श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
५. शिक्षाष्टक, उपसंहार एवं ग्रन्थ-माहात्म्य
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384 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/35-44 ] कृष्ण तोमार इँहा आइला, पाइला दरशन? कृष्णेर उद्देश कहि' राखह जीवन ॥" ३६ ॥ अनुवाद—[श्रीकृष्णविरही गोपियोंका विलाप—] "हे आम्र-वृक्ष! हे कटहल-वृक्ष! हे प्रियाल (चिरौँजी)-वृक्ष! हे जामुन-वृक्ष! हे कचनार-वृक्ष! आप सब (व्रज) तीर्थवासी हो, इसलिये दूसरोंका उपकार करो। श्रीकृष्ण आपके यहाँ आये थे, क्या आपने उनके दर्शन किये हैं? श्रीकृष्ण किधर गये हैं, हमें यह बतलाकर हमारे जीवनकी रक्षा कीजिये॥" ३५-३६ ॥ उत्तर ना पाञा पुन: करे अनुमान। 'एइ सब—पुरुष-जाति, कृष्णेर सखार समान॥ ३७॥ ए केने कहिबे कृष्णेर उद्देश आमाय? ए—स्त्रीजाति लता, आमार सखीप्राय॥ ३८॥ अवश्य कहिबे,—पाञाछे कृष्णेर दर्शने।' एत अनुमानि' पुछे तुलस्यादि-गणे॥ ३९॥ “तुलसि, मालति, यूथि, माधवि, मल्लिके। तोमार प्रिय कृष्ण आइला तोमार अन्तिके? ?४० ॥ तुमि-सब हओ आमार सखीर समान। कृष्णोद्देश कहि' सबे राखह पराण॥" ४१ ॥ अनुवाद—वृक्षोंसे कोई भी उत्तर नहीं मिलनेपर उन्होंने पुन: अनुमान लगाया कि 'ये सब वृक्ष तो पुरुष जातिके होनेके कारण श्रीकृष्णके सखाके समान हैं। इसलिये श्रीकृष्ण किधर गये हैं, ये वृक्ष हमें क्यों बतलायेंगे? ये लताएँ तो स्त्री-जाति हैं, ये तो हमारी सखियों जैसी हैं, इसलिये ये तो हमें अवश्य ही बतलायेंगी कि इन्होंने श्रीकृष्णके दर्शन प्राप्त किये हैं।' ऐसा अनुमान करके उन्होंने तुलसी आदिसे पूछा,—"हे तुलसि! हे मालति! हे जूहि! हे माधवि! हे मल्लिके! क्या तुम्हारे प्रिय श्रीकृष्ण तुम्हारे निकट आये थे? तुम सब तो हमारी सखियोंके समान हो। हमें श्रीकृष्ण किधर गये हैं, यह बतलाकर हमारे प्राणोंकी रक्षा करो॥" ३७-४१ ॥ उत्तर ना पाञा पुनः भावेन अन्तरे। 'एह—कृष्णदासी, भये ना कहे आमारे ॥' ४२ ॥ अनुवाद—लताओंसे भी उत्तर नहीं मिलनेपर गोपियाँ पुनः मनमें विचार करने लगीं,—'ये सब तो कृष्णकी दासियाँ हैं, ये भयके कारण हमें कुछ भी नहीं बतला रही हैं॥' ४२ ॥ आगे मृगीगण देखि' कृष्णाङ्ग-गन्ध पाञा। तार मुख देखि' पुछेन निर्णय करिया ॥ ४३ ॥ अनुवाद—थोड़ा आगे चलनेपर हिरनीको देखकर और कृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध पाकर वे उस हिरनीके मुखको देखकर कुछ निर्णय करते हुए पूछने लगीं॥ ४३ ॥ हिरनीसे श्रीकृष्णके विषयमें जिज्ञासा :- श्रीमद्भागवत (10/30/11) में— अप्येण-पत्न्युपगतः प्रिययेह गात्रै- स्तन्वन् दृशां सखी सुनिर्वृतिमच्युतो वः। कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुम-रञ्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥ ४४ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ४४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कान्ताके अङ्ग-सङ्गके द्वारा कुचकुङ्कुमसे रञ्जित कुन्दमालाधारी श्रीकृष्णकी गन्ध इस ओरसे आ रही है। हे हिरनी, राधिकाके साथ श्रीकृष्ण तुम्हारे नेत्रोंके आनन्दको वर्धित करके क्या इस पथसे गये हैं? ४४ ॥ अनुभाष्य—गोपियोंके साथ रासलीला करते-करते भगवान् श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर एकान्त श्रीकृष्णमें आविष्ट चित्तवाली गोपियाँ विरहमें उन्हें ढूँढ़ रही हैं— हे सखि, एणपत्नि, (हरिणि,) अच्युतः (कृष्णः) प्रियया [सह वर्त्तमानः] गात्रैः (अङ्गसङ्गैः) वः (युष्माकं) दृशां
[ 15/44-53 पन्द्रहवाँ अध्याय 385 (नयनानां) सुनिर्वृतिं (सुखं) तन्वन् (वर्धयन्) इह अपि [किम्] उपगतः? [यतः] कुलपतेः (कृष्णस्य) कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरञ्जितायाः (कान्ताङ्गसङ्गोत्थ-वक्षःस्थ- कुङ्कुमरागेण विभूषितायाः) कुन्दस्रजः (कुन्दपुष्पमालायाः) गन्धः इह वाति (प्रवहति) । श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 44 ॥ श्लोकार्थ :- “कह, मृगि, राधा-सह श्रीकृष्ण सर्वथा। तोमाय सुख दिते आइला? ना कर अन्यथा ॥ 45 ॥ राधा-प्रियसखी आमरा, नहि बहिरङ्ग। दूर हैते जानि तार यैछे अङ्ग-गन्ध ॥ 46 ॥ राधा-अङ्ग-सङ्गे कुचकुङ्कुम-भूषित। कृष्ण-कुन्दमाला-गन्धे वायु-सुवासित ॥ 47 ॥ कृष्ण इँहा छाड़ि' गेला, इँह-विरहिणी। किबा उत्तर दिबे एइ-ना सुने काहिनी ॥” 48 ॥ अनुवाद—“हे हिरनी बतलाओ! सदा तुम्हें प्रसन्न करनेवाले श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ यहाँ आये थे ना? हमें सत्य बतलाना, कुछ मत छिपाना। हम श्रीराधाकी प्रिय सखियाँ हैं, हम कोई बाहरी नहीं हैं। हम दूरसे ही श्रीकृष्णकी अङ्ग-गन्धको पहचान लेती हैं। श्रीराधाके अङ्ग-सङ्गसे उनके कुचकुङ्कुमसे विभूषित श्रीकृष्णकी कुन्दमालाकी गन्धसे वायु सुगन्धित हो रही है। [हिरनीसे उत्तर प्राप्त नहीं होनेपर गोपियाँ कहने लगीं]—श्रीकृष्ण तो इस बेचारी हिरनीको छोड़ गये हैं, यह तो स्वयं ही विरहिणी है। यह क्या उत्तर देगी, इसके कानोंमें तो हमारी बात ही नहीं पहुँच रही है॥” 45-48 ॥ वृक्षोंसे श्रीकृष्णके विषयमें पूछना :- आगे वृक्षगण देखे पुष्पफलभरे। शाखा सब पड़ियाछे पृथिवी-उपरे ॥ 49 ॥ कृष्णे देखि' एइ सब करेन नमस्कार। कृष्णगमन पुछे तारे करिया निर्द्धार ॥ 50 ॥ अनुवाद—आगे उन्हें पुष्पों और फलोंसे सुशोभित ऐसे वृक्ष दिखलायी पड़े, जिनकी सभी शाखाएँ पृथ्वीकी ओर झुकी हुई थीं। इसे देखकर गोपियोंने निश्चित किया कि अवश्य ही इन्होंने श्रीकृष्णको देखकर झुककर नमस्कार किया होगा, इसलिये वे वृक्षोंसे पूछने लगीं कि श्रीकृष्ण किधर गये हैं॥ 49-50 ॥ शास्त्रीय-दृष्टान्त :- श्रीमद्भागवत (10/30/12) में— बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीतपद्मो रामानुजस्तुलसिकालिकुलैर्मदान्धैः। अन्वीयमान इह वस्तरवः प्रणामं किंवाबिनन्दति चरन् प्रणयावलोकैः ॥ 51 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 51 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे वृक्षों, बतलाओ, राधिकाके कन्धेपर [बायीं] भुजाको रखकर, [दाहिने] हाथमें कमल धारण करके, तुलसीके रसपानसे मदमें अन्धे हुए भौंरोंके द्वारा अनुसरण किये जा रहे बलरामके अनुज श्रीकृष्णने चलते-चलते प्रणय-अवलोकनके द्वारा तुम्हारे प्रणामको स्वीकार करके क्या अभिनन्दन किया है? 51 ॥ अनुभाष्य— हे तरवः, (वृक्षाः,) प्रियांसे (प्रियायाः स्कन्धे) बाहुं (वाम-भुजम्) उपधाय (संन्यस्य) गृहीतपद्मः (दक्षिणभुजधृत- लीलाकमलः) मदान्धैः (रसपानमदेन अन्धैः) तुलसिकालिकुलैः (तुलसिकायाः अलिकुलैः) अन्वीयमानः (अनुगम्यमानः) रामानुजः (कृष्णः) इह चरन् प्रणयावलोकैः वः (युष्माकं) प्रणामं किम् अभिनन्दति वा? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 51 ॥ श्लोकार्थ :- “प्रिया-मुखे भृङ्ग पड़े, ताहा निवारिते। लीलापद्म चालाइते हैल अन्यचित्ते ॥ 52 ॥ तोमार प्रणामे कि करियाछेन अवधान? किवा नाहि करेन, कह वचनप्रमाण ॥ 53 ॥
386 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/52-62] कृष्णेर वियोगे एइ सेवक दुःखित। किवा उत्तर दिबे? इहार नाहिक सम्वित्॥" 54॥ अनुवाद—"श्रीकृष्णका चित्त अपनी प्रिया श्रीराधाके मुखारविन्दपर बैठनेके लिये प्रयासरत भँवरोंको लीलाकमलको घुमाकर भगाते हुए अन्यत्र चला गया होगा। तुम्हारे प्रणामकी ओर क्या उनका ध्यान गया अथवा नहीं? हमें सत्य-सत्य यह बतला दो। [उत्तर नहीं मिलनेपर गोपियोंने विचार किया] श्रीकृष्णके वियोगमें ये सेवक भी ऐसे दुःखी हैं कि इन्हें कोई ज्ञान नहीं है, ये क्या उत्तर देंगे॥" 52-54॥ अनुभाष्य—'सम्वित्'—ज्ञान, चैतन्य॥ 54॥ श्रीकृष्ण-रूप-दर्शनकी प्राप्ति :— एत बलि' आगे चले यमुनार कूले। देखे,—ताँहा कृष्ण हय कदम्बेर तले॥ 55॥ अनुवाद—यह कहकर गोपियाँ आगे चलते हुए यमुनाके तटपर पहुँच गयीं, वहाँ उन्होंने श्रीकृष्णको कदम्बके वृक्षके नीचे खड़े हुए देखा॥ 55॥ कोटिमन्मथमोहन मुरलीवदन। अपार सौन्दर्ये हरे जगन्नेत्र-मन॥ 56॥ अनुवाद—अधरोंपर मुरली धारण किये कदम्बके नीचे खड़े श्रीकृष्ण करोड़ों-करोड़ों कामदेवोंको मोहित करनेवाले हैं, उनका अपार सौन्दर्य जगत्-वासियोंके नेत्रों और मनका हरण करनेवाला है॥ 56॥ श्रीकृष्णके दर्शनसे महाप्रभुकी मूर्च्छा और भक्तोंके द्वारा उन्हें सचेत करना :— सौन्दर्य देखिया भूमे पड़े मूर्च्छा पाञा। हेनकाले स्वरूपादि मिलिला आसिया॥ 57॥ अनुवाद—[उन गोपियोंके भावोंमें आविष्ट] महाप्रभु भी [स्वयंको उन गोपियोंके साथ जानकर] श्रीकृष्णके सौन्दर्यको देखकर भूमिपर अचेतन होकर गिर पड़े। उस समय श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्त भी उस पुष्प-उद्यानमें उपस्थित हुए॥ 57॥ पूर्ववत् सर्वाङ्गे सात्त्विकभावसकल। अन्तरे आनन्द-आस्वाद, बाहिरे विह्वल॥ 58॥ अनुवाद—महाप्रभुके समस्त अङ्गोंमें पहलेकी भाँति समस्त सात्त्विक भाव प्रकाशित हो रहे थे। वे हृदयमें तो आनन्दका आस्वादन कर रहे थे, किन्तु बाहरमें विह्वल हो रहे थे॥ 58॥ पूर्ववत् सबे मिलि' कराइला चेतन। उठिया चौदिके प्रभु करेन दर्शन॥ 59॥ श्रीकृष्णके दर्शनसे वञ्चित महाप्रभुका विलाप :— “काँहा गेला कृष्ण? एखनि पाइनु दरशन! याँहार सौन्दर्य मोर हरिल नेत्र-मन! !60॥ पुनः केने ना देखिये मुरली-वदन! ताँहार दर्शन-लोभे भ्रमय नयन॥" 61॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति सभी भक्तोंने मिलकर महाप्रभुको चेतन कराया। महाप्रभु उठकर चारों ओर देखते हुए कहने लगे,—“कृष्ण कहाँ चले गये? मुझे अभी-अभी तो उनके दर्शन प्राप्त हुए थे! उनके सौन्दर्यने मेरे नेत्रों और मनका हरण कर लिया है! मैं पुनः उन मुरली-वदनको क्यों नहीं देख पा रहा हूँ! उनके दर्शनके लोभसे मेरे नेत्र भ्रमण कर रहे हैं॥" 59-61॥ विशाखाके प्रति श्रीकृष्णके दर्शनके लिये तृष्णार्त्त श्रीराधाके वचन :— विशाखारे राधा यैछे श्लोक कहिला। सेइ श्लोक महाप्रभु पड़िते लागिला॥ 62॥ अनुवाद—श्रीराधाने विशाखा सखीको जो श्लोक सुनाया था, महाप्रभु उसी श्लोकको पढ़ने लगे—॥ 62॥
[ 15/63-68 पन्द्रहवाँ अध्याय 387 चित्रजल्पोक्ति :- गोविन्दलीलामृत (8/4)में श्रीराधिकाके वचन - <verse> नवाम्बुद-लसद्द्युतिर्नवतड़िन्मनोज्ञाम्बरः सुचित्रमुरलीस्फुरच्छरदमन्दचन्द्राननः। मयूरदलभूषितः सुभगतारहारप्रभः स मे मदनमोहनः सखि तनोति नेत्रस्पृहाम् ॥ 63 ॥ </verse> अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 63॥ अमृतप्रवाह भाष्य- हे सखि, नवीन मेघोंको सुशोभित करनेवाली नव-विद्युतकी भाँति मनोहर पीताम्बर धारण करनेवाले, सुन्दर-मुरलीको अधरोंपर धारण किये हुए, मयूरके पंखसे विभूषित पूर्ण शरत् चन्द्रके जैसे सुशोभित मुखमण्डलवाले, सुन्दर दीप्तिमान (मुक्ता) हारकी प्रभासे युक्त, वे मदनमोहन मेरे नेत्रोंकी स्पृहाका विस्तार कर रहे हैं॥ 63॥ अनुभाष्य- हे सखि, नवाम्बुद-लसद्द्युतिः (नवाम्बुदात् नवमेघादपि लसन्ती शोभमाना द्युतिः कान्तिः यस्य सः) नवतड़िन्मनोज्ञाम्बरः (नवतड़ितः नवीनसौदामिन्याः अपि मनोज्ञे रुचिरे अम्बरे वसने यस्य सः) सुचित्रमुरलीस्फुरच्छरदमन्दचन्द्राननः (सुष्ठु चित्रया मनोज्ञया मुरल्या स्फुरत् शोभमानं शरदि अमन्दः अक्षीणचन्द्रः इव आननं यस्य सः) मयूरदलभूषितः (शिखिपिच्छशोभितः), सुभगतारहारप्रभः (सुभगाः सुदीप्ता ताराः इव हारस्य प्रभा यस्य सः) सः मदनमोहनः (मदयति सम्भोगरसपुष्ट्यर्थं विप्रलम्भांशे ग्लापयित्वा सम्भोगपुष्टिं करोति च इति मदनः ताभ्यां स्ववशीकरोति इति मोहनः स चासौ स च इति) मे (मम) नेत्रस्पृहां (नयनदिदृक्षां) तनोति (वर्धयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [मदमत्त करके विप्रलम्भके द्वारा जो सम्भोगकी पुष्टि करता है, उस मदनको वशीभूत करनेवाले मोहन अर्थात् मदनमोहन] ॥ 63 ॥ श्लोकका अर्थ; श्रीकृष्णरूपका वर्णन (चित्रजल्प) :- <verse> "नवघनस्निग्धवर्ण, दलिताञ्जन-चिक्कण, इन्दीवर-निन्दि सुकोमल। जिनि' उपमार गण, हरे सबार नयन, कृष्णकान्ति परम प्रबल ॥ 64 ॥ </verse> अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 64॥ अमृतप्रवाह भाष्य-[श्लोकके भावोंको प्रकाशित करते हुए महाप्रभु आगे कह रहे हैं]-श्रीकृष्णकान्ति पिसे हुए काजलकी चिकनाहटको पराजित करते हुए नवीन-मेघकी भाँति स्निग्ध वर्णवाली है, वह इन्दीवर (नीलकमल)की अपेक्षा सुकोमल [सभीके नेत्रोंको आकर्षित करनेवाली] एवं समस्त उपमाओंसे अतीत है॥ 64॥ <verse> कह, सखि, कि करि उपाय ? कृष्णाद्भुत बलाहक, मोर नेत्र-चातक, ना देखि' पियासे मरि' याय ॥ 65 ॥ ध्रु॥ </verse> श्रीकृष्णके रूपकी उपमा :- <verse> सौदामिनी पीताम्बर, स्थिर নহে निरन्तर, मुक्ताहार बकपाँति भाल। इन्द्रधनु-शिखिपाखा, उपरे दियाछे देखा, आर धनु वैजयन्ती-माल ॥ 66 ॥ </verse> <verse> मुरलीर कलध्वनि, मधुर गर्जन शुनि', वृन्दावने नाचे मयूरचय। अकलङ्क पूर्णकल, लावण्य-ज्योत्स्ना झलमल, चित्रचन्द्र ताहाते उदय॥ 67॥ </verse> श्रीकृष्णदर्शन-सुखसे वञ्चित श्रीराधाके द्वारा अपने दुर्भाग्यका वर्णन :- <verse> लीलामृत-वरिषणे, सिञ्चे चौद्द भुवने, हेन मेघ यबे देखा दिल। दुर्दैव-झञ्झापवने, मेघे निल अन्यस्थाने, मरे चातक, पिते ना पाइल ॥" 68 ॥ </verse> अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65-68॥ अमृतप्रवाह भाष्य- हे सखि, श्रीकृष्ण-अद्भुत मेघस्वरूप हैं, मेरे नेत्र-चातक उस मेघको नहीं देखकर प्याससे मर रहे हैं। कृष्णका जो पीताम्बर है, वह उस मेघमें विद्युत-स्वरूप है; किन्तु वह-अस्थिर है। उनके गलेमें जो मुक्ताका हार है, वह मेघके (श्वेत)
388 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला [ 15/65-75 ]
निम्नभागमें बगुलोंकी श्रेणीकी भाँति शोभा पा रहा है। उनका जो मयूरपंख है, वह-मेघमें स्थित इन्द्रधनुषकी भाँति है; उनकी (पाँच वर्षोंसे युक्त) वैजयन्तीमाला इन्द्रधनुषके समान है। कृष्णके मुखसे निकली जो मुरलीकी मधुरध्वनि है, वह-कृष्णरूपी मेघकी मधुर गर्जन-स्वरूप है; उसे सुनकर वृन्दावनके मयूर नृत्य कर रहे हैं। कृष्णके लावण्यकी ज्योत्स्ना अकलङ्क पूर्ण (सोलह) कलायुक्त अपूर्व चन्द्रकी भाँति उदित हुई है। कृष्णमेघका लीलामृत-वर्षण चौदह भुवनोंको सिञ्चित कर रहा है। उस कृष्णरूप मेघने जब दर्शन दिये, तब मेरे दुर्भाग्यरूपी बवण्डरने उस मेघको स्थानान्तरित करके दूर कर दिया। अब मेघको नहीं देखकर मेरा नेत्र-चातक-जलके अभावमें मृतकी भाँति है। 'बलाहक',-मेघ। 'अकलङ्क पूर्णकल',-कलङ्कहीन एवं परिपूर्ण सोलह कलाओंके साथ उदित विचित्र चन्द्र। 'झाञ्झापवने',-बवण्डर ॥ 65-68 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 21/109 संख्या देखें ॥ 65-68 ॥
श्रीरामानन्दके द्वारा महाप्रभुके भावके उपयोगी श्लोकका पाठ; स्वयं महाप्रभुके द्वारा उसकी व्याख्या :- पुनः कहे, - "हाय हाय, पड़ पड़ रामराय", बले प्रभु गद्गद आख्याने। रामानन्द पड़े श्लोक, शुनि' प्रभुर हर्ष-शोक, आपने प्रभु करेन व्याख्याने ॥ 69 ॥
अनुवाद-महाप्रभु पुनः गद्गद वाणीसे कहने लगे,-"हाय, हाय! हे रामानन्द राय! बोलो-बोलो।" श्रीरामानन्द रायने [निम्नलिखित] एक श्लोकका उच्चारण किया, जिसे सुनकर महाप्रभुको हर्ष और शोक हुआ। उसे सुनकर महाप्रभु स्वयं उसकी व्याख्या करने लगे ॥ 69 ॥ अनुभाष्य- 'हर्ष-शोक',-कृष्णके माधुर्यके श्रवणसे 'हर्ष', उनके विरहमें 'शोक' ॥ 69 ॥
चित्रजल्पोक्ति :- श्रीमद्भागवत (10/29/39) में- वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्रिय- गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्। दत्ताभयञ्च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणंञ्च भवाम दास्यः ॥ 70 ॥
अनुवाद-हे कृष्ण! आपका अलकाओंसे आवृत मुख, कपोलोंपर कुण्डलोंकी शोभा, अमृतयुक्त अधरपर मन्द हास्यके साथमें देखना, अभय प्रदान करनेवाली दो भुजाएँ और एकमात्र श्रीके द्वारा शोभित वक्षको देखकर ही हम आपकी दासी बनी हैं ॥ 70 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/48 संख्या देखें ॥ 70 ॥
श्लोकका अर्थ; गोपियोंके प्रति श्रीकृष्णके रूप-माधुर्यके बलके प्रयोगका वर्णन (चित्रजल्प) :- “कृष्ण जिनि' पद्म-चान्द, पातियाछे मुख-फान्द, ताते अधर मधुस्मित चार। व्रजनारी आसिं' आसिं', फान्दे पड़ि' हय दासी, छाड़ि' लाज-पति-घर-द्वार ॥ 71 ॥ बान्धव कृष्ण करे व्याधेर आचार। नाहि माने धर्माधर्म, हरे नारी-मृगी-मर्म, करे नाना उपाय ताहार ॥ 72 ॥ ध्रु ॥ गण्डस्थल झलमल, नाचे मकर-कुण्डल, सेइ नृत्य हरे नारीचय। सस्मित कटाक्ष-बाणे, ता-सबार हृदये हाने, नारी-वधे नाहि किछु भय ॥ 73 ॥ अति उच्च सुविस्तार, लक्ष्मी-श्रीवत्स-अलङ्कार, कृष्णेर ये डाकातिया वक्ष। व्रजदेवी लक्ष लक्ष, ता-सबार मनोवक्ष, हरिदासी करिबारे दक्ष ॥ 74 ॥ सुललित दीर्घार्गल, कृष्णेर भुजयुगल,
[ 15/71-78 पन्द्रहवाँ अध्याय 389 [बायाँ स्तम्भ] भुज नहे, —कृष्णसर्पकाय। दुइ शैल-छिद्रे पैशे, नारीर हृदये दंशे, मरे नारी से विषज्वालाय ॥ 75 ॥ कृष्ण-कर-पदतल, कोटिचन्द्र-सुशीतल, जिनि' कर्पूर-वेणामूल-चन्दन। एकबार यार स्पर्शे, स्मरज्वाला-विष नाशे, यार स्पर्शे लुब्ध नारी-मन ॥" 76 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 71-76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[राधाभावमें आविष्ट महाप्रभुने कहा—] चन्द्र और कमलको पराजित करके (गोपीरूपी) हिरनीको पकड़नेके लिये कृष्णने मुखरूपी फन्दको बिछाया है। उस फन्देमें मधुर हँसीरूपी चारा अर्थात् (गोपीरूपी) हिरनीको प्रलोभन देनेके लिये झूठ-मूठका खाद्य पदार्थ रखा गया है। घर, द्वार और लज्जाका परित्याग करके व्रजनारीरूपी हिरनियाँ उस फन्देमें फँसकर दासियाँ बन रही हैं। ओहो, हमारे बान्धव श्रीकृष्ण इस प्रकार शिकारी जैसा आचरण ही करते हैं। वह शिकारी धर्म-अधर्मको नहीं मानता,—वह व्रजरमणीरूपी हिरनियोंके मर्म (हृदय)का हरण करनेके लिये अनेक प्रकारके उपायोंकी सृष्टि करता है; उसके कपोलोंपर मकर-कुण्डल झलमल करते हुए नृत्य करके नारियोंके मनका हरण करते हैं; उनके हृदयमें सहास्य कटाक्ष-बाणको बेंधकर वह शिकारी नारी-वधका कोई भय नहीं करता। कृष्णका (डाकूकी भाँति लूटनेकी इच्छासे युक्त उनका) चौड़ा वक्षःस्थल, जिसपर लक्ष्मी और श्रीवत्स (दक्षिणावर्त्त रोमावली)—ये दो चिह्न अलङ्कार-स्वरूप हैं, वह लाखों-लाखों व्रजदेवियों एवं उनके मन और वक्षको बलपूर्वक आकर्षित करके उन हरिकी ही दासी बना डालता है। कृष्णकी अति सुन्दर सुदीर्घ-अर्गल (सिटकनी)-स्वरूप काले सर्पके आकारवाली दो भुजाएँ नारियोंके दो पर्वतरूपी स्तनोंके मध्यस्थलमें प्रवेश करके उनके हृदयको डँसती हैं। (गोपियाँ उस [दायाँ स्तम्भ] स्पर्शरूपी डँसनेके विषसे काम-ज्वालामें जल उठती हैं); कृष्णके हाथ और चरणके तलवे कर्पूर, सुगन्धित खसखस और चन्दनको पराजित करके करोड़ों चन्द्रोंसे भी सुशीतल हैं। वे एकबार जिन्हें स्पर्श करते हैं, उनका काम-ज्वालारूपी विष नष्ट हो जाता है। 'डाकातिया वक्ष',—डकैतकी भाँति (कृष्णका) जो वक्ष है, वह समस्त व्रजनारियोंको बलपूर्वक खींच लेता है। 'शैल-छिद्रे',—हृदयस्थ दोनों स्तनोंके छिद्रमें (मध्यस्थलमें) ॥ 71-76 ॥ अनुभाष्य—'वेणामूल',—सुगन्धित खसखस ॥ 76 ॥ श्रीकृष्णविरही महाप्रभुके द्वारा श्लोकका पाठ :- एतेक विलाप करि' विषादे श्रीगौरहरि, एइ अर्थे पड़े एक श्लोक। एइ श्लोक पाञा राधा, विशाखारे कहे राधा, उघाड़िया हृदयेर शोक ॥ 77 ॥ अनुवाद—श्रीगौरहरिने इस प्रकार विलाप करते हुए विषादग्रस्त होकर इस (निम्नलिखित) श्लोकको पढ़ा, जिस श्लोकके द्वारा श्रीराधिकाने अपने हृदयके शोकको सम्पूर्ण रूपमें खोलकर श्रीविशाखा सखीको कहा था ॥ 77 ॥ श्रीराधाकी श्रीकृष्णदर्शन-तृष्णा :- गोविन्दलीलामृत (8/7)में— हरिणमणिकवाटिकाप्रततहारिवक्षःस्थलः स्मरार्त्ततरुणीमनःकलुषहारिदोर्गलः। सुधांशुरहरिचन्दनोत्पलसिताभ्रशीताङ्गकः स मे मदनमोहनः सखि तनोति वक्षःस्पृहाम् ॥ 78 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 78 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, जिनका वक्षःस्थल—इन्द्रनीलमणिसे निर्मित कपाटकी भाँति विस्तृत और मनोहर है, जिनकी दोनों भुजाएँ कामसे पीड़ित
390 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/78-84 ] तरुणियोंके मनके कलुषका (कामतापका) हरण करती हैं, जिनके अङ्ग चन्द्रमा, हरिचन्दन, नीलकमल और कर्पूरकी शीतलताको धारण करते हैं, वे मदनमोहन मेरे वक्षकी स्पृहाका विस्तार कर रहे हैं ॥ ७८ ॥ अनुभाष्य- हे सखि, हरिमणिकवाटिका-प्रततहारिवक्षःस्थलः (हरिमणिभिः इन्द्रनीलमणिभिः रचितायाः कवाटिकायाः प्रततिः विस्तृतैः तां हर्त्तुं शीलं यस्य तथाभूतं च वक्षःस्थलं यस्य सः) स्मरात्र्त्ततरुणीमनः-कलुषहारिदोर्गलः (स्मरात्र्त्तानां मदनपीडितानां तरुणीनां युवतीनां मनःकलुषं मनस्तापं हर्त्तुं भुजरूपार्गलः यस्य सः) सुधांशुहरिचन्दनोत्पलसिताभ्रशीताङ्गकः (सुधांशुः शशधरः च हरिचन्दनं च उत्पलं कुवलयं पद्मं कमलं च सिताभ्रः कर्पूरः च एभ्योऽपि शीतलं अङ्गं यस्य सः) मदनमोहनः मे (मम) वक्षःस्पृहां तनोति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ७८ ॥ श्रीकृष्णदर्शनसे वञ्चित महाप्रभुका विलाप :- प्रभु कहे, - "कृष्ण मुञि एखनि देखिनु । आपनार दुर्देवे पुनः हाराइनु ॥ ७९ ॥ चञ्चलस्वभाव कृष्णेर, ना रय एकस्थाने। देखा दिया मन हरि' करे अन्तर्धाने ॥" ८० ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मैंने अभी-अभी श्रीकृष्णको देखा, किन्तु अपने ही दुर्भाग्यके कारण मैंने उन्हें पुनः खो दिया है। श्रीकृष्णका स्वभाव बहुत चञ्चल है, वे किसी एक स्थानपर नहीं रहते। श्रीकृष्ण एकबार अपने दर्शन देकर मनका हरण कर लेते हैं और फिर अन्तर्धान हो जाते हैं ॥" ७९-८० ॥ गोपीप्रेमको वर्धित करनेके लिये श्रीकृष्णका राससे अन्तर्धान होना :- श्रीमद्भागवत (10/29/48) में- तासां तत्सौभगमदं वीक्ष्यमाणञ्च केशवः। प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत ॥ ८१ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ८१ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-[केशव- 'क' अर्थात् ब्रह्मा और 'ईश' अर्थात् महादेवको वशीभूत करनेवाले] श्रीकृष्ण उनके (गोपियोंके) सौभाग्य-अहङ्कारको देखकर उसे प्रशमित करनेके लिये और उनके प्रति कृपा करनेके लिये उस स्थानसे [रासस्थलीसे] अन्तर्धान हो गये ॥ ८१ ॥ अनुभाष्य-महाभागवत श्रीशुकदेव शुश्रूषु परीक्षितको श्रीकृष्णकी रासलीलाका वर्णन कर रहे हैं- केशवः (कञ्च ईशञ्च तौ वशयतीति तथा सः कृष्णः) तासां (गोपीनां) तत्सौभगमदं (तेषां सौभाग्यमूलगर्वं) मानं (गर्व) च वीक्ष्य, तस्य प्रशमाय प्रसादाय तत्र (रासस्थल्याम्) एव अन्तरधीयत (अन्तर्हितः बभूव)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ८१ ॥ श्रीस्वरूपको गान गानेकी आज्ञा :- स्वरूप-गोसाञिरे कहेन, - "गाओ एक गीत। याते आमार हृदयेर हुये त' 'सम्वित्' ॥" ८२ ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे कहा,- "तुम एक गीत गाओ, जिससे मेरे व्याकुल हृदयको स्थिरताकी प्राप्ति हो ॥" ८२ ॥ अनुभाष्य- 'सम्वित्'-व्याकुल-चित्तमें स्थिरज्ञानकी प्राप्ति ॥ ८२ ॥ स्वरूप-गोसाञि तबे मधुर करिया। गीतगोविन्देर पद गाय प्रभुरे शुनाञा ॥ ८३ ॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदर अत्यन्त मधुर स्वरसे श्रीगीत-गोविन्दके पदको गाकर उन्हें सुनाने लगे ॥ ८३ ॥ गोपियोंके द्वारा रासरसिक श्रीकृष्णका स्मरण :- गीतगोविन्द (2/5) में - रासे हरमिह विहितविलासम् । स्मरति मनो मम कृतपरिहासम् ॥ ८४ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ८४ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इस रासमें अनेक प्रकारसे
[ 15/84-94 पन्द्रहवाँ अध्याय 391 विलास करनेवाले एवं परिहास करनेवाले हरिको मेरा मन स्मरण कर रहा है॥ 84॥ अनुभाष्य— हे सखि, इह रासे (रासक्रीड़ायां) मम मनः विहित-विलासं (विहितः सम्पादितः विलासः येन तं) कृतपरिहासं (कृतः विहितः परिहासः येन तं) हरिं स्मरति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 84॥ गानको श्रवण करके महाप्रभुके द्वारा प्रेमावेशमें नृत्य :— स्वरूप-गोसाञि यबे एइ पद गाहिला। उठि' प्रेमावेशे तबे नाचिते लागिला ॥ 85 ॥ अनुवाद—जब श्रीस्वरूप दामोदरने इस पदका गान किया, तब महाप्रभु उठकर प्रेमावेशमें नृत्य करने लगे॥ 85॥ महाप्रभुके श्रीअङ्गोंमें अष्टसात्त्विक-विकार और समस्त भावोंका एक साथमें उदित होना :— 'अष्टसात्त्विक' भाव अङ्गे प्रकट हइल। हर्षादि 'व्यभिचारी' सब उथलिल ॥ 86 ॥ भावोदय, भावसन्धि, भाव-शाबल्य। भावे-भावे महायुद्धे सबार प्राबल्य ॥ 87 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके श्रीअङ्गोंमें अष्टसात्त्विक भाव प्रकटित हो गये। हर्ष आदि समस्त व्यभिचारी भाव भी उमड़ पड़े। महाप्रभुमें भावोंका उदय, भाव-सन्धि और भाव-शाबल्यका प्रकाश होने लगा। भावोंका परस्परमें महायुद्ध होने लगा, क्योंकि सभी भाव बहुत प्रबल थे॥ 86-87॥ अनुभाष्य—'भावोदय,'—अष्टसात्त्विक-भावोंका उदय; 'भावसन्धि,'—एक समान अथवा पृथक्-पृथक् दो भावोंका मिलन; 'भाव-शाबल्य,'—भाव-समूहोंका परस्पर मर्दन ॥ 87 ॥ उस पदका गान, आस्वादन और नर्तन :— सेइ पद पुनः पुनः कराय गायन। पुनः पुनः आस्वादये, करेन नर्त्तन ॥ 88 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे पुनः पुनः उस पदका ही गान करवाया और स्वयं पुनः पुनः उसका नये-नये रूपमें आस्वादन करते हुए नृत्य किया॥ 88॥ श्रीस्वरूपके कीर्तनका समापन :— एइमत नृत्य यदि हैल बहुक्षण। स्वरूप-गोसाञि पद कैला समापन ॥ 89 ॥ महाप्रभुकी अवस्थाको देखकर श्रीस्वरूपके द्वारा गान बन्द करना :— 'बल' 'बल' बलि प्रभु कहेन बार बार। ना गाय स्वरूप-गोसाञि प्रेम देखि ताँर ॥ 90 ॥ सभीके द्वारा हरिध्वनि :— 'बल' 'बल' प्रभु बलेन, भक्तगण शुनि' । चौदिकेते सबे मेलि' करे हरिध्वनि ॥ 91 ॥ अनुवाद—इस प्रकार जब महाप्रभुको नृत्य करते हुए बहुत समय हो गया, तब श्रीस्वरूप दामोदरने पदको गाना बन्द कर दिया। महाप्रभु तब भी श्रीस्वरूप दामोदरको बार बार 'बोलो, बोलो' कहकर पद गानेके लिये कहते रहे, किन्तु श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुके प्रेममें आविष्ट होकर नृत्यके श्रमको देखकर गान नहीं किया। महाप्रभुने पुनः 'बोलो! बोलो!' कहा और उसे सुनकर सभी भक्त महाप्रभुको चारों ओरसे घेरकर हरिध्वनि करने लगे॥ 89-91 ॥ श्रीरायके द्वारा महाप्रभुकी थकावटको दूर करना :— रामानन्द-राय तबे प्रभुरे बसाइला। व्यजनादि करि' प्रभुर श्रम घुचाइला ॥ 92 ॥ अनुवाद—तब श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको बैठाया और पंखा आदि झलकर उनके परिश्रमको दूर किया॥ 92॥ महाप्रभुका स्नान और भोजनके पश्चात् शयन :— प्रभुरे लञा गेला तबे समुद्रेर तीरे। स्नान कराञा पुनः ताँरे लञा आइला घरे ॥ 93 ॥
392 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/93–99 ] भोजन कराञा प्रभुरे कराइला शयन। रामानन्द-आदि सबे गेला निज-स्थान॥ 94॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय महाप्रभुको समुद्रतटपर ले गये और उन्हें समुद्रमें स्नान करवाकर पुनः घरपर ले आये। तब महाप्रभुको भोजन करवाकर शयन करा दिया, उसके पश्चात् श्रीरामानन्द राय आदि सभी भक्त अपने-अपने स्थानपर लौट गये॥ 93-94॥ गोपीदासीके अभिमानमें महाप्रभुके द्वारा वृन्दावनकी लीलाका उद्दीपनरूपी दिव्योन्माद (उद्घूर्णा और चित्रजल्प) :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर उद्यान-विहार। वृन्दावन-भ्रमे याँहा प्रवेश ताँहार ॥ 95 ॥ विलाप-सहित एइ उन्माद-वर्णन। श्रीरूप-गोसाञि इहा करियाछेन लिखन ॥ 96 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने महाप्रभुके उद्यान-विहारका वर्णन किया, जिसमें महाप्रभुने वृन्दावनके भ्रमसे प्रवेश किया था। उनके इस विलाप-सहित उन्मादका वर्णन श्रीरूप गोस्वामीने अपने ग्रन्थ स्तवमालामें लिखा है॥ 95-96॥ वृन्दावनकी उद्दीपनासे प्रेमावेशमें श्रीकृष्णनामका उच्चारण करनेवाले महाप्रभु :- स्तवमालामें प्रथम चैतन्याष्टकका (6) श्लोक— पयोराशेस्तीरे स्फुरदुपवनालीकलनया मुहुर्वृन्दारण्यस्मरणजनितप्रेमविवशः। क्वचित् कृष्णावृत्तिप्रचलरसनो भक्तिरसिकः स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम् ॥ 97 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 97 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—समुद्रके तटपर सुन्दर उपवन- श्रेणीको देखकर महाप्रभु बार बार वृन्दावनके स्मरणके कारण प्रेममें विवश हो जाते थे; प्रचल (चञ्चल) रसनासे भक्तिरसिक गौराङ्ग 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोल रहे हैं,—ऐसे चैतन्यदेव क्या मेरे दर्शन पथपर पुनः आविर्भूत होंगे? ॥ 97 ॥ पन्द्रहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— क्वचित् यः पयोराशेः (समुद्रस्य) तीरे (तटे बालुकाखण्डे) स्फुरदुपवनालि-कलनया (स्फुरन्तीनां सुशोभितानां उपवनालीनां उपवनपुञ्जानां कलनया अवलोकनेन) मुहुः (अनुक्षणं) वृन्दारण्य-स्मरणजनित-प्रेमविवशः (वृन्दावन-चिन्तोदयात् प्रेम्णा कृष्णप्रेमलालसया विवशः) अभूत्, कृष्णावृत्तिप्रचलरसनः (कृष्णेति नाम्नः सदाकीर्तनेन प्रचला चञ्चला रसना यस्य सः) भक्तिरसिकः सः चैतन्यः मे (मम) दृशोः (नयनयोः) पदं (मार्गं) पुनरपि किं यास्यति (प्राप्स्यति)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 97 ॥ पन्द्रहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। अनन्त चैतन्यलीला ना याय लिखन। दिङ्मात्र देखाञा ताहा करिये सूचन ॥ 98 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ अनन्त हैं, इसलिये उन सबको लिखा नहीं जा सकता। मैं तो केवल उन लीलाओंका दिग्दर्शन करवाकर उनकी भूमिका मात्र ही प्रस्तुत कर रहा हूँ॥ 98 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 99 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे उद्यानविहारो नाम पञ्चदशः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 99 ॥ न्त्यखण्डमें उद्यानविहार नामक का अनुवाद समाप्त।
सोलहवाँ अध्याय
[बायाँ स्तम्भ]
**कथासार—**गौड़ीय-भक्तगण पुनः श्रीक्षेत्रमें आये। उनके साथ श्रीरघुनाथदासके सम्बन्धसे चाचा कहलानेवाले श्रीकालिदास आये थे। श्रीकालिदासने गौड़देशके समस्त वैष्णवोंका अधरामृत प्राप्त किया था; उन्होंने झडुठाकुर तकके अधरामृतको प्राप्त किया था। उसी सुकृतिके बलसे उन्होंने नीलाचलमें महाप्रभुके चरणामृत और प्रसादको प्राप्त किया। सात वर्षकी आयुमें कविकर्णपूरने महाप्रभुके निकट आकर हरिनाम महामन्त्र प्राप्त किया और उन्होंने उसी समय अपने कवित्वका परिचय भी दिया था। वल्लभभोगको प्राप्त करके महाप्रभुने फेलामृतके (श्रीकृष्ण-उच्छिष्टरूपी अमृतके) माहात्म्यका वर्णन किया और समस्त वैष्णवोंको फेलामृतका सेवन करवाकर स्वयं श्रीकृष्णके अधरामृतके पान करनेमें निमग्न हो गये। —(अमृतप्रवाह भाष्य)
स्वयं आचरण करके भक्तिकी शिक्षा प्रदान करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :— वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यं कृष्णभावामृतं हि यः। आस्वाद्यास्वादयन् भक्तान् प्रेमदीक्षामशिक्षयत्॥ 1 ॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**जिन्होंने कृष्णभावामृत स्वयं आस्वादन करके और भक्तोंको भी उसका आस्वादन करवाकर, प्रेम-दीक्षा-विषयक दिव्यज्ञानकी शिक्षा दी थी, मैं उन श्रीकृष्णचैतन्यकी वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य— यः (महाप्रभुः) कृष्णभावामृतं (उन्नतोज्ज्वलरसं) स्वयम् आस्वाद्य भक्तान् (निजाश्रितान्) आस्वादयन् प्रेमदीक्षां (शुद्धप्रीतिमूलां भजनप्रणालीं) च अशिक्षयत् (उपादिशत्), तं श्रीकृष्णचैतन्यम्
[दायाँ स्तम्भ]
[अहं] वन्दे। **श्लोक-भावानुवाद—**जिन महाप्रभुने उन्नतोज्ज्वलरसका स्वयं आस्वादन करके अपने आश्रितजनोंको उसका आस्वादन करवाकर शुद्धप्रीतिमूलक भजनप्रणालीका उपदेश दिया, उन श्रीकृष्णचैतन्यकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ 2 ॥
**अनुवाद—**श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और समस्त गौरभक्तोंकी जय हो॥ 2 ॥
नीलाचलमें भक्तोंके साथ महाप्रभुकी लीला :— एइमत महाप्रभु रहेन नीलाचले। भक्तगण-सङ्गे सदा प्रेम-विह्वले॥ 3 ॥
**अनुवाद—**इस प्रकार महाप्रभु सदा प्रेममें विह्वल होकर अपने भक्तोंके साथ नीलाचलमें वास करते थे॥ 3 ॥
अगले वर्ष रथयात्राके उपलक्ष्यमें गौड़ीय-भक्तोंका पुरीमें आगमन :— वर्षान्तरे आइला सब गौड़ेर भक्तगण। पूर्ववत् आसि' कैल प्रभुर मिलन॥ 4 ॥
**अनुवाद—**एक वर्षके पश्चात् समस्त गौड़ीय भक्त पूर्व वर्षोंकी भाँति श्रीजगन्नाथपुरीमें आकर महाप्रभुसे मिले॥ 4 ॥
गौड़ीय भक्तोंके साथ श्रीकालिदासका आगमन :— ताँ-सबार सङ्गे आइल कालिदास नाम। कृष्णनाम बिना तैँहो नाहि जाने आन॥ 5 ॥
Here is the Devanagari text transcribed from the image, preserving the original two-column layout and structure:
394 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/5-13 ]
[Left Column] श्रीकालिदासके गुण :- महाभागवत तैं हो, सरल उदार। कृष्णनाम 'सङ्केते' चालाय व्यवहार ॥6॥ अनुवाद-उन गौड़ीय भक्तोंके साथ श्रीकालिदास नामक एक भक्त भी आये। वे श्रीकृष्णनामके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं जानते थे। वे महाभागवत, सरल और उदार थे, वे श्रीकृष्णनामके संङ्केतके द्वारा ही अपने सब कार्य करते थे ॥5-6॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृष्णनाम 'सङ्केते' चालाय व्यवहार,'- श्रीकृष्णनामके सङ्केतके साथ (अपने) व्यवहारिक कार्य आदिका निर्वाह करते ॥6॥ कौतुकेते तैं हो यदि पाशक खेलाय। 'हरे कृष्ण' 'हरे कृष्ण' करि' पाशक चालाय ॥7॥ अनुवाद-श्रीकालिदास कौतुकसे भी यदि पासा खेलते, तो वे पासे भी 'हरे कृष्ण' 'हरे कृष्ण' कहकर ही चलाते थे॥7॥ अनुभाष्य-श्रीकालिदास विष्णु-वैष्णवमें पूर्ण समर्पित आत्मा, श्रीकृष्णका अनन्य भजन करनेवाले और अप्राकृत श्रद्धायुक्त थे। उनकी श्रीकृष्णनाममें निष्ठाका अनुसरण नहीं करके, कोई अनर्थयुक्त जीव यदि केवल अपनी इन्द्रिय-तृप्तिके लिये उनके बाहरी व्यवहारको (पासा खेलनेको) देखकर उनकी वञ्चना-लीलाका अनुकरण करके कभी पासा (जुआ) खेल आदि वृथा व्यसनमें आसक्त होता है, तो फिर (भाः 1/18/38-41 श्लोकके अनुसार) उसकी कलिके दासत्व-हेतु पाप अथवा अधर्म-प्रवृत्ति ही वर्धित होगी। बाहरसे श्रीकालिदासके जैसे नामोच्चारणका अनुकरण और चेष्टाएँ रहनेपर भी उसकी उस नामोच्चारणके अनुकरणकी चेष्टा ही नामके बलपर पापमें प्रवृत्ति हेतु वह नामापराध ही होगा। जगत्के शिक्षित, संयत और सत्-चरित्र व्यक्तियोंके द्वारा धर्मके नामपर उसकी इस प्रकारकी दुर्नीतिपर आधारित कपटताकी निन्दा होगी॥7॥
[Right Column] वैष्णवोंके उच्छिष्टका भोजन करनेवाले श्रीकालिदासका पूर्व-परिचय :- रघुनाथदासेर तैं हो हय ज्ञाति-खुड़ा। वैष्णवेर उच्छिष्ट खाइते तैं हो हैल बुड़ा ॥8॥ महासौभाग्यवान् श्रीकालिदासकी वैष्णवोंके प्रति अद्वितीय सेवाप्रवृत्तिके कारण महामहाप्रसादमें विश्वास :- गौड़देशे हय यत वैष्णवेर गण। सबार उच्छिष्ट तैं हो करिल भोजन ॥9॥ ब्राह्मण-वैष्णव यत-छोट, बड़ हय। उत्तम वस्तु भेट लञा ताँर ठाञि याय ॥10॥ ताँर ठाञि शेष-पात्र लयेन मागिया। काँहा ना पाय, तबे रहे लुकाञा ॥11॥ भोजन करिले पात्र फेलाञा याय। लुकाञा सेइ पात्र आनि' चाटि' खाय ॥12॥ अनुवाद-श्रीकालिदास सम्बन्धसे श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चाचा थे, वे सारा जीवन वैष्णवोंका उच्छिष्ट खाते-खाते हुए ही वृद्ध हुए। गौड़देशमें जितने वैष्णव-गण हैं, श्रीकालिदासने उन सबके उच्छिष्टको खाया था। वे छोटे-बड़े समस्त ब्राह्मण-वैष्णवोंको भेंट देनेके लिये उत्तम वस्तुएँ लेकर उनके पास जाते और उन वैष्णवोंसे उच्छिष्ट माँगकर ले लेते। यदि उन्हें कहींपर माँगनेपर भी उच्छिष्ट नहीं मिलता, तो वे उस वैष्णवके घरके आस-पास छिपकर रह जाते। जब वैष्णव लोग भोजन करनेके बाद अपने जूठे पत्तलोंको फेंककर जाते, तब श्रीकालिदास उन वैष्णवोंकी अनुपस्थितिमें छिपकर उन पत्तलोंको उठाकर उनपर लगे भोजनको चाट-चाटकर खा जाते॥8-12॥ अनुभाष्य- 'ब्राह्मण-वैष्णव,'-शौक्र-ब्राह्मण कुलमें जन्में वैष्णव ॥10॥ श्रीकालिदासकी वैष्णवोंमें जातिबुद्धि नहीं :- शूद्र-वैष्णवेर घरे याय भेट लञा। एइमत ताँर उच्छिष्ट खाय लुकाञा ॥13॥
[ 16/13–19 सोलहवाँ अध्याय 395 अनुवाद—श्रीकालिदास शूद्र जातिमें उत्पन्न वैष्णवोंके घर भी कुछ भेंट लेकर जाते और उसी प्रकारसे छिपकर उनका भी उच्छिष्ट खाते॥ 13 ॥ अनुभाष्य—'शूद्र-वैष्णव',—शौक्र-शूद्र कुलमें जन्में वैष्णव ॥ 13 ॥ श्रीकालिदास और झडु-ठाकुरका वृत्तान्त :— भुँइमालि-जाति, 'वैष्णव'—'झडु' ताँर नाम। आम्रफल लञा तेंहो गेला ताँर स्थान ॥ 14 ॥ अनुवाद—भुँइमालि-जातिके झडु नामक एक वैष्णव थे। श्रीकालिदास उनके घरपर आमके फल लेकर गये ॥ 14 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भुँइमाली',—'हाँडी' तुल्य एक विशेष जाति ॥ 14 ॥ अनुभाष्य—श्रीकालिदास और झडु ठाकुर, —इन दोनोंका घर 'भेदो' अथवा 'भादुया' ग्राममें था। श्रील दास गोस्वामीकी प्रकट-भूमि 'कृष्णपुर' ग्रामसे प्रायः तीन मील दक्षिणमें और इ-आइ-आर लाइनपर बैण्डल-जंक्शनसे प्रायः एक मील पश्चिममें अवस्थित है और डाकघर—देवानन्दपुर है। झडु ठाकुरके द्वारा सेवित श्रीमदनगोपाल-विग्रह इसी स्थानपर श्रीरामप्रसाद दास नामक एक रामायेत ('रामानन्दी' सम्प्रदायके व्यक्ति) के द्वारा पूजित हो रहे हैं। सुना जाता है, श्रीकालिदासके सेवित विग्रह सरस्वती नदीके तटवर्ती शङ्खनगरमें अब तक भी जिस किसी प्रकारसे सेवित होते हुए आ रहे हैं। आजसे लगभग बीस वर्ष पूर्व त्रिवेणीके अधिवासी मतिलाल चट्टोपाध्याय नामक एक व्यक्तिने उन्हें अपने घरमें ले जाकर सेवा प्रारम्भ की है ॥ 14 ॥ आम्र भेट दिया ताँर चरण वन्दिला। ताँर पत्नीरे तबे नमस्कार कैला ॥ 15 ॥ पत्नी-सहित तेंहो आछेन बसिया। बहु सम्मान कैला कालिदासरे देखिया ॥ 16 ॥ अनुवाद—श्रीकालिदासने श्रीझडु ठाकुरको आम भेंट देकर उनके चरणोंकी वन्दना की, तत्पश्चात् श्रीकालिदासने श्रीझडु ठाकुरकी पत्नीको भी नमस्कार किया। उस समय श्रीझडु ठाकुर अपनी पत्नीके साथ बैठे हुए थे, उन्होंने श्रीकालिदासको देखकर उनका बहुत सम्मान किया ॥ 15-16 ॥ इष्टगोष्ठी कतक्षण करि' ताँर सने। झडुठाकुर कहे ताँरे मधुर वचने ॥ 17 ॥ झडु-ठाकुरके द्वारा दीनतावशतः वञ्चनाकी चेष्टा; अमानी होना और मान प्रदान करना :— “आमि नीचजाति, तुमि—अतिथि सर्वोत्तम। कोन् प्रकारे करिमु तोमार सेवन ?? 18 ॥ आज्ञा देह',—ब्राह्मण-घरे अन्न लञा दिये। ताँहा तुमि प्रसाद पाओ, तबे आमि जीये ॥”19 ॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरने कुछ समय तक श्रीकालिदासके साथ इष्ट-गोष्ठी करनेके पश्चात् मधुर वचन कहे, —“मैं नीच-जातिका व्यक्ति हूँ और आप सर्वोत्तम अतिथि हैं। मैं किस प्रकारसे आपकी सेवा करूँ? यदि आप मुझे आज्ञा दें तो मैं किसी ब्राह्मणके घरमें कच्चे चावल आदि जाकर दे दूँ और आप वहीं प्रसादको ग्रहण करें। ऐसा करनेसे मैं सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करूँगा ॥” 17-19 ॥ अमृतानुकणिका—इस पृथ्वीपर दो प्रकारके मनुष्य देखे जाते हैं—एक प्रकारके मानव पूर्ण भगवद्-विश्वासी और एक प्रकारके मानव कर्मजड़-स्मार्त्त। एक प्रकारके व्यक्तियोंका विचार जीवके स्वरूपको लेकर होता है और अन्य एक प्रकारके व्यक्तियोंका विचार विरूपको लेकर होता है। श्रीगीता (2/24) में जीवात्माके स्वरूप विचारमें कहा है— नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ आत्मा नित्य वस्तु है, सभी योनियोंमें भ्रमण करनेपर भी स्थिर, अचल और सनातन है। आत्मामें
स्थित अथवा नित्य स्वरूपमें अवस्थित होकर पूर्ण सच्चिदानन्द भगवान्की नित्य सेवा ही दैवी गुणोंवाले पुरुषोंकी अभिलषित वस्तु है। उनकी चेष्टा परिवर्तनशील असत् स्थूलदेह और सूक्ष्मदेहके कार्योंमें नियुक्त ना रहकर सदा अपरिवर्तनशील सत् आत्म-विषयमें ही नियुक्त होती है। भगवद्-विस्मृतिके कारण ही यह विरूप स्थूल और सूक्ष्म देह धारण करनी होती है। गीतामें कहा गया है—इस स्थूल और सूक्ष्म देहके कार्यमें लिप्त रहनेसे विरूप बुद्धि नष्ट न होकर और भी बढ़ती जाती है। कर्मजड़ स्मार्त्तगणोंकी बुद्धि वेदोंके मधु-पुष्पित वाक्योंमें लगकर कर्मके फलोंको भोगनेमें ही नियुक्त है। इसलिये वे देहको छोड़कर और कुछ विचार नहीं कर पाते हैं। आत्मविचारका प्रयास दिखानेपर भी स्मार्त्तगण देह-विचार ही सामने लाते हैं। पारमार्थिक राज्यमें भी उनका देह-विचार प्रबल हो उठता है। इस प्रकारके विचारके वशीभूत होकर वे विष्णुभक्तोंके जन्मको खोजते हुए उनकी जातिके विचारको लेकर व्यस्त होते हैं। इन सब स्मार्त्त विचारोंका चश्मा पहनकर भागवत-वस्तुके जन्म विचारको करते हुए हम भी विष्णु-चरणामृतको प्राकृत जल देखेंगे, शालिग्रामको शिला देखेंगे, गोबरको विष्ठा देखेंगे, शङ्खको हड्डी देखेंगे और भगवान्की देहको भी हाड़-मांसकी थैली समझेंगे। किन्तु भगवद्भक्तगण सभीमें अप्राकृत दर्शन करते हैं, क्योंकि वे सेवोन्मुख हैं। भोगोन्मुख दृष्टि जड़-दर्शन करवाती है और सेवोन्मुख नेत्रोंसे चिन्मय दर्शन होता है। इसलिये कर्मजड़ स्मार्त्तगण बाहरी जन्म-कर्मको लेकर व्यस्त रहते हैं। प्राकृत जाति या वर्ण स्त्रीसङ्गसे ही उत्पन्न वस्तु मात्र है। भगवद्भक्तोंकी कोई प्राकृत जाति नहीं होती, क्योंकि वे प्राकृत गुणमय जगत्में अप्राकृत निर्गुण वस्तु हैं। कर्मजड़ स्मार्त्तगण भोगोन्मुख मस्तिष्कमें यह सूक्ष्म विचार धारण नहीं कर पाते हैं। श्रीनारायण गण्डकी शिलामें प्रकटित होकर अर्चारूप धारण कर सकते हैं, अथवा आठ प्रकारकी अर्चामूर्त्तिमें विराजित हो सकते हैं। वैष्णव अति नीचकुलमें जन्म ले सकते हैं। इसके लिये श्रीनारायण शिला या मिट्टी, काष्ठ, पत्थर या लोहे या बालूके नहीं होते अथवा वैष्णव चमार, झाडूदार, चण्डाल, वैश्य, क्षत्रिय या प्राकृत ब्राह्मण भी नहीं होते। रैदास कभी भी चमार नहीं थे, झाडु ठाकुर भुँइमालि नहीं थे, गुहक चण्डाल नहीं थे, उद्धारण ठाकुर सोनेके व्यापारी (सुनार) नहीं थे, नरोत्तम ठाकुर कायस्थ नहीं थे या श्रीनिवास आचार्य प्राकृत ब्राह्मण भी नहीं थे। ये सभी वैकुण्ठ वस्तु हैं—एक-एक कुलको पवित्र करनेके लिये धराधाममें अवतीर्ण हुए हैं। भक्त या वैष्णव भगवान्के अभिन्न तनु है। वैष्णव अच्युत गौत्रीय हैं। इसलिये महाप्रभुने हरिदास ठाकुरको कहा है (चैः भाः मध्यखण्ड 10/36)— “एइ मोर देह हैते तुमि मोर बड़। तोमार ये जाति, सेइ जाति मोर दृढ़॥” “मेरी अपनी देहसे तुम्हारी देह श्रेष्ठ है। तुम जिस जातिके हो, वही मेरी भी जाति है।” गुणविहीन जाति ब्राह्मणकी बात तो बहुत दूरकी, शम-दम आदि गुणसम्पन्न सगुण ब्राह्मणसे भी भगवद्भक्त कोटि-कोटि गुणा श्रेष्ठ होते हैं—यहाँ तक कि ब्रह्मज्ञ ब्राह्मणसे भी भगवद्भक्तकी श्रेष्ठता शास्त्रीय वाक्य और विचारके द्वारा देखी जा सकती है। जैसे, गरुड़पुराणमें कहा गया है— “ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते। सत्रयाजि सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः॥ सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णु-भक्तो विशिष्यते। वैष्णवानां सहस्रेभ्यः एकान्त्येको विशिष्यते॥” [अर्थात् “हजार ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक याज्ञिक पुरुष श्रेष्ठ है, हजारों याज्ञिक ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक सर्ववेदान्त-शास्त्रज्ञ पुरुष श्रेष्ठ है, करोड़ों सर्ववेदान्त- शास्त्रज्ञोंकी अपेक्षा एक वैष्णव श्रेष्ठ है और हजारों वैष्णवोंकी अपेक्षा एक एकान्तिक भक्त श्रेष्ठ है।”] शम-दम आदि बारह गुणसम्पन्न ब्राह्मण भी यदि कमलनाभ श्रीभगवान्की सेवा-विमुख हो, तब उससे
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भगवद्भक्त चण्डाल भी श्रेष्ठ है और इससे भी कोई यह ना माने कि ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न वैष्णवसे चण्डाल कुलमें उत्पन्न वैष्णव छोटा है। जड़ स्मार्त्त विचारके वशीभूत होकर अनेक लोग मिट्टीके अर्जाविग्रहको स्वर्ण-प्रतिमासे छोटा मानकर भगवान्के चरणोंमें अपराध करते हैं। इसलिये 'मिट्टीके गौराङ्ग', 'सोनेके-गौराङ्ग' नाम दिया है। श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीकी अपेक्षा श्रीरघुनाथ दास गोस्वामीको छोटा मानकर वे दोनोंके चरणोंमें अपराध करते हैं। श्रीभगवान्की अङ्गकान्ति या शक्तिमानकी निशक्तिक प्रतीति ही ब्रह्म प्रतीति है और जड़के मध्य अनुप्रविष्ट भगवदंशकी अनुभूति ही परमात्म अनुभूति है। ब्रह्म और परमात्म प्रतीतिको क्रोड़ीभूत करके ऐश्वर्य और माधुर्यके पूर्ण विकासके सहित सम्पूर्ण दर्शन ही भगवद्दर्शन है। इसलिये जो भक्त या वैष्णव हैं, वे एक ही साथमें ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण और परमात्मविद् योगी हैं; अर्थात् जो लखपति हैं, वे हजारकी और सौकी मुद्राके भी अधिकारी हैं। जैसे लखपतिको यदि कहा जाय कि तुम्हारे पास हजार रुपये या सौ रुपये नहीं है, तो यह पागलके प्रलापके भाँति ही है। उसी प्रकार यदि भगवद्भक्तको कहा जाय कि 'तुम भक्त या वैष्णव हो, किन्तु ब्राह्मण नहीं हो', तब यह बात भी उसी प्रकार हास्यास्पद है। सभी जीव स्वरूपतः भगवान्के दास हैं। जिन सब जीवोंमें यह अन्तर्निहित दास्यवृत्ति जाग्रत होती है, आचार्य उनको ब्राह्मण कहकर निर्देश करते हैं। इसलिये वैष्णवमें सगुण ब्राह्मणता तो छोटी सी बात है, निर्गुण ब्राह्मणताका भी अभाव नहीं है—वह पूर्णभावसे विराजित है। निर्गुण ब्राह्मणताकी चरम परिणति ही वैष्णवता है। इसलिये ही श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने लिखा है (चैःभाः मध्यखण्ड दसवाँ अध्याय)— “ये ते कुले वैष्णवेर जन्म केने নহে। तथापिहे सर्वोत्तम सर्वशास्त्रे कहे ॥ 100 ॥ ये पापिष्ट वैष्णवेरे जातिबुद्धि करे। जन्म जन्म अधम योनिते डुबि मरे ॥ 102 ॥” [किसी भी कुलमें वैष्णवका जन्म क्यों न हुआ हो, तथापि वह सर्वोत्तम है, यही समस्त शास्त्रोंका कहना है। जो पापी वैष्णवोंमें जातिबुद्धि करते हैं, वे जन्म-जन्ममें अधम योनिको प्राप्त करते हैं।”] भगवद्भक्तगण अनेक समय स्वरूपके अणुत्वकी उपलब्धि करके कहते हैं,—जैसे श्रीहरिदास ठाकुरने कहा (चैःभाः मध्यखण्ड 10/59)— “निर्गुण अधम सर्वजातिबहिष्कृत।” [“मैं गुणहीन, अधम और अन्त्यज नीचजातिका हूँ।”] अथवा श्रीसनातन गोस्वामीने सर्वोच्च कुलमें जन्म लेकर भी कहा (चैःचः मध्यलीला 20/99)— “नीच जाति, नीच-सङ्गी, पतित अधम।” [“मैं नीच जातिका, नीच लोगोंका सङ्ग करनेवाला, अधम पतित हूँ।”] अथवा श्रील नरोत्तमदास ठाकुर महाशय कहते हैं— “अधम चण्डाल आमि, दयार ठाकुर तुमि।” [मैं तो अधम चण्डाल हूँ और आप परम दयालु ठाकुर (स्वामी) हैं।”] भगवद्भक्तोंकी ये सब स्वाभाविक दीनताकी बातें प्राकृत बुद्धिसे ग्रहण करके जड़बुद्धिसम्पन्न व्यक्ति कहते हैं—'ये अपने-अपने नीच जातित्वका परिचय अपने ही मुखसे दे रहे हैं, इसलिये ये नीचजातिके हैं।' किन्तु ये सब जड़बुद्धिसम्पन्न अपराधी व्यक्ति भगवान्के द्वारा अपने मुखसे कही बातको नहीं सुनते, जैसे उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरसे कहा—'तोमार ये जाति, सेइ जाति मोर दृढ़ ॥' तुलसीदासजीने भी कहा है— “ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सब कोइ करत विचार तुलसी कहे, हरि ना भजेत चारो चमार ॥ हरि भजे त चारो जात मिल्के एक हो जाय। अष्टधातु से परश लागाओये एक मूलसे बिकाय ॥” चारों जातियोंमें-से किसी भी जातिमें क्यों न हो,
398 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/17–26 ] भगवान्का भजन न करनेके कारण वह चमार है। चमार जैसे चमड़ेका व्यापार करते हैं, इसी प्रकार जीव भगवान्को भूलकर हाड़-मांसकी थैलीमें “मैं”की बुद्धि करते हैं और दैहिक क्रियाओंमें ही आसक्त होकर कर्मजड़ हो जाते हैं। और यदि वे हरिभजन करें तो चारों वर्णोंके सभी लोग भगवान्की जातिको प्राप्त करते हैं जिस प्रकार स्पर्शमणिके स्पर्शसे अष्टधातुकी सभी धातुएँ स्वर्ण हो जाती हैं। इसलिये भगवद्भक्त या वैष्णव ही सर्वश्रेष्ठ हैं और भगवद्भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है।—'गौड़ीय प्रथम खण्ड, 43 संख्या' ॥ 17–19 ॥ श्रीकालिदासकी दैन्योक्ति और वैष्णवोंमें जातिबुद्धिहीनता :— कालिदास कहे,—'ठाकुर, कृपा कर मोरे। तोमार दर्शने आइनु मुइ पतित पामरे ॥ 20 ॥ पवित्र हइनु मुइ, पाइनु दरशन। कृतार्थ हइनु, मोर सफल जीवन ॥ 21 ॥ एक वाञ्छा हय,—यदि कृपा करि' कर। पादरज देह', पाद मोर माथे धर ॥' 22 ॥ अनुवाद—श्रीकालिदासने कहा,—'हे ठाकुर ! आप मुझपर कृपा कीजिये, मैं पतित-पापी आपके दर्शन करनेके लिये आया हूँ। मैं आपके दर्शन करके पवित्र हो गया हूँ, कृतार्थ हो गया हूँ, मेरा जीवन सफल हो गया है। मेरी एक इच्छा है जिसे आप कृपा करके पूर्ण कीजिये। आप मेरे सिरपर अपने चरणकमल रखकर मुझे अपने चरणोंकी रज प्रदान कीजिये॥' 20–22 ॥ अमानी-मानद झडु-ठाकुरकी दैन्यपूर्ण उक्ति :— ठाकुर कहे,—'ऐछे बात कहिते ना युयाय। आमि—नीच जाति, तुमि—सुसज्जन राय ॥' 23 ॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरने कहा,—'ऐसी बात कहना आपके योग्य नहीं है। मैं नीच जातिका हूँ और आप सुसज्जन धनी व्यक्ति हैं॥' 23 ॥ झडु ठाकुरके निकट श्रीकालिदासके द्वारा वैष्णव-माहात्म्य-सूचक श्लोकका पाठ :— तबे कालिदास श्लोक पड़ि' शुनाइल। शुनि' झडुठाकुरेर बड़ सुख हइल ॥ 24 ॥ अनुवाद—तब श्रीकालिदासने उन्हें कुछ श्लोक सुनाये, जिन्हें सुनकर श्रीझडु ठाकुरको बहुत प्रसन्नता हुई॥ 24 ॥ हरिभक्तिविलास (10/91) में— न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः। तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथाह्यहम् ॥ 25 ॥ अनुवाद—चतुर्वेदपाठी अर्थात् चौबे ब्राह्मण होनेपर ही 'भक्त' होता है, ऐसा नहीं है। मेरा भक्त चण्डाल होनेपर भी मुझे प्रिय है, भक्त ही वास्तवमें दान-पात्र एवं ग्रहण-पात्र है; भक्तमात्र ही मेरे समान पूजनीय है॥ 25 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 19/50 संख्या देखें ॥ 25 ॥ श्रीमद्भागवत (7/9/10) में— विप्राद्द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पादारविन्दविमुखात् श्वपचं वरिष्ठम्। मन्ये तदर्पित-मनोवचनेहितार्थ- प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ 26 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके चरणकमलोंसे विमुख बारह-गुणोंसे युक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भी जिसके मन, वचन, चेष्टा, अर्थ और प्राण श्रीकृष्णमें समर्पित हैं, ऐसे चण्डालको भी मैं श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि वह (चण्डाल कुलमें उत्पन्न भक्त) अपने कुलको पवित्र करता है, और अत्यधिक सम्मानसे युक्त ब्राह्मण वैसा नहीं कर सकता ॥ 26 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 20/59 संख्या देखें ॥ 26 ॥
श्रीमद्भागवत (3/33/7)में — अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥27॥ अनुवाद—हे भगवन्, जिनके मुखमें आपका नाम वर्तमान है, वे श्वपच (कुत्तेका मांस खानेवाले) होनेपर भी श्रेष्ठ हैं। जो आपका नाम कीर्तन करते हैं, उन्होंने सब प्रकारकी तपस्या कर ली है, समस्त यज्ञ कर लिये हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया है एवं अङ्गसहित समस्त वेदोंका पाठ कर लिया है, इसलिये उनकी आर्योंमें गणना होती है ॥27॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 11/192 संख्या देखें ॥27॥ श्रीकृष्णभक्तकी पदवीका निर्णय :— शुनि' ठाकुर कहे,—“शास्त्र, एड् सत्य हय। सेइ नीच নহে,—याँते कृष्णभक्ति हय ॥ 28॥ श्रीकृष्णभक्तोंका जड़ीय-अभिमानशून्य अप्राकृत-अभिमानमय अमानी होना और सम्मान प्रदान करना :— आमि—नीचजाति, आमार नाहि कृष्णभक्ति। अन्य ऐछे हय, आमाय नाहि ऐछे शक्ति ॥”29॥ अनुवाद—शास्त्रोंके इन श्लोकोंको सुनकर श्रीझाडु ठाकुरने कहा,—“शास्त्रोंमें कही गयीं ये बातें सत्य ही हैं कि वह व्यक्ति नीच नहीं है, जिसमें कृष्णभक्ति हो। किन्तु मैं नीच जातिका व्यक्ति हूँ और मुझमें कृष्णभक्ति भी नहीं है। उपरोक्त श्लोकोंमें कही गयीं बातें अन्य निम्न कुलमें उत्पन्न कृष्णभक्तोंके लिये उपयुक्त हैं, किन्तु मुझमें ऐसी आध्यात्मिक शक्ति नहीं है॥”28-29॥ अनुभाष्य—महाभारतके वनपर्वमें 180 अः— “शूद्रे तु यद्भवेलक्ष्म द्विज्ये तच्च न विद्यते। न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ॥” उसी वनपर्वमें 211 अः— “शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठतः। आर्जवे वर्त्तमानस्य ब्राह्मण्यमभि-जायते ॥” [अर्थात् “शूद्रमें यदि विप्रके लक्षण दिखलायी दें एवं यदि ब्राह्मणमें वे लक्षण न हों, तब वह शूद्र-कुलमें उत्पन्न व्यक्ति शूद्र नहीं है और ब्राह्मण-वंशमें उत्पन्न व्यक्ति भी ब्राह्मण नहीं है। शूद्र योनिमें जन्म ग्रहण करनेपर भी यदि उसमें सद्गुणसमूह विद्यमान हो, उन गुणोंमें-से 'सरलता'-नामक गुणके रहनेपर उसमें ब्राह्मणता मानी जाती है।”] महाभारतके अनुशासन पर्वके 163 अः— “स्थितो ब्राह्मण-धर्मेण ब्राह्मण्यमुपजीवति। क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा ब्रह्मभूयः स गच्छति॥ एभिस्तु कर्मभिर्देवि शुभैराचरितैस्तथा। शूद्रो ब्राह्मणतां याति वैश्यः क्षत्रियतां व्रजेत्॥ न योनिर्नापि संस्कारो न श्रुतं न च सन्ततिः। कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम्॥” [अर्थात् “ब्राह्मण धर्मके द्वारा ब्राह्मणता होती है—उस धर्ममें स्थित होकर कोई क्षत्रिय अथवा वैश्य भी ब्रह्मत्व प्राप्त करता है। हे देवि! इन समस्त शुभकर्मोंके आचरणके द्वारा शूद्र भी ब्राह्मणता प्राप्त करता है एवं वैश्य क्षत्रियत्व प्राप्त करता है। जन्म, संस्कार, वेदाध्ययन और सन्तान होना—ब्राह्मणताका कारण नहीं है, स्वभाव ही एकमात्र कारण है।”] (भाः 4/21/12)— “सर्वत्रास्खलितादेशः सप्तद्वीपैक-दण्डधृक्। अन्यत्र ब्राह्मणकुलादन्यत्राच्युतगोत्रतः॥” [अर्थात् “सप्तद्वीपवाली पृथ्वीके एकछत्र दण्ड- विधाता सम्राट पृथु महाराजकी आज्ञा ऋषिकुल ब्राह्मण और अच्युत गोत्रीय वैष्णवोंके अतिरिक्त अन्य सर्वत्र ही पालनीय थी।”] (भाः 7/11/35)— “यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्। यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत् ॥” [अर्थात् “मनुष्योंके वर्णका बोध करानेवाले जो समस्त लक्षण कहे गये हैं, उनमेंसे जो लक्षण जिस स्थानपर लक्षित होंगे, उन्हीं लक्षणोंके द्वारा ही उसी वर्णका कहकर उस व्यक्तिको निर्देश करना होगा।”]
400 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/28-32 ] पद्मपुराणमें— “न शूद्रा भगवद्भक्तास्ते तु भागवता मताः। सर्ववर्णेषु ते शूद्रा ये न भक्ता जनार्दने॥” “श्वपाकमिव नेक्षेत लोके विप्रमवैष्णवम्। वैष्णवो वर्णबाह्योऽपि पुनाति भुवनत्रयम्॥” “शूद्रं वा भगवद्भक्तं निषादं श्वपचं तथा। वीक्ष्यते जातिसामान्यात् स याति नरकं ध्रुवम्॥” [अर्थात् “भगवद्भक्त ‘शूद्र’ नहीं हैं, उन्हें ‘भागवत’ कहा जाता है। जो भगवान् श्रीजनार्दनके भक्त नहीं हैं, वे ही सभी वर्णोंमें शूद्र हैं। जगत्में जिस प्रकार कुत्तेका माँस खानेवाले चण्डालका दर्शन नहीं करना चाहिये, उसी प्रकार किसी ब्राह्मणके अवैष्णव होनेपर उसका दर्शन करना भी निषिद्ध है। किन्तु वैष्णव यदि वर्णके बाहर भी हों, तो वे त्रिभुवनको पवित्र करते हैं। जो भगवद्भक्तको ‘शूद्र’ अथवा ‘निषाद’ या ‘चण्डाल’ आदि रूपमें साधारण जाति-बुद्धिके अनुसार दर्शन करता है, वह निश्चित रूपसे नरकगामी होता है।”] गरुड़पुराणमें— “भक्तिरष्टविधा ह्येषा यस्मिन् म्लेच्छेऽपि वर्त्तते। स विप्रेन्द्रो मुनिश्रेष्ठः स ज्ञानी स च पण्डितः॥” [अर्थात् “यह आठ प्रकारकी भक्ति जिस म्लेच्छकुलमें उत्पन्न व्यक्तिमें भी विद्यमान रहती है, उसे ब्राह्मणोंमें प्रधान, मुनियोंमें श्रेष्ठ, ज्ञानी और पण्डित समझना चाहिये।”] तत्त्वसागरमें— “यथा काञ्चनतां याति कांस्यं रसविधानतः। तथा दीक्षा-विधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम्॥” [अर्थात् “जिस प्रकार काँसा-धातु रसविधानसे (किसी रसायनिक विधिसे) स्वर्णताको प्राप्त करती है अर्थात् स्वर्ण बन जाती है, उसी प्रकार मनुष्योंको दीक्षा-विधानके द्वारा ब्राह्मणताकी प्राप्ति हुआ करती है।”] ऐसे बहुतसे शास्त्रीय-वचनोंमें वैष्णवोंमें अप्राकृत- ब्राह्मणता नित्य अनुस्यूत (ग्रंथित) है, ऐसा जाना जाता है। अतएव नीचकुलमें उत्पन्न व्यक्तिका भी श्रीकृष्णके प्रति भक्तिमान् होनेपर तब उसका नीच-जातित्व नहीं रहता। 'मैं वैष्णव नहीं हूँ,'—यह श्रीझडु-ठाकुरकी वैष्णवोचित उदारता है और उनके अपने निरभिमानी होनेका सूचकमात्र है, 'मेरे-अतिरिक्त अन्य समस्त कृष्णभक्तोंका ही शास्त्रीय-सत्यके अनुसार उत्तम-अधिकार है; और केवलमात्र मैं ही भक्तिहीन हूँ एवं नीच-कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ; मुझमें उच्च-अधिकारको प्राप्त करनेकी शक्ति नहीं हैं',—आदि शुद्धभक्तोचित दैन्य-उक्ति ही वास्तविक देहात्मबुद्धिसे मुक्त महाभागवतोंका स्वभाव है॥ 28-29 ॥ मानद झडु-ठाकुरके द्वारा कुछ दूरी तक श्रीकालिदासके पीछे चलना, और फिर अपने घर लौटना :— ताँरे नमस्करि’ कालिदास विदाय मागिला। झडुठाकुर तबे ताँर अनुव्रजि’ आइला ॥ 30 ॥ अनुवाद—श्रीकालिदासने श्रीझडु ठाकुरको नमस्कार करके उनसे विदायी माँगी। श्रीझडु ठाकुर कुछ दूर तक उनके पीछे चल करके अपने घरपर लौट आये॥ 30 ॥ अनुभाष्य—'अनुव्रजि',—पीछे-पीछे आकर ॥ 30 ॥ ताँरे विदाय दिया ठाकुर यदि घरे आइल। ताँर चरण-चिह्न येइ ठाञि पड़िल ॥ 31 ॥ झडु ठाकुरके लौट जानेपर श्रीकालिदासके द्वारा अपने समस्त अङ्गोंपर उन्हें वैष्णव मानकर उनके चरणकी धूलिको लेकर मलना :— सेइ धूलि लञा कालिदास सर्वाङ्गे लेपिला। ताँर निकट एकस्थाने लुकाञा रहिला ॥ 32 ॥ अनुवाद—श्रीकालिदासको विदायी देकर श्रीझडु ठाकुर जब अपने घर लौट गये, तब जहाँ-जहाँपर उनके चरणोंके चिह्न पड़े थे, श्रीकालिदासने उन स्थानोंकी रजको लेकर अपने समस्त अङ्गोंपर लगाया और फिर
[ 16/31-41 सोलहवाँ अध्याय 401
वे उनके घरके निकट ही किसी एक स्थानपर छिप गये॥ 31-32॥ समस्त ब्राह्मणोंके गुरु झडु-ठाकुरके द्वारा मनोमयी अर्च्चाके मानस-पूजनके बाद श्रीकृष्णका उच्छिष्ट मानकर आमको खाना :- झडुठाकुर घर याइ' देखि' आम्रफल। मानसेइ कृष्णचन्द्रे अर्पिला सकल॥ 33॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरने अपने घर जाकर जब श्रीकालिदासके द्वारा भेंटमें लाये आमोंको देखा, तब उन्होंने मन-ही-मन श्रीकृष्णचन्द्रको समस्त आम अर्पित किये॥ 33॥ कलार पाटुया खोला हैते आम्र निकालिया। ताँर पत्नी ताँरे देन, खायेन चुषिया॥ 34॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरकी पत्नीने केलेके पेड़के पत्ते और छालसे बने दोनेमें-से आम निकालकर उन्हें दिये और श्रीझडु ठाकुरने उन्हें चूसकर खाया॥ 34॥ अनुभाष्य—'पाटुया-खोला',—पत्ते और छाल; 'निकालिया',—बाहर निकाल करके॥ 34॥ वैष्णव-पत्नीके द्वारा वैष्णव-पतिके उच्छिष्टका सम्मान :- चुषि' चुषि' चोषा आठि फेलिला पाटुयाते। ताँरे खाओयाञा ताँर पत्नी खाय पश्चाते॥ 35॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरने आमकी गुठलियोंको भी चूस-चूसकर उसे उसी दोनेमें डाल दिया। श्रीझडु ठाकुरको आम खिलानेके बाद उनकी पत्नीने स्वयं भी आम खाये॥ 35॥ आठि-चोषा सेइ पाटुया-खोलाते भरिया। बाहिरे उच्छिष्ट-गर्त्ते फेलाइला लञा॥ 36॥ अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरकी पत्नीने भी आमकी गुठलियोंको उसी दोनेमें भरकर उसे अपने घरके बाहर बने जूठन फेंकनेवाले गड्ढेमें फेंक दिया॥ 36॥ महासौभाग्यवान् श्रीकालिदासके द्वारा अति आनन्दसे अप्राकृत-बुद्धिसे वैष्णव-उच्छिष्टका सम्मान :- सेइ खोला, आठि, चोकला चुषे कालिदास। चुषिते चुषिते हय प्रेमेते उल्लास॥ 37॥ अनुवाद—श्रीकालिदास उस दोनेको और उसमें पड़ी गुठलियों तथा आमके छिलकोंको चूसने लगे। चूसते-चूसते वे प्रेममें आविष्ट हो गये॥ 37॥ अनुभाष्य—'चोकला',—छिलका॥ 37॥ गौड़देशके समस्त वैष्णवोंके उच्छिष्टका सम्मान करनेवाले श्रीकालिदास :- एइमत यत वैष्णव वैसे गौड़देशे। कालिदास ऐछे सबार निला अवशेषे॥ 38॥ अनुवाद—जितने भी वैष्णव गौड़देशमें रहते थे, श्रीकालिदासने इसी प्रकार उन सबके उच्छिष्टको ग्रहण किया॥ 38॥ पुरीमें आनेपर श्रीकालिदासके प्रति महाप्रभुके द्वारा उनपर निष्कपट महाकृपा :- सेइ कालिदास यबे नीलाचले आइला। महाप्रभु ताँर उपर महाकृपा कैला॥ 39॥ अनुवाद—वे श्रीकालिदास जब श्रीजगन्नाथपुरीमें आये, तब महाप्रभुने उनके ऊपर महान कृपा की॥ 39॥ महाप्रभुके कमण्डलुके वाहक श्रीगोविन्द :- प्रतिदिन प्रभु यदि यान दरशने। जल-करङ्ग लञा गोविन्द याय प्रभु-सने॥ 40॥ अनुवाद—प्रतिदिन जब महाप्रभु भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके लिये जाते थे, तब श्रीगोविन्द जलसे भरे कमण्डलुको अपने हाथमें लेकर महाप्रभुके साथ-साथ चलते थे॥ 40॥ सिंहद्वारके निकट सीढ़ीके नीचे गड्ढेमें महाप्रभुके चरणोंको धुलवाना :- सिंहद्वारेर उत्तरदिके कपाटेर आड़े। बाइश 'पहाच'-तले आछे एक निम्न गाड़े॥ 41॥
402 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/41-49 ] सेइ गाड़े करेन प्रभु पादप्रक्षालने। तबे करिबारे याय ईश्वर-दरशने॥42॥ अनुवाद—सिंहद्वारकी उत्तर दिशामें कपाटके पीछे श्रीजगन्नाथ मन्दिरकी ओर जानेवाली बाईस सीढ़ियोंसे पहले भूमिपर एक गड्ढा बना हुआ था। श्रीगोविन्द महाप्रभुके चरणोंको उसी गड्ढेमें ही धुलाते थे, उसके पश्चात् ही महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये मन्दिरमें जाते थे॥41-42॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बाइश पहाच',—बाइस 'पाहाच', उड़ीसाके लोग एक-एक सीढ़ीको 'पाहाच' कहते हैं। सिंहद्वारसे मन्दिरकी ओर जानेके लिये बाइस सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं॥41॥ अनुभाष्य—'आड़े',—आड़में, बीचके स्थानमें; वर्तमान समयमें ये सब स्थान खाली नहीं हैं, वहाँ घर आदि बन गये हैं। 'गाड़े',—गड्ढेमें॥41॥ लोक-शिक्षक आचार्यरूपी महाप्रभुका कठोर नियम :— गोविन्देरे महाप्रभु कैराछे नियम। “मोर पादजल येन ना लय कोनजन ॥” 43 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दको एक नियम बतलाया था,—“कोई भी मेरा चरणजल न ले॥” 43 ॥ अति अन्तरङ्ग भक्तके अतिरिक्त अन्य सभीका महाप्रभुके चरणामृतमें अनधिकार :— प्राणिमात्र लइते ना पाय सेइ जल। अन्तरङ्ग भक्त लय करि' कोन छल॥44॥ अनुवाद—कोई भी प्राणी महाप्रभुके चरणोंके जलको नहीं ले सकता था, केवलमात्र अन्तरङ्ग भक्त ही किसी छलसे उसे ले लेते थे॥44॥ श्रीकालिदासके द्वारा महाप्रभुके चरणामृतको ग्रहण करनेके उद्देश्यसे उनके निकट हाथ फैलाना :— एकदिन प्रभु ताँहा पाद प्रक्षालिते। कालिदास आसिं' ताँहा पातिलेन हाते॥45॥ अनुवाद—एकदिन जब महाप्रभु अपने श्रीचरण धो रहे थे, तब श्रीकालिदासने वहाँ आकर अपना हाथ फैला दिया॥45॥ तीन बार अञ्जलीसे महाप्रभुके चरणामृतको पान करनेके बाद महाप्रभुके द्वारा निषेध :— एक अञ्जलि, दुइ अञ्जलि, तिन अञ्जलि पिला। तबे महाप्रभु ताँरे निषेध करिला॥46॥ महाप्रभुके द्वारा अपने चरणामृतको प्रदान करनेके बाद पुनः ग्रहण करनेके लिये निषेध :— “अतःपर आर ना करिह पुनर्बार। एतावता वाञ्छा पूरण करिनुँ तोमार ॥” 47 ॥ अनुवाद—श्रीकालिदासने जब महाप्रभुके चरणजलकी एक अञ्जलि, दूसरी अञ्जलि और तीसरी अञ्जलि भरकर पी ली, तब महाप्रभुने श्रीकालिदासको और लेनेसे मना करते हुए कहा,—“अब इसके उपरान्त पुनः ऐसा मत करना। मैंने अब तककी तुम्हारी अभिलाषाको पूर्ण किया है॥” 46-47 ॥ अनुभाष्य—'एतावता',—अब तक॥47॥ अन्तर्यामी परमेश्वर श्रीगौरसुन्दर :— सर्वज्ञ-शिरोमणि चैतन्य ईश्वर। वैष्णवे ताँहार विश्वास जानेन अन्तर॥48॥ वैष्णवोंमें अप्राकृत श्रद्धाके कारण श्रीकालिदासके लिये ब्रह्मादिके लिये भी दुर्लभ कृपाका प्रदर्शन :— सेइ गुण लञा प्रभु ताँरे तुष्ट हइला। अन्येरे दुर्लभ प्रसाद ताँहारे करिला ॥ 49 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु ईश्वर होनेके कारण सर्वज्ञोंके भी शिरोमणि हैं। महाप्रभु जानते थे कि श्रीकालिदासका हृदयकी गहराइयों तक वैष्णवोंके प्रति दृढ़ विश्वास है। इसी गुणके कारण महाप्रभुने उनसे सन्तुष्ट होकर उनके प्रति ऐसी कृपा की जो अन्योंके लिये अति दुर्लभ है॥48-49॥
[ 16/50-55 सोलहवाँ अध्याय 403 महाप्रभुके द्वारा श्रीनृसिंह-प्रणाम :- बाइश 'पहाच'-पाछे उपर दक्षिण-दिके। एक नृसिंह-मूर्ति आछेन उठिते वामभागे ॥ 50 ॥ प्रतिदिन ताँरे प्रभु करेन नमस्कार। नमस्करि' एइ श्लोक पड़े बार बार ॥ 51 ॥ अनुवाद-दक्षिण-दिशामें बाईस सीढ़ियोंके पीछे ऊपरकी ओर श्रीनृसिंह भगवान्का एक विग्रह है, जो सीढ़ियोंसे चढ़कर मन्दिर जाते समय बायीं ओर पड़ता है। महाप्रभु प्रतिदिन श्रीनृसिंह भगवान्के उस श्रीविग्रहको नमस्कार करते और नमस्कार करनेके पश्चात् यह निम्नलिखित श्लोक बार बार पढ़ते ॥ 50-51 ॥ शुद्धभक्ति प्रचारक भक्तोंके एकमात्र रक्षक, पाखण्डियोंका दमन करनेवाले, भक्तप्रिय श्रीनृसिंहको प्रणाम :- नृसिंह-पुराणके दो वचन— नमस्ते नरसिंहाय प्रह्लादाह्लाददायिने। हिरण्यकशिपोर्वक्षःशिलाटङ्क-नखालये ॥ 52 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रह्लादको आनन्द प्रदान करनेवाले नृसिंहको नमस्कार है; हिरण्यकशिपुकी वक्षरूपी शिलाको विदीर्ण करनेमें समर्थ नखोंको धारण करनेवाले नृसिंहको नमस्कार है ॥ 52 ॥ अनुभाष्य- हिरण्यकशिपोः (कश्यपतनयस्य प्रह्लादपितुः विष्णु-वैष्णव- विरोघिनः दैत्यराजस्य) वक्षःशिलाटङ्कनखालये (वक्षः एव शिलाः तस्याः टङ्कः पाषाण-विदारकास्त्रविशेषः, टङ्कः एव नखानां आलिः श्रेणी यस्य तस्मै) प्रह्लादाह्लाद-दायिने (हिरण्यकशिपोः तनयस्य शुद्धवैष्णवप्रवरस्य आनन्ददात्रे) नरसिंहाय (नृसिंहदेवाय) ते (तुभ्यं) नमः। श्लोक-भावानुवाद-कश्यप ऋषिके पुत्र और प्रह्लादके पिता विष्णु-वैष्णव-विरोधी दैत्यराज हिरण्यकशिपुके वक्षरूपी शिलाको पत्थर काटनेकी छेनीके समान नखश्रेणीवाले और शुद्धवैष्णवोंमें प्रधान हिरण्यकशिपुके पुत्र प्रह्लादको आनन्द प्रदान करनेवाले नृसिंहदेवको नमस्कार करता हूँ॥ 52 ॥ शुद्धभक्ति-प्रचारकोंके द्वारा सर्वत्र ही अधोक्षज श्रीनृसिंहदेवका अपने रक्षकके रूपमें दर्शन :- इतो नृसिंहः परतो नृसिंहो यतो यतो यामि ततो नृसिंहः। बहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहो नृसिंहमादिं शरणं प्रपद्ये ॥ 53 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इस ओर [देवीधाममें] नृसिंह, उस ओर [परव्योममें] नृसिंह, जहाँ जहाँ जाता हूँ, उस स्थानपर नृसिंह ही हैं, बाहर भी नृसिंह हैं, और हृदयमें नृसिंह हैं,-ऐसे उन आदि-नृसिंहके मैं शरणागत होता हूँ॥ 53 ॥ अनुभाष्य- इतः (अस्मिन् स्थाने देवीधाम्नि) नृसिंहः, परतः (परव्योम्नि) नृसिंहः, यतः यतः (यत्र यत्र) [प्रति-] यामि, ततः (तत्र) नृसिंहः, बहिः (प्रपञ्चे) नृसिंहः, हृदये (अन्तर्जगति) नृसिंहः [स्फुरति]; अतः आदिम् (आदिदेवं सर्वमूलं) नृसिंहम् [अहं] शरणं प्रपद्ये (आश्रये इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥ महाप्रभुके द्वारा प्रसादका भोजन :- तबे प्रभु करिला जगन्नाथ दरशन। घरे आसि' करिला मध्याह्न-भोजन ॥ 54 ॥ अनुवाद-श्रीनृसिंहदेवको नमस्कार करनेके पश्चात् महाप्रभुने भगवान् श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन किये। तब अपने निवास स्थानपर आकर मध्याह्न-कृत्य समाप्त करके भोजन किया ॥ 54 ॥ उच्छिष्ट प्राप्तिकी प्रतीक्षामें खड़े श्रीकालिदासको महाप्रभुकी इच्छाके अनुसार उनके उच्छिष्टका दान :- बहिद्वारे आछे कालिदास प्रत्याशा करिया। गोविन्देरे ठारे प्रभु कहेन जानिया ॥ 55 ॥