श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचञ्चल हो रहे हैं। इस प्रकारसे आपके स्वरूपको देखकर मेरे हृदयमें अद्भुत चमत्कार भाव उदित हो रहा है। इसलिये हे प्रभो! आप कपटता छोड़कर मुझे इसका यथार्थ कारण बतलाइये॥” 268-270 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 3/86-89 संख्या देखें ॥ 266-269 ॥
रायको 'महाभागवत' कहकर उनकी प्रशंसाके द्वारा स्वयंका गोपन करनेकी चेष्टा :- प्रभु कहे, — “कृष्णे तोमार गाढ़प्रेम हय। प्रेमार स्वभाव एह जानिह निश्चय ॥ 271 ॥ महाभागवत अथवा वैष्णव अथवा परमहंसका दर्शन :- महाभागवत देखे स्थावर-जङ्गम। ताँहा ताँहा हय ताँर श्रीकृष्ण-स्फुरण ॥ 272 ॥ स्थावर-जङ्गम देखे, ना देखे तार मूर्त्ति। सर्वत्र हय ताँर इष्टदेव-स्फूर्त्ति ॥ 273 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने आत्म-गोपन करते हुए श्रीरामानन्द रायसे कहा,—“आपका श्रीकृष्णके प्रति गाढ़ अनुराग है। प्रेमका स्वभाव ही यह होता है कि महाभागवतकी दृष्टिमें जो भी स्थावर-जङ्गम आते हैं, उनमें उन्हें श्रीकृष्णकी ही स्फूर्त्ति होती है। स्थावर-जङ्गम दृष्टिगोचर होनेपर भी उन्हें उनकी मूर्ति (आकृति) दिखायी नहीं देती, केवल सर्वत्र अपने इष्टदेवकी ही स्फूर्त्ति होती है ॥ 271-273 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-प्रभो, आपको मैंने पहले एक संन्यासीके जैसा देखा था; अब आपको श्याम-गोपरूपमें देख रहा हूँ। फिर आपके सामने एक सोनेकी पुतली देख रहा हूँ। यद्यपि उस पुतलीने गौरकान्तिके द्वारा आपकी पूरी देहको ढक दिया है, तथापि आपका रङ्ग जैसे प्रकटरूपमें ही प्रतीत हो रहा है और आपका बाँया नेत्र अनेक प्रकारसे चञ्चल है। प्रभो! आपके इस प्रकार चमत्कारमय-भावका कारण क्या है, उसे निष्कपट होकर बतलाइये। महाप्रभुने कहा, —जिनका श्रीकृष्णमें गाढ़ प्रेम है, वे उत्तम भागवत हैं। उनके प्रेमका स्वभाव यह है कि वे स्थावर-जङ्गम, जो कुछ भी देखते हैं, उनमें स्थावर-जङ्गमकी मूर्ति न देखकर सर्वत्र (अपने) इष्टदेवकी स्फूर्त्तिरूपी श्रीकृष्णभावको ही देखते हैं ॥ 267-273 ॥
सर्वत्र श्रीकृष्ण-कार्ष्ण-दर्शन :- श्रीमद्भागवत (11/2/45)- सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ 274 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 274 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो उत्तम भागवत होते हैं, वे सभी प्राणियोंमें आत्माके भी आत्मरूप भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको ही देखते हैं एवं आत्माके आत्मस्वरूप श्रीकृष्णमें समस्त जीवोंको देख पाते हैं ॥ 274 ॥
अनुभाष्य-विदेहराज 'निमि'के द्वारा तीन प्रकारके भक्तों अथवा भागवतोंके लक्षण, दर्शन, आचरण और बोलनेके सम्बन्धमें जाननेकी इच्छा करनेपर उनके प्रश्नोंके उत्तरमें नव-योगेन्द्रोंमेंसे अन्यतम 'हवि'ने कहा- यः सर्वभूतेषु (चेतनाचेतनात्मकेषु सर्वेषु) आत्मनः (भोगजड़ातीतस्य अप्राकृतस्य) भगवद्भावं (भूतानां भगवत्- सेवोपयोगिसिद्धस्वरूपादिकं) पश्येत्, आत्मनि भगवति [निजसिद्धरूपेण अप्राकृत-नित्यसेवापराणि] भूतानि पश्येत, [सः] एषः भागवतोत्तमः। [अप्राकृतभावप्राबल्येन महाभागवताः सर्वत्र सेव्य-सेवक- भावावस्थिताः कृष्णकार्ष्णान् पश्यन्ति, बहिर्दृष्टेरभावात्]।
श्लोक-भावानुवाद-जो चेतन-अचेतन प्राणियोंमें अप्राकृत भगवद्-सेवोपयोगी सिद्ध-स्वरूपको देखते हैं और उन्हें अपने समान ही श्रीकृष्णकी अप्राकृत-सेवाके उपकरण रूपमें देखते हैं, वे ही महाभागवतोंमें उत्तम हैं। [अप्राकृत-भावकी प्रबलताके कारण महाभागवत सर्वत्र ही सेव्य-सेवक-भावमें स्थित कृष्ण-कार्ष्ण-दर्शन करते हैं, क्योंकि उनमें बाह्य-दृष्टिका अभाव होता है] ॥ 274 ॥
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