श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1174, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/263–265 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला बुद्धिवृत्ति-प्रवर्त्तक 'भर्गोदेव' हैं, यह कहा जा रहा है; जैसे (भाः 2/4/22)— “प्रचोदिता येन पुरा सरस्वती वितन्वताजस्य सतीं स्मृतिं हृदि। स्वलक्षणा प्रादुरभूत् किलास्यतः स मे ऋषीणामृषभः प्रसीदताम्॥” “कल्पके प्रारम्भमें जिन्होंने ब्रह्माके हृदयमें सृष्टिविषयक स्मृतिका प्रकाश किया था और जिनके द्वारा प्रेरित सरस्वतीने ब्रह्माके मुखसे प्रकटित होकर श्रीकृष्णको ही उपास्यरूपमें लक्ष्य किया था, वे ज्ञानप्रदातागणोंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीभगवान् मेरे प्रति प्रसन्न हों।” भाः 2/9/30–35, 11/14/3, 12/4/40 और 12/13/19 आदि श्लोक देखें ॥ 263-264 ॥ चिद्विलासमय परमेश्वर-वस्तुका निरूपण और ध्यान :— श्रीमद्भागवत (1/1/1)— जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः। तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ 265 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 265 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस विश्वका जन्म, स्थिति और लय जिससे होता है, ऐसा कहनेसे जो तत्त्व निश्चित हुआ है, अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा विचार करनेपर जो समस्त अर्थ अथवा कार्यमें एकमात्र परम 'ज्ञ-तत्त्व' अर्थात् 'स्वरूपतत्त्व' कहलाकर स्थिर होते हैं; जो दृश्यमान जगत्में एकमात्र स्वराट् अर्थात् स्वतन्त्र राजा हैं; जिन्होंने आदिकवि ब्रह्माको अन्तर्यामीके रूपमें ब्रह्मतत्त्वकी शिक्षा दी है; जिनके विषयमें समस्त बुद्धिमान पण्डितोंमें बारम्बार मोह उत्पन्न होता है; जिनसे अग्नि, जल और मिट्टी आदि भूतोंका विनिमय अर्थात् पृथक् रूपमें सत्ता है; जिनसे तीन प्रकारकी सृष्टि अर्थात् चिद्-उदयरूप सृष्टि, जीव-प्रकाट्यरूप सृष्टि और मायिक-ब्रह्माण्डरूप सृष्टि—सत्यरूपमें वर्तमान है; स्वरूपशक्तिके द्वारा नित्य-कपट-शून्य परमसत्य- तत्त्वरूप उन श्रीकृष्णका हम ध्यान करते हैं ॥ 265 ॥ अनुभाष्य— यतः (यस्मात् शक्तिमतः) अस्य (विश्वस्य) जन्मादि (जन्मस्थितिभङ्गं “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” इत्यादि श्रुतेः, “जन्माद्यास्य यतः” इति न्यायात्—ब्रः सूः 1/1/2) अन्वयात् इतरतश्च (अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां भवति); यः अन्वयात् अर्थेषु (चिन्मयरूपरसगन्धशब्दस्पर्शाद्योग्य-व्यापारेषु) अभिज्ञः (आसक्तः) व्यतिरेकात् अर्थेषु (जडरूपरसगन्धशब्दस्पर्शाद्विषयेषु) अभिज्ञः (असंस्पृष्टः) सन् स्वराट् (स्वेन एव राजते यः स्वप्रकाशः); यत् (यस्मिन् परमसत्ये) सुरयः (ब्रह्मादयः—दशमे ब्रह्ममोहनात्, देवाः तलवकारश्रुतेः; ब्राह्मणादयः मुनयश्च दत्तात्रेय-दुर्वासो-वशिष्ठ-शङ्कर-विद्यारण्यादयः “दैवाहताथैरचना” इति भाः 3/9/10 वचनात्) अपि मुह्यन्ति (मोहं प्राप्नुवन्ति परमसत्यनिर्द्धारणे असमर्थाः भवन्ति); तत् ब्रह्म (तत्त्वं—“वदन्ति तत्तत्त्वविदः” इत्याद्येः) आदिकवये (ब्रह्मणे), हृदा (मनसि—‘त्रया प्रबुद्धः’ इति ब्रह्मसंहिता-वचनात्) यः तेने (प्रकाशितवान्); यथा तेजोवारिमृदां विनिमयः (व्यत्ययः अन्यस्मिन् अन्यावभासः तथा) त्रिसर्गः (त्रयाणां रजस्तमःसत्त्वानां नश्वरः सर्गः, पक्षान्तरे, अन्तरङ्ग-बहिरङ्ग-तटस्थ-शक्तित्रयाणां नित्यप्रकाशः) यत्र (परमसत्ये भगवत्-स्वरूपे सच्चिदानन्दविग्रहाद्वयज्ञाने) अमृषा (सत्यः); स्वेन धाम्ना (अप्राकृतान्तरङ्गसन्धिन्यादि-तद्रूप-वैभवेन बलेन) सदा निरस्त-कुहकं (निरस्तं व्युदस्तं माया-लक्षणं कुहकं कपटं यस्मिन् तं) सत्यं (सत्यस्वरूपं सनातनं) परं (सर्वस्मात् परं परमेश्वरं) धीमहि (वयं ध्यायेमः)। श्लोक-भावानुवाद—जिन शक्तिमान्से इस विश्वका (“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” आदि उपनिषद् वचनों और “जन्माद्यास्य यतः” ब्रह्मसूत्र 1/1/2 से प्रमाणित) अन्वय-व्यतिरेक रूपसे जन्म, स्थिति और लय होता है, जो अन्वय रूपसे चिन्मय रूप-रस- गन्ध-शब्द-स्पर्श योग्य कार्योंमें आसक्त और व्यतिरेक रूपसे जड़ रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्श विषयोंसे पूर्णरूपसे अस्पृष्ट होकर एकमात्र स्वतन्त्र राजा अथवा स्वयं-प्रकाश रूपमें विराजमान हैं; जिन परम सत्यका निर्धारण करनेमें ब्रह्मा (दशम स्कन्ध ब्रह्ममोहनलीला), देवता लोग (तलवकार श्रुति) ब्राह्मण आदि मुनि (दत्तात्रेय, 326 ।