भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1182, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1182

[ 8/293-294 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला तक) उत्तर दिये। उनमें पहला—ताँबेके समान साधारण धातु; दूसरा—काँसेके समान उससे उत्कृष्ट धातु, तीसरा—चाँदीके समान उससे भी उत्कृष्ट धातु, चौथा—सर्वोत्कृष्ट स्वर्ण-धातु हैं। किन्तु पाँचवाँ—ज्ञानशून्य भक्ति; वही रत्नचिन्तामणि अथवा साध्य वस्तु,—जिसके प्रभावसे अन्य चार धातुएँ धातुत्व प्राप्त करती है। पुनः छठे उत्तरको (68-81 संख्या तक) 'पहला' मानकर उसके बाद एक-एक करके जो पाँच प्रेम विषयक उत्तर दिये हैं, उनमें भी वैसी ही तुलना समझनी चाहिये ॥ 293 ॥ अनुभाष्य—व्रजमें यमुनाजल, तटकी बालू, कदम्ब-वृक्षादि, गो-छड़ी-वेणु आदि शान्त-रसके विग्रहसमूह, चित्रक-पत्रक-रक्तकादि दास्यरसके विग्रहसमूह, श्रीदाम-सुदामादि सख्यरसके विग्रहसमूह, श्रीनन्द-यशोदादि वात्सल्यरसके विग्रहसमूह और श्रीमती राधिका, ललितादि गोपरमणियाँ अपने-अपने रसमें धनी हैं। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—ये पाँचों उत्तरोत्तर ताँबा, काँसा, चाँदी, सोना और रत्न- चिन्तामणिके तुल्य हैं। 'पोता'—भूमिके गर्भमें स्थित ॥ 293 ॥ अमृतानुकणिका—"भागवतमें देवताओं और दैत्योंके द्वारा एक समुद्र मन्थनका वर्णन है। उसमें पहले कालकूट विष निकला, उसके बाद सुन्दर-सुन्दर रत्न निकले, फिर ऐरावत हाथी और फिर उसके बाद कौस्तुभ मणि, लक्ष्मीजी और फिर धन्वन्तरिके सहित अमृत निकला। श्रीचैतन्यचरितामृतमें भी एक समुद्रका मन्थन हुआ है। समस्त धर्मशास्त्र, वेद, उपनिषदादिको मिलाकर उस समुद्रका मन्थन गोदावरीके तटपर हुआ। गोदावरीके तटपर मन्थनमें पहले विषके समान वर्णाश्रम-धर्म निकला, अर्थात् लोग गृहस्थमें रहकर संसारमें अपनी समृद्धिके लिये भगवान्‌का भजन करते हैं, यही वह विष है। जो भी इसका पान करेगा, वह अवश्य ही मरेगा अर्थात् जन्म-मरणके चक्रमें ही पड़ा रहेगा। शङ्करजी इसका सामञ्जस्य कर सकते हैं। महाप्रभुके गृहस्थ भक्त श्रीवास पण्डितादि, महाराज जनक, गोपियाँ आदि—ये संसारमेंसे कुछ लाभ करके भगवान्‌का भजन कर सकते हैं। इसलिये महाप्रभुने इसे बाह्य कहा। ऐसे समुद्र मन्थन हो रहा था और भगवान्‌के चरणोंमें कर्मार्पण, सर्वधर्मत्याग, ज्ञानमिश्रा-भक्ति आदि निकले। जो इनके अधिकारी हैं, महाप्रभु उन्हें वह प्रदान करते जा रहे थे। अर्थात् जो शुद्ध भक्तिके अधिकारी नहीं है, सङ्गसिद्धा और आरोपसिद्धा भक्तिके ही अधिकारी हैं, महाप्रभु उनको यह सब देते जा रहे थे। ज्ञानमिश्रा भक्ति अर्थात् जो शत्रु-मित्रादि सबके प्रति समान है, समदर्शी है, जिसकी कोई सांसारिक आकाङ्क्षाएँ नही हैं, ऐसा व्यक्ति भक्त-सङ्गके द्वारा भगवान्‌की पराभक्तिको लाभ करता है, परन्तु अभी प्राप्त नहीं किया है। तब श्रीरायने ज्ञानशून्य भक्तिको साध्यसार कहा। जो ज्ञानका प्रयास छोड़कर सन्तोंके मुखसे निकली भगवद्-कथाका श्रवण करते हैं और उसे ही अपना जीवन समझते हैं, वे ही प्रेमाभक्ति लाभ करते हैं। भागवतकी कथा बड़ी रसीली कथा है और सभी तत्त्व इसमें स्वयं आ जाते है। पृथक् रूपसे जाननेकी आवश्यकता नहीं है कि जीव-तत्त्व, माया-तत्त्व, ईश-तत्त्व आदि क्या हैं? ज्ञान, वैराग्य, तत्त्व-ज्ञानके लिये भी प्रयासकी कोई आवश्यकता नहीं है, ये सब सन्तोंके मुखसे झरनेकी भाँति उनके हृदयसे निकलकर आ जाते हैं। प्रेमके साथमें श्रवण करनेसे, उन कथाओंको नमस्कार करनेसे, कथावाचकको नमस्कार करनेसे, कथाके स्थानको नमस्कार करनेसे, श्रोताओंको नमस्कार करनेसे, वक्ताओंको भी नमस्कार करनेसे और उनकी कथाओंका निरन्तर चिन्तन करनेसे अजित भगवान् भी वशीभूत हो जाते हैं। इसके बाद श्रीरायने क्रमशः दास्य, साख्य, वात्सल्य और अन्तमें मधुर रसको साध्यसार कहा। समस्त शास्त्रोंका यही तात्पर्य है कि श्रीकृष्णके प्रति गोपियोंकी जैसी भक्ति है, उससे बढ़कर उससे श्रेष्ठ और कोई भक्ति नहीं है। यही अमृतकी खान है। 334 ।