श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 8/275-281 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णसेवामय-चित्तमें सर्वत्र चेतना या श्रीकृष्णसेवावृत्ति-दर्शन :- श्रीमद्भागवत (10/35/9)- वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः। प्रणतभारविटपा मधुधाराः प्रेमहृष्टतनवो ववृषुः स्म॥ 275 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275॥ अमृतप्रवाह भाष्य-[श्रीकृष्णका वेणुनाद श्रवण करके] वनकी लताएँ और वृक्ष फूल और फलोंसे लद गये और उनके भारसे उनकी डालियाँ झुक गयीं। समस्त वनस्पति अपने भीतर श्रीकृष्णकी अभिव्यक्तिको सूचित करते हुए प्रेममें पुलकित होकर मधुधारा वर्षण करने लगीं॥ 275॥ अनुभाष्य-दिनके समय श्रीकृष्णके वनमें जानेपर विरह-सन्तप्त गोपियाँ परस्पर इस प्रकार गीत गाती थीं- [कृष्णवेणु-नादं श्रुत्वा] प्रणतभारविटपाः (भारावनत तरवः) पुष्पफलाढ्याः (फलकुसुमान्विताः) प्रेमहृष्टतनवः (कृष्णप्रेमोत्-फुल्लकलेवराः) वनलताः तरवः च आत्मनि (स्वीये विग्रहे) विष्णुं (विभु-चैतन्यं) व्यञ्जयन्त्यः (प्रकाशयमानं सूचयन्त्यः) इव मधुधारा ववृषुः स्म। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275॥ वैष्णवोंका सर्वोत्तम चरम दर्शन :- राधाकृष्णे तोमार महाप्रेम हय। याँहा ताँहा राधाकृष्ण तोमारे स्फुरय॥" 276॥ अनुवाद-तुम्हारे हृदयमें श्रीराधाकृष्णके प्रति महाप्रेम है, इसलिये जहाँ-तहाँ सर्वत्र तुम्हारे हृदयमें श्रीराधाकृष्णकी ही स्फूर्त्ति होती है॥" 276॥ श्रीरायके द्वारा स्पष्टरूपसे महाप्रभुके अवतारके उद्देश्यका कथन :- राय कहे,-"प्रभु तुमि छाड़ भारिभुरि। मोर आगे निजरूप ना करिह चुरि॥ 277॥ राधिकार भावकान्ति करि' अङ्गीकार। निजरस आस्वादिते करियाछ अवतार॥ 278॥ निज-गूढ़कार्य तोमार-प्रेम-आस्वादन। आनुषङ्गे प्रेममय कैले त्रिभुवन॥ 279॥ महाप्रभुके द्वारा अपनेको गोपन करना और छलसे श्रीरायका आरोप :- आपने आइले मोरे करिते उद्धार। एबे कपट कर,-तोमार कोन् व्यवहार॥" 280॥ अनुवाद-यह सुनकर श्रीराय रामानन्दने कहा,-"प्रभो! आप अपनी चतुराई छोड़िये। मुझसे अपने स्वरूपको मत छिपाइये। श्रीराधिकाके भाव और कान्तिको अङ्गीकार करके स्वयं रसास्वादनके लिये ही आपने अवतार ग्रहण किया है। आपका अपना परम गूढ़ कार्य है-प्रेमका आस्वादन करना और उसके आनुषङ्गिक फलसे आपने तीनों भुवनोंको प्रेममय बना दिया है। आप यहाँ मेरा उद्धार करनेके लिये आये हैं। और अब कपटता कर रहे हैं, यह आपका कैसा व्यवहार है?"॥ 277-280॥ अनुभाष्य-भगवान्के द्वारा अपनेको गोपन करनेका प्रयास करनेपर भी भक्त भगवान्की लीलाको देख लेते हैं, इस सम्बन्धमें आदिलीला 3/86-89 संख्या एवं आदिलीला 1/5 श्लोकके तात्पर्यके सम्बन्धमें आदिलीला चौथा अध्याय देखें॥ 277-279॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायको अपने श्याम और गौररूपका प्रदर्शन :- तबे हासि' ताँरे प्रभु देखाइल स्वरूप। 'रसराज', 'महाभाव'-दुइ एक रूप॥ 281॥ अनुवाद-तब मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए महाप्रभुने श्रीराम force/रामानन्द रायको अपने स्वरूपका दर्शन कराया। उस स्वरूपमें मूर्तिमान शृङ्गार-रसराज श्रीकृष्ण और मूर्तिमती महाभावमयी श्रीराधा दोनों ही एक रूपमें प्रकट हो रहे थे॥ 281॥ 330 ।