श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1184, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/302–309 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अपने सहस्र मुखोंसे भगवान् श्रीशेष भी नहीं कर सकते ॥ 302 ॥ चैतन्यलीला, श्रीराय-चरित्र और राधाकृष्णलीलाका परस्पर सम्बन्ध एवं अति सौभाग्यशालीव्यक्तिका ही इस लीलार्मे अधिकार और सुयोग :- सहजे चैतन्य-चरित्र-घनदुग्धपूर । रामानन्द-चरित्र ताहे खण्ड प्रचुर ॥ 303 ॥ राधाकृष्णलीला-ताते कर्पूर-मिलन । भाग्यवान् येइ, सेइ करे आस्वादन ॥ 304 ॥ ये इहा एकबार पिये कर्णद्वारे। तार कर्ण लोभे इहा छाड़िते ना पारे ॥ 305 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र स्वाभाविक रूपसे घन-दुग्ध (रबड़ी) के सदृश है और श्रीराय रामानन्दका चरित्र मीठी चीनीके समान है, जिससे मिलनेसे रबड़ी मधुरतिमधुर हो गयी है। श्रीराधाकृष्णकी लीला उसमें कर्पूरके समान मिश्रित है, जिसका कोई-कोई भाग्यवान् ही आस्वादन कर सकता है। जो भी मनुष्य अपने कर्ण-द्वारसे एक बार भी इसका पान कर लेता है, फिर तो माधुर्यके लोभी उसके कान इसे कभी छोड़ नहीं सकते ॥ 303-305 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुका चरित्र रबड़ी-स्वरूप है, श्रीरामानन्दका चरित्र उसमें चीनीके समान है; एवं (उसमें) श्रीराधाकृष्णकी लीला-चीनीयुक्त-रबड़ीमें श्रीकर्पूर है॥ 303-304 ॥ आठवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। महाप्रभु-श्रीरामानन्द राय-संवाद-श्रवणके फलका वर्णन :- 'रसतत्त्व-ज्ञान' हय इहार श्रवणे । 'प्रेमभक्ति' हय राधाकृष्णेर चरणे ॥ 306 ॥ चैतन्येर गूढ़तत्त्व जानि इहा हैते । विश्वास करि' शुन, तर्क ना करिह चित्ते ॥ 307 ॥ अनुवाद-इस मिलन-प्रसङ्गके श्रवणसे सम्पूर्ण रसतत्त्वका ज्ञान हो जाता है और श्रीराधाकृष्णके श्रीचरणकमलोंमें प्रेमभक्तिकी उपलब्धि हो जाती है। श्रीचैतन्य महाप्रभुका तत्त्व अत्यन्त रहस्यमय है-उस रहस्यका ज्ञान इसके श्रवणसे ही होता है। अपने मनमें किसी भी प्रकारका तर्क-कुतर्क न करके इसे विश्वासपूर्वक सुनो ॥ 306-307 ॥ भगवान्का अचिन्त्यभाव-तर्कातीत :- अलौकिक लीला एइ परम निगूढ़ । विश्वासे पाइये, तर्के हय बहुदूर ॥ 308 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी यह अलौकिक लीला अति निगूढ़ और रहस्यमय है, जिसे विश्वास है, वही इसकी उपलब्धि कर सकता है, तर्क करनेसे इससे बहुत दूर रहोगे ॥ 308 ॥ श्रीनित्याइ-गौर-अद्वैतके एकान्तिक भक्तोंको ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-चरण। याँहार सर्वस्व, ताँरे मिले एइ धन ॥ 309 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके श्रीचरणकमलोंको जिन्होंने अपना सर्वस्व मान लिया है, उनको ही इस रस-सम्पत्तिकी प्राप्ति हो सकती है ॥ 309 ॥ अनुभाष्य-“विश्वासे मिलये कृष्ण, तर्के बहुदूर” अर्थात् विश्वास रखनेवाले श्रद्धालुको क्रमशः आगे बढ़ते हुए इस अलौकिक परम-गोपनीय वास्तव-वस्तु श्रीकृष्णलीलाकी अनुभूति होती है। यह (श्रीकृष्णलीला) गुरु-परम्पराको न माननेवाले, वास्तव-सत्यमें संशयशील सेवा-विमुख जीवोंके सङ्कल्प-विकल्पात्मक मनोधर्मसे उत्पन्न और स्वेच्छानुसार गठन-योग्य काल्पनिक विचार नहीं है। जड़़ीय तर्कका सहारा लेनेपर जड़-भोग प्रवृत्तिकी प्रचुरताके कारण चिन्मयलीला उनसे दूर रहती है। जैसे-(कठोपनिषद् 1/2/9)- “नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।” हे प्रियतम नचिकेत! इस भगवद्-विषयणी मतिको 336 ।