श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1183, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/294-302 ] जैसा 'आराध्यो भगवान्...' श्लोकमें भी कहा है। अतः समुद्र-मन्थनके अन्तमें महाप्रभुने यही प्रदान किया है कि राधाजीका ही भाव ही सर्वोत्तम है। इससे बढ़कर और कोई भाव नहीं है। जो भजन करना चाहते हैं, उन्हें राधाजीकी अनुचरी बननेका लक्ष्य रखना चाहिये। अर्थात् राधाजीकी जो सखियाँ हैं अथवा दासियाँ हैं, उन दासियोंकी दासीकी दासीकी दासीके रूपमें उनकी चरणोंकी धूलि ग्रहणकर उनकी किङ्करी बन जाँय। यही सब शास्त्रोंका एकमात्र उद्देश्य है और भागवतका भी यह एकमात्र प्रतिपाद्य विषय है। यथार्थ समुद्र-मन्थन श्रीचैतन्यचरितामृतमें इस प्रकारसे दिया है। इसी रूपमें इसे ग्रहण करना चाहिये।” - श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 294 ॥ श्रीरायसे महाप्रभुके द्वारा विदायी-ग्रहण और आदेश देना :- आर दिन राय-पाशे विदाय मागिला। विदायेर काले ताँरे एइ आज्ञा दिला ॥ 295 ॥ श्रीरायको नीलाचल जानेका आदेश और वहाँ पुनः मिलनेपर श्रीकृष्णकथा चर्चाका सुयोग :- “विषय छाड़िया तुमि याह नीलाचले। आमि तीर्थ करि' ताँहा आसिब अल्पकाले ॥ 296 ॥ दुइजने नीलाचले रहिब एकसङ्गे। सुखे गोङाइब काल कृष्णकथा-रङ्गे ॥” 297 ॥ एत बलि' रामानन्दे करि' आलिङ्गन। ताँरे घरे पाठाइया करिल शयन ॥ 298 ॥ अनुवाद - अगले दिन महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायसे विदायी माँगी। विदायीके समय महाप्रभुने उन्हें यह आज्ञा प्रदान की, - “सांसारिक विषयोंको छोड़कर अर्थात् सब प्रकारके दायित्वसे मुक्त होकर आप नीलाचल चले जाइये और मैं भी तीर्थभ्रमण करके थोड़े समयमें वहाँ आ जाऊँगा। तब हम दोनों एक साथ नीलाचलमें रहेंगे और परस्पर कृष्णकथाका श्रवण-कीर्तन करके सुखपूर्वक समय बितायेंगे।” इतना कहकर महाप्रभुने श्रीरामानन्दका आलिङ्गन किया और उन्हें घर भेजकर स्वयं शयन करने चले गये ॥ 295-298 ॥ बजरङ्गजीके दर्शन करके महाप्रभुके द्वारा दक्षिण-यात्रा :- प्रातःकाले उठि' प्रभु देखि' हनुमान्। ताँरे नमस्करि' प्रभु दक्षिणे करिला प्रयाण ॥ 299 ॥ अनुवाद - प्रातःकालमें उठकर महाप्रभुने श्रीहनुमानजीके दर्शन किये और उन्हें प्रणामकर दक्षिण भारतके तीर्थोंकी ओर प्रस्थान किया ॥ 299 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'हनुमान' - विद्यानगरमें श्रीहनुमानकी मूर्ति-पूजा होती है। उन ग्राम्य-देवताको प्रणाम करके महाप्रभु दक्षिण दिशाकी ओर गये ॥ 299 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे सम्पूर्ण विद्यानगरवासीकी वैष्णवता :- 'विद्यापुरे' नाना-मत लोक बैसे जत। प्रभु-दर्शने 'वैष्णव' हैल छाड़ि' निजमत ॥ 300 ॥ अनुवाद - 'विद्यापुर' में अनेक मतावलम्बी लोग थे, परन्तु महाप्रभुका दर्शन करते ही वे लोग अपने मतको छोड़कर वैष्णव बन गये ॥ 300 ॥ अनुभाष्य - 'विद्यापुरे'- विद्यानगरमें ॥ 300 ॥ महाप्रभुके विरहमें श्रीरायकी अवस्था :- रामानन्द हैला प्रभुर विरहे विह्वल। प्रभुर ध्याने रहे विषय छाड़िया सकल ॥ 301 ॥ अनुवाद - इधर श्रीराय रामानन्द महाप्रभुके विरहमें अति व्याकुल हो गये और सारे विषयोंका त्याग करके महाप्रभुजीके ध्यानमें लगे रहते थे ॥ 301 ॥ ग्रन्थमें महाप्रभु-श्रीरामानन्द संवादका संक्षिप्त वर्णन :- संक्षेपे कहिलुँ रामानन्देर मिलन। विस्तारि' वर्णिते नारे सहस्र-वदन ॥ 302 ॥ अनुवाद - (ग्रन्थकार कह रहे हैं) - इस प्रकार महाप्रभुके साथ श्रीरामानन्द रायके मिलनका मैंने संक्षेपमें वर्णन किया। जिसका विस्तारपूर्वक वर्णन । 335