श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/257-264 ] अभागिया ज्ञानी आस्वादये शुष्क ज्ञान। कृष्ण-प्रेमामृत पान करे भाग्यवान् ॥ 258 ॥ अनुवाद—जिस प्रकार कौवे नीमके फल जैसी कड़वी वस्तुओंको ही खाया करते हैं, उसी प्रकार अरसज्ञ अर्थात् रसको न जाननेवाले ज्ञानरूपी नीमके फलको चूसते हैं। किन्तु आमके कोमल और मृदुल मुकुलोंका रसास्वादन करनेवाली कोयलके समान भक्तिरसज्ञ श्रीकृष्णप्रेमरूपी आमकी कलियोंका रसास्वादन करते हैं। दुर्भागे ज्ञानी केवल नीरस शुष्कज्ञानका आस्वादन करते हैं और भक्त श्रीकृष्ण-प्रेमामृतका पान किया करते हैं, इसलिये वे परम सौभाग्यशाली हैं॥ 257-258 ॥ अनुभाष्य—'ज्ञान'—नीमके फलके समान कड़वा, आस्वादनके अयोग्य, कर्कश-तर्कनिष्ठ कौवे जैसी अवस्थावाले जीवोंके खाने योग्य है। किन्तु प्रेमरूपी आमकी कलीका स्वाद-प्रिय और अत्यधिक मीठा है, वह—रसास्वादक कोयल तुल्य श्रीकृष्णभक्तोंके लिये ही आस्वादनीय है। नीरस ज्ञान ही दुर्भागे ज्ञानियोंके भाग्यमें आस्वादनीय वस्तु है; और सरस श्रीकृष्णप्रेमामृत ही भाग्यवान् भक्तोंके पान करने योग्य वस्तु है ॥ 257-258 ॥ श्रीकृष्णकथा-आलोचनामें ही दोनोंकी रात्रि व्यतीत :- एइमत दुइजन कृष्णकथा-रसे। नृत्य-गीत-रोदने हैल रात्रि-शेषे ॥ 259 ॥ दोंहे निज-निज-कार्ये चलिला विहाने। सन्ध्याकाले राय आसि' मिलिला आर दिने॥ 260 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीराय रामानन्द और महाप्रभु दोनों ही श्रीकृष्णकी कथाओंका आस्वादन करते रहे, प्रेमपूर्वक नृत्य-गीत-रोदन करते रहे और सारी रात्रि बीत गयी। प्रातःकाल होते ही दोनों अपने-अपने कार्यके लिये चले गये। सन्ध्याकाल होनेपर पूर्व दिनोंकी भाँति श्रीराय रामानन्द पुनः आकर महाप्रभुसे मिले॥ 259-260 ॥ अनुभाष्य—'विहाने'—पूर्वबङ्गाल और पश्चिममें (हिन्दी भाषामें) अभी भी 'प्रातःकालमें'-शब्दके बदले चलती भाषामें यह शब्द व्यवहार किया जाता है ॥ 260 ॥ दूसरे दिन महाप्रभुके चरणोंमें श्रीरायका निवेदन :- इष्टगोष्ठी कृष्णकथा कहिं' कतक्षण। प्रभुपाद धरि' राय करे निवेदन ॥ 261 ॥ “ 'कृष्णतत्त्व', 'राधातत्त्व' 'प्रेमतत्त्वसार'। 'रसतत्त्व', 'लीलातत्त्व' विविध प्रकार ॥ 262 ॥ शुद्धहृदयमें उदयके कारण महाप्रभुका स्व-प्रकाशत्व :- एत तत्त्व मोर चित्ते कैले प्रकाशन। ब्रह्माके वेद येन पड़ाइल नारायण ॥ 263 ॥ अन्तर्यामी ईश्वररे एइ रीति हय। बाहिरे ना कहे, वस्तु प्रकाशे हृदय ॥ 264 ॥ अनुवाद—कुछ समय तक इष्टगोष्ठीमें श्रीकृष्णकथाका कथन-श्रवण हुआ। उसके बाद श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़कर बड़े ही विनीत भावसे निवेदन किया,- “आपने मेरे हृदयमें 'कृष्णतत्त्व', 'राधातत्त्व', 'प्रेमतत्त्वसार', 'रसतत्त्व' और विविध प्रकारके 'लीलातत्त्वों'को इस प्रकार प्रकाशित किया है, जिस प्रकार श्रीनारायणने ब्रह्माजीको वेदोंका ज्ञान प्रदान किया था। अन्तर्यामी ईश्वरकी यही रीति है कि वे बाहरसे कुछ नहीं कहते, किन्तु हृदयमें उस तत्त्ववस्तुको स्फुरित कराते हैं॥ 261-264 ॥ अनुभाष्य—ब्रह्माके हृदयमें भगवान्के द्वारा वेदप्रकाशन, -(श्वे०उ: 6/18)- “यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ " जिन्होंने सृष्टिके पहले ब्रह्माकी सृष्टि की थी और उनके हृदयमें समस्त वेदोंको सञ्चारित किया था, उन आत्मबुद्धिप्रकाशक-देवकी मुक्तिकी इच्छा करनेवाला मैं शरण ग्रहण करता हूँ। इसके द्वारा श्रीगौरसुन्दर ही गायत्रीके प्रतिपाद्य । 325