श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1181, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/284-294 ]
सम्भोगरसमें नागर अथवा विषय-विग्रह हैं। और श्रीकृष्ण ही 'श्रीगौरस्वरूपमें' विप्रलम्भरसमें आश्रय-विग्रह- श्रीराधा-भावकान्तिमय श्रीकृष्णचैतन्य हैं। अप्राकृत शृङ्गार-रसराज विग्रह 'धीर-ललित' नायक स्वयंरूप श्रीनन्दनन्दनके अतिरिक्त अन्य कोई भी विष्णुविग्रह श्रीकृष्णकी पूर्ण-चिद्-शक्ति अथवा स्वरूपशक्ति महाभावस्वरूपा श्रीराधिकाके भोक्ता नहीं हो सकते। क्योंकि श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य समस्त विष्णु-विग्रहोंमें शृङ्गाररस एवं धीर-ललित नायकका भाव नहीं है और ऐश्वर्यभावकी प्रबलता है। इसलिये श्रीमतीके नाम “गोविन्दानन्दिनी, राधा, गोविन्दमोहिनी। गोविन्दसर्वस्व, सर्वकान्ता-शिरोमणि॥” हैं (आदिलीला 4/82 संख्या)। आदिलीला 3/86-89 संख्या भी देखें॥284-288॥
गूढ़ भजनकी बात सर्वत्र प्रकाश योग्य नहीं :- गुप्ते राखिह, काँहा ना करिह प्रकाश। आमार वातुल-चेष्टा लोके उपहास॥289॥ महाप्रभु और श्रीराय, दोनों ही आश्रयके भावमें प्रमत्त :- आमि-एक वातुल, तुमि - द्वितीय वातुल। अतएव तोमाय-आमाय हइ समतुल ॥ *290॥
अनुवाद-तुम मेरे इस स्वरूप, तत्त्व एवं दर्शनको गुप्त ही रखना, कहीं प्रकाशित मत करना। मेरी उन्मत्तकी भाँति चेष्टाओंको लोग समझ न पानेके कारण वे उपहास करेंगे। मैं एक पागल हूँ और तुम दूसरे पागल हो, हम-तुम दोनों ही एक समान हैं॥ *289-290॥
अनुभाष्य-केवल जड़ वस्तुओंमें आसक्तिके कारण तर्कनिष्ठ लोग इन सब बातोंको न समझनेके कारण उपहास करेंगे, इसलिये तुम इनको अभक्त अनधिकारीके सामने प्रकाशित मत करना। जो श्रीकृष्णप्रेममें मत्त हो जाता है, उसकी तर्कनिष्ठ सांसारिक जड़-चेष्टाएँ दूर हो जाती हैं। यद्यपि रागानुगा-भावकी प्रेम-चेष्टाएँ साधारण भोगी लोगोंके दृष्टिकोणसे 'पागलपन' मात्र लगती हैं, तथापि यह पागलपन नहीं, प्रेमोन्मत्तता है। सांसारिक लोगोंके विचारसे मैं भी पागल और तुम भी पागल हो। दोनोंमें समानता रहनेसे हम दोनों ही श्रीकृष्णप्रेमकी कथामें मत्त हैं। भक्तोंके दृष्टिकोणसे श्रीकृष्णसे इतर जड़रस-रसिक पागल और उपहासके पात्र हैं॥289-290॥
महाप्रभुका श्रीरायके साथ दस दिन तक वास :- एइरूप दशरात्रि रामानन्द-सङ्गे। सुखे गोङाइला प्रभु कृष्णकथा-रङ्गे॥291॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके साथ दस रात्रियाँ सुखपूर्वक कृष्णकथाके आनन्दमें बितायीं ॥ 291॥
महाप्रभु और श्रीरामानन्द-संवाद-एक बृहद् धातुकी खान, उसके मूल्यके भेदसे बहुतसी धातुओंका प्रकाश :- निगूढ़ व्रजेर रस-लीलार विचार। अनेक कहिल, तार ना पाइल पार ॥ 292 ॥
अनुवाद-व्रजकी रसलीलाओंका विचार अति रहस्यमय है-अनेक प्रकारसे इसका वर्णन किया जाय, तो भी इनका पार नहीं पाया जा सकता ॥ 292 ॥
अप्राकृत पाँच रसोंकी उपमा :- तामा, काँसा, रूपा, सोना, रत्नचिन्तामणि। केह यदि काँहा पोता पाय एकखानि ॥ 293 ॥ क्रमे उठाइते सेह उत्तम वस्तु पाय। ऐछे प्रश्नोत्तर कैल प्रभु-रामराय ॥ 294 ॥
अनुवाद-किसी व्यक्तिको एक ही खानमें जिस प्रकार ताँबा, काँसा, चाँदी, सोना, रत्न एवं चिन्तामणि दबी हुई मिल जाँय, तो क्रमसे खोदनेपर उत्तरोत्तर उत्तम वस्तु प्राप्त होती जाती है, ठीक इसी प्रकार श्रीराय रामानन्दके साथ प्रश्नोत्तरमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठतर तत्त्वकी प्राप्ति हुई है॥ 293-294॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीरामानन्द रायने श्रीमन्महाप्रभुके प्रश्नके पहले पाँच (इसी अध्यायकी 57 संख्यासे 67
। 333