श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 15/84-94 पन्द्रहवाँ अध्याय 391 विलास करनेवाले एवं परिहास करनेवाले हरिको मेरा मन स्मरण कर रहा है॥ 84॥ अनुभाष्य— हे सखि, इह रासे (रासक्रीड़ायां) मम मनः विहित-विलासं (विहितः सम्पादितः विलासः येन तं) कृतपरिहासं (कृतः विहितः परिहासः येन तं) हरिं स्मरति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 84॥ गानको श्रवण करके महाप्रभुके द्वारा प्रेमावेशमें नृत्य :— स्वरूप-गोसाञि यबे एइ पद गाहिला। उठि' प्रेमावेशे तबे नाचिते लागिला ॥ 85 ॥ अनुवाद—जब श्रीस्वरूप दामोदरने इस पदका गान किया, तब महाप्रभु उठकर प्रेमावेशमें नृत्य करने लगे॥ 85॥ महाप्रभुके श्रीअङ्गोंमें अष्टसात्त्विक-विकार और समस्त भावोंका एक साथमें उदित होना :— 'अष्टसात्त्विक' भाव अङ्गे प्रकट हइल। हर्षादि 'व्यभिचारी' सब उथलिल ॥ 86 ॥ भावोदय, भावसन्धि, भाव-शाबल्य। भावे-भावे महायुद्धे सबार प्राबल्य ॥ 87 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके श्रीअङ्गोंमें अष्टसात्त्विक भाव प्रकटित हो गये। हर्ष आदि समस्त व्यभिचारी भाव भी उमड़ पड़े। महाप्रभुमें भावोंका उदय, भाव-सन्धि और भाव-शाबल्यका प्रकाश होने लगा। भावोंका परस्परमें महायुद्ध होने लगा, क्योंकि सभी भाव बहुत प्रबल थे॥ 86-87॥ अनुभाष्य—'भावोदय,'—अष्टसात्त्विक-भावोंका उदय; 'भावसन्धि,'—एक समान अथवा पृथक्-पृथक् दो भावोंका मिलन; 'भाव-शाबल्य,'—भाव-समूहोंका परस्पर मर्दन ॥ 87 ॥ उस पदका गान, आस्वादन और नर्तन :— सेइ पद पुनः पुनः कराय गायन। पुनः पुनः आस्वादये, करेन नर्त्तन ॥ 88 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे पुनः पुनः उस पदका ही गान करवाया और स्वयं पुनः पुनः उसका नये-नये रूपमें आस्वादन करते हुए नृत्य किया॥ 88॥ श्रीस्वरूपके कीर्तनका समापन :— एइमत नृत्य यदि हैल बहुक्षण। स्वरूप-गोसाञि पद कैला समापन ॥ 89 ॥ महाप्रभुकी अवस्थाको देखकर श्रीस्वरूपके द्वारा गान बन्द करना :— 'बल' 'बल' बलि प्रभु कहेन बार बार। ना गाय स्वरूप-गोसाञि प्रेम देखि ताँर ॥ 90 ॥ सभीके द्वारा हरिध्वनि :— 'बल' 'बल' प्रभु बलेन, भक्तगण शुनि' । चौदिकेते सबे मेलि' करे हरिध्वनि ॥ 91 ॥ अनुवाद—इस प्रकार जब महाप्रभुको नृत्य करते हुए बहुत समय हो गया, तब श्रीस्वरूप दामोदरने पदको गाना बन्द कर दिया। महाप्रभु तब भी श्रीस्वरूप दामोदरको बार बार 'बोलो, बोलो' कहकर पद गानेके लिये कहते रहे, किन्तु श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुके प्रेममें आविष्ट होकर नृत्यके श्रमको देखकर गान नहीं किया। महाप्रभुने पुनः 'बोलो! बोलो!' कहा और उसे सुनकर सभी भक्त महाप्रभुको चारों ओरसे घेरकर हरिध्वनि करने लगे॥ 89-91 ॥ श्रीरायके द्वारा महाप्रभुकी थकावटको दूर करना :— रामानन्द-राय तबे प्रभुरे बसाइला। व्यजनादि करि' प्रभुर श्रम घुचाइला ॥ 92 ॥ अनुवाद—तब श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको बैठाया और पंखा आदि झलकर उनके परिश्रमको दूर किया॥ 92॥ महाप्रभुका स्नान और भोजनके पश्चात् शयन :— प्रभुरे लञा गेला तबे समुद्रेर तीरे। स्नान कराञा पुनः ताँरे लञा आइला घरे ॥ 93 ॥