भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1168

[ 8/245 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कारण ही जीव जड़ीय-वैभवका आदर करते हैं। सांसारिक वैभवके द्वारा प्राप्त अनित्य यश अथवा जड़भोग-त्यागियोंके मध्यमें 'ब्रह्मज्ञ'के रूपमें प्राप्त ख्यातिकी अपेक्षा 'विष्णुभक्त'के रूपमें ख्यातिकी श्रेष्ठता है; उसीके उन्नत स्तरमें 'कृष्णभक्त'के रूपमें ख्याति है। (गरुड़ पुराणमें इन्द्रकी उक्ति)— "कलौ भागवतं नाम दुर्लभं नैव लभ्यते। ब्रह्मरुद्रपदोत्कृष्टं गुरुणा कथितं मम॥" मेरे श्रीगुरुदेवने कहा है कि ब्रह्मा-रुद्रादि पदकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट जो भागवत (शुद्धभक्त)-नामक पद है, वह कलियुगमें बहुत ही दुर्लभ है। (इतिहास-समुच्चयमें श्रीनारद-पुण्डरीक-संवादमें)— "जन्मान्तर-सहस्रेषु यस्य स्याद् बुद्धिरीदृशी। 'दासोऽहं वासुदेवस्य' सर्वलोकान् समुद्धरेत्॥" 'मैं श्रीवासुदेवका दास हूँ'—हजारों-हजारों जन्मोंके बाद जिनकी इस प्रकार बुद्धि हो गयी है, वे समस्त विश्वका उद्धार कर सकते हैं। (आदि-पुराणके श्रीकृष्ण-अर्जुन संवादमें)— “भक्तानामनुगच्छन्ति मुक्तयः श्रुतिभिः सह॥” श्रुतियोंके साथ सालोक्यादि मुक्तियाँ भक्तोंका अनुगमन करती हैं। (बृहन्नारदीयमें)— “अद्यापि च मुनिश्रेष्ठा ब्रह्माद्या अपि देवताः। प्रभावं न विजानन्ति विष्णुभक्तिरतात्मनाम्॥" विष्णुभक्तिमें रत रहनेवाले भक्तोंके प्रभावको आज तक भी श्रेष्ठ मुनिजन और ब्रह्मादि देवता पूर्णरूपसे नहीं जानते। (गरुड़ पुराणमें)— ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्टते। सत्रयाजि-सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः। सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णुभक्तो विशिष्यते। वैष्णवानां सहस्रेभ्या एकान्तेको विशिष्यते। एकान्तिनस्तु पुरुषा गच्छन्ति परमं पदम्॥" हजारों ब्राह्मणोंसे एक सावित्र्य ब्राह्मण श्रेष्ठ है, हजार सावित्र्य ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक सर्ववेदान्तका ज्ञाता ब्राह्मण श्रेष्ठ है, करोड़ों-करोड़ों वेदान्तके ज्ञाता ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक विष्णुभक्त श्रेष्ठ है, सैकड़ों वैष्णवोंसे एकान्तिक भक्त श्रेष्ठ है। एकान्तिक पुरुष ही परम पदको प्राप्त करते हैं। (भाः 3/13/4)— "श्रुतस्य पुंसां सुचिरश्रमस्य नन्वञ्जसा सूरिभिरीड़ितोऽर्थः। तत्तद्गुणानुश्रवणं मुकुन्द-पादारविन्दं हृदयेषु येषाम् ॥" हे मुने ! जिनके हृदयमें श्रीमुकुन्दके चरणारविन्द विराजमान हैं, उन भक्तजनोंके गुणोंको श्रवण करना ही मनुष्योंके बहुत दिनों तक किये हुए शास्त्राभ्यासके श्रमका मुख्य फल है, ऐसा विद्वानोंका मत है। (नारायणव्यूह स्तवमें)— "नाहं ब्रह्मापि भूयासं त्वद्भक्तिरहितो हरे। त्वयि भक्तस्तु कीटोऽपि भूयासं जन्मजन्मसु ॥" हे कृष्ण ! आपमें भक्तिसे रहित होकर मैं ब्रह्माका जन्म भी नहीं चाहता, अपितु जन्म-जन्मान्तरोंमें भी आपके प्रति भक्तियुक्त होकर मैं कीट जन्मकी ही इच्छा करता हूँ। तथा भागवतके 3/25/38, 4/24/29, 4/31/22, 7/9/24, 10/14/30 आदि श्लोक देखें। भक्तोंमें प्रह्लादकी ख्याति—जैसे (भाः 7/9/26 और 7/10/21) तथा स्कन्दपुराणमें श्रीरुद्रवाक्य— “भक्त एव हि तत्त्वेन् कृष्णं जानाति न त्वहम्। सर्वेषु हरिभक्तेषु प्रह्लादोऽतिमहत्तमः ॥" भक्त ही श्रीकृष्णको तत्त्व-सहित जानते हैं, मैं नहीं जानता। सभी हरिभक्तोंमें प्रह्लाद सर्वश्रेष्ठ हैं। उनसे पाण्डवोंकी श्रेष्ठता—(भाः 7/10/48-50, 7/15/75-77) में वर्णित है; भागवत (7/10/48)— यूयं नृलोके बत भूरिभागा लोकं पुनाना मुनयोऽभियन्ति। येषां गृहानाFlowसतीति साक्षाद् गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम् ॥ श्रीनारद राजा युधिष्ठिरको प्रह्लाद-चरित्र वर्णन करनेके बाद बोले, - "इस मनुष्यलोकमें तुम अति 320 ।