श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1179, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/266-283 ]
अमृतप्रवाह भाष्य-रसराजरूप श्रीकृष्ण और महाभावरूपा श्रीमती राधिका-दोनों मिलकर जो एकतत्त्व हैं, वही स्वरूप दिखलाया-अर्थात् 'राधाभावद्युतिसुवलित श्रीकृष्णस्वरूप' दिखलाया। इससे एक-तत्त्वमें दो और दोनों-तत्त्व ही एक हैं, ऐसा एक अपूर्व स्वरूप दिखलाया। जो श्रीकृष्णचैतन्य और श्रीराधाकृष्ण-तत्त्व जाननेमें समर्थ होते हैं, वे ही श्रीस्वरूप गोस्वामीकी कृपासे उस नित्य स्वरूपकी सेवा कर पाते हैं॥ 281 ॥ श्रीरायकी आनन्द-मूर्च्छा :- देखि' रामानन्द हैला आनन्दे मूर्च्छिते। धरिते ना पारे देह, पड़िला भूमिते ॥ 282 ॥ चेतनता प्राप्त होनेपर महाप्रभुके संन्यास वेशके दर्शनसे विस्मय :- प्रभु ताँरे हस्त स्पर्शि' कराइला चेतन। संन्यासीर वेष देखि' विस्मित हैल मन ॥ 283 ॥ अनुवाद-इस अपूर्व स्वरूपको देखते ही श्रीरामानन्द अत्यधिक आनन्दसे मूर्च्छित हो गये, देहको सम्भाल न पाये और भूमिपर गिर पड़े। महाप्रभुने उनको अपने हस्तकमलोंसे स्पर्शकर उन्हें चेतन किया। चेतनावस्था आनेपर पुनः उनका संन्यासीका वेश देखकर उनका मन विस्मित हो गया ॥ 282-283 ॥ अमृताणुकणिका-“श्रीराय रामानन्द व्रजलीलामें विशाखा सखी हैं। उन्होंने श्रीकृष्णको भी देखा है और श्रीराधाको भी, किन्तु दोनों मिलकर एक हो गये और कैसे श्यामकन्ति गौरकान्तिसे आवृत हो गयी-यह इससे पूर्व उन्होंने नहीं देखा था। जिस वस्तुका प्रभाव अधिक होता है, वही दूसरी वस्तुको आवृत कर सकती है। श्रीराधा शक्ति हैं और श्रीकृष्ण शक्तिमान्। शक्ति ही शक्तिमान्को प्रकाशित करती है। इस अद्भुत मिलनसे नीलमणि श्यामकन्ति स्वर्णकान्तिसे ढककर एक अद्भुत कान्ति बन गयी। अभी तक योगमायाके प्रभावसे महाप्रभुका स्वरूप आच्छादित था। महाप्रभुकी कृपासे योगमाया तनिक-सी हटी और श्रीराय रामानन्दने इस मिलित स्वरूपके दर्शन किये। अब वे महाप्रभुके वार्त्तालाप और प्रश्न करनेकी चतुरायीसे समझ गये कि ये अन्य कोई नहीं, स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं। श्रीकृष्ण अत्यन्त चतुर हैं, किन्तु उनके भक्त उनसे अधिक चतुर होते हैं। श्रीकृष्णने महाप्रभुके संन्यासी स्वरूपमें स्वयंको छिपानेकी बहुत चेष्टा की, परन्तु केवल वर्ण-कान्ति परिवर्तित होनेसे स्वरूप परिवर्तित नहीं होता। श्रीराय रामानन्द अथवा विशाखा सखीके समान श्रीकृष्णके अन्तरङ्ग परिकर उन्हें किसी भी रूपमें पहचान लेते हैं। इसलिये श्रीराय रामानन्दने कहा-'प्रभो! अब अपनी कपटता त्याग दीजिये और इसका रहस्य मुझे बतलाइये।' महाप्रभु मुस्कुरा दिये कि अब ये मेरे भावको समझ गये हैं और मेरी चोरीका भेद खुल गया है। परन्तु फिर भी अपनेको गोपन रखनेका प्रयास करते हुए वे कहने लगे- 'मैं तो ब्राह्मण संन्यासी ही हूँ। तुम्हारी श्रीकृष्णके प्रति अगाध निष्ठा है, इसलिये तुम सर्वत्र श्रीकृष्णको ही देख रहे हो। महाभागवतका यही स्वभाव है कि उन्हें स्थावर-जङ्गम- सभी वस्तुओंमें अपने इष्टदेवकी स्फूर्ति होती है।' तब श्रीराय रामानन्दने कहा-'प्रभो! अब आप अपनी इस चतुरायीको आप छोड़ दीजिये। मैं आपके स्वरूपको पहचान गया हूँ। आप तो मेरा उद्धार करने आये हैं, फिर कपटता क्यों कर रहे हैं? मैं जान गया हूँ कि कृष्णरूपमें आपकी रसास्वादनकी इच्छा पूर्ण नहीं हुई थी, इसलिये आपने अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रेयसी श्रीराधाके प्रेमकी महिमा और उस प्रेमके द्वारा आपके माधुर्यके रसास्वानकी सीमाको अनुभव करनेके लिये उनके मादनाख्य महाभावको चोरी किया है। इस भावके साथ उनकी स्वर्ण-कान्तिका अटूट सम्बन्ध है, इसलिये आपका वर्ण भी परिवर्तित हो गया। अब आप कपट व्यवहार त्यागकर अपने स्वरूपको प्रकट कीजिये।' महाप्रभु हँस दिये और उन्होंने श्रीराय रामानन्दको अपने रसराज-महाभावके सम्मिलित स्वरूपके दर्शन करवाये। श्रीराय रामानन्दने श्रीकृष्णको भी देखा है
। 331