भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1167

आठवाँ अध्याय 8/237-245 ] श्रीरसत्तत्त्वके ज्ञानकी आप ही अन्तिम सीमा हैं। दस विद्याओंका सार है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिनोंकी तो बात ही क्या? जीवन भर मैं आपका साथ दिया, - "श्रीकृष्णभक्ति ही सभी विद्याओंका सार है, छोड़ नहीं सकता। मैं और आप एक साथ ही जगन्नाथ इसके अतिरिक्त कोई और विद्या है ही नहीं ॥" 244 ॥ पुरीमें रहेंगे और सुखपूर्वक कृष्णकथाके आनन्दमें अनुभाष्य-विद्याकी श्रेष्ठता-विषयक प्रश्नका श्रीरायका अपना समय व्यतीत करेंगे ॥" 237-240 ॥ उत्तर यह है कि कृष्णभक्ति-विद्या ही सर्वोत्तम है। अनुभाष्य-राधाकृष्ण-प्रेमरसके स्वरूपको तुमने ही जड़भोग-जननी विद्या और जड़से अतीत ब्रह्मविद्याकी जाना है। उस ज्ञानमें तुम पारङ्गत सिद्ध हो, इसलिये अपेक्षा उन्नत विष्णुभक्ति-विद्यासे भी उन्नतस्तरकी तुम ही शेष (अन्तिम) सीमा हो ॥ 238 ॥ कृष्णभक्ति-विद्या है। (भाः 4/29/49) "तत् कर्म हरितोषणं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया" निज-निज कार्य समाप्तकर सन्ध्यामें दोनोंका मिलन :- जिसके द्वारा श्रीहरि सन्तुष्ट होते हैं, वही जीवका एत बलि' दुँहे निज-निज कार्ये गेला। एकमात्र कर्तव्य कर्म है और जिसके द्वारा श्रीहरिमें सन्ध्याकाले राय पुनः आसिया मिलिला ॥ 241 ॥ मति होती है, वही विद्या है। दोनोंकी इष्टगोष्ठी :- (भाः 7/5/23-24)-"श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं अन्योन्ये मिलि' दुँहे निभृते बसिया। पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं साख्यमात्मनिवेदनम् ॥ प्रश्नोत्तर-गोष्ठी कहे आनन्दित हञा ॥ 242 ॥ इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा ॥ क्रियेत भगवत्यद्धा अनुवाद-इतना कहकर दोनों ही अपने-अपने तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥" कार्यके लिये चले गये। सन्ध्या होनेपर श्रीरामानन्द राय श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, पुनः महाप्रभुसे आकर मिले। एक दूसरेसे मिलकर दोनों दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन-ऐसी नौ लक्षणोंवाली एकान्त स्थानपर बैठकर अति आनन्दके साथ परस्पर भक्तिको जो विष्णुमें साक्षात् अर्पण करते हैं, वे ही प्रश्नोत्तर गोष्ठीमें संलग्न हो गये ॥ 241-242 ॥ शास्त्रोंके उत्तम पण्डित हैं। अनुभाष्य-'गोष्ठी'-संलाप (बातचीत) ॥ 242 ॥ (भाः 11/19/40) – 'विद्यात्मनि भिदोबाधा:'" महाप्रभु-रामानन्दका वार्त्तालाप; जीवमें अविद्याके द्वारा किया गया जो भेद है महाप्रभुके प्रश्न, श्रीरायके उत्तर :- अर्थात् अनात्मत्व है, उसे दूर करना ही 'विद्या' प्रभु पुछे, रामानन्द करेन उत्तर। है ॥ 244 ॥ एइ मत सेइ रात्रे कथा परस्पर ॥ 243 ॥ (2) कृष्णदास्य ही सर्वश्रेष्ठ यश या प्रतिष्ठा :- अनुवाद-महाप्रभु प्रश्न करते और श्रीरामानन्द 'कीर्त्तिगण-मध्ये जीवेर कोन् बड़ कीर्त्ति?' राय उसका उत्तर देते। इस प्रकार उन्होंने वह सारी 'कृष्णभक्ति बलिया याँहार हय ख्याति ॥' 245 ॥ रात परस्पर प्रश्नोत्तरमें ही बिता दी ॥ 243 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूछा,-"समस्त कीर्त्तियोंमेंसे जीवकी (1) कृष्णभक्ति ही परा विद्या :- प्रधान कीर्त्ति क्या है?" श्रीरामानन्द रायने कहा,-"श्रीकृष्णका प्रभु कहे,-"कोन् विद्या विद्या-मध्ये सार?" भक्त कहलाना ही सबसे बड़ी कीर्त्ति है ॥" 245 ॥ राय कहे,-"कृष्णभक्ति-बिना विद्या नाहि आर ॥" 244 ॥ अनुभाष्य-'कृष्णभक्त' होनेकी ख्याति ही सबसे अनुवाद-महाप्रभुने पूछा,-"कौन-सी विद्या समस्त अधिक कीर्त्ति (यश) है। जड़विषयोंके प्रति लोभके । 319