श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1171, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/250-254 ] अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,–“श्रेयोंमेंसे कौनसा श्रेय जीवोंके लिये सार है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,—“श्रीकृष्णभक्त-सङ्गके समान और कोई मङ्गल नहीं है॥”250॥ अनुभाष्य—(भाः 11/2/30)— “अत आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्छामो भवतोऽनघाः। संसारेऽस्मिन् क्षणार्द्धोऽपि सत्सङ्गः शेवधिर्नृणाम्॥” “हे महापुरुषों! आप लोगोंके दुर्लभ दर्शन प्राप्त करके मैं अपने परम कल्याणके विषयमें जाननेकी इच्छा करता हूँ। इस संसारमें यदि आधे क्षणके लिये भी शुद्धभक्तका सङ्ग प्राप्त हो जाय, तो वह जीवोंको परमानन्द प्रदान करनेवाला होता है॥”250॥ (8) कृष्ण ही एकमात्र नित्य स्मरणीय :- ‘काँहार स्मरण जीव करिबे अनुक्षण?’ ‘कृष्ण-नाम-गुण-लीला-प्रधान स्मरण॥’ 251॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,–“जीवोंको प्रतिक्षण किसका स्मरण करना चाहिये?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,—“श्रीकृष्णके नाम, रूप, गुण और लीलाओंका स्मरण करना ही प्रधान स्मरण है॥”251॥ अनुभाष्य—(भाः 2/2/36)— “तस्मात् सर्वात्मना राजन् हरिः सर्वत्र सर्वदा। श्रोतव्यः कीर्त्तितव्यश्च स्मर्त्तव्यो भगवन्नृणाम्॥” “इसलिये हे राजन्! मनुष्यमात्रके लिये सर्वात्माके द्वारा सर्वत्र और सर्वदा उन श्रीहरिके नाम-गुण-लीलादि श्रवणीय, कीर्त्तनीय और स्मरणीय हैं॥”251॥ (9) राधाकृष्ण-चरणकमल ही एकमात्र ध्येय :- ‘ध्येय-मध्ये जीवेर कर्त्तव्य कोन् ध्यान?’ ‘राधाकृष्णपदाम्बुज-ध्यान-प्रधान॥’ 252॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,–“सब प्रकारके ध्यानोंमेंसे किसका ध्यान करना जीवोंका कर्त्तव्य है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,–“श्रीराधाकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करना ही प्रधान ध्यान है॥”252॥ अनुभाष्य—(भाः 1/2/14)— “तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पतिः। श्रोतव्यः कीर्त्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा॥” “इसलिये स्थिर चित्तसे भक्तोंके एकमात्र पतिस्वरूप भगवान् श्रीहरिके नामादिका श्रवण, कीर्तन, ध्यान और पूजा करना कर्त्तव्य है।” 252॥ (10) ब्रज ही एकमात्र वासयोग्य स्थान :- ‘सर्व त्यजि’ जीवेर कर्त्तव्य काँहा वास?’ ‘श्रीवृन्दावन-भूमि-याँहा नित्य-लीलारास॥’ 253॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,–“सर्वस्व त्याग करके कहाँ वास करना जीवका कर्त्तव्य है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,—“जहाँ श्रीकृष्ण नित्य रास-लीला करते हैं, उस ब्रजभूमि वृन्दावनमें ही वास करना चाहिये॥” 253॥ अनुभाष्य—(भाः10/47/61)— “आसामहो चरणरेणु जुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथञ्च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥” “श्रीउद्धवने कहा,—“दुस्त्यज स्वजनों और आर्यपथका त्याग करके जो श्रुतियोंकी भी निरन्तर अन्वेषणीय श्रीकृष्णपदवीकी सेवामें निरत हुई हैं, अहो, मैं उन गोपियोंकी चरणधूलि प्राप्त करनेके लिये वृन्दावनमें झाड़ी-लतादिमें किसी एक स्वरूपसे जन्म ग्रहण करनेकी इच्छा करता हूँ॥” 253॥ (11) श्रीराधाकृष्ण-प्रेमलीला ही एकमात्र श्रवणयोग्य :- ‘श्रवण-मध्ये जीवेर कोन् श्रेष्ठ श्रवण?’ ‘राधाकृष्ण-प्रेमकैलि कर्ण-रसायन॥’ 254॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,–“श्रवणमें जीवके लिये सर्वश्रेष्ठ श्रवण क्या है?” श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया,–“कर्ण-रसायनरूप श्रीराधाकृष्णकी प्रेमकलिका श्रवण ही सर्वश्रेष्ठ है॥” 254॥ । 323