भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1172

[ 8/244-257 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—(भाः 10/30/39)— “विक्रीड़ितं व्रजवधूभिरिदञ्च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः। भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥” “व्रजवधुओंके साथ श्रीकृष्णकी रासक्रीड़ा जो धीर व्यक्ति श्रद्धासहित निरन्तर श्रवण करनेके बाद निरन्तर उसका कीर्त्तन करता है, वह अति शीघ्र ही पराभक्ति प्राप्त करके हृदयके कामरोगको अविलम्ब दूर करनेमें समर्थ होता है॥” 254 ॥ (12) हरेकृष्ण-नाम ही एकमात्र कीर्तनीय :— 'उपास्येर मध्ये कोन् उपास्य प्रधान?' 'श्रेष्ठ-उपास्य—युगल 'राधाकृष्ण' नाम॥' 255 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, —“उपास्योंमेंसे कौन-सा उपास्य सर्वप्रधान है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,—“श्रीराधाकृष्णका युगल नाम ही सर्वश्रेष्ठ उपास्य है॥” 255 ॥ अनुभाष्य—(भाः 6/3/22)— “एतावानेर लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्म परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः॥” “नामसङ्कीर्त्तनादिके द्वारा भगवान् श्रीवासुदेवका जो भक्तियोग है—यहीं तक ही इस जगत्में जीवोंका 'परमधर्म' कहा गया है॥” 255 ॥ (13) मुक्तिकामी और भुक्तिकामीकी गति :— 'मुक्ति, भुक्ति वाञ्छे येइ, काँहा दुँहार गति?' 'स्थावरदेह, देवदेह यैछे अवस्थिति॥' 256 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, —“जो मुक्ति और भुक्तिकी कामना करते हैं, उन दोनोंकी क्या गति होती है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,—“जो ब्रह्म-सायुज्य मुक्तिकी कामना करते हैं, उन्हें वृक्ष योनिकी प्राप्ति होती है। मुक्तिका लोभ करनेवालोंको देवदेहकी प्राप्ति होती है॥” 256 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—“प्रभु कहे,—कोन् विद्या” से आरम्भ होकर “स्थावरदेह, देव-देह यैछे अवस्थिति” तक प्रत्येक पद्यकी प्रथम पंक्ति महाप्रभुका प्रश्न और द्वितीय पंक्ति श्रीरायका उत्तर है। चैतन्यचन्द्रोदय नाटकके सातवें अङ्कमें यह कथोपकथन है॥ 244-256 ॥ अनुभाष्य—मुक्तिवादी लोग जड़भोगोंका त्यागकर साधनकी चरम अवस्थामें चित्-क्रियाहीन अर्थात् सुप्तचेतन स्थावर (वृक्षादि) देहको प्राप्त करते हैं। और जड़भोगोंकी कामनावाले भुक्तिवादी लोग परलोकमें भोग करनेके उपयोगी देव देहको प्राप्त करते हैं। “मुक्तयैः यः प्रस्तरत्वाय शास्त्रमुचे महामुनि। गौतमं तं विजानीथ यथा वित्थ तथैव सः।” यही बौद्ध मतवादियोंके दर्शनका फल है। पत्थरके समान दशाकी प्राप्तिरूप मुक्तिके उद्देश्यसे जिन महामुनिने (न्याय)-शास्त्रका प्रवर्त्तन किया है, उन गौतमको जिस रूपमें जानते हो, वे उसी रूपमें कहकर जाने जाते हैं। (भाः11/10/23)— “इष्ट्वेह देवता यज्ञैः स्वर्लोकं याति याज्ञिकः। भुञ्जीत देववत्तत्र भोगान् दिव्यान् निजार्जितान्॥” याज्ञिक पुरुष इस लोकमें यज्ञके द्वारा देवताओंकी आराधना करके स्वर्ग प्राप्त करते हैं और वहाँ देवताओंके समान अपने पुण्योंसे अर्जित सब दिव्य-विषयोंको भोग करते हैं। (भाः 4/29/29)— “देवो मनुष्यस्तिर्यग्वा यथाकर्मगुणं भवः॥” अज्ञानसे आवृत जीव कभी देवता, कभी मनुष्य या तिर्यक् जन्म अथवा कर्मानुसार जन्म ग्रहण करता है। और (गीः 9/20) देखें॥ 256॥ ज्ञानी और भक्तके साधनका वैशिष्ट्य :— अरसज्ञ काक चुषे ज्ञान-निम्बफले। रसज्ञ कोकिल खाय प्रेमाम्र-मुकुले॥ 257॥ 324 ।