भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2407, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2407

390 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/78-84 ] तरुणियोंके मनके कलुषका (कामतापका) हरण करती हैं, जिनके अङ्ग चन्द्रमा, हरिचन्दन, नीलकमल और कर्पूरकी शीतलताको धारण करते हैं, वे मदनमोहन मेरे वक्षकी स्पृहाका विस्तार कर रहे हैं ॥ ७८ ॥ अनुभाष्य- हे सखि, हरिमणिकवाटिका-प्रततहारिवक्षःस्थलः (हरिमणिभिः इन्द्रनीलमणिभिः रचितायाः कवाटिकायाः प्रततिः विस्तृतैः तां हर्त्तुं शीलं यस्य तथाभूतं च वक्षःस्थलं यस्य सः) स्मरात्र्त्ततरुणीमनः-कलुषहारिदोर्गलः (स्मरात्र्त्तानां मदनपीडितानां तरुणीनां युवतीनां मनःकलुषं मनस्तापं हर्त्तुं भुजरूपार्गलः यस्य सः) सुधांशुहरिचन्दनोत्पलसिताभ्रशीताङ्गकः (सुधांशुः शशधरः च हरिचन्दनं च उत्पलं कुवलयं पद्मं कमलं च सिताभ्रः कर्पूरः च एभ्योऽपि शीतलं अङ्गं यस्य सः) मदनमोहनः मे (मम) वक्षःस्पृहां तनोति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ७८ ॥ श्रीकृष्णदर्शनसे वञ्चित महाप्रभुका विलाप :- प्रभु कहे, - "कृष्ण मुञि एखनि देखिनु । आपनार दुर्देवे पुनः हाराइनु ॥ ७९ ॥ चञ्चलस्वभाव कृष्णेर, ना रय एकस्थाने। देखा दिया मन हरि' करे अन्तर्धाने ॥" ८० ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मैंने अभी-अभी श्रीकृष्णको देखा, किन्तु अपने ही दुर्भाग्यके कारण मैंने उन्हें पुनः खो दिया है। श्रीकृष्णका स्वभाव बहुत चञ्चल है, वे किसी एक स्थानपर नहीं रहते। श्रीकृष्ण एकबार अपने दर्शन देकर मनका हरण कर लेते हैं और फिर अन्तर्धान हो जाते हैं ॥" ७९-८० ॥ गोपीप्रेमको वर्धित करनेके लिये श्रीकृष्णका राससे अन्तर्धान होना :- श्रीमद्भागवत (10/29/48) में- तासां तत्सौभगमदं वीक्ष्यमाणञ्च केशवः। प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत ॥ ८१ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ८१ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-[केशव- 'क' अर्थात् ब्रह्मा और 'ईश' अर्थात् महादेवको वशीभूत करनेवाले] श्रीकृष्ण उनके (गोपियोंके) सौभाग्य-अहङ्कारको देखकर उसे प्रशमित करनेके लिये और उनके प्रति कृपा करनेके लिये उस स्थानसे [रासस्थलीसे] अन्तर्धान हो गये ॥ ८१ ॥ अनुभाष्य-महाभागवत श्रीशुकदेव शुश्रूषु परीक्षितको श्रीकृष्णकी रासलीलाका वर्णन कर रहे हैं- केशवः (कञ्च ईशञ्च तौ वशयतीति तथा सः कृष्णः) तासां (गोपीनां) तत्सौभगमदं (तेषां सौभाग्यमूलगर्वं) मानं (गर्व) च वीक्ष्य, तस्य प्रशमाय प्रसादाय तत्र (रासस्थल्याम्) एव अन्तरधीयत (अन्तर्हितः बभूव)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ८१ ॥ श्रीस्वरूपको गान गानेकी आज्ञा :- स्वरूप-गोसाञिरे कहेन, - "गाओ एक गीत। याते आमार हृदयेर हुये त' 'सम्वित्' ॥" ८२ ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे कहा,- "तुम एक गीत गाओ, जिससे मेरे व्याकुल हृदयको स्थिरताकी प्राप्ति हो ॥" ८२ ॥ अनुभाष्य- 'सम्वित्'-व्याकुल-चित्तमें स्थिरज्ञानकी प्राप्ति ॥ ८२ ॥ स्वरूप-गोसाञि तबे मधुर करिया। गीतगोविन्देर पद गाय प्रभुरे शुनाञा ॥ ८३ ॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदर अत्यन्त मधुर स्वरसे श्रीगीत-गोविन्दके पदको गाकर उन्हें सुनाने लगे ॥ ८३ ॥ गोपियोंके द्वारा रासरसिक श्रीकृष्णका स्मरण :- गीतगोविन्द (2/5) में - रासे हरमिह विहितविलासम् । स्मरति मनो मम कृतपरिहासम् ॥ ८४ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ८४ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इस रासमें अनेक प्रकारसे

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 2407, कुल 2549 में से · BharatKosha