्तित सूक्ष्म शरीर प्राप्त करता है। परन्तु शुद्ध-जीवात्मा नश्वर स्थूल-सूक्ष्म,-दोनों प्रकारकी देहोंको ग्रहण करनेके बदले चिन्मय गोलोकमें अथवा वैकुण्ठमें नित्यकालके लिये दोनों चिन्मय देह प्राप्त करता है। तब उसके द्वारा वह श्रीकृष्णको सुखी करनेके उद्देश्यसे श्रीराधाकृष्णकी अप्राकृत सेवा करता है। जड़ अथवा सूक्ष्म देह, जड़से अतीत अथवा अपने भोगोंसे अतीत वस्तुओंकी चिन्ता करनेमें सक्षम नहीं हैं। इसलिये त्रिगुणातीत भक्त श्रीकृष्णके अप्राकृत गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर उसके उपयोगी सिद्धदेहकी अप्राकृत इन्द्रियोंकी सहायतासे अप्राकृत-वस्तुकी चिन्ता करके अप्राकृत-सेवा करते-करते अप्राकृत सखीभावके आनुगत्यमें अप्राकृत श्रीराधा-कृष्णके चरणोंको प्राप्त करता है। मध्यलीला 22/152-156, 160 संख्या देखें ॥ 228 ॥ गोपियोंके आनुगत्य बिना श्रीकृष्णकी प्राप्ति असम्भव :- गोपी-आनुगत्य बिना ऐश्वर्यज्ञाने। भजिलेह नाहि पाय व्रजेन्द्रनन्दने ॥ 229 ॥ अनुवाद-गोपियोंके आनुगत्यके बिना ऐश्वर्यज्ञानसे युक्त होकर भजन करनेपर भी श्रीराधाकृष्णकी प्रेममयी सेवा प्राप्त नहीं हो सकती ॥ 229 ॥ अनुभाष्य-ऐश्वर्य बुद्धिसे विधिमार्गमें व्रजेन्द्रनन्दनका भजन नहीं होता। माधुर्यके आकर्षणसे गोपियोंके आनुगत्यमें भजन करनेसे ही श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है। आदिलीला 4/176 और मध्यलीला 9/130-135, 137 संख्या देखें ॥ 229 ॥ गोपियोंके आनुगत्यके बिना लक्ष्मीकी भी रास विलासकी प्राप्तिमें अयोग्यता :- ताहाते दृष्टान्त-लक्ष्मी करिल भजन। तथापि ना पाइल व्रजे व्रजेन्द्रनन्दन ॥ "230 ॥ । 317