श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/307-312 ] तर्कके द्वारा नष्ट करना उचित नहीं है। यह अन्य इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे रामानन्दराय-सङ्गोत्सवो तत्त्वज्ञ व्यक्तिके द्वारा उपदिष्ट हुई है, इसलिये यह नामाष्टम-परिच्छेदः। उत्तम ज्ञानका कारण होगी। अनुवाद—श्रीरामानन्द रायके श्रीचरणकमलोंमें मैं (मुण्डकोपनिषद् 3/2/3)— कोटि-कोटि बार प्रणाम करता हूँ, जिनके मुखारविन्दसे “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। महाप्रभुने प्रेमरस-सम्पत्तिका विस्तार करवाया है। इस यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥” प्रकार मैंने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके कड़चाके इस परमात्म-वस्तुका बहुत तर्क, मेधा (बुद्धि) या अनुसार महाप्रभु और श्रीरामानन्द रायके मिलनकी पाण्डित्यके द्वारा बोध नहीं होता। वे जिसको (भक्तिसे लीलाका वर्णन किया है। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके सन्तुष्ट होकर) वरण करते हैं, उसके द्वारा प्राप्य होती चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस है। उसके निकट ही ये परमेश्वर अपनी श्रीमूर्त्ति श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥310-312॥ प्रकाश करते हैं। अनुभाष्य—ग्रन्थकार प्रायः प्रत्येक अध्यायके अन्तमें (ब्रः सूः 2/1/11)— इस प्रकार श्रौत-पन्थामें अर्थात् गुरुके प्रति अपनी “तर्काप्रतिष्ठानात्।” अचला (अटल) निष्ठा प्रदर्शित कर रहे हैं। यह तर्कके द्वारा अप्राकृत तत्त्वकी क्या बात, प्राकृत 'महाप्रभु-रामानन्द-मिलन' घटना श्रील स्वरूप दामोदरके विषयमें भी उसकी प्रतिष्ठा नहीं देखी जाती। कड़चाके अनुसार ही लिखित और वर्णित हुई है। मानव प्राकृत लौकिक विचारपूर्ण ज्ञानकी सहायतासे सांसारिक लोग अपने अभिमानके कारण जैसे गुरुमुखसे अलौकिक तत्त्वको समझनेका प्रयास करनेपर उस सुनी कथाका परित्याग करके स्वकपोल-कल्पित तत्त्वसे दूर हो जाता है। यहाँ विचारणीय विषय (मनघड़न्त) कथा बोलते हैं, यह महाप्रभु-रामानन्द-मिलन (श्रीकृष्णप्रेमरस)-अलौकिक है। जड़-सहजिया या लीला वैसी ग्रन्थकारकी दम्भपूर्ण चेष्टा नहीं है—यही साहित्यिक व्यक्ति जो भी विचार अपने मन या बुद्धिसे ग्रन्थकारके प्रतिपादन (स्थापित) करनेका उद्देश्य है॥311॥ करेंगे, वह लौकिक होगा, इसलिये (अलौकिक वस्तुको जाननेका) उनका प्रयास निरर्थक है। उस प्रकारके अष्टम अध्यायका अनुभाष्य समाप्त॥ विचारोंको त्याग करके जो विष्णु-तत्त्वमें ऐकान्तिक श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें रामानन्दराय-सङ्गोत्सव श्रद्धावान् होते हैं, उनका सम्बन्धज्ञान ही शुद्ध और नामक आठवाँ अध्याय समाप्त। अनायास प्राप्य होता है॥307-309॥ ग्रन्थकारके द्वारा श्रीरायकी वन्दना :- रामानन्द राये मोर कोटी नमस्कार। याँर मुखे कैल प्रभु रसेर विस्तार॥310॥ दामोदर-स्वरूपेर कड़चा-अनुसारे। रामानन्द-मिलन-लीला करिल प्रचारे॥311॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥312॥ । 337