श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1180, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/266–288 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला और श्रीराधाको भी। परन्तु जब महाभाव-स्वरूपा श्रीराधा और रसराज-स्वरूप श्रीकृष्णको एक रूपमें देखा, तब उनके हृदयमें भावकी प्रबल तरङ्गें उठने लगीं, जिनके आवेशमें वे अपनेको सम्भाल न सके और मूर्च्छित हो गये। सुन्दर श्यामवर्ण किशोर गोप श्रीकृष्ण और सुन्दरी गौरकान्तियुक्त किशोरी गोपी श्रीराधा-दोनोंको एक-साथ संयुक्त होते देखकर वे मूर्च्छित हो गये। यह मूर्च्छा अत्यन्त घनीभूत थी, इसलिए महाप्रभुने अपने कोमल सुगन्धित हस्त-स्पर्शसे उसे दूर किया। श्रीकृष्णने श्रीराधाके मादनाख्य-महाभाव और अङ्गकान्तिको चोरीसे ग्रहण किया था, परन्तु उनमें आश्रय-विग्रहका विज्ञान नहीं था। श्रीराय रामानन्दसे समस्त तत्त्व सुनकर उन्हें अनुभूति हुई कि 'मैं व्रजमें वृषभानु महाराजकी पुत्री हूँ, एक किशोरी गोपी हूँ, मेरा विवाह जावटमें हुआ, परन्तु मैं नन्द महाराजके पुत्रपर आसक्त हूँ, वे मेरे प्रेमी और प्राण-प्रियतम हैं, मैं उनके अतिरिक्त अन्य किसीको नहीं जानती, तथा हमारा मिलन छिप-छिपकर होता है।' यहाँ श्रीकृष्णके अङ्ग और भाव ढक गये और अब वे श्रीराधा हो गये। श्रीकृष्णमें एकादश भाव, महाभाव, मादन-मोदन, प्रेम-वैचित्त्य, समस्त भाव-सम्पत्ति सञ्चरित हो गयी। श्रीकृष्णकी आत्मा और मनकी भावनाएँ—सभी राधामय हो गयीं; यही महाप्रभुका स्वरूप है। शृङ्गार रसराज मूर्ति और महाभावमय—यही गौर-तत्त्व है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 266–283 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायको सान्त्वना, अपने कृष्ण-स्वरूपत्व और राधाभावद्युतिमयत्वके उद्देश्य आदि समस्त गूढ़ कारणोंका अकपट रूपसे ज्ञापन :— आलिङ्गन करि' प्रभु कैल आश्वासन। “तोमा बिना एइ रूप ना देखे अन्यजन ॥ 284 ॥ मोर तत्त्वलीला-रस तोमार गोचरे। अतएव एइ रूप देखाइलुँ तोमारे ॥ 285 ॥ गौर अङ्ग नहे मोर—राधाङ्ग-स्पर्शन। गोपेन्द्रसुत बिना तैं हो ना स्पर्शे अन्यजन ॥ 286 ॥ ताँर भावे भावित करि' आत्म-मन। तबे निज-माधुर्य करि आस्वादन ॥ 287 ॥ तोमार ठाञि आमार किछु गुप्त नाहि कर्म। लुकाइले प्रेम-बले जान सर्व मर्म ॥ 288 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दका आलिङ्गन किया और आश्वासन देते हुए कहने लगे,—“राय! तुम्हारे अतिरिक्त अन्य किसीने मेरे इस रूपको नहीं देखा है। मेरा स्वरूपतत्त्व एवं लीलारसतत्त्व, सब कुछ तुम जानते हो, इसलिये मैंने तुम्हें यह अपना विशेष रूप दिखलाया है। मेरा गौरवर्ण नहीं है, परन्तु राधाके अङ्गस्पर्शसे मेरा गौरवर्ण हो गया है और राधा गोपेन्द्रसुत अर्थात् व्रजेन्द्रनन्दनके अतिरिक्त किसी अन्यका कदापि स्पर्श नहीं करती हैं। राधाके भावोंमें अपने मन एवं आत्माको अनुभावित करके ही मैं अपने माधुर्यका आस्वादन कर सकता हूँ। तुम्हारे सम्मुख मेरा कोई भी तत्त्व छिपा नहीं रह सकता। मैंने आत्मगोपनका प्रयास अवश्य किया, परन्तु तुम्हारे प्रेमके अतिशय प्रभावके कारण तुमने मेरा स्वरूपतत्त्व जान लिया अर्थात् मुझे पहचान ही लिया ॥ 284–288 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे रामानन्द, तुम मुझे अलग एक 'गौरपुरुष'के रूपमें देख रहे हो, मैं वह नहीं हूँ, मैं वही गोपेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हूँ, राधा-अङ्ग-स्पर्शके कारण मेरा यह गौरभाव ही नित्य है। राधिका कृष्णके अतिरिक्त और किसीको स्पर्श नहीं करती। श्रीराधिकाके भावमें अपने स्वरूप और मनको भावित करके मैं अपने कृष्णमाधुर्यरसका आस्वादन करता हूँ॥ 286–287 ॥ अनुभाष्य—प्राकृत सहजिया-सम्प्रदायके लोग पयार संख्या 286के 'गौर अङ्ग नहे' वचनके द्वारा श्रीगौर और श्रीकृष्णको अलग मानते हैं। वस्तुतः दोनों ही स्वयं रूप-विग्रह हैं अर्थात् श्रीगौर ही 'श्रीकृष्णस्वरूपमें' 332 ।