भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1176, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1176

[ 8/265–270 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नित्य अपनी शक्ति स्वरूपा गोपियोंके साथ लीला-विलास करते रहते हैं, उनकी लीलाओंसे आदिरस शृङ्गाररसका जन्म होता है। ‘अन्वय व्यतिरेकाभ्यां भवति’—अन्वय और व्यतिरेक रूपमें श्रीराधा-कृष्णके संयोग या मिलनके रूपमें राधाजीका महाभाव उच्चतम अवस्था मादन तक पहुँच जाता है; पुनः वियोगमें चित्रजल्पादि अनेक रूप धारण करता है। इन दोनोंके संयोग और वियोगके कारण ही रस पूर्णताको प्राप्त करता है। इस आद्य शृङ्गार रसमें दोनों अभिज्ञ हैं। कभी श्रीराधा मान कर लेती हैं और इस रसको नवीन-नूतन बनाकर श्रीकृष्णको अपनी सेवामें नियुक्त कर लेती हैं। इधर श्रीकृष्ण भी अभिज्ञ हैं, परम विदग्ध हैं, श्रीराधाके मान-प्रसादनके लिये प्रेमके वशीभूत होकर परम चातुरीसे उनका मान दूर करते हैं। ऐसे शृङ्गाररसका प्रादुर्भाव अन्य किसी भी भगवत्-अवतारमें नहीं हुआ, क्योंकि उनमें ऐश्वर्यकी प्रधानता होती है। श्रीराधाकृष्णकी लीलाओंमें ही शृङ्गाररस सर्वोत्तम स्तरपर पहुँचा है। ‘स्वराट्’—श्रीकृष्ण और श्रीराधा दोनों ही अपनेमें पूर्ण हैं। ‘तेने ब्रह्महृदा’— श्रीशुकदेव गोस्वामीके हृदयमें आद्य शृङ्गाररस प्रकट किया, क्योंकि ये श्रीराधाके शुक हैं और श्रीकृष्णके हाथोंमें भी गये हैं, तब इनको दोनोंकी कृपासे रस-विषयमें अनुभूति हुई। ‘मुह्यन्ति यत् सूरयः’—ब्रह्मा आदि देवता इस व्रजलीलासे मोहित हो जाते हैं। ब्रह्मा व्रजमें आये, किन्तु वे शृङ्गाररस तक नहीं पहुँच पाये, उन्होंने केवल बाल्यलीलाएँ देखीं, श्रीकृष्णका ऐश्वर्य देखा, अघासुरकी मुक्ति देखी, जब श्रीकृष्णने अपना चतुर्भुज रूप दिखाया, तब वे आश्चर्यचकित हो गये। श्रीराधाकृष्णके मिलनमें जो रस होता है, उसके द्वारा यमुनाका जल कठोर हो जाता है, गिरिराजके प्रस्तर पिघल जाते हैं, चन्द्रमा निस्तेज हो जाता है। ‘त्रिसर्ग’—श्रीराधाकृष्णकी वृन्दावनमें परिपूर्णतम, मथुरामें पूर्णतर और द्वारकामें पूर्ण लीलाएँ हुईं। इन दोनों स्थानों, मथुरा और द्वारकामें श्रीराधा नहीं रहीं, इसलिये लीलाएँ भी पूर्णताको प्राप्त नहीं कर सकीं। उन अप्राकृत व्रजलीलाओंके सहित मैं श्रीराधाकृष्णका ध्यान करता हूँ।”—श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 265 ॥ श्रीरायका संशय :— एक संशय मोर आछये हृदये। कृपा करि’ कह मोरे ताहार निश्चये ॥ 266 ॥ श्रीरायके निकट महाप्रभुके स्वरूपका आविर्भाव :— पहिले देखिलुँ तोमार संन्यासी-स्वरूप। एबे तोमा देखि मुञि श्याम-गोपरूप ॥ 267 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“मेरे हृदयमें एक संशय उदित हुआ है। आप कृपा करके मुझे उसका समाधान निश्चय करके बताइये। पहले मैंने आपके संन्यासीरूपका दर्शन किया और अब मैं आपको श्याम-वर्ण गोपके रूपमें देख रहा हूँ॥ 266–267 ॥ अनुभाष्य—अर्थात् 'रसराज, महाभाव—दुइ एक रूप' (281 संख्या)। 'संन्यासी-स्वरूप'—नित्य श्रीकृष्णविरहजनित अधिरूढ़-महाभावमय नित्य वैरागी अथवा तपस्वी-स्वरूप ॥ 267 ॥ श्रीरायको राधाभावद्युति-सुवलित श्रीगौरसुन्दरका दर्शन :— तोमार सन्मुखे देखि काञ्चन-पञ्चालिका। ताँर गौरकान्त्ये तोमार सर्व अङ्ग ढाका ॥ 268 ॥ ताहाते प्रकट देखि स-वंशी वदन। नाना-भावे चञ्चल ताहे कमल-नयन ॥ 269 ॥ स्वयं महाप्रभुसे ही श्रीरायके द्वारा गौररूपके कारणकी जिज्ञासा :— एइमत तोमा देखि’ हय चमत्कार। अकपटे कह, प्रभु, कारण इहार ॥ 270 ॥ अनुवाद—अब आपके सामने एक स्वर्ण प्रतिमाको देख रहा हूँ, जिसकी गौरकान्तिसे आपके सारे अङ्ग ढके हुए हैं। गौरकान्तिसे आपके अङ्गोंके ढके होनेपर भी मैं आपके उस वंशीयुक्त मुखकमलको देख रहा हूँ और अनेक प्रकारके भावोंसे आपके नेत्रकमल भी 328 ।