भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1166

[ 8/230-240 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इसका एक उदाहरण लक्ष्मीदेवी हैं,—गोपियोंके आनुगत्यके बिना कठोर तपस्या और उपासनाके द्वारा भी वे ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णकी गोपियों जैसी प्रेममयी सेवा प्राप्त नहीं कर सकीं॥" 230 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 9/111-155, 14/112-123 संख्या देखें ॥ 230 ॥ श्रीमद्भागवत (10/47/60)— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम्॥ 231 ॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरीयोंके प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो क्या कहूँ? ॥ 231 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/80 संख्या देखें ॥ 231 ॥ महाप्रभु और श्रीरायका प्रेम-क्रन्दन :— एत शुनि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन। दुइ जने गलागलि करेन क्रन्दन ॥ 232 ॥ दोनोंका रात्रिमें एक साथ वास और दूसरे दिन प्रातः स्वकार्यके लिये गमन :— एइमत प्रेमावेशे रात्रि गोङाइला। प्रातःकाले निज-निज-कार्ये दुँहे गेला ॥ 233 ॥ श्रीरायकी दीनता और महाप्रभुके सङ्गकी प्रार्थना :— विदाय-समये प्रभुर चरणे धरिया। रामानन्द राय कहे विनति करिया ॥ 234 ॥ “मोरे कृपा करिते तोमार इँहा आगमन। दिन दश रहि' शोध मोर दुष्ट मन ॥ 235 ॥ तोमा बिना अन्य नाहि जीव उद्धारिते। तोमा बिना अन्य नाहि कृष्णप्रेम दिते॥”236॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीराय रामानन्दके द्वारा कथित अपूर्व रससिद्धान्तको सुनकर महाप्रभु बड़े आनन्दित हुए और उनका आलिङ्गन किया। दोनों ही एक दूसरेके गले लगकर रोदन करने लगे। इसी प्रकार प्रेमाविष्ट होकर वार्तालाप करते-करते सम्पूर्ण रात्रि बीत गयी। प्रातःकाल होते ही दोनों अपने कार्योंके लिये चले गये। विदायीके समय श्रीराय रामानन्द महाप्रभुके श्रीचरणोंको पकड़कर विनती करते हुए कहने लगे,—“हे प्रभो! यहाँ आपका आगमन मुझपर कृपा करनेके लिये ही हुआ है। अतः दस दिन और रहकर मेरे कलुषित मनको शुद्ध कीजिये। आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी इस जीवका उद्धार नहीं कर सकता और न ही कृष्णप्रेम प्रदान कर सकता है॥”232-236 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायकी स्तुति और उनकी वश्यताको स्वीकार करना :— प्रभु कहे,—“आइलाङ शुनि' तोमार गुण। कृष्णकथा शुनि, शुद्ध कराइते मन ॥ 237 ॥ यैछे शुनिलुँ, तैछे देखिलुँ तोमार महिमा। राधाकृष्ण-प्रेमरस-ज्ञानेर तुमि सीमा ॥ 238 ॥ दश दिनेर का-कथा, यावत् आमि जीव'। तावत् तोमार सङ्ग छाड़िते नारिब ॥ 239 ॥ नीलाचलमें महाप्रभुको श्रीरायके सङ्गकी इच्छा :— नीलाचले तुमि-आमि थाकिब एकसङ्गे। सुखे गोङाइब काल कृष्णकथा-रङ्गे ॥” 240 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं तो श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके मुखसे आपके गुणोंको सुनकर आपसे कृष्णकथा सुनकर अपने मनको शुद्ध करनेके लिये आया था। मैंने जैसा सुना था, आपकी महिमाको वैसा ही देखा। श्रीराधातत्त्व, श्रीकृष्णतत्त्व, श्रीप्रेमतत्त्व एवं 318 ।