श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2410, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय
[बायाँ स्तम्भ]
**कथासार—**गौड़ीय-भक्तगण पुनः श्रीक्षेत्रमें आये। उनके साथ श्रीरघुनाथदासके सम्बन्धसे चाचा कहलानेवाले श्रीकालिदास आये थे। श्रीकालिदासने गौड़देशके समस्त वैष्णवोंका अधरामृत प्राप्त किया था; उन्होंने झडुठाकुर तकके अधरामृतको प्राप्त किया था। उसी सुकृतिके बलसे उन्होंने नीलाचलमें महाप्रभुके चरणामृत और प्रसादको प्राप्त किया। सात वर्षकी आयुमें कविकर्णपूरने महाप्रभुके निकट आकर हरिनाम महामन्त्र प्राप्त किया और उन्होंने उसी समय अपने कवित्वका परिचय भी दिया था। वल्लभभोगको प्राप्त करके महाप्रभुने फेलामृतके (श्रीकृष्ण-उच्छिष्टरूपी अमृतके) माहात्म्यका वर्णन किया और समस्त वैष्णवोंको फेलामृतका सेवन करवाकर स्वयं श्रीकृष्णके अधरामृतके पान करनेमें निमग्न हो गये। —(अमृतप्रवाह भाष्य)
स्वयं आचरण करके भक्तिकी शिक्षा प्रदान करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :— वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यं कृष्णभावामृतं हि यः। आस्वाद्यास्वादयन् भक्तान् प्रेमदीक्षामशिक्षयत्॥ 1 ॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**जिन्होंने कृष्णभावामृत स्वयं आस्वादन करके और भक्तोंको भी उसका आस्वादन करवाकर, प्रेम-दीक्षा-विषयक दिव्यज्ञानकी शिक्षा दी थी, मैं उन श्रीकृष्णचैतन्यकी वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य— यः (महाप्रभुः) कृष्णभावामृतं (उन्नतोज्ज्वलरसं) स्वयम् आस्वाद्य भक्तान् (निजाश्रितान्) आस्वादयन् प्रेमदीक्षां (शुद्धप्रीतिमूलां भजनप्रणालीं) च अशिक्षयत् (उपादिशत्), तं श्रीकृष्णचैतन्यम्
[दायाँ स्तम्भ]
[अहं] वन्दे। **श्लोक-भावानुवाद—**जिन महाप्रभुने उन्नतोज्ज्वलरसका स्वयं आस्वादन करके अपने आश्रितजनोंको उसका आस्वादन करवाकर शुद्धप्रीतिमूलक भजनप्रणालीका उपदेश दिया, उन श्रीकृष्णचैतन्यकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ 2 ॥
**अनुवाद—**श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और समस्त गौरभक्तोंकी जय हो॥ 2 ॥
नीलाचलमें भक्तोंके साथ महाप्रभुकी लीला :— एइमत महाप्रभु रहेन नीलाचले। भक्तगण-सङ्गे सदा प्रेम-विह्वले॥ 3 ॥
**अनुवाद—**इस प्रकार महाप्रभु सदा प्रेममें विह्वल होकर अपने भक्तोंके साथ नीलाचलमें वास करते थे॥ 3 ॥
अगले वर्ष रथयात्राके उपलक्ष्यमें गौड़ीय-भक्तोंका पुरीमें आगमन :— वर्षान्तरे आइला सब गौड़ेर भक्तगण। पूर्ववत् आसि' कैल प्रभुर मिलन॥ 4 ॥
**अनुवाद—**एक वर्षके पश्चात् समस्त गौड़ीय भक्त पूर्व वर्षोंकी भाँति श्रीजगन्नाथपुरीमें आकर महाप्रभुसे मिले॥ 4 ॥
गौड़ीय भक्तोंके साथ श्रीकालिदासका आगमन :— ताँ-सबार सङ्गे आइल कालिदास नाम। कृष्णनाम बिना तैँहो नाहि जाने आन॥ 5 ॥