भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2406, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2406

[ 15/71-78 पन्द्रहवाँ अध्याय 389 [बायाँ स्तम्भ] भुज नहे, —कृष्णसर्पकाय। दुइ शैल-छिद्रे पैशे, नारीर हृदये दंशे, मरे नारी से विषज्वालाय ॥ 75 ॥ कृष्ण-कर-पदतल, कोटिचन्द्र-सुशीतल, जिनि' कर्पूर-वेणामूल-चन्दन। एकबार यार स्पर्शे, स्मरज्वाला-विष नाशे, यार स्पर्शे लुब्ध नारी-मन ॥" 76 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 71-76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[राधाभावमें आविष्ट महाप्रभुने कहा—] चन्द्र और कमलको पराजित करके (गोपीरूपी) हिरनीको पकड़नेके लिये कृष्णने मुखरूपी फन्दको बिछाया है। उस फन्देमें मधुर हँसीरूपी चारा अर्थात् (गोपीरूपी) हिरनीको प्रलोभन देनेके लिये झूठ-मूठका खाद्य पदार्थ रखा गया है। घर, द्वार और लज्जाका परित्याग करके व्रजनारीरूपी हिरनियाँ उस फन्देमें फँसकर दासियाँ बन रही हैं। ओहो, हमारे बान्धव श्रीकृष्ण इस प्रकार शिकारी जैसा आचरण ही करते हैं। वह शिकारी धर्म-अधर्मको नहीं मानता,—वह व्रजरमणीरूपी हिरनियोंके मर्म (हृदय)का हरण करनेके लिये अनेक प्रकारके उपायोंकी सृष्टि करता है; उसके कपोलोंपर मकर-कुण्डल झलमल करते हुए नृत्य करके नारियोंके मनका हरण करते हैं; उनके हृदयमें सहास्य कटाक्ष-बाणको बेंधकर वह शिकारी नारी-वधका कोई भय नहीं करता। कृष्णका (डाकूकी भाँति लूटनेकी इच्छासे युक्त उनका) चौड़ा वक्षःस्थल, जिसपर लक्ष्मी और श्रीवत्स (दक्षिणावर्त्त रोमावली)—ये दो चिह्न अलङ्कार-स्वरूप हैं, वह लाखों-लाखों व्रजदेवियों एवं उनके मन और वक्षको बलपूर्वक आकर्षित करके उन हरिकी ही दासी बना डालता है। कृष्णकी अति सुन्दर सुदीर्घ-अर्गल (सिटकनी)-स्वरूप काले सर्पके आकारवाली दो भुजाएँ नारियोंके दो पर्वतरूपी स्तनोंके मध्यस्थलमें प्रवेश करके उनके हृदयको डँसती हैं। (गोपियाँ उस [दायाँ स्तम्भ] स्पर्शरूपी डँसनेके विषसे काम-ज्वालामें जल उठती हैं); कृष्णके हाथ और चरणके तलवे कर्पूर, सुगन्धित खसखस और चन्दनको पराजित करके करोड़ों चन्द्रोंसे भी सुशीतल हैं। वे एकबार जिन्हें स्पर्श करते हैं, उनका काम-ज्वालारूपी विष नष्ट हो जाता है। 'डाकातिया वक्ष',—डकैतकी भाँति (कृष्णका) जो वक्ष है, वह समस्त व्रजनारियोंको बलपूर्वक खींच लेता है। 'शैल-छिद्रे',—हृदयस्थ दोनों स्तनोंके छिद्रमें (मध्यस्थलमें) ॥ 71-76 ॥ अनुभाष्य—'वेणामूल',—सुगन्धित खसखस ॥ 76 ॥ श्रीकृष्णविरही महाप्रभुके द्वारा श्लोकका पाठ :- एतेक विलाप करि' विषादे श्रीगौरहरि, एइ अर्थे पड़े एक श्लोक। एइ श्लोक पाञा राधा, विशाखारे कहे राधा, उघाड़िया हृदयेर शोक ॥ 77 ॥ अनुवाद—श्रीगौरहरिने इस प्रकार विलाप करते हुए विषादग्रस्त होकर इस (निम्नलिखित) श्लोकको पढ़ा, जिस श्लोकके द्वारा श्रीराधिकाने अपने हृदयके शोकको सम्पूर्ण रूपमें खोलकर श्रीविशाखा सखीको कहा था ॥ 77 ॥ श्रीराधाकी श्रीकृष्णदर्शन-तृष्णा :- गोविन्दलीलामृत (8/7)में— हरिणमणिकवाटिकाप्रततहारिवक्षःस्थलः स्मरार्त्ततरुणीमनःकलुषहारिदोर्गलः। सुधांशुरहरिचन्दनोत्पलसिताभ्रशीताङ्गकः स मे मदनमोहनः सखि तनोति वक्षःस्पृहाम् ॥ 78 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 78 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, जिनका वक्षःस्थल—इन्द्रनीलमणिसे निर्मित कपाटकी भाँति विस्तृत और मनोहर है, जिनकी दोनों भुजाएँ कामसे पीड़ित