श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 8/230-240 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इसका एक उदाहरण लक्ष्मीदेवी हैं,—गोपियोंके आनुगत्यके बिना कठोर तपस्या और उपासनाके द्वारा भी वे ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णकी गोपियों जैसी प्रेममयी सेवा प्राप्त नहीं कर सकीं॥" 230 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 9/111-155, 14/112-123 संख्या देखें ॥ 230 ॥ श्रीमद्भागवत (10/47/60)— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम्॥ 231 ॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरीयोंके प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो क्या कहूँ? ॥ 231 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/80 संख्या देखें ॥ 231 ॥ महाप्रभु और श्रीरायका प्रेम-क्रन्दन :— एत शुनि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन। दुइ जने गलागलि करेन क्रन्दन ॥ 232 ॥ दोनोंका रात्रिमें एक साथ वास और दूसरे दिन प्रातः स्वकार्यके लिये गमन :— एइमत प्रेमावेशे रात्रि गोङाइला। प्रातःकाले निज-निज-कार्ये दुँहे गेला ॥ 233 ॥ श्रीरायकी दीनता और महाप्रभुके सङ्गकी प्रार्थना :— विदाय-समये प्रभुर चरणे धरिया। रामानन्द राय कहे विनति करिया ॥ 234 ॥ “मोरे कृपा करिते तोमार इँहा आगमन। दिन दश रहि' शोध मोर दुष्ट मन ॥ 235 ॥ तोमा बिना अन्य नाहि जीव उद्धारिते। तोमा बिना अन्य नाहि कृष्णप्रेम दिते॥”236॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीराय रामानन्दके द्वारा कथित अपूर्व रससिद्धान्तको सुनकर महाप्रभु बड़े आनन्दित हुए और उनका आलिङ्गन किया। दोनों ही एक दूसरेके गले लगकर रोदन करने लगे। इसी प्रकार प्रेमाविष्ट होकर वार्तालाप करते-करते सम्पूर्ण रात्रि बीत गयी। प्रातःकाल होते ही दोनों अपने कार्योंके लिये चले गये। विदायीके समय श्रीराय रामानन्द महाप्रभुके श्रीचरणोंको पकड़कर विनती करते हुए कहने लगे,—“हे प्रभो! यहाँ आपका आगमन मुझपर कृपा करनेके लिये ही हुआ है। अतः दस दिन और रहकर मेरे कलुषित मनको शुद्ध कीजिये। आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी इस जीवका उद्धार नहीं कर सकता और न ही कृष्णप्रेम प्रदान कर सकता है॥”232-236 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायकी स्तुति और उनकी वश्यताको स्वीकार करना :— प्रभु कहे,—“आइलाङ शुनि' तोमार गुण। कृष्णकथा शुनि, शुद्ध कराइते मन ॥ 237 ॥ यैछे शुनिलुँ, तैछे देखिलुँ तोमार महिमा। राधाकृष्ण-प्रेमरस-ज्ञानेर तुमि सीमा ॥ 238 ॥ दश दिनेर का-कथा, यावत् आमि जीव'। तावत् तोमार सङ्ग छाड़िते नारिब ॥ 239 ॥ नीलाचलमें महाप्रभुको श्रीरायके सङ्गकी इच्छा :— नीलाचले तुमि-आमि थाकिब एकसङ्गे। सुखे गोङाइब काल कृष्णकथा-रङ्गे ॥” 240 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं तो श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके मुखसे आपके गुणोंको सुनकर आपसे कृष्णकथा सुनकर अपने मनको शुद्ध करनेके लिये आया था। मैंने जैसा सुना था, आपकी महिमाको वैसा ही देखा। श्रीराधातत्त्व, श्रीकृष्णतत्त्व, श्रीप्रेमतत्त्व एवं 318 ।
आठवाँ अध्याय 8/237-245 ] श्रीरसत्तत्त्वके ज्ञानकी आप ही अन्तिम सीमा हैं। दस विद्याओंका सार है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिनोंकी तो बात ही क्या? जीवन भर मैं आपका साथ दिया, - "श्रीकृष्णभक्ति ही सभी विद्याओंका सार है, छोड़ नहीं सकता। मैं और आप एक साथ ही जगन्नाथ इसके अतिरिक्त कोई और विद्या है ही नहीं ॥" 244 ॥ पुरीमें रहेंगे और सुखपूर्वक कृष्णकथाके आनन्दमें अनुभाष्य-विद्याकी श्रेष्ठता-विषयक प्रश्नका श्रीरायका अपना समय व्यतीत करेंगे ॥" 237-240 ॥ उत्तर यह है कि कृष्णभक्ति-विद्या ही सर्वोत्तम है। अनुभाष्य-राधाकृष्ण-प्रेमरसके स्वरूपको तुमने ही जड़भोग-जननी विद्या और जड़से अतीत ब्रह्मविद्याकी जाना है। उस ज्ञानमें तुम पारङ्गत सिद्ध हो, इसलिये अपेक्षा उन्नत विष्णुभक्ति-विद्यासे भी उन्नतस्तरकी तुम ही शेष (अन्तिम) सीमा हो ॥ 238 ॥ कृष्णभक्ति-विद्या है। (भाः 4/29/49) "तत् कर्म हरितोषणं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया" निज-निज कार्य समाप्तकर सन्ध्यामें दोनोंका मिलन :- जिसके द्वारा श्रीहरि सन्तुष्ट होते हैं, वही जीवका एत बलि' दुँहे निज-निज कार्ये गेला। एकमात्र कर्तव्य कर्म है और जिसके द्वारा श्रीहरिमें सन्ध्याकाले राय पुनः आसिया मिलिला ॥ 241 ॥ मति होती है, वही विद्या है। दोनोंकी इष्टगोष्ठी :- (भाः 7/5/23-24)-"श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं अन्योन्ये मिलि' दुँहे निभृते बसिया। पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं साख्यमात्मनिवेदनम् ॥ प्रश्नोत्तर-गोष्ठी कहे आनन्दित हञा ॥ 242 ॥ इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा ॥ क्रियेत भगवत्यद्धा अनुवाद-इतना कहकर दोनों ही अपने-अपने तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥" कार्यके लिये चले गये। सन्ध्या होनेपर श्रीरामानन्द राय श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, पुनः महाप्रभुसे आकर मिले। एक दूसरेसे मिलकर दोनों दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन-ऐसी नौ लक्षणोंवाली एकान्त स्थानपर बैठकर अति आनन्दके साथ परस्पर भक्तिको जो विष्णुमें साक्षात् अर्पण करते हैं, वे ही प्रश्नोत्तर गोष्ठीमें संलग्न हो गये ॥ 241-242 ॥ शास्त्रोंके उत्तम पण्डित हैं। अनुभाष्य-'गोष्ठी'-संलाप (बातचीत) ॥ 242 ॥ (भाः 11/19/40) – 'विद्यात्मनि भिदोबाधा:'" महाप्रभु-रामानन्दका वार्त्तालाप; जीवमें अविद्याके द्वारा किया गया जो भेद है महाप्रभुके प्रश्न, श्रीरायके उत्तर :- अर्थात् अनात्मत्व है, उसे दूर करना ही 'विद्या' प्रभु पुछे, रामानन्द करेन उत्तर। है ॥ 244 ॥ एइ मत सेइ रात्रे कथा परस्पर ॥ 243 ॥ (2) कृष्णदास्य ही सर्वश्रेष्ठ यश या प्रतिष्ठा :- अनुवाद-महाप्रभु प्रश्न करते और श्रीरामानन्द 'कीर्त्तिगण-मध्ये जीवेर कोन् बड़ कीर्त्ति?' राय उसका उत्तर देते। इस प्रकार उन्होंने वह सारी 'कृष्णभक्ति बलिया याँहार हय ख्याति ॥' 245 ॥ रात परस्पर प्रश्नोत्तरमें ही बिता दी ॥ 243 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूछा,-"समस्त कीर्त्तियोंमेंसे जीवकी (1) कृष्णभक्ति ही परा विद्या :- प्रधान कीर्त्ति क्या है?" श्रीरामानन्द रायने कहा,-"श्रीकृष्णका प्रभु कहे,-"कोन् विद्या विद्या-मध्ये सार?" भक्त कहलाना ही सबसे बड़ी कीर्त्ति है ॥" 245 ॥ राय कहे,-"कृष्णभक्ति-बिना विद्या नाहि आर ॥" 244 ॥ अनुभाष्य-'कृष्णभक्त' होनेकी ख्याति ही सबसे अनुवाद-महाप्रभुने पूछा,-"कौन-सी विद्या समस्त अधिक कीर्त्ति (यश) है। जड़विषयोंके प्रति लोभके । 319
[ 8/245 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कारण ही जीव जड़ीय-वैभवका आदर करते हैं। सांसारिक वैभवके द्वारा प्राप्त अनित्य यश अथवा जड़भोग-त्यागियोंके मध्यमें 'ब्रह्मज्ञ'के रूपमें प्राप्त ख्यातिकी अपेक्षा 'विष्णुभक्त'के रूपमें ख्यातिकी श्रेष्ठता है; उसीके उन्नत स्तरमें 'कृष्णभक्त'के रूपमें ख्याति है। (गरुड़ पुराणमें इन्द्रकी उक्ति)— "कलौ भागवतं नाम दुर्लभं नैव लभ्यते। ब्रह्मरुद्रपदोत्कृष्टं गुरुणा कथितं मम॥" मेरे श्रीगुरुदेवने कहा है कि ब्रह्मा-रुद्रादि पदकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट जो भागवत (शुद्धभक्त)-नामक पद है, वह कलियुगमें बहुत ही दुर्लभ है। (इतिहास-समुच्चयमें श्रीनारद-पुण्डरीक-संवादमें)— "जन्मान्तर-सहस्रेषु यस्य स्याद् बुद्धिरीदृशी। 'दासोऽहं वासुदेवस्य' सर्वलोकान् समुद्धरेत्॥" 'मैं श्रीवासुदेवका दास हूँ'—हजारों-हजारों जन्मोंके बाद जिनकी इस प्रकार बुद्धि हो गयी है, वे समस्त विश्वका उद्धार कर सकते हैं। (आदि-पुराणके श्रीकृष्ण-अर्जुन संवादमें)— “भक्तानामनुगच्छन्ति मुक्तयः श्रुतिभिः सह॥” श्रुतियोंके साथ सालोक्यादि मुक्तियाँ भक्तोंका अनुगमन करती हैं। (बृहन्नारदीयमें)— “अद्यापि च मुनिश्रेष्ठा ब्रह्माद्या अपि देवताः। प्रभावं न विजानन्ति विष्णुभक्तिरतात्मनाम्॥" विष्णुभक्तिमें रत रहनेवाले भक्तोंके प्रभावको आज तक भी श्रेष्ठ मुनिजन और ब्रह्मादि देवता पूर्णरूपसे नहीं जानते। (गरुड़ पुराणमें)— ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्टते। सत्रयाजि-सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः। सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णुभक्तो विशिष्यते। वैष्णवानां सहस्रेभ्या एकान्तेको विशिष्यते। एकान्तिनस्तु पुरुषा गच्छन्ति परमं पदम्॥" हजारों ब्राह्मणोंसे एक सावित्र्य ब्राह्मण श्रेष्ठ है, हजार सावित्र्य ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक सर्ववेदान्तका ज्ञाता ब्राह्मण श्रेष्ठ है, करोड़ों-करोड़ों वेदान्तके ज्ञाता ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक विष्णुभक्त श्रेष्ठ है, सैकड़ों वैष्णवोंसे एकान्तिक भक्त श्रेष्ठ है। एकान्तिक पुरुष ही परम पदको प्राप्त करते हैं। (भाः 3/13/4)— "श्रुतस्य पुंसां सुचिरश्रमस्य नन्वञ्जसा सूरिभिरीड़ितोऽर्थः। तत्तद्गुणानुश्रवणं मुकुन्द-पादारविन्दं हृदयेषु येषाम् ॥" हे मुने ! जिनके हृदयमें श्रीमुकुन्दके चरणारविन्द विराजमान हैं, उन भक्तजनोंके गुणोंको श्रवण करना ही मनुष्योंके बहुत दिनों तक किये हुए शास्त्राभ्यासके श्रमका मुख्य फल है, ऐसा विद्वानोंका मत है। (नारायणव्यूह स्तवमें)— "नाहं ब्रह्मापि भूयासं त्वद्भक्तिरहितो हरे। त्वयि भक्तस्तु कीटोऽपि भूयासं जन्मजन्मसु ॥" हे कृष्ण ! आपमें भक्तिसे रहित होकर मैं ब्रह्माका जन्म भी नहीं चाहता, अपितु जन्म-जन्मान्तरोंमें भी आपके प्रति भक्तियुक्त होकर मैं कीट जन्मकी ही इच्छा करता हूँ। तथा भागवतके 3/25/38, 4/24/29, 4/31/22, 7/9/24, 10/14/30 आदि श्लोक देखें। भक्तोंमें प्रह्लादकी ख्याति—जैसे (भाः 7/9/26 और 7/10/21) तथा स्कन्दपुराणमें श्रीरुद्रवाक्य— “भक्त एव हि तत्त्वेन् कृष्णं जानाति न त्वहम्। सर्वेषु हरिभक्तेषु प्रह्लादोऽतिमहत्तमः ॥" भक्त ही श्रीकृष्णको तत्त्व-सहित जानते हैं, मैं नहीं जानता। सभी हरिभक्तोंमें प्रह्लाद सर्वश्रेष्ठ हैं। उनसे पाण्डवोंकी श्रेष्ठता—(भाः 7/10/48-50, 7/15/75-77) में वर्णित है; भागवत (7/10/48)— यूयं नृलोके बत भूरिभागा लोकं पुनाना मुनयोऽभियन्ति। येषां गृहानाFlowसतीति साक्षाद् गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम् ॥ श्रीनारद राजा युधिष्ठिरको प्रह्लाद-चरित्र वर्णन करनेके बाद बोले, - "इस मनुष्यलोकमें तुम अति 320 ।
आठवाँ अध्याय 8/245-246 ] भाग्यवान् हो, क्योंकि तुम्हारे घर मनुष्यरूपी साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण गूढ़रूपमें वास करते हैं, यह जानकर संसारको पवित्र कर देनेवाले मुनिगण सदा तुम्हारे घरमें आते-जाते रहते हैं।” उनसे यादवोंकी श्रेष्ठता-(भाः 10/82/28,30); भागवत (10/82/29)— अहो भोजपते यूयं जन्मभाजो नृणामिह। यत् पश्यथासकृत् कृष्णं दुर्दर्शमपि योगिनाम्॥ पाण्डवोंने कहा,—“हे भोजराज उग्रसेन ! आप लोगोंका ही पृथ्वीपर मानवोंके मध्य जन्म सार्थक है, क्योंकि जिन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन योगियोंके लिये भी दुर्लभ है, उनके आप निरन्तर दर्शन करते हैं।” उनमेंसे उद्धवकी सर्वश्रेष्ठता-(भाः 3/4/31, 11/14/15, 11/16/29); भागवत (11/14/15)— न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः। न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥ श्रीकृष्णने उद्धवजीसे कहा,—“तुम मेरे जितने प्रियतम हो, ब्रह्मा, शङ्कर, सङ्कर्षण, लक्ष्मी, यहाँ तक कि मेरा अपना स्वरूप भी उतना प्रिय नहीं है।” उनकी अपेक्षा व्रजदेवियोंका श्रेष्ठत्व-(भाः 10/47/58)— एताः परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढ़भावाः। वाञ्छन्ति यद्भवभियो मुनयो वयञ्च किं ब्रह्मजन्मभिरनन्त-कथारसस्य॥ श्रीउद्धवजीने कहा,—“समस्त जीवोंके आत्मस्वरूप श्रीकृष्णमें परमप्रेमवती इन गोपियोंका ही जन्म सार्थक है। मुक्तिकामी मुनिगण और हम भक्तगण भी उस प्रकारके भावकी प्रार्थना करते रहते हैं। इसलिये श्रीकृष्णकथा-रसिकोंके लिये ब्रह्मादि जन्मका भी क्या मूल्य है?” तथा 'बृहद्वामन'में भृगु आदि ऋषियोंके प्रति ब्रह्माके वाक्य— “षष्टिवर्ष-सहस्राणि मया तप्तं तपः पुरा। नन्दगोपव्रजस्त्रीणां पादरेणूपलब्धये॥ तथापि न मया प्राप्तास्तासां वै पादरेणवः। नाहं शिवश्च शेषश्च श्रीश्च ताभिः समाः क्वचित्॥” श्रीनन्दगोपके व्रजमें रहनेवाली गोपरमणयोंके श्रीचरणोंकी रज प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें मैंने साठ हजार वर्षोंकी कठोर तपस्या की थी, तो भी मैं उनकी चरणरेणुको प्राप्त नहीं कर सका। मैं (ब्रह्मा) शङ्कर, शेष और लक्ष्मीजी किसी प्रकारसे उन व्रजगोपियोंके समान नहीं हैं। आदि पुराणमें श्रीभगवद्-वाक्य— “न तथा मे प्रियतमो ब्रह्मा रुद्रश्च पार्थिव। न च लक्ष्मीनं चात्मा च यथा गोपीजनो मम॥” हे पार्थ ! जिस प्रकार व्रजकी गोपियाँ मेरी प्रियतमा हैं, उस प्रकार ब्रह्मा, शङ्कर, लक्ष्मी और यहाँ तक कि मेरी आत्मा भी उतनी प्रिय नहीं है। गोपियोंमें भी श्रीराधिकाका ही सर्वश्रेष्ठत्व है। श्रीराधाके सबसे प्रिय सेवकवर, श्रीगौराङ्गके अत्यन्त अन्तरङ्ग सेवक श्रील रूपगोस्वामी प्रभुके जो एकान्त अनुगत हैं, वे ही रूपानुगके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनके ऐश्वर्यके सम्बन्धमें श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें— “आस्तां वैराग्यकोटिर्भवतु शम-दम-क्षान्ति-मैत्रादिकोटि- स्तत्त्वानुध्यान कोटिर्भवतु भवतु वा वैष्णवी भक्तिकोटिः। कोट्यांशोऽप्यस्य न स्यात्तदपि गुणगणो यः स्वतःसिद्ध आस्ते श्रीमच्चैतन्यचन्द्र-प्रिय-चरण-नख-ज्योतिरामोद-भाजाम्॥” कोटि वैराग्य रहे, कोटि शम, दम, क्षान्ति, मैत्रादि असंख्य गुण ही रहें, कोटि ब्रह्मध्यान हो या कोटि विष्णुभक्ति विद्यमान रहे, किन्तु श्रीचैतन्यचन्द्रके प्रिय भक्तोंकी चरण-नख ज्योतिके द्वारा आनन्द प्राप्त दासोंकी जो स्वतःसिद्ध गुणावली है, उनके कोटि भागका एक अंश भी ये सब नहीं हैं॥ 245 ॥ (3) राधागोविन्दमें प्रेमभक्ति ही परम धन :— 'सम्पत्तिर मध्ये जीवेर कोन् सम्पत्ति गणि?' 'राधाकृष्णे प्रेम याँर, सेइ बड़ धनी ॥' 246 ॥ । 321
[ 8/246-250 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "सम्पत्तियोंमें जीवकी सबसे बड़ी सम्पत्ति क्या है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया, — "जिनके पास श्रीराधाकृष्णप्रेम रूप सम्पत्ति है, वही सबसे बड़ा धनी है॥"246॥ अनुभाष्य-जड़ीय भोगोंमें लिप्त होकर जीव अधिक भोगवासनाओंकी पूर्ति करनेवाले धनको ही प्राप्य वस्तुओंमें सबसे श्रेष्ठ समझते हैं। किन्तु सम्पत्तिके तारतम्यके विचारमें सूक्ष्म अप्राकृत-बुद्धिके अनुसार श्रीराधाकृष्णप्रेमके समान सम्पत्ति और कुछ भी नहीं है। (भाः 10/39/2)— "किमलभ्यं भगवति प्रसन्ने श्रीनिकेतने। तथापि तत्परा राजन्न हि वाञ्छन्ति किञ्चन॥" "समस्त सम्पत्तिके मूलस्वरूप भगवान्के प्रसन्न होनेपर और क्या प्राप्त करना बाकी रह जाता है? तथापि हे राजन्! भक्त लोग श्रीकृष्णप्रेम-धनके अतिरिक्त उनसे और कुछ भी नहीं चाहते॥"246॥ (4) कृष्णभक्तका विरह ही तीव्रतम दुःख :- 'दुःख-मध्ये कोन् दुःख हय गुरुतर?' 'कृष्णभक्त-विरह बिना दुःख नाहि देखि पर॥'247॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "सब दुःखोंमेंसे कौनसा दुःख सबसे भारी है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया, — "श्रीकृष्णभक्तके विरहसे बढ़कर और कोई दुःख मैं नहीं देखता हूँ॥"247॥ अनुभाष्य—(भाः 3/30/6)— "मामणाराध्य दुःखार्त्तः कुटुम्बासक्तमानसाः। सत्सङ्ग-रहितो मर्त्यो वृद्धसेवा-परिच्युतः॥" "मेरी आराधना न करके कुटुम्बमें आसक्त चित्तवाले जीव साधुसङ्गरहित और पूर्व साधुसेवासे भ्रष्ट होकर दुःखों और कष्टोंमें पड़ जाते हैं।" (यह श्लोक उद्धृत संख्याके अनुसार मूलग्रन्थमें दिखायी नहीं देता) (बृः भाः 1/5/44)— 'स्वजीवनाधिकं प्रार्थ्यं श्रीविष्णुजनसङ्गतः। विच्छेदेन क्षणं चात्र न सुखांशं लभामहे॥" महाराज युधिष्ठिर श्रीनारदसे बोले, — "वास्तवमें भगवान् श्रीविष्णुके भक्तोंका सङ्ग हमें अपने जीवनसे भी अधिक प्रार्थनीय है, परन्तु अब उन्हीं भक्तोंके विच्छेदसे हम इस संसारमें एक क्षणके लिये तनिक भी सुख प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं॥"247॥ (5) कृष्णप्रेमी ही सर्वश्रेष्ठ मुक्त :- 'मुक्त-मध्ये कोन् जीव मुक्त करि' मानि?' 'कृष्णप्रेम याँर, सेइ मुक्त-शिरोमणि॥'248॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "मुक्तगणोंमेंसे किस जीवको मुक्त मानना चाहिये?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया, — "जिनमें श्रीकृष्णप्रेम है, वे ही मुक्त-शिरोमणि हैं॥"248॥ अनुभाष्य—(भाः6/14/4)— "मुक्तानामपि सिद्धानां नारायण परायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥" "हे महामुने! करोड़ों मुक्त और सिद्ध पुरुषोंमें भी प्रशान्तात्मा नारायण-परायण भक्त अत्यन्त दुर्लभ हैं॥"248॥ (6) कृष्णलीला-गान ही शुद्ध-जीवात्माका सहज धर्म :- 'गान-मध्ये कोन् गान—जीवेर निज धर्म?' 'राधाकृष्णेर प्रेमकेलि—येइ गीतेर मर्म॥'249॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "समस्त गानोंमें कौन-सा गान जीवका निज (स्वरूप) धर्म है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया, — "श्रीराधाकृष्णकी प्रेमकेलि लीलाओंका गान करना ही समस्त गीतोंका सार है॥"249॥ अनुभाष्य—(भाः 10/33/36)— "अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमाश्रितः। भजते तादृशीः क्रीड़ा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत्।" "भगवान् श्रीकृष्णने भक्तोंके प्रति अनुग्रह करनेके लिये जो गोलोककी रासलीला प्रपञ्चमें प्रकट की है, उसे श्रवण करके मनुष्य देहधारी प्राणीमात्र ही भगवत्-सेवामें तत्पर होंगे॥"249॥ (7) कृष्णभक्तका सङ्ग ही जीवका एकमात्र श्रेय :- 'श्रेयो-मध्ये कोन् श्रेयः जीवेर हय सार?' कृष्णभक्त-सङ्ग बिना श्रेयः नाहि आर॥'250॥ 322 ।
आठवाँ अध्याय 8/250-254 ] अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,–“श्रेयोंमेंसे कौनसा श्रेय जीवोंके लिये सार है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,—“श्रीकृष्णभक्त-सङ्गके समान और कोई मङ्गल नहीं है॥”250॥ अनुभाष्य—(भाः 11/2/30)— “अत आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्छामो भवतोऽनघाः। संसारेऽस्मिन् क्षणार्द्धोऽपि सत्सङ्गः शेवधिर्नृणाम्॥” “हे महापुरुषों! आप लोगोंके दुर्लभ दर्शन प्राप्त करके मैं अपने परम कल्याणके विषयमें जाननेकी इच्छा करता हूँ। इस संसारमें यदि आधे क्षणके लिये भी शुद्धभक्तका सङ्ग प्राप्त हो जाय, तो वह जीवोंको परमानन्द प्रदान करनेवाला होता है॥”250॥ (8) कृष्ण ही एकमात्र नित्य स्मरणीय :- ‘काँहार स्मरण जीव करिबे अनुक्षण?’ ‘कृष्ण-नाम-गुण-लीला-प्रधान स्मरण॥’ 251॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,–“जीवोंको प्रतिक्षण किसका स्मरण करना चाहिये?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,—“श्रीकृष्णके नाम, रूप, गुण और लीलाओंका स्मरण करना ही प्रधान स्मरण है॥”251॥ अनुभाष्य—(भाः 2/2/36)— “तस्मात् सर्वात्मना राजन् हरिः सर्वत्र सर्वदा। श्रोतव्यः कीर्त्तितव्यश्च स्मर्त्तव्यो भगवन्नृणाम्॥” “इसलिये हे राजन्! मनुष्यमात्रके लिये सर्वात्माके द्वारा सर्वत्र और सर्वदा उन श्रीहरिके नाम-गुण-लीलादि श्रवणीय, कीर्त्तनीय और स्मरणीय हैं॥”251॥ (9) राधाकृष्ण-चरणकमल ही एकमात्र ध्येय :- ‘ध्येय-मध्ये जीवेर कर्त्तव्य कोन् ध्यान?’ ‘राधाकृष्णपदाम्बुज-ध्यान-प्रधान॥’ 252॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,–“सब प्रकारके ध्यानोंमेंसे किसका ध्यान करना जीवोंका कर्त्तव्य है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,–“श्रीराधाकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करना ही प्रधान ध्यान है॥”252॥ अनुभाष्य—(भाः 1/2/14)— “तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पतिः। श्रोतव्यः कीर्त्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा॥” “इसलिये स्थिर चित्तसे भक्तोंके एकमात्र पतिस्वरूप भगवान् श्रीहरिके नामादिका श्रवण, कीर्तन, ध्यान और पूजा करना कर्त्तव्य है।” 252॥ (10) ब्रज ही एकमात्र वासयोग्य स्थान :- ‘सर्व त्यजि’ जीवेर कर्त्तव्य काँहा वास?’ ‘श्रीवृन्दावन-भूमि-याँहा नित्य-लीलारास॥’ 253॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,–“सर्वस्व त्याग करके कहाँ वास करना जीवका कर्त्तव्य है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,—“जहाँ श्रीकृष्ण नित्य रास-लीला करते हैं, उस ब्रजभूमि वृन्दावनमें ही वास करना चाहिये॥” 253॥ अनुभाष्य—(भाः10/47/61)— “आसामहो चरणरेणु जुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथञ्च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥” “श्रीउद्धवने कहा,—“दुस्त्यज स्वजनों और आर्यपथका त्याग करके जो श्रुतियोंकी भी निरन्तर अन्वेषणीय श्रीकृष्णपदवीकी सेवामें निरत हुई हैं, अहो, मैं उन गोपियोंकी चरणधूलि प्राप्त करनेके लिये वृन्दावनमें झाड़ी-लतादिमें किसी एक स्वरूपसे जन्म ग्रहण करनेकी इच्छा करता हूँ॥” 253॥ (11) श्रीराधाकृष्ण-प्रेमलीला ही एकमात्र श्रवणयोग्य :- ‘श्रवण-मध्ये जीवेर कोन् श्रेष्ठ श्रवण?’ ‘राधाकृष्ण-प्रेमकैलि कर्ण-रसायन॥’ 254॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,–“श्रवणमें जीवके लिये सर्वश्रेष्ठ श्रवण क्या है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,–“कर्ण-रसायनरूप श्रीराधाकृष्णकी प्रेमकलिका श्रवण ही सर्वश्रेष्ठ है॥” 254॥ । 323
[ 8/244-257 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—(भाः 10/30/39)— “विक्रीड़ितं व्रजवधूभिरिदञ्च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः। भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥” “व्रजवधुओंके साथ श्रीकृष्णकी रासक्रीड़ा जो धीर व्यक्ति श्रद्धासहित निरन्तर श्रवण करनेके बाद निरन्तर उसका कीर्त्तन करता है, वह अति शीघ्र ही पराभक्ति प्राप्त करके हृदयके कामरोगको अविलम्ब दूर करनेमें समर्थ होता है॥” 254 ॥ (12) हरेकृष्ण-नाम ही एकमात्र कीर्तनीय :— 'उपास्येर मध्ये कोन् उपास्य प्रधान?' 'श्रेष्ठ-उपास्य—युगल 'राधाकृष्ण' नाम॥' 255 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, —“उपास्योंमेंसे कौन-सा उपास्य सर्वप्रधान है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,—“श्रीराधाकृष्णका युगल नाम ही सर्वश्रेष्ठ उपास्य है॥” 255 ॥ अनुभाष्य—(भाः 6/3/22)— “एतावानेर लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्म परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः॥” “नामसङ्कीर्त्तनादिके द्वारा भगवान् श्रीवासुदेवका जो भक्तियोग है—यहीं तक ही इस जगत्में जीवोंका 'परमधर्म' कहा गया है॥” 255 ॥ (13) मुक्तिकामी और भुक्तिकामीकी गति :— 'मुक्ति, भुक्ति वाञ्छे येइ, काँहा दुँहार गति?' 'स्थावरदेह, देवदेह यैछे अवस्थिति॥' 256 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, —“जो मुक्ति और भुक्तिकी कामना करते हैं, उन दोनोंकी क्या गति होती है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,—“जो ब्रह्म-सायुज्य मुक्तिकी कामना करते हैं, उन्हें वृक्ष योनिकी प्राप्ति होती है। मुक्तिका लोभ करनेवालोंको देवदेहकी प्राप्ति होती है॥” 256 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—“प्रभु कहे,—कोन् विद्या” से आरम्भ होकर “स्थावरदेह, देव-देह यैछे अवस्थिति” तक प्रत्येक पद्यकी प्रथम पंक्ति महाप्रभुका प्रश्न और द्वितीय पंक्ति श्रीरायका उत्तर है। चैतन्यचन्द्रोदय नाटकके सातवें अङ्कमें यह कथोपकथन है॥ 244-256 ॥ अनुभाष्य—मुक्तिवादी लोग जड़भोगोंका त्यागकर साधनकी चरम अवस्थामें चित्-क्रियाहीन अर्थात् सुप्तचेतन स्थावर (वृक्षादि) देहको प्राप्त करते हैं। और जड़भोगोंकी कामनावाले भुक्तिवादी लोग परलोकमें भोग करनेके उपयोगी देव देहको प्राप्त करते हैं। “मुक्तयैः यः प्रस्तरत्वाय शास्त्रमुचे महामुनि। गौतमं तं विजानीथ यथा वित्थ तथैव सः।” यही बौद्ध मतवादियोंके दर्शनका फल है। पत्थरके समान दशाकी प्राप्तिरूप मुक्तिके उद्देश्यसे जिन महामुनिने (न्याय)-शास्त्रका प्रवर्त्तन किया है, उन गौतमको जिस रूपमें जानते हो, वे उसी रूपमें कहकर जाने जाते हैं। (भाः11/10/23)— “इष्ट्वेह देवता यज्ञैः स्वर्लोकं याति याज्ञिकः। भुञ्जीत देववत्तत्र भोगान् दिव्यान् निजार्जितान्॥” याज्ञिक पुरुष इस लोकमें यज्ञके द्वारा देवताओंकी आराधना करके स्वर्ग प्राप्त करते हैं और वहाँ देवताओंके समान अपने पुण्योंसे अर्जित सब दिव्य-विषयोंको भोग करते हैं। (भाः 4/29/29)— “देवो मनुष्यस्तिर्यग्वा यथाकर्मगुणं भवः॥” अज्ञानसे आवृत जीव कभी देवता, कभी मनुष्य या तिर्यक् जन्म अथवा कर्मानुसार जन्म ग्रहण करता है। और (गीः 9/20) देखें॥ 256॥ ज्ञानी और भक्तके साधनका वैशिष्ट्य :— अरसज्ञ काक चुषे ज्ञान-निम्बफले। रसज्ञ कोकिल खाय प्रेमाम्र-मुकुले॥ 257॥ 324 ।
आठवाँ अध्याय 8/257-264 ] अभागिया ज्ञानी आस्वादये शुष्क ज्ञान। कृष्ण-प्रेमामृत पान करे भाग्यवान् ॥ 258 ॥ अनुवाद—जिस प्रकार कौवे नीमके फल जैसी कड़वी वस्तुओंको ही खाया करते हैं, उसी प्रकार अरसज्ञ अर्थात् रसको न जाननेवाले ज्ञानरूपी नीमके फलको चूसते हैं। किन्तु आमके कोमल और मृदुल मुकुलोंका रसास्वादन करनेवाली कोयलके समान भक्तिरसज्ञ श्रीकृष्णप्रेमरूपी आमकी कलियोंका रसास्वादन करते हैं। दुर्भागे ज्ञानी केवल नीरस शुष्कज्ञानका आस्वादन करते हैं और भक्त श्रीकृष्ण-प्रेमामृतका पान किया करते हैं, इसलिये वे परम सौभाग्यशाली हैं॥ 257-258 ॥ अनुभाष्य—'ज्ञान'—नीमके फलके समान कड़वा, आस्वादनके अयोग्य, कर्कश-तर्कनिष्ठ कौवे जैसी अवस्थावाले जीवोंके खाने योग्य है। किन्तु प्रेमरूपी आमकी कलीका स्वाद-प्रिय और अत्यधिक मीठा है, वह—रसास्वादक कोयल तुल्य श्रीकृष्णभक्तोंके लिये ही आस्वादनीय है। नीरस ज्ञान ही दुर्भागे ज्ञानियोंके भाग्यमें आस्वादनीय वस्तु है; और सरस श्रीकृष्णप्रेमामृत ही भाग्यवान् भक्तोंके पान करने योग्य वस्तु है ॥ 257-258 ॥ श्रीकृष्णकथा-आलोचनामें ही दोनोंकी रात्रि व्यतीत :- एइमत दुइजन कृष्णकथा-रसे। नृत्य-गीत-रोदने हैल रात्रि-शेषे ॥ 259 ॥ दोंहे निज-निज-कार्ये चलिला विहाने। सन्ध्याकाले राय आसि' मिलिला आर दिने॥ 260 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीराय रामानन्द और महाप्रभु दोनों ही श्रीकृष्णकी कथाओंका आस्वादन करते रहे, प्रेमपूर्वक नृत्य-गीत-रोदन करते रहे और सारी रात्रि बीत गयी। प्रातःकाल होते ही दोनों अपने-अपने कार्यके लिये चले गये। सन्ध्याकाल होनेपर पूर्व दिनोंकी भाँति श्रीराय रामानन्द पुनः आकर महाप्रभुसे मिले॥ 259-260 ॥ अनुभाष्य—'विहाने'—पूर्वबङ्गाल और पश्चिममें (हिन्दी भाषामें) अभी भी 'प्रातःकालमें'-शब्दके बदले चलती भाषामें यह शब्द व्यवहार किया जाता है ॥ 260 ॥ दूसरे दिन महाप्रभुके चरणोंमें श्रीरायका निवेदन :- इष्टगोष्ठी कृष्णकथा कहिं' कतक्षण। प्रभुपाद धरि' राय करे निवेदन ॥ 261 ॥ “ 'कृष्णतत्त्व', 'राधातत्त्व' 'प्रेमतत्त्वसार'। 'रसतत्त्व', 'लीलातत्त्व' विविध प्रकार ॥ 262 ॥ शुद्धहृदयमें उदयके कारण महाप्रभुका स्व-प्रकाशत्व :- एत तत्त्व मोर चित्ते कैले प्रकाशन। ब्रह्माके वेद येन पड़ाइल नारायण ॥ 263 ॥ अन्तर्यामी ईश्वररे एइ रीति हय। बाहिरे ना कहे, वस्तु प्रकाशे हृदय ॥ 264 ॥ अनुवाद—कुछ समय तक इष्टगोष्ठीमें श्रीकृष्णकथाका कथन-श्रवण हुआ। उसके बाद श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़कर बड़े ही विनीत भावसे निवेदन किया,- “आपने मेरे हृदयमें 'कृष्णतत्त्व', 'राधातत्त्व', 'प्रेमतत्त्वसार', 'रसतत्त्व' और विविध प्रकारके 'लीलातत्त्वों'को इस प्रकार प्रकाशित किया है, जिस प्रकार श्रीनारायणने ब्रह्माजीको वेदोंका ज्ञान प्रदान किया था। अन्तर्यामी ईश्वरकी यही रीति है कि वे बाहरसे कुछ नहीं कहते, किन्तु हृदयमें उस तत्त्ववस्तुको स्फुरित कराते हैं॥ 261-264 ॥ अनुभाष्य—ब्रह्माके हृदयमें भगवान्के द्वारा वेदप्रकाशन, -(श्वे०उ: 6/18)- “यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ " जिन्होंने सृष्टिके पहले ब्रह्माकी सृष्टि की थी और उनके हृदयमें समस्त वेदोंको सञ्चारित किया था, उन आत्मबुद्धिप्रकाशक-देवकी मुक्तिकी इच्छा करनेवाला मैं शरण ग्रहण करता हूँ। इसके द्वारा श्रीगौरसुन्दर ही गायत्रीके प्रतिपाद्य । 325
[ 8/263–265 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला बुद्धिवृत्ति-प्रवर्त्तक 'भर्गोदेव' हैं, यह कहा जा रहा है; जैसे (भाः 2/4/22)— “प्रचोदिता येन पुरा सरस्वती वितन्वताजस्य सतीं स्मृतिं हृदि। स्वलक्षणा प्रादुरभूत् किलास्यतः स मे ऋषीणामृषभः प्रसीदताम्॥” “कल्पके प्रारम्भमें जिन्होंने ब्रह्माके हृदयमें सृष्टिविषयक स्मृतिका प्रकाश किया था और जिनके द्वारा प्रेरित सरस्वतीने ब्रह्माके मुखसे प्रकटित होकर श्रीकृष्णको ही उपास्यरूपमें लक्ष्य किया था, वे ज्ञानप्रदातागणोंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीभगवान् मेरे प्रति प्रसन्न हों।” भाः 2/9/30–35, 11/14/3, 12/4/40 और 12/13/19 आदि श्लोक देखें ॥ 263-264 ॥ चिद्विलासमय परमेश्वर-वस्तुका निरूपण और ध्यान :— श्रीमद्भागवत (1/1/1)— जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः। तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ 265 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 265 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस विश्वका जन्म, स्थिति और लय जिससे होता है, ऐसा कहनेसे जो तत्त्व निश्चित हुआ है, अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा विचार करनेपर जो समस्त अर्थ अथवा कार्यमें एकमात्र परम 'ज्ञ-तत्त्व' अर्थात् 'स्वरूपतत्त्व' कहलाकर स्थिर होते हैं; जो दृश्यमान जगत्में एकमात्र स्वराट् अर्थात् स्वतन्त्र राजा हैं; जिन्होंने आदिकवि ब्रह्माको अन्तर्यामीके रूपमें ब्रह्मतत्त्वकी शिक्षा दी है; जिनके विषयमें समस्त बुद्धिमान पण्डितोंमें बारम्बार मोह उत्पन्न होता है; जिनसे अग्नि, जल और मिट्टी आदि भूतोंका विनिमय अर्थात् पृथक् रूपमें सत्ता है; जिनसे तीन प्रकारकी सृष्टि अर्थात् चिद्-उदयरूप सृष्टि, जीव-प्रकाट्यरूप सृष्टि और मायिक-ब्रह्माण्डरूप सृष्टि—सत्यरूपमें वर्तमान है; स्वरूपशक्तिके द्वारा नित्य-कपट-शून्य परमसत्य- तत्त्वरूप उन श्रीकृष्णका हम ध्यान करते हैं ॥ 265 ॥ अनुभाष्य— यतः (यस्मात् शक्तिमतः) अस्य (विश्वस्य) जन्मादि (जन्मस्थितिभङ्गं “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” इत्यादि श्रुतेः, “जन्माद्यास्य यतः” इति न्यायात्—ब्रः सूः 1/1/2) अन्वयात् इतरतश्च (अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां भवति); यः अन्वयात् अर्थेषु (चिन्मयरूपरसगन्धशब्दस्पर्शाद्योग्य-व्यापारेषु) अभिज्ञः (आसक्तः) व्यतिरेकात् अर्थेषु (जडरूपरसगन्धशब्दस्पर्शाद्विषयेषु) अभिज्ञः (असंस्पृष्टः) सन् स्वराट् (स्वेन एव राजते यः स्वप्रकाशः); यत् (यस्मिन् परमसत्ये) सुरयः (ब्रह्मादयः—दशमे ब्रह्ममोहनात्, देवाः तलवकारश्रुतेः; ब्राह्मणादयः मुनयश्च दत्तात्रेय-दुर्वासो-वशिष्ठ-शङ्कर-विद्यारण्यादयः “दैवाहताथैरचना” इति भाः 3/9/10 वचनात्) अपि मुह्यन्ति (मोहं प्राप्नुवन्ति परमसत्यनिर्द्धारणे असमर्थाः भवन्ति); तत् ब्रह्म (तत्त्वं—“वदन्ति तत्तत्त्वविदः” इत्याद्येः) आदिकवये (ब्रह्मणे), हृदा (मनसि—‘त्रया प्रबुद्धः’ इति ब्रह्मसंहिता-वचनात्) यः तेने (प्रकाशितवान्); यथा तेजोवारिमृदां विनिमयः (व्यत्ययः अन्यस्मिन् अन्यावभासः तथा) त्रिसर्गः (त्रयाणां रजस्तमःसत्त्वानां नश्वरः सर्गः, पक्षान्तरे, अन्तरङ्ग-बहिरङ्ग-तटस्थ-शक्तित्रयाणां नित्यप्रकाशः) यत्र (परमसत्ये भगवत्-स्वरूपे सच्चिदानन्दविग्रहाद्वयज्ञाने) अमृषा (सत्यः); स्वेन धाम्ना (अप्राकृतान्तरङ्गसन्धिन्यादि-तद्रूप-वैभवेन बलेन) सदा निरस्त-कुहकं (निरस्तं व्युदस्तं माया-लक्षणं कुहकं कपटं यस्मिन् तं) सत्यं (सत्यस्वरूपं सनातनं) परं (सर्वस्मात् परं परमेश्वरं) धीमहि (वयं ध्यायेमः)। श्लोक-भावानुवाद—जिन शक्तिमान्से इस विश्वका (“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” आदि उपनिषद् वचनों और “जन्माद्यास्य यतः” ब्रह्मसूत्र 1/1/2 से प्रमाणित) अन्वय-व्यतिरेक रूपसे जन्म, स्थिति और लय होता है, जो अन्वय रूपसे चिन्मय रूप-रस- गन्ध-शब्द-स्पर्श योग्य कार्योंमें आसक्त और व्यतिरेक रूपसे जड़ रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्श विषयोंसे पूर्णरूपसे अस्पृष्ट होकर एकमात्र स्वतन्त्र राजा अथवा स्वयं-प्रकाश रूपमें विराजमान हैं; जिन परम सत्यका निर्धारण करनेमें ब्रह्मा (दशम स्कन्ध ब्रह्ममोहनलीला), देवता लोग (तलवकार श्रुति) ब्राह्मण आदि मुनि (दत्तात्रेय, 326 ।
आठवाँ अध्याय 8/265 ] दुर्वासा, वशिष्ठ, शङ्कर, विद्यारण्य आदि 'देवाहातार्यरचना' भागवतके 3/9/10 वचनानुसार) आदि भी असमर्थ होते हैं; जिन्होंने अन्तर्यामीके रूपमें आदिकवि ब्रह्माके हृदयमें ('त्रया प्रबुद्धः' ब्रह्मसंहिता वचनानुसार) ब्रह्मतत्त्वकी शिक्षा दी है; जिनसे अग्नि, जल और मिट्टी आदि भूतोंका विनिमय अर्थात् अन्यमें अन्यका आभास होता है; जिनसे 'रज-तम-सत्त्व' - तीन गुणोंसे नश्वर सृष्टि, पक्षान्तरमें अन्तरङ्गा, बहिरङ्गा और तटस्था-इन तीन शक्तियोंका नित्य प्रकाश है; जिनका भगवद्-स्वरूप अर्थात् अद्वयज्ञान सच्चिदानन्द विग्रहरूप सत्य है; स्वरूपशक्ति-तद्रूप-वैभवके द्वारा नित्य माया-कपट-शून्य उन परमसत्य परमेश्वर श्रीकृष्णका हमें ध्यान करना चाहिये। विशेष रूपसे जाननेके लिये श्रीमद्भागवतका गौड़ीय भाष्य देखें॥ 265 ॥ अमृताणुकणिका-“ 'जन्माद्यस्य यतः'-जिन्होंने मथुरा तथा गोकुलमें जन्मग्रहण आदि लीलाओंको प्रकटितकर आद्य रस अर्थात् शृङ्गार रसमें अपनी सर्वश्रेष्ठ नित्य लीलाओंका आस्वादन किया। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य आदि अन्य सभी रस शृङ्गार रसके अन्तर्भुक्त हैं; शृङ्गाररस ही आदि रस है। जैसे, जब स्वयं श्रीकृष्ण अवतार लेते हैं, तब उनके समस्त पूर्व-पूर्व अवतार, अंश, कला, तद्रूप वैभव तथा भविष्यमें आनेवाले सभी अवतार उनके अन्दर क्रोड़ीभूत होकर अवतरित होते हैं। शृङ्गार रस-अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां भवति। शृङ्गाररसका प्रादुर्भाव अन्वय-व्यतिरेक अर्थात् मिलन और विरहके रूपमें होता है। रसमय श्रीकृष्णसे संयोग और वियोग भेदसे प्रेयसियोंके साथ यह शृङ्गाररस उत्पन्न होता है। प्रेमके आविर्भाव होनेपर श्रीकृष्णकी प्रेयसियोंमें मिलनसे पूर्व दर्शन, प्रियके श्रवण आदिसे उत्पन्न होनेवाली उत्कण्ठामयी रति को पूर्वराग कहा जाता है। यही प्रेम कुटिल रूप धारणकर मानके रूपमें श्रीकृष्ण और गोपियोंको और अधिक आनन्द प्रदान करता है। इस अप्राकृत शृङ्गाररस संयोग-वियोग लीलामें विभिन्न प्रकारके सञ्चारी, सात्त्विक भाव-अनुभाव उदित होकर श्रीकृष्ण और गोपियोंको रससागरमें निमग्न करते हैं। 'अर्थेष्वभिज्ञः' धीर-ललित नायक श्रीकृष्ण इन सभी चौंसठ प्रकारकी शृङ्गाररसकी विद्याओंमें अत्यन्त अभिज्ञ हैं। प्रेयसियोंको आकर्षित करना, उन्हें मनाना, शृङ्गार-वेश रचना आदि सभी कलाओंमें वे प्रवीण हैं अर्थात् वे प्रेमकी समस्त कलाओंमें दक्ष, विदग्ध हैं। 'स्वराट्' - इस विषयमें उन्हें किसीसे सीखनेकी आवश्यकता नहीं है। 'तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये' - श्रीकृष्णने आदिकवि ब्रह्माके हृदयमें 'शब्दब्रह्म'को प्रकाशित किया था, परन्तु श्रीशुकदेव गोस्वामीके हृदयमें 'रसब्रह्म'को प्रकाशित किया जिसके द्वारा वे श्रीमद्भागवतमें वर्णित 'पिबत भागवतं रसं' की रसवर्षा कर सके। 'मुह्यन्ति यत् सूरयः'-जिनकी वृन्दावनलीलामें ब्रह्माजी मोहित होकर ग्वालबाल-बछड़ोंको चुरानेका अपराध कर बैठे, इसी प्रकार अन्य-अन्य ऋषिगण, देवतागण भी श्रीकृष्णकी व्रजलीलाएँ देखकर मोहग्रस्त हो गये। 'तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो'-चन्द्रसरोवरमें श्रीकृष्णकी रासलीलामें वंशीध्वनि श्रवण करके चन्द्रमा निस्तेज हो गये, श्रीकृष्णके सौन्दर्यके सम्मुख वे मलिन हो गये; यमुनाका जल जमकर कठोर हो गया, गिरिराज गोवर्धनकी शिलायें पिघल गयीं। श्रीकृष्णके रूप और सौन्दर्य तथा वंशीध्वनिने रसधारा वर्षण करके तेज, जल और प्रस्तरके स्वभावको बदल दिया, उनके स्वभावका विनिमय हो गया अर्थात् जड़ चेतन हो गया और चेतन जड़ाकार हो गया। 'यत्र त्रिसर्गोऽमृषा'-श्रीकृष्णके त्रिसर्ग गोकुल, मथुरा और द्वारका, उनकी त्रिशक्ति ह्लादिनी, सम्वित् और सन्धिनी, श्रीकृष्णकी त्रिविध लीलाएँ-बाल्य, पौगण्ड, और कैशोर, ये त्रिसर्ग सब समय सत्य हैं। इन समस्त अवस्थाओं, लीलाओं और शक्तियोंके साथ जो अपने 'निरस्त कुहकं' अर्थात् महामायाके प्रभावसे रहित धाममें विराजमान हैं, उन 'सत्यं परं धीमहि' सत्य स्वरूप सनातन परम परमेश्वर श्रीकृष्णका मैं ध्यान करता हूँ। अथवा व्याख्यान्तरके द्वारा-'जन्माद्यस्य यतः'-जो । 327
[ 8/265–270 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नित्य अपनी शक्ति स्वरूपा गोपियोंके साथ लीला-विलास करते रहते हैं, उनकी लीलाओंसे आदिरस शृङ्गाररसका जन्म होता है। ‘अन्वय व्यतिरेकाभ्यां भवति’—अन्वय और व्यतिरेक रूपमें श्रीराधा-कृष्णके संयोग या मिलनके रूपमें राधाजीका महाभाव उच्चतम अवस्था मादन तक पहुँच जाता है; पुनः वियोगमें चित्रजल्पादि अनेक रूप धारण करता है। इन दोनोंके संयोग और वियोगके कारण ही रस पूर्णताको प्राप्त करता है। इस आद्य शृङ्गार रसमें दोनों अभिज्ञ हैं। कभी श्रीराधा मान कर लेती हैं और इस रसको नवीन-नूतन बनाकर श्रीकृष्णको अपनी सेवामें नियुक्त कर लेती हैं। इधर श्रीकृष्ण भी अभिज्ञ हैं, परम विदग्ध हैं, श्रीराधाके मान-प्रसादनके लिये प्रेमके वशीभूत होकर परम चातुरीसे उनका मान दूर करते हैं। ऐसे शृङ्गाररसका प्रादुर्भाव अन्य किसी भी भगवत्-अवतारमें नहीं हुआ, क्योंकि उनमें ऐश्वर्यकी प्रधानता होती है। श्रीराधाकृष्णकी लीलाओंमें ही शृङ्गाररस सर्वोत्तम स्तरपर पहुँचा है। ‘स्वराट्’—श्रीकृष्ण और श्रीराधा दोनों ही अपनेमें पूर्ण हैं। ‘तेने ब्रह्महृदा’— श्रीशुकदेव गोस्वामीके हृदयमें आद्य शृङ्गाररस प्रकट किया, क्योंकि ये श्रीराधाके शुक हैं और श्रीकृष्णके हाथोंमें भी गये हैं, तब इनको दोनोंकी कृपासे रस-विषयमें अनुभूति हुई। ‘मुह्यन्ति यत् सूरयः’—ब्रह्मा आदि देवता इस व्रजलीलासे मोहित हो जाते हैं। ब्रह्मा व्रजमें आये, किन्तु वे शृङ्गाररस तक नहीं पहुँच पाये, उन्होंने केवल बाल्यलीलाएँ देखीं, श्रीकृष्णका ऐश्वर्य देखा, अघासुरकी मुक्ति देखी, जब श्रीकृष्णने अपना चतुर्भुज रूप दिखाया, तब वे आश्चर्यचकित हो गये। श्रीराधाकृष्णके मिलनमें जो रस होता है, उसके द्वारा यमुनाका जल कठोर हो जाता है, गिरिराजके प्रस्तर पिघल जाते हैं, चन्द्रमा निस्तेज हो जाता है। ‘त्रिसर्ग’—श्रीराधाकृष्णकी वृन्दावनमें परिपूर्णतम, मथुरामें पूर्णतर और द्वारकामें पूर्ण लीलाएँ हुईं। इन दोनों स्थानों, मथुरा और द्वारकामें श्रीराधा नहीं रहीं, इसलिये लीलाएँ भी पूर्णताको प्राप्त नहीं कर सकीं। उन अप्राकृत व्रजलीलाओंके सहित मैं श्रीराधाकृष्णका ध्यान करता हूँ।”—श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 265 ॥ श्रीरायका संशय :— एक संशय मोर आछये हृदये। कृपा करि’ कह मोरे ताहार निश्चये ॥ 266 ॥ श्रीरायके निकट महाप्रभुके स्वरूपका आविर्भाव :— पहिले देखिलुँ तोमार संन्यासी-स्वरूप। एबे तोमा देखि मुञि श्याम-गोपरूप ॥ 267 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“मेरे हृदयमें एक संशय उदित हुआ है। आप कृपा करके मुझे उसका समाधान निश्चय करके बताइये। पहले मैंने आपके संन्यासीरूपका दर्शन किया और अब मैं आपको श्याम-वर्ण गोपके रूपमें देख रहा हूँ॥ 266–267 ॥ अनुभाष्य—अर्थात् 'रसराज, महाभाव—दुइ एक रूप' (281 संख्या)। 'संन्यासी-स्वरूप'—नित्य श्रीकृष्णविरहजनित अधिरूढ़-महाभावमय नित्य वैरागी अथवा तपस्वी-स्वरूप ॥ 267 ॥ श्रीरायको राधाभावद्युति-सुवलित श्रीगौरसुन्दरका दर्शन :— तोमार सन्मुखे देखि काञ्चन-पञ्चालिका। ताँर गौरकान्त्ये तोमार सर्व अङ्ग ढाका ॥ 268 ॥ ताहाते प्रकट देखि स-वंशी वदन। नाना-भावे चञ्चल ताहे कमल-नयन ॥ 269 ॥ स्वयं महाप्रभुसे ही श्रीरायके द्वारा गौररूपके कारणकी जिज्ञासा :— एइमत तोमा देखि’ हय चमत्कार। अकपटे कह, प्रभु, कारण इहार ॥ 270 ॥ अनुवाद—अब आपके सामने एक स्वर्ण प्रतिमाको देख रहा हूँ, जिसकी गौरकान्तिसे आपके सारे अङ्ग ढके हुए हैं। गौरकान्तिसे आपके अङ्गोंके ढके होनेपर भी मैं आपके उस वंशीयुक्त मुखकमलको देख रहा हूँ और अनेक प्रकारके भावोंसे आपके नेत्रकमल भी 328 ।
चञ्चल हो रहे हैं। इस प्रकारसे आपके स्वरूपको देखकर मेरे हृदयमें अद्भुत चमत्कार भाव उदित हो रहा है। इसलिये हे प्रभो! आप कपटता छोड़कर मुझे इसका यथार्थ कारण बतलाइये॥” 268-270 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 3/86-89 संख्या देखें ॥ 266-269 ॥
रायको 'महाभागवत' कहकर उनकी प्रशंसाके द्वारा स्वयंका गोपन करनेकी चेष्टा :- प्रभु कहे, — “कृष्णे तोमार गाढ़प्रेम हय। प्रेमार स्वभाव एह जानिह निश्चय ॥ 271 ॥ महाभागवत अथवा वैष्णव अथवा परमहंसका दर्शन :- महाभागवत देखे स्थावर-जङ्गम। ताँहा ताँहा हय ताँर श्रीकृष्ण-स्फुरण ॥ 272 ॥ स्थावर-जङ्गम देखे, ना देखे तार मूर्त्ति। सर्वत्र हय ताँर इष्टदेव-स्फूर्त्ति ॥ 273 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने आत्म-गोपन करते हुए श्रीरामानन्द रायसे कहा,—“आपका श्रीकृष्णके प्रति गाढ़ अनुराग है। प्रेमका स्वभाव ही यह होता है कि महाभागवतकी दृष्टिमें जो भी स्थावर-जङ्गम आते हैं, उनमें उन्हें श्रीकृष्णकी ही स्फूर्त्ति होती है। स्थावर-जङ्गम दृष्टिगोचर होनेपर भी उन्हें उनकी मूर्ति (आकृति) दिखायी नहीं देती, केवल सर्वत्र अपने इष्टदेवकी ही स्फूर्त्ति होती है ॥ 271-273 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-प्रभो, आपको मैंने पहले एक संन्यासीके जैसा देखा था; अब आपको श्याम-गोपरूपमें देख रहा हूँ। फिर आपके सामने एक सोनेकी पुतली देख रहा हूँ। यद्यपि उस पुतलीने गौरकान्तिके द्वारा आपकी पूरी देहको ढक दिया है, तथापि आपका रङ्ग जैसे प्रकटरूपमें ही प्रतीत हो रहा है और आपका बाँया नेत्र अनेक प्रकारसे चञ्चल है। प्रभो! आपके इस प्रकार चमत्कारमय-भावका कारण क्या है, उसे निष्कपट होकर बतलाइये। महाप्रभुने कहा, —जिनका श्रीकृष्णमें गाढ़ प्रेम है, वे उत्तम भागवत हैं। उनके प्रेमका स्वभाव यह है कि वे स्थावर-जङ्गम, जो कुछ भी देखते हैं, उनमें स्थावर-जङ्गमकी मूर्ति न देखकर सर्वत्र (अपने) इष्टदेवकी स्फूर्त्तिरूपी श्रीकृष्णभावको ही देखते हैं ॥ 267-273 ॥
सर्वत्र श्रीकृष्ण-कार्ष्ण-दर्शन :- श्रीमद्भागवत (11/2/45)- सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ 274 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 274 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो उत्तम भागवत होते हैं, वे सभी प्राणियोंमें आत्माके भी आत्मरूप भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको ही देखते हैं एवं आत्माके आत्मस्वरूप श्रीकृष्णमें समस्त जीवोंको देख पाते हैं ॥ 274 ॥
अनुभाष्य-विदेहराज 'निमि'के द्वारा तीन प्रकारके भक्तों अथवा भागवतोंके लक्षण, दर्शन, आचरण और बोलनेके सम्बन्धमें जाननेकी इच्छा करनेपर उनके प्रश्नोंके उत्तरमें नव-योगेन्द्रोंमेंसे अन्यतम 'हवि'ने कहा- यः सर्वभूतेषु (चेतनाचेतनात्मकेषु सर्वेषु) आत्मनः (भोगजड़ातीतस्य अप्राकृतस्य) भगवद्भावं (भूतानां भगवत्- सेवोपयोगिसिद्धस्वरूपादिकं) पश्येत्, आत्मनि भगवति [निजसिद्धरूपेण अप्राकृत-नित्यसेवापराणि] भूतानि पश्येत, [सः] एषः भागवतोत्तमः। [अप्राकृतभावप्राबल्येन महाभागवताः सर्वत्र सेव्य-सेवक- भावावस्थिताः कृष्णकार्ष्णान् पश्यन्ति, बहिर्दृष्टेरभावात्]।
श्लोक-भावानुवाद-जो चेतन-अचेतन प्राणियोंमें अप्राकृत भगवद्-सेवोपयोगी सिद्ध-स्वरूपको देखते हैं और उन्हें अपने समान ही श्रीकृष्णकी अप्राकृत-सेवाके उपकरण रूपमें देखते हैं, वे ही महाभागवतोंमें उत्तम हैं। [अप्राकृत-भावकी प्रबलताके कारण महाभागवत सर्वत्र ही सेव्य-सेवक-भावमें स्थित कृष्ण-कार्ष्ण-दर्शन करते हैं, क्योंकि उनमें बाह्य-दृष्टिका अभाव होता है] ॥ 274 ॥
। 329
[ 8/275-281 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णसेवामय-चित्तमें सर्वत्र चेतना या श्रीकृष्णसेवावृत्ति-दर्शन :- श्रीमद्भागवत (10/35/9)- वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः। प्रणतभारविटपा मधुधाराः प्रेमहृष्टतनवो ववृषुः स्म॥ 275 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275॥ अमृतप्रवाह भाष्य-[श्रीकृष्णका वेणुनाद श्रवण करके] वनकी लताएँ और वृक्ष फूल और फलोंसे लद गये और उनके भारसे उनकी डालियाँ झुक गयीं। समस्त वनस्पति अपने भीतर श्रीकृष्णकी अभिव्यक्तिको सूचित करते हुए प्रेममें पुलकित होकर मधुधारा वर्षण करने लगीं॥ 275॥ अनुभाष्य-दिनके समय श्रीकृष्णके वनमें जानेपर विरह-सन्तप्त गोपियाँ परस्पर इस प्रकार गीत गाती थीं- [कृष्णवेणु-नादं श्रुत्वा] प्रणतभारविटपाः (भारावनत तरवः) पुष्पफलाढ्याः (फलकुसुमान्विताः) प्रेमहृष्टतनवः (कृष्णप्रेमोत्-फुल्लकलेवराः) वनलताः तरवः च आत्मनि (स्वीये विग्रहे) विष्णुं (विभु-चैतन्यं) व्यञ्जयन्त्यः (प्रकाशयमानं सूचयन्त्यः) इव मधुधारा ववृषुः स्म। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275॥ वैष्णवोंका सर्वोत्तम चरम दर्शन :- राधाकृष्णे तोमार महाप्रेम हय। याँहा ताँहा राधाकृष्ण तोमारे स्फुरय॥" 276॥ अनुवाद-तुम्हारे हृदयमें श्रीराधाकृष्णके प्रति महाप्रेम है, इसलिये जहाँ-तहाँ सर्वत्र तुम्हारे हृदयमें श्रीराधाकृष्णकी ही स्फूर्त्ति होती है॥" 276॥ श्रीरायके द्वारा स्पष्टरूपसे महाप्रभुके अवतारके उद्देश्यका कथन :- राय कहे,-"प्रभु तुमि छाड़ भारिभुरि। मोर आगे निजरूप ना करिह चुरि॥ 277॥ राधिकार भावकान्ति करि' अङ्गीकार। निजरस आस्वादिते करियाछ अवतार॥ 278॥ निज-गूढ़कार्य तोमार-प्रेम-आस्वादन। आनुषङ्गे प्रेममय कैले त्रिभुवन॥ 279॥ महाप्रभुके द्वारा अपनेको गोपन करना और छलसे श्रीरायका आरोप :- आपने आइले मोरे करिते उद्धार। एबे कपट कर,-तोमार कोन् व्यवहार॥" 280॥ अनुवाद-यह सुनकर श्रीराय रामानन्दने कहा,-"प्रभो! आप अपनी चतुराई छोड़िये। मुझसे अपने स्वरूपको मत छिपाइये। श्रीराधिकाके भाव और कान्तिको अङ्गीकार करके स्वयं रसास्वादनके लिये ही आपने अवतार ग्रहण किया है। आपका अपना परम गूढ़ कार्य है-प्रेमका आस्वादन करना और उसके आनुषङ्गिक फलसे आपने तीनों भुवनोंको प्रेममय बना दिया है। आप यहाँ मेरा उद्धार करनेके लिये आये हैं। और अब कपटता कर रहे हैं, यह आपका कैसा व्यवहार है?"॥ 277-280॥ अनुभाष्य-भगवान्के द्वारा अपनेको गोपन करनेका प्रयास करनेपर भी भक्त भगवान्की लीलाको देख लेते हैं, इस सम्बन्धमें आदिलीला 3/86-89 संख्या एवं आदिलीला 1/5 श्लोकके तात्पर्यके सम्बन्धमें आदिलीला चौथा अध्याय देखें॥ 277-279॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायको अपने श्याम और गौररूपका प्रदर्शन :- तबे हासि' ताँरे प्रभु देखाइल स्वरूप। 'रसराज', 'महाभाव'-दुइ एक रूप॥ 281॥ अनुवाद-तब मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए महाप्रभुने श्रीराम force/रामानन्द रायको अपने स्वरूपका दर्शन कराया। उस स्वरूपमें मूर्तिमान शृङ्गार-रसराज श्रीकृष्ण और मूर्तिमती महाभावमयी श्रीराधा दोनों ही एक रूपमें प्रकट हो रहे थे॥ 281॥ 330 ।
आठवाँ अध्याय 8/266-283 ]
अमृतप्रवाह भाष्य-रसराजरूप श्रीकृष्ण और महाभावरूपा श्रीमती राधिका-दोनों मिलकर जो एकतत्त्व हैं, वही स्वरूप दिखलाया-अर्थात् 'राधाभावद्युतिसुवलित श्रीकृष्णस्वरूप' दिखलाया। इससे एक-तत्त्वमें दो और दोनों-तत्त्व ही एक हैं, ऐसा एक अपूर्व स्वरूप दिखलाया। जो श्रीकृष्णचैतन्य और श्रीराधाकृष्ण-तत्त्व जाननेमें समर्थ होते हैं, वे ही श्रीस्वरूप गोस्वामीकी कृपासे उस नित्य स्वरूपकी सेवा कर पाते हैं॥ 281 ॥ श्रीरायकी आनन्द-मूर्च्छा :- देखि' रामानन्द हैला आनन्दे मूर्च्छिते। धरिते ना पारे देह, पड़िला भूमिते ॥ 282 ॥ चेतनता प्राप्त होनेपर महाप्रभुके संन्यास वेशके दर्शनसे विस्मय :- प्रभु ताँरे हस्त स्पर्शि' कराइला चेतन। संन्यासीर वेष देखि' विस्मित हैल मन ॥ 283 ॥ अनुवाद-इस अपूर्व स्वरूपको देखते ही श्रीरामानन्द अत्यधिक आनन्दसे मूर्च्छित हो गये, देहको सम्भाल न पाये और भूमिपर गिर पड़े। महाप्रभुने उनको अपने हस्तकमलोंसे स्पर्शकर उन्हें चेतन किया। चेतनावस्था आनेपर पुनः उनका संन्यासीका वेश देखकर उनका मन विस्मित हो गया ॥ 282-283 ॥ अमृताणुकणिका-“श्रीराय रामानन्द व्रजलीलामें विशाखा सखी हैं। उन्होंने श्रीकृष्णको भी देखा है और श्रीराधाको भी, किन्तु दोनों मिलकर एक हो गये और कैसे श्यामकन्ति गौरकान्तिसे आवृत हो गयी-यह इससे पूर्व उन्होंने नहीं देखा था। जिस वस्तुका प्रभाव अधिक होता है, वही दूसरी वस्तुको आवृत कर सकती है। श्रीराधा शक्ति हैं और श्रीकृष्ण शक्तिमान्। शक्ति ही शक्तिमान्को प्रकाशित करती है। इस अद्भुत मिलनसे नीलमणि श्यामकन्ति स्वर्णकान्तिसे ढककर एक अद्भुत कान्ति बन गयी। अभी तक योगमायाके प्रभावसे महाप्रभुका स्वरूप आच्छादित था। महाप्रभुकी कृपासे योगमाया तनिक-सी हटी और श्रीराय रामानन्दने इस मिलित स्वरूपके दर्शन किये। अब वे महाप्रभुके वार्त्तालाप और प्रश्न करनेकी चतुरायीसे समझ गये कि ये अन्य कोई नहीं, स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं। श्रीकृष्ण अत्यन्त चतुर हैं, किन्तु उनके भक्त उनसे अधिक चतुर होते हैं। श्रीकृष्णने महाप्रभुके संन्यासी स्वरूपमें स्वयंको छिपानेकी बहुत चेष्टा की, परन्तु केवल वर्ण-कान्ति परिवर्तित होनेसे स्वरूप परिवर्तित नहीं होता। श्रीराय रामानन्द अथवा विशाखा सखीके समान श्रीकृष्णके अन्तरङ्ग परिकर उन्हें किसी भी रूपमें पहचान लेते हैं। इसलिये श्रीराय रामानन्दने कहा-'प्रभो! अब अपनी कपटता त्याग दीजिये और इसका रहस्य मुझे बतलाइये।' महाप्रभु मुस्कुरा दिये कि अब ये मेरे भावको समझ गये हैं और मेरी चोरीका भेद खुल गया है। परन्तु फिर भी अपनेको गोपन रखनेका प्रयास करते हुए वे कहने लगे- 'मैं तो ब्राह्मण संन्यासी ही हूँ। तुम्हारी श्रीकृष्णके प्रति अगाध निष्ठा है, इसलिये तुम सर्वत्र श्रीकृष्णको ही देख रहे हो। महाभागवतका यही स्वभाव है कि उन्हें स्थावर-जङ्गम- सभी वस्तुओंमें अपने इष्टदेवकी स्फूर्ति होती है।' तब श्रीराय रामानन्दने कहा-'प्रभो! अब आप अपनी इस चतुरायीको आप छोड़ दीजिये। मैं आपके स्वरूपको पहचान गया हूँ। आप तो मेरा उद्धार करने आये हैं, फिर कपटता क्यों कर रहे हैं? मैं जान गया हूँ कि कृष्णरूपमें आपकी रसास्वादनकी इच्छा पूर्ण नहीं हुई थी, इसलिये आपने अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रेयसी श्रीराधाके प्रेमकी महिमा और उस प्रेमके द्वारा आपके माधुर्यके रसास्वानकी सीमाको अनुभव करनेके लिये उनके मादनाख्य महाभावको चोरी किया है। इस भावके साथ उनकी स्वर्ण-कान्तिका अटूट सम्बन्ध है, इसलिये आपका वर्ण भी परिवर्तित हो गया। अब आप कपट व्यवहार त्यागकर अपने स्वरूपको प्रकट कीजिये।' महाप्रभु हँस दिये और उन्होंने श्रीराय रामानन्दको अपने रसराज-महाभावके सम्मिलित स्वरूपके दर्शन करवाये। श्रीराय रामानन्दने श्रीकृष्णको भी देखा है
। 331
[ 8/266–288 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला और श्रीराधाको भी। परन्तु जब महाभाव-स्वरूपा श्रीराधा और रसराज-स्वरूप श्रीकृष्णको एक रूपमें देखा, तब उनके हृदयमें भावकी प्रबल तरङ्गें उठने लगीं, जिनके आवेशमें वे अपनेको सम्भाल न सके और मूर्च्छित हो गये। सुन्दर श्यामवर्ण किशोर गोप श्रीकृष्ण और सुन्दरी गौरकान्तियुक्त किशोरी गोपी श्रीराधा-दोनोंको एक-साथ संयुक्त होते देखकर वे मूर्च्छित हो गये। यह मूर्च्छा अत्यन्त घनीभूत थी, इसलिए महाप्रभुने अपने कोमल सुगन्धित हस्त-स्पर्शसे उसे दूर किया। श्रीकृष्णने श्रीराधाके मादनाख्य-महाभाव और अङ्गकान्तिको चोरीसे ग्रहण किया था, परन्तु उनमें आश्रय-विग्रहका विज्ञान नहीं था। श्रीराय रामानन्दसे समस्त तत्त्व सुनकर उन्हें अनुभूति हुई कि 'मैं व्रजमें वृषभानु महाराजकी पुत्री हूँ, एक किशोरी गोपी हूँ, मेरा विवाह जावटमें हुआ, परन्तु मैं नन्द महाराजके पुत्रपर आसक्त हूँ, वे मेरे प्रेमी और प्राण-प्रियतम हैं, मैं उनके अतिरिक्त अन्य किसीको नहीं जानती, तथा हमारा मिलन छिप-छिपकर होता है।' यहाँ श्रीकृष्णके अङ्ग और भाव ढक गये और अब वे श्रीराधा हो गये। श्रीकृष्णमें एकादश भाव, महाभाव, मादन-मोदन, प्रेम-वैचित्त्य, समस्त भाव-सम्पत्ति सञ्चरित हो गयी। श्रीकृष्णकी आत्मा और मनकी भावनाएँ—सभी राधामय हो गयीं; यही महाप्रभुका स्वरूप है। शृङ्गार रसराज मूर्ति और महाभावमय—यही गौर-तत्त्व है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 266–283 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायको सान्त्वना, अपने कृष्ण-स्वरूपत्व और राधाभावद्युतिमयत्वके उद्देश्य आदि समस्त गूढ़ कारणोंका अकपट रूपसे ज्ञापन :— आलिङ्गन करि' प्रभु कैल आश्वासन। “तोमा बिना एइ रूप ना देखे अन्यजन ॥ 284 ॥ मोर तत्त्वलीला-रस तोमार गोचरे। अतएव एइ रूप देखाइलुँ तोमारे ॥ 285 ॥ गौर अङ्ग नहे मोर—राधाङ्ग-स्पर्शन। गोपेन्द्रसुत बिना तैं हो ना स्पर्शे अन्यजन ॥ 286 ॥ ताँर भावे भावित करि' आत्म-मन। तबे निज-माधुर्य करि आस्वादन ॥ 287 ॥ तोमार ठाञि आमार किछु गुप्त नाहि कर्म। लुकाइले प्रेम-बले जान सर्व मर्म ॥ 288 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दका आलिङ्गन किया और आश्वासन देते हुए कहने लगे,—“राय! तुम्हारे अतिरिक्त अन्य किसीने मेरे इस रूपको नहीं देखा है। मेरा स्वरूपतत्त्व एवं लीलारसतत्त्व, सब कुछ तुम जानते हो, इसलिये मैंने तुम्हें यह अपना विशेष रूप दिखलाया है। मेरा गौरवर्ण नहीं है, परन्तु राधाके अङ्गस्पर्शसे मेरा गौरवर्ण हो गया है और राधा गोपेन्द्रसुत अर्थात् व्रजेन्द्रनन्दनके अतिरिक्त किसी अन्यका कदापि स्पर्श नहीं करती हैं। राधाके भावोंमें अपने मन एवं आत्माको अनुभावित करके ही मैं अपने माधुर्यका आस्वादन कर सकता हूँ। तुम्हारे सम्मुख मेरा कोई भी तत्त्व छिपा नहीं रह सकता। मैंने आत्मगोपनका प्रयास अवश्य किया, परन्तु तुम्हारे प्रेमके अतिशय प्रभावके कारण तुमने मेरा स्वरूपतत्त्व जान लिया अर्थात् मुझे पहचान ही लिया ॥ 284–288 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे रामानन्द, तुम मुझे अलग एक 'गौरपुरुष'के रूपमें देख रहे हो, मैं वह नहीं हूँ, मैं वही गोपेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हूँ, राधा-अङ्ग-स्पर्शके कारण मेरा यह गौरभाव ही नित्य है। राधिका कृष्णके अतिरिक्त और किसीको स्पर्श नहीं करती। श्रीराधिकाके भावमें अपने स्वरूप और मनको भावित करके मैं अपने कृष्णमाधुर्यरसका आस्वादन करता हूँ॥ 286–287 ॥ अनुभाष्य—प्राकृत सहजिया-सम्प्रदायके लोग पयार संख्या 286के 'गौर अङ्ग नहे' वचनके द्वारा श्रीगौर और श्रीकृष्णको अलग मानते हैं। वस्तुतः दोनों ही स्वयं रूप-विग्रह हैं अर्थात् श्रीगौर ही 'श्रीकृष्णस्वरूपमें' 332 ।
आठवाँ अध्याय 8/284-294 ]
सम्भोगरसमें नागर अथवा विषय-विग्रह हैं। और श्रीकृष्ण ही 'श्रीगौरस्वरूपमें' विप्रलम्भरसमें आश्रय-विग्रह- श्रीराधा-भावकान्तिमय श्रीकृष्णचैतन्य हैं। अप्राकृत शृङ्गार-रसराज विग्रह 'धीर-ललित' नायक स्वयंरूप श्रीनन्दनन्दनके अतिरिक्त अन्य कोई भी विष्णुविग्रह श्रीकृष्णकी पूर्ण-चिद्-शक्ति अथवा स्वरूपशक्ति महाभावस्वरूपा श्रीराधिकाके भोक्ता नहीं हो सकते। क्योंकि श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य समस्त विष्णु-विग्रहोंमें शृङ्गाररस एवं धीर-ललित नायकका भाव नहीं है और ऐश्वर्यभावकी प्रबलता है। इसलिये श्रीमतीके नाम “गोविन्दानन्दिनी, राधा, गोविन्दमोहिनी। गोविन्दसर्वस्व, सर्वकान्ता-शिरोमणि॥” हैं (आदिलीला 4/82 संख्या)। आदिलीला 3/86-89 संख्या भी देखें॥284-288॥
गूढ़ भजनकी बात सर्वत्र प्रकाश योग्य नहीं :- गुप्ते राखिह, काँहा ना करिह प्रकाश। आमार वातुल-चेष्टा लोके उपहास॥289॥ महाप्रभु और श्रीराय, दोनों ही आश्रयके भावमें प्रमत्त :- आमि-एक वातुल, तुमि - द्वितीय वातुल। अतएव तोमाय-आमाय हइ समतुल ॥ *290॥
अनुवाद-तुम मेरे इस स्वरूप, तत्त्व एवं दर्शनको गुप्त ही रखना, कहीं प्रकाशित मत करना। मेरी उन्मत्तकी भाँति चेष्टाओंको लोग समझ न पानेके कारण वे उपहास करेंगे। मैं एक पागल हूँ और तुम दूसरे पागल हो, हम-तुम दोनों ही एक समान हैं॥ *289-290॥
अनुभाष्य-केवल जड़ वस्तुओंमें आसक्तिके कारण तर्कनिष्ठ लोग इन सब बातोंको न समझनेके कारण उपहास करेंगे, इसलिये तुम इनको अभक्त अनधिकारीके सामने प्रकाशित मत करना। जो श्रीकृष्णप्रेममें मत्त हो जाता है, उसकी तर्कनिष्ठ सांसारिक जड़-चेष्टाएँ दूर हो जाती हैं। यद्यपि रागानुगा-भावकी प्रेम-चेष्टाएँ साधारण भोगी लोगोंके दृष्टिकोणसे 'पागलपन' मात्र लगती हैं, तथापि यह पागलपन नहीं, प्रेमोन्मत्तता है। सांसारिक लोगोंके विचारसे मैं भी पागल और तुम भी पागल हो। दोनोंमें समानता रहनेसे हम दोनों ही श्रीकृष्णप्रेमकी कथामें मत्त हैं। भक्तोंके दृष्टिकोणसे श्रीकृष्णसे इतर जड़रस-रसिक पागल और उपहासके पात्र हैं॥289-290॥
महाप्रभुका श्रीरायके साथ दस दिन तक वास :- एइरूप दशरात्रि रामानन्द-सङ्गे। सुखे गोङाइला प्रभु कृष्णकथा-रङ्गे॥291॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके साथ दस रात्रियाँ सुखपूर्वक कृष्णकथाके आनन्दमें बितायीं ॥ 291॥
महाप्रभु और श्रीरामानन्द-संवाद-एक बृहद् धातुकी खान, उसके मूल्यके भेदसे बहुतसी धातुओंका प्रकाश :- निगूढ़ व्रजेर रस-लीलार विचार। अनेक कहिल, तार ना पाइल पार ॥ 292 ॥
अनुवाद-व्रजकी रसलीलाओंका विचार अति रहस्यमय है-अनेक प्रकारसे इसका वर्णन किया जाय, तो भी इनका पार नहीं पाया जा सकता ॥ 292 ॥
अप्राकृत पाँच रसोंकी उपमा :- तामा, काँसा, रूपा, सोना, रत्नचिन्तामणि। केह यदि काँहा पोता पाय एकखानि ॥ 293 ॥ क्रमे उठाइते सेह उत्तम वस्तु पाय। ऐछे प्रश्नोत्तर कैल प्रभु-रामराय ॥ 294 ॥
अनुवाद-किसी व्यक्तिको एक ही खानमें जिस प्रकार ताँबा, काँसा, चाँदी, सोना, रत्न एवं चिन्तामणि दबी हुई मिल जाँय, तो क्रमसे खोदनेपर उत्तरोत्तर उत्तम वस्तु प्राप्त होती जाती है, ठीक इसी प्रकार श्रीराय रामानन्दके साथ प्रश्नोत्तरमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठतर तत्त्वकी प्राप्ति हुई है॥ 293-294॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीरामानन्द रायने श्रीमन्महाप्रभुके प्रश्नके पहले पाँच (इसी अध्यायकी 57 संख्यासे 67
। 333
[ 8/293-294 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला तक) उत्तर दिये। उनमें पहला—ताँबेके समान साधारण धातु; दूसरा—काँसेके समान उससे उत्कृष्ट धातु, तीसरा—चाँदीके समान उससे भी उत्कृष्ट धातु, चौथा—सर्वोत्कृष्ट स्वर्ण-धातु हैं। किन्तु पाँचवाँ—ज्ञानशून्य भक्ति; वही रत्नचिन्तामणि अथवा साध्य वस्तु,—जिसके प्रभावसे अन्य चार धातुएँ धातुत्व प्राप्त करती है। पुनः छठे उत्तरको (68-81 संख्या तक) 'पहला' मानकर उसके बाद एक-एक करके जो पाँच प्रेम विषयक उत्तर दिये हैं, उनमें भी वैसी ही तुलना समझनी चाहिये ॥ 293 ॥ अनुभाष्य—व्रजमें यमुनाजल, तटकी बालू, कदम्ब-वृक्षादि, गो-छड़ी-वेणु आदि शान्त-रसके विग्रहसमूह, चित्रक-पत्रक-रक्तकादि दास्यरसके विग्रहसमूह, श्रीदाम-सुदामादि सख्यरसके विग्रहसमूह, श्रीनन्द-यशोदादि वात्सल्यरसके विग्रहसमूह और श्रीमती राधिका, ललितादि गोपरमणियाँ अपने-अपने रसमें धनी हैं। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—ये पाँचों उत्तरोत्तर ताँबा, काँसा, चाँदी, सोना और रत्न- चिन्तामणिके तुल्य हैं। 'पोता'—भूमिके गर्भमें स्थित ॥ 293 ॥ अमृतानुकणिका—"भागवतमें देवताओं और दैत्योंके द्वारा एक समुद्र मन्थनका वर्णन है। उसमें पहले कालकूट विष निकला, उसके बाद सुन्दर-सुन्दर रत्न निकले, फिर ऐरावत हाथी और फिर उसके बाद कौस्तुभ मणि, लक्ष्मीजी और फिर धन्वन्तरिके सहित अमृत निकला। श्रीचैतन्यचरितामृतमें भी एक समुद्रका मन्थन हुआ है। समस्त धर्मशास्त्र, वेद, उपनिषदादिको मिलाकर उस समुद्रका मन्थन गोदावरीके तटपर हुआ। गोदावरीके तटपर मन्थनमें पहले विषके समान वर्णाश्रम-धर्म निकला, अर्थात् लोग गृहस्थमें रहकर संसारमें अपनी समृद्धिके लिये भगवान्का भजन करते हैं, यही वह विष है। जो भी इसका पान करेगा, वह अवश्य ही मरेगा अर्थात् जन्म-मरणके चक्रमें ही पड़ा रहेगा। शङ्करजी इसका सामञ्जस्य कर सकते हैं। महाप्रभुके गृहस्थ भक्त श्रीवास पण्डितादि, महाराज जनक, गोपियाँ आदि—ये संसारमेंसे कुछ लाभ करके भगवान्का भजन कर सकते हैं। इसलिये महाप्रभुने इसे बाह्य कहा। ऐसे समुद्र मन्थन हो रहा था और भगवान्के चरणोंमें कर्मार्पण, सर्वधर्मत्याग, ज्ञानमिश्रा-भक्ति आदि निकले। जो इनके अधिकारी हैं, महाप्रभु उन्हें वह प्रदान करते जा रहे थे। अर्थात् जो शुद्ध भक्तिके अधिकारी नहीं है, सङ्गसिद्धा और आरोपसिद्धा भक्तिके ही अधिकारी हैं, महाप्रभु उनको यह सब देते जा रहे थे। ज्ञानमिश्रा भक्ति अर्थात् जो शत्रु-मित्रादि सबके प्रति समान है, समदर्शी है, जिसकी कोई सांसारिक आकाङ्क्षाएँ नही हैं, ऐसा व्यक्ति भक्त-सङ्गके द्वारा भगवान्की पराभक्तिको लाभ करता है, परन्तु अभी प्राप्त नहीं किया है। तब श्रीरायने ज्ञानशून्य भक्तिको साध्यसार कहा। जो ज्ञानका प्रयास छोड़कर सन्तोंके मुखसे निकली भगवद्-कथाका श्रवण करते हैं और उसे ही अपना जीवन समझते हैं, वे ही प्रेमाभक्ति लाभ करते हैं। भागवतकी कथा बड़ी रसीली कथा है और सभी तत्त्व इसमें स्वयं आ जाते है। पृथक् रूपसे जाननेकी आवश्यकता नहीं है कि जीव-तत्त्व, माया-तत्त्व, ईश-तत्त्व आदि क्या हैं? ज्ञान, वैराग्य, तत्त्व-ज्ञानके लिये भी प्रयासकी कोई आवश्यकता नहीं है, ये सब सन्तोंके मुखसे झरनेकी भाँति उनके हृदयसे निकलकर आ जाते हैं। प्रेमके साथमें श्रवण करनेसे, उन कथाओंको नमस्कार करनेसे, कथावाचकको नमस्कार करनेसे, कथाके स्थानको नमस्कार करनेसे, श्रोताओंको नमस्कार करनेसे, वक्ताओंको भी नमस्कार करनेसे और उनकी कथाओंका निरन्तर चिन्तन करनेसे अजित भगवान् भी वशीभूत हो जाते हैं। इसके बाद श्रीरायने क्रमशः दास्य, साख्य, वात्सल्य और अन्तमें मधुर रसको साध्यसार कहा। समस्त शास्त्रोंका यही तात्पर्य है कि श्रीकृष्णके प्रति गोपियोंकी जैसी भक्ति है, उससे बढ़कर उससे श्रेष्ठ और कोई भक्ति नहीं है। यही अमृतकी खान है। 334 ।
आठवाँ अध्याय 8/294-302 ] जैसा 'आराध्यो भगवान्...' श्लोकमें भी कहा है। अतः समुद्र-मन्थनके अन्तमें महाप्रभुने यही प्रदान किया है कि राधाजीका ही भाव ही सर्वोत्तम है। इससे बढ़कर और कोई भाव नहीं है। जो भजन करना चाहते हैं, उन्हें राधाजीकी अनुचरी बननेका लक्ष्य रखना चाहिये। अर्थात् राधाजीकी जो सखियाँ हैं अथवा दासियाँ हैं, उन दासियोंकी दासीकी दासीकी दासीके रूपमें उनकी चरणोंकी धूलि ग्रहणकर उनकी किङ्करी बन जाँय। यही सब शास्त्रोंका एकमात्र उद्देश्य है और भागवतका भी यह एकमात्र प्रतिपाद्य विषय है। यथार्थ समुद्र-मन्थन श्रीचैतन्यचरितामृतमें इस प्रकारसे दिया है। इसी रूपमें इसे ग्रहण करना चाहिये।” - श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 294 ॥ श्रीरायसे महाप्रभुके द्वारा विदायी-ग्रहण और आदेश देना :- आर दिन राय-पाशे विदाय मागिला। विदायेर काले ताँरे एइ आज्ञा दिला ॥ 295 ॥ श्रीरायको नीलाचल जानेका आदेश और वहाँ पुनः मिलनेपर श्रीकृष्णकथा चर्चाका सुयोग :- “विषय छाड़िया तुमि याह नीलाचले। आमि तीर्थ करि' ताँहा आसिब अल्पकाले ॥ 296 ॥ दुइजने नीलाचले रहिब एकसङ्गे। सुखे गोङाइब काल कृष्णकथा-रङ्गे ॥” 297 ॥ एत बलि' रामानन्दे करि' आलिङ्गन। ताँरे घरे पाठाइया करिल शयन ॥ 298 ॥ अनुवाद - अगले दिन महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायसे विदायी माँगी। विदायीके समय महाप्रभुने उन्हें यह आज्ञा प्रदान की, - “सांसारिक विषयोंको छोड़कर अर्थात् सब प्रकारके दायित्वसे मुक्त होकर आप नीलाचल चले जाइये और मैं भी तीर्थभ्रमण करके थोड़े समयमें वहाँ आ जाऊँगा। तब हम दोनों एक साथ नीलाचलमें रहेंगे और परस्पर कृष्णकथाका श्रवण-कीर्तन करके सुखपूर्वक समय बितायेंगे।” इतना कहकर महाप्रभुने श्रीरामानन्दका आलिङ्गन किया और उन्हें घर भेजकर स्वयं शयन करने चले गये ॥ 295-298 ॥ बजरङ्गजीके दर्शन करके महाप्रभुके द्वारा दक्षिण-यात्रा :- प्रातःकाले उठि' प्रभु देखि' हनुमान्। ताँरे नमस्करि' प्रभु दक्षिणे करिला प्रयाण ॥ 299 ॥ अनुवाद - प्रातःकालमें उठकर महाप्रभुने श्रीहनुमानजीके दर्शन किये और उन्हें प्रणामकर दक्षिण भारतके तीर्थोंकी ओर प्रस्थान किया ॥ 299 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'हनुमान' - विद्यानगरमें श्रीहनुमानकी मूर्ति-पूजा होती है। उन ग्राम्य-देवताको प्रणाम करके महाप्रभु दक्षिण दिशाकी ओर गये ॥ 299 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे सम्पूर्ण विद्यानगरवासीकी वैष्णवता :- 'विद्यापुरे' नाना-मत लोक बैसे जत। प्रभु-दर्शने 'वैष्णव' हैल छाड़ि' निजमत ॥ 300 ॥ अनुवाद - 'विद्यापुर' में अनेक मतावलम्बी लोग थे, परन्तु महाप्रभुका दर्शन करते ही वे लोग अपने मतको छोड़कर वैष्णव बन गये ॥ 300 ॥ अनुभाष्य - 'विद्यापुरे'- विद्यानगरमें ॥ 300 ॥ महाप्रभुके विरहमें श्रीरायकी अवस्था :- रामानन्द हैला प्रभुर विरहे विह्वल। प्रभुर ध्याने रहे विषय छाड़िया सकल ॥ 301 ॥ अनुवाद - इधर श्रीराय रामानन्द महाप्रभुके विरहमें अति व्याकुल हो गये और सारे विषयोंका त्याग करके महाप्रभुजीके ध्यानमें लगे रहते थे ॥ 301 ॥ ग्रन्थमें महाप्रभु-श्रीरामानन्द संवादका संक्षिप्त वर्णन :- संक्षेपे कहिलुँ रामानन्देर मिलन। विस्तारि' वर्णिते नारे सहस्र-वदन ॥ 302 ॥ अनुवाद - (ग्रन्थकार कह रहे हैं) - इस प्रकार महाप्रभुके साथ श्रीरामानन्द रायके मिलनका मैंने संक्षेपमें वर्णन किया। जिसका विस्तारपूर्वक वर्णन । 335
[ 8/302–309 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अपने सहस्र मुखोंसे भगवान् श्रीशेष भी नहीं कर सकते ॥ 302 ॥ चैतन्यलीला, श्रीराय-चरित्र और राधाकृष्णलीलाका परस्पर सम्बन्ध एवं अति सौभाग्यशालीव्यक्तिका ही इस लीलार्मे अधिकार और सुयोग :- सहजे चैतन्य-चरित्र-घनदुग्धपूर । रामानन्द-चरित्र ताहे खण्ड प्रचुर ॥ 303 ॥ राधाकृष्णलीला-ताते कर्पूर-मिलन । भाग्यवान् येइ, सेइ करे आस्वादन ॥ 304 ॥ ये इहा एकबार पिये कर्णद्वारे। तार कर्ण लोभे इहा छाड़िते ना पारे ॥ 305 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र स्वाभाविक रूपसे घन-दुग्ध (रबड़ी) के सदृश है और श्रीराय रामानन्दका चरित्र मीठी चीनीके समान है, जिससे मिलनेसे रबड़ी मधुरतिमधुर हो गयी है। श्रीराधाकृष्णकी लीला उसमें कर्पूरके समान मिश्रित है, जिसका कोई-कोई भाग्यवान् ही आस्वादन कर सकता है। जो भी मनुष्य अपने कर्ण-द्वारसे एक बार भी इसका पान कर लेता है, फिर तो माधुर्यके लोभी उसके कान इसे कभी छोड़ नहीं सकते ॥ 303-305 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुका चरित्र रबड़ी-स्वरूप है, श्रीरामानन्दका चरित्र उसमें चीनीके समान है; एवं (उसमें) श्रीराधाकृष्णकी लीला-चीनीयुक्त-रबड़ीमें श्रीकर्पूर है॥ 303-304 ॥ आठवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। महाप्रभु-श्रीरामानन्द राय-संवाद-श्रवणके फलका वर्णन :- 'रसतत्त्व-ज्ञान' हय इहार श्रवणे । 'प्रेमभक्ति' हय राधाकृष्णेर चरणे ॥ 306 ॥ चैतन्येर गूढ़तत्त्व जानि इहा हैते । विश्वास करि' शुन, तर्क ना करिह चित्ते ॥ 307 ॥ अनुवाद-इस मिलन-प्रसङ्गके श्रवणसे सम्पूर्ण रसतत्त्वका ज्ञान हो जाता है और श्रीराधाकृष्णके श्रीचरणकमलोंमें प्रेमभक्तिकी उपलब्धि हो जाती है। श्रीचैतन्य महाप्रभुका तत्त्व अत्यन्त रहस्यमय है-उस रहस्यका ज्ञान इसके श्रवणसे ही होता है। अपने मनमें किसी भी प्रकारका तर्क-कुतर्क न करके इसे विश्वासपूर्वक सुनो ॥ 306-307 ॥ भगवान्का अचिन्त्यभाव-तर्कातीत :- अलौकिक लीला एइ परम निगूढ़ । विश्वासे पाइये, तर्के हय बहुदूर ॥ 308 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी यह अलौकिक लीला अति निगूढ़ और रहस्यमय है, जिसे विश्वास है, वही इसकी उपलब्धि कर सकता है, तर्क करनेसे इससे बहुत दूर रहोगे ॥ 308 ॥ श्रीनित्याइ-गौर-अद्वैतके एकान्तिक भक्तोंको ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-चरण। याँहार सर्वस्व, ताँरे मिले एइ धन ॥ 309 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके श्रीचरणकमलोंको जिन्होंने अपना सर्वस्व मान लिया है, उनको ही इस रस-सम्पत्तिकी प्राप्ति हो सकती है ॥ 309 ॥ अनुभाष्य-“विश्वासे मिलये कृष्ण, तर्के बहुदूर” अर्थात् विश्वास रखनेवाले श्रद्धालुको क्रमशः आगे बढ़ते हुए इस अलौकिक परम-गोपनीय वास्तव-वस्तु श्रीकृष्णलीलाकी अनुभूति होती है। यह (श्रीकृष्णलीला) गुरु-परम्पराको न माननेवाले, वास्तव-सत्यमें संशयशील सेवा-विमुख जीवोंके सङ्कल्प-विकल्पात्मक मनोधर्मसे उत्पन्न और स्वेच्छानुसार गठन-योग्य काल्पनिक विचार नहीं है। जड़़ीय तर्कका सहारा लेनेपर जड़-भोग प्रवृत्तिकी प्रचुरताके कारण चिन्मयलीला उनसे दूर रहती है। जैसे-(कठोपनिषद् 1/2/9)- “नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।” हे प्रियतम नचिकेत! इस भगवद्-विषयणी मतिको 336 ।
आठवाँ अध्याय 8/307-312 ] तर्कके द्वारा नष्ट करना उचित नहीं है। यह अन्य इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे रामानन्दराय-सङ्गोत्सवो तत्त्वज्ञ व्यक्तिके द्वारा उपदिष्ट हुई है, इसलिये यह नामाष्टम-परिच्छेदः। उत्तम ज्ञानका कारण होगी। अनुवाद—श्रीरामानन्द रायके श्रीचरणकमलोंमें मैं (मुण्डकोपनिषद् 3/2/3)— कोटि-कोटि बार प्रणाम करता हूँ, जिनके मुखारविन्दसे “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। महाप्रभुने प्रेमरस-सम्पत्तिका विस्तार करवाया है। इस यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥” प्रकार मैंने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके कड़चाके इस परमात्म-वस्तुका बहुत तर्क, मेधा (बुद्धि) या अनुसार महाप्रभु और श्रीरामानन्द रायके मिलनकी पाण्डित्यके द्वारा बोध नहीं होता। वे जिसको (भक्तिसे लीलाका वर्णन किया है। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके सन्तुष्ट होकर) वरण करते हैं, उसके द्वारा प्राप्य होती चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस है। उसके निकट ही ये परमेश्वर अपनी श्रीमूर्त्ति श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥310-312॥ प्रकाश करते हैं। अनुभाष्य—ग्रन्थकार प्रायः प्रत्येक अध्यायके अन्तमें (ब्रः सूः 2/1/11)— इस प्रकार श्रौत-पन्थामें अर्थात् गुरुके प्रति अपनी “तर्काप्रतिष्ठानात्।” अचला (अटल) निष्ठा प्रदर्शित कर रहे हैं। यह तर्कके द्वारा अप्राकृत तत्त्वकी क्या बात, प्राकृत 'महाप्रभु-रामानन्द-मिलन' घटना श्रील स्वरूप दामोदरके विषयमें भी उसकी प्रतिष्ठा नहीं देखी जाती। कड़चाके अनुसार ही लिखित और वर्णित हुई है। मानव प्राकृत लौकिक विचारपूर्ण ज्ञानकी सहायतासे सांसारिक लोग अपने अभिमानके कारण जैसे गुरुमुखसे अलौकिक तत्त्वको समझनेका प्रयास करनेपर उस सुनी कथाका परित्याग करके स्वकपोल-कल्पित तत्त्वसे दूर हो जाता है। यहाँ विचारणीय विषय (मनघड़न्त) कथा बोलते हैं, यह महाप्रभु-रामानन्द-मिलन (श्रीकृष्णप्रेमरस)-अलौकिक है। जड़-सहजिया या लीला वैसी ग्रन्थकारकी दम्भपूर्ण चेष्टा नहीं है—यही साहित्यिक व्यक्ति जो भी विचार अपने मन या बुद्धिसे ग्रन्थकारके प्रतिपादन (स्थापित) करनेका उद्देश्य है॥311॥ करेंगे, वह लौकिक होगा, इसलिये (अलौकिक वस्तुको जाननेका) उनका प्रयास निरर्थक है। उस प्रकारके अष्टम अध्यायका अनुभाष्य समाप्त॥ विचारोंको त्याग करके जो विष्णु-तत्त्वमें ऐकान्तिक श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें रामानन्दराय-सङ्गोत्सव श्रद्धावान् होते हैं, उनका सम्बन्धज्ञान ही शुद्ध और नामक आठवाँ अध्याय समाप्त। अनायास प्राप्य होता है॥307-309॥ ग्रन्थकारके द्वारा श्रीरायकी वन्दना :- रामानन्द राये मोर कोटी नमस्कार। याँर मुखे कैल प्रभु रसेर विस्तार॥310॥ दामोदर-स्वरूपेर कड़चा-अनुसारे। रामानन्द-मिलन-लीला करिल प्रचारे॥311॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥312॥ । 337