श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1175, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/265 ] दुर्वासा, वशिष्ठ, शङ्कर, विद्यारण्य आदि 'देवाहातार्यरचना' भागवतके 3/9/10 वचनानुसार) आदि भी असमर्थ होते हैं; जिन्होंने अन्तर्यामीके रूपमें आदिकवि ब्रह्माके हृदयमें ('त्रया प्रबुद्धः' ब्रह्मसंहिता वचनानुसार) ब्रह्मतत्त्वकी शिक्षा दी है; जिनसे अग्नि, जल और मिट्टी आदि भूतोंका विनिमय अर्थात् अन्यमें अन्यका आभास होता है; जिनसे 'रज-तम-सत्त्व' - तीन गुणोंसे नश्वर सृष्टि, पक्षान्तरमें अन्तरङ्गा, बहिरङ्गा और तटस्था-इन तीन शक्तियोंका नित्य प्रकाश है; जिनका भगवद्-स्वरूप अर्थात् अद्वयज्ञान सच्चिदानन्द विग्रहरूप सत्य है; स्वरूपशक्ति-तद्रूप-वैभवके द्वारा नित्य माया-कपट-शून्य उन परमसत्य परमेश्वर श्रीकृष्णका हमें ध्यान करना चाहिये। विशेष रूपसे जाननेके लिये श्रीमद्भागवतका गौड़ीय भाष्य देखें॥ 265 ॥ अमृताणुकणिका-“ 'जन्माद्यस्य यतः'-जिन्होंने मथुरा तथा गोकुलमें जन्मग्रहण आदि लीलाओंको प्रकटितकर आद्य रस अर्थात् शृङ्गार रसमें अपनी सर्वश्रेष्ठ नित्य लीलाओंका आस्वादन किया। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य आदि अन्य सभी रस शृङ्गार रसके अन्तर्भुक्त हैं; शृङ्गाररस ही आदि रस है। जैसे, जब स्वयं श्रीकृष्ण अवतार लेते हैं, तब उनके समस्त पूर्व-पूर्व अवतार, अंश, कला, तद्रूप वैभव तथा भविष्यमें आनेवाले सभी अवतार उनके अन्दर क्रोड़ीभूत होकर अवतरित होते हैं। शृङ्गार रस-अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां भवति। शृङ्गाररसका प्रादुर्भाव अन्वय-व्यतिरेक अर्थात् मिलन और विरहके रूपमें होता है। रसमय श्रीकृष्णसे संयोग और वियोग भेदसे प्रेयसियोंके साथ यह शृङ्गाररस उत्पन्न होता है। प्रेमके आविर्भाव होनेपर श्रीकृष्णकी प्रेयसियोंमें मिलनसे पूर्व दर्शन, प्रियके श्रवण आदिसे उत्पन्न होनेवाली उत्कण्ठामयी रति को पूर्वराग कहा जाता है। यही प्रेम कुटिल रूप धारणकर मानके रूपमें श्रीकृष्ण और गोपियोंको और अधिक आनन्द प्रदान करता है। इस अप्राकृत शृङ्गाररस संयोग-वियोग लीलामें विभिन्न प्रकारके सञ्चारी, सात्त्विक भाव-अनुभाव उदित होकर श्रीकृष्ण और गोपियोंको रससागरमें निमग्न करते हैं। 'अर्थेष्वभिज्ञः' धीर-ललित नायक श्रीकृष्ण इन सभी चौंसठ प्रकारकी शृङ्गाररसकी विद्याओंमें अत्यन्त अभिज्ञ हैं। प्रेयसियोंको आकर्षित करना, उन्हें मनाना, शृङ्गार-वेश रचना आदि सभी कलाओंमें वे प्रवीण हैं अर्थात् वे प्रेमकी समस्त कलाओंमें दक्ष, विदग्ध हैं। 'स्वराट्' - इस विषयमें उन्हें किसीसे सीखनेकी आवश्यकता नहीं है। 'तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये' - श्रीकृष्णने आदिकवि ब्रह्माके हृदयमें 'शब्दब्रह्म'को प्रकाशित किया था, परन्तु श्रीशुकदेव गोस्वामीके हृदयमें 'रसब्रह्म'को प्रकाशित किया जिसके द्वारा वे श्रीमद्भागवतमें वर्णित 'पिबत भागवतं रसं' की रसवर्षा कर सके। 'मुह्यन्ति यत् सूरयः'-जिनकी वृन्दावनलीलामें ब्रह्माजी मोहित होकर ग्वालबाल-बछड़ोंको चुरानेका अपराध कर बैठे, इसी प्रकार अन्य-अन्य ऋषिगण, देवतागण भी श्रीकृष्णकी व्रजलीलाएँ देखकर मोहग्रस्त हो गये। 'तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो'-चन्द्रसरोवरमें श्रीकृष्णकी रासलीलामें वंशीध्वनि श्रवण करके चन्द्रमा निस्तेज हो गये, श्रीकृष्णके सौन्दर्यके सम्मुख वे मलिन हो गये; यमुनाका जल जमकर कठोर हो गया, गिरिराज गोवर्धनकी शिलायें पिघल गयीं। श्रीकृष्णके रूप और सौन्दर्य तथा वंशीध्वनिने रसधारा वर्षण करके तेज, जल और प्रस्तरके स्वभावको बदल दिया, उनके स्वभावका विनिमय हो गया अर्थात् जड़ चेतन हो गया और चेतन जड़ाकार हो गया। 'यत्र त्रिसर्गोऽमृषा'-श्रीकृष्णके त्रिसर्ग गोकुल, मथुरा और द्वारका, उनकी त्रिशक्ति ह्लादिनी, सम्वित् और सन्धिनी, श्रीकृष्णकी त्रिविध लीलाएँ-बाल्य, पौगण्ड, और कैशोर, ये त्रिसर्ग सब समय सत्य हैं। इन समस्त अवस्थाओं, लीलाओं और शक्तियोंके साथ जो अपने 'निरस्त कुहकं' अर्थात् महामायाके प्रभावसे रहित धाममें विराजमान हैं, उन 'सत्यं परं धीमहि' सत्य स्वरूप सनातन परम परमेश्वर श्रीकृष्णका मैं ध्यान करता हूँ। अथवा व्याख्यान्तरके द्वारा-'जन्माद्यस्य यतः'-जो । 327