श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1169, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/245-246 ] भाग्यवान् हो, क्योंकि तुम्हारे घर मनुष्यरूपी साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण गूढ़रूपमें वास करते हैं, यह जानकर संसारको पवित्र कर देनेवाले मुनिगण सदा तुम्हारे घरमें आते-जाते रहते हैं।” उनसे यादवोंकी श्रेष्ठता-(भाः 10/82/28,30); भागवत (10/82/29)— अहो भोजपते यूयं जन्मभाजो नृणामिह। यत् पश्यथासकृत् कृष्णं दुर्दर्शमपि योगिनाम्॥ पाण्डवोंने कहा,—“हे भोजराज उग्रसेन ! आप लोगोंका ही पृथ्वीपर मानवोंके मध्य जन्म सार्थक है, क्योंकि जिन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन योगियोंके लिये भी दुर्लभ है, उनके आप निरन्तर दर्शन करते हैं।” उनमेंसे उद्धवकी सर्वश्रेष्ठता-(भाः 3/4/31, 11/14/15, 11/16/29); भागवत (11/14/15)— न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः। न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥ श्रीकृष्णने उद्धवजीसे कहा,—“तुम मेरे जितने प्रियतम हो, ब्रह्मा, शङ्कर, सङ्कर्षण, लक्ष्मी, यहाँ तक कि मेरा अपना स्वरूप भी उतना प्रिय नहीं है।” उनकी अपेक्षा व्रजदेवियोंका श्रेष्ठत्व-(भाः 10/47/58)— एताः परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढ़भावाः। वाञ्छन्ति यद्भवभियो मुनयो वयञ्च किं ब्रह्मजन्मभिरनन्त-कथारसस्य॥ श्रीउद्धवजीने कहा,—“समस्त जीवोंके आत्मस्वरूप श्रीकृष्णमें परमप्रेमवती इन गोपियोंका ही जन्म सार्थक है। मुक्तिकामी मुनिगण और हम भक्तगण भी उस प्रकारके भावकी प्रार्थना करते रहते हैं। इसलिये श्रीकृष्णकथा-रसिकोंके लिये ब्रह्मादि जन्मका भी क्या मूल्य है?” तथा 'बृहद्वामन'में भृगु आदि ऋषियोंके प्रति ब्रह्माके वाक्य— “षष्टिवर्ष-सहस्राणि मया तप्तं तपः पुरा। नन्दगोपव्रजस्त्रीणां पादरेणूपलब्धये॥ तथापि न मया प्राप्तास्तासां वै पादरेणवः। नाहं शिवश्च शेषश्च श्रीश्च ताभिः समाः क्वचित्॥” श्रीनन्दगोपके व्रजमें रहनेवाली गोपरमणयोंके श्रीचरणोंकी रज प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें मैंने साठ हजार वर्षोंकी कठोर तपस्या की थी, तो भी मैं उनकी चरणरेणुको प्राप्त नहीं कर सका। मैं (ब्रह्मा) शङ्कर, शेष और लक्ष्मीजी किसी प्रकारसे उन व्रजगोपियोंके समान नहीं हैं। आदि पुराणमें श्रीभगवद्-वाक्य— “न तथा मे प्रियतमो ब्रह्मा रुद्रश्च पार्थिव। न च लक्ष्मीनं चात्मा च यथा गोपीजनो मम॥” हे पार्थ ! जिस प्रकार व्रजकी गोपियाँ मेरी प्रियतमा हैं, उस प्रकार ब्रह्मा, शङ्कर, लक्ष्मी और यहाँ तक कि मेरी आत्मा भी उतनी प्रिय नहीं है। गोपियोंमें भी श्रीराधिकाका ही सर्वश्रेष्ठत्व है। श्रीराधाके सबसे प्रिय सेवकवर, श्रीगौराङ्गके अत्यन्त अन्तरङ्ग सेवक श्रील रूपगोस्वामी प्रभुके जो एकान्त अनुगत हैं, वे ही रूपानुगके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनके ऐश्वर्यके सम्बन्धमें श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें— “आस्तां वैराग्यकोटिर्भवतु शम-दम-क्षान्ति-मैत्रादिकोटि- स्तत्त्वानुध्यान कोटिर्भवतु भवतु वा वैष्णवी भक्तिकोटिः। कोट्यांशोऽप्यस्य न स्यात्तदपि गुणगणो यः स्वतःसिद्ध आस्ते श्रीमच्चैतन्यचन्द्र-प्रिय-चरण-नख-ज्योतिरामोद-भाजाम्॥” कोटि वैराग्य रहे, कोटि शम, दम, क्षान्ति, मैत्रादि असंख्य गुण ही रहें, कोटि ब्रह्मध्यान हो या कोटि विष्णुभक्ति विद्यमान रहे, किन्तु श्रीचैतन्यचन्द्रके प्रिय भक्तोंकी चरण-नख ज्योतिके द्वारा आनन्द प्राप्त दासोंकी जो स्वतःसिद्ध गुणावली है, उनके कोटि भागका एक अंश भी ये सब नहीं हैं॥ 245 ॥ (3) राधागोविन्दमें प्रेमभक्ति ही परम धन :— 'सम्पत्तिर मध्ये जीवेर कोन् सम्पत्ति गणि?' 'राधाकृष्णे प्रेम याँर, सेइ बड़ धनी ॥' 246 ॥ । 321