श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें392 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/93–99 ] भोजन कराञा प्रभुरे कराइला शयन। रामानन्द-आदि सबे गेला निज-स्थान॥ 94॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय महाप्रभुको समुद्रतटपर ले गये और उन्हें समुद्रमें स्नान करवाकर पुनः घरपर ले आये। तब महाप्रभुको भोजन करवाकर शयन करा दिया, उसके पश्चात् श्रीरामानन्द राय आदि सभी भक्त अपने-अपने स्थानपर लौट गये॥ 93-94॥ गोपीदासीके अभिमानमें महाप्रभुके द्वारा वृन्दावनकी लीलाका उद्दीपनरूपी दिव्योन्माद (उद्घूर्णा और चित्रजल्प) :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर उद्यान-विहार। वृन्दावन-भ्रमे याँहा प्रवेश ताँहार ॥ 95 ॥ विलाप-सहित एइ उन्माद-वर्णन। श्रीरूप-गोसाञि इहा करियाछेन लिखन ॥ 96 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने महाप्रभुके उद्यान-विहारका वर्णन किया, जिसमें महाप्रभुने वृन्दावनके भ्रमसे प्रवेश किया था। उनके इस विलाप-सहित उन्मादका वर्णन श्रीरूप गोस्वामीने अपने ग्रन्थ स्तवमालामें लिखा है॥ 95-96॥ वृन्दावनकी उद्दीपनासे प्रेमावेशमें श्रीकृष्णनामका उच्चारण करनेवाले महाप्रभु :- स्तवमालामें प्रथम चैतन्याष्टकका (6) श्लोक— पयोराशेस्तीरे स्फुरदुपवनालीकलनया मुहुर्वृन्दारण्यस्मरणजनितप्रेमविवशः। क्वचित् कृष्णावृत्तिप्रचलरसनो भक्तिरसिकः स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम् ॥ 97 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 97 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—समुद्रके तटपर सुन्दर उपवन- श्रेणीको देखकर महाप्रभु बार बार वृन्दावनके स्मरणके कारण प्रेममें विवश हो जाते थे; प्रचल (चञ्चल) रसनासे भक्तिरसिक गौराङ्ग 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोल रहे हैं,—ऐसे चैतन्यदेव क्या मेरे दर्शन पथपर पुनः आविर्भूत होंगे? ॥ 97 ॥ पन्द्रहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— क्वचित् यः पयोराशेः (समुद्रस्य) तीरे (तटे बालुकाखण्डे) स्फुरदुपवनालि-कलनया (स्फुरन्तीनां सुशोभितानां उपवनालीनां उपवनपुञ्जानां कलनया अवलोकनेन) मुहुः (अनुक्षणं) वृन्दारण्य-स्मरणजनित-प्रेमविवशः (वृन्दावन-चिन्तोदयात् प्रेम्णा कृष्णप्रेमलालसया विवशः) अभूत्, कृष्णावृत्तिप्रचलरसनः (कृष्णेति नाम्नः सदाकीर्तनेन प्रचला चञ्चला रसना यस्य सः) भक्तिरसिकः सः चैतन्यः मे (मम) दृशोः (नयनयोः) पदं (मार्गं) पुनरपि किं यास्यति (प्राप्स्यति)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 97 ॥ पन्द्रहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। अनन्त चैतन्यलीला ना याय लिखन। दिङ्मात्र देखाञा ताहा करिये सूचन ॥ 98 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ अनन्त हैं, इसलिये उन सबको लिखा नहीं जा सकता। मैं तो केवल उन लीलाओंका दिग्दर्शन करवाकर उनकी भूमिका मात्र ही प्रस्तुत कर रहा हूँ॥ 98 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 99 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे उद्यानविहारो नाम पञ्चदशः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 99 ॥ न्त्यखण्डमें उद्यानविहार नामक का अनुवाद समाप्त।