श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें388 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला [ 15/65-75 ]
निम्नभागमें बगुलोंकी श्रेणीकी भाँति शोभा पा रहा है। उनका जो मयूरपंख है, वह-मेघमें स्थित इन्द्रधनुषकी भाँति है; उनकी (पाँच वर्षोंसे युक्त) वैजयन्तीमाला इन्द्रधनुषके समान है। कृष्णके मुखसे निकली जो मुरलीकी मधुरध्वनि है, वह-कृष्णरूपी मेघकी मधुर गर्जन-स्वरूप है; उसे सुनकर वृन्दावनके मयूर नृत्य कर रहे हैं। कृष्णके लावण्यकी ज्योत्स्ना अकलङ्क पूर्ण (सोलह) कलायुक्त अपूर्व चन्द्रकी भाँति उदित हुई है। कृष्णमेघका लीलामृत-वर्षण चौदह भुवनोंको सिञ्चित कर रहा है। उस कृष्णरूप मेघने जब दर्शन दिये, तब मेरे दुर्भाग्यरूपी बवण्डरने उस मेघको स्थानान्तरित करके दूर कर दिया। अब मेघको नहीं देखकर मेरा नेत्र-चातक-जलके अभावमें मृतकी भाँति है। 'बलाहक',-मेघ। 'अकलङ्क पूर्णकल',-कलङ्कहीन एवं परिपूर्ण सोलह कलाओंके साथ उदित विचित्र चन्द्र। 'झाञ्झापवने',-बवण्डर ॥ 65-68 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 21/109 संख्या देखें ॥ 65-68 ॥
श्रीरामानन्दके द्वारा महाप्रभुके भावके उपयोगी श्लोकका पाठ; स्वयं महाप्रभुके द्वारा उसकी व्याख्या :- पुनः कहे, - "हाय हाय, पड़ पड़ रामराय", बले प्रभु गद्गद आख्याने। रामानन्द पड़े श्लोक, शुनि' प्रभुर हर्ष-शोक, आपने प्रभु करेन व्याख्याने ॥ 69 ॥
अनुवाद-महाप्रभु पुनः गद्गद वाणीसे कहने लगे,-"हाय, हाय! हे रामानन्द राय! बोलो-बोलो।" श्रीरामानन्द रायने [निम्नलिखित] एक श्लोकका उच्चारण किया, जिसे सुनकर महाप्रभुको हर्ष और शोक हुआ। उसे सुनकर महाप्रभु स्वयं उसकी व्याख्या करने लगे ॥ 69 ॥ अनुभाष्य- 'हर्ष-शोक',-कृष्णके माधुर्यके श्रवणसे 'हर्ष', उनके विरहमें 'शोक' ॥ 69 ॥
चित्रजल्पोक्ति :- श्रीमद्भागवत (10/29/39) में- वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्रिय- गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्। दत्ताभयञ्च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणंञ्च भवाम दास्यः ॥ 70 ॥
अनुवाद-हे कृष्ण! आपका अलकाओंसे आवृत मुख, कपोलोंपर कुण्डलोंकी शोभा, अमृतयुक्त अधरपर मन्द हास्यके साथमें देखना, अभय प्रदान करनेवाली दो भुजाएँ और एकमात्र श्रीके द्वारा शोभित वक्षको देखकर ही हम आपकी दासी बनी हैं ॥ 70 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/48 संख्या देखें ॥ 70 ॥
श्लोकका अर्थ; गोपियोंके प्रति श्रीकृष्णके रूप-माधुर्यके बलके प्रयोगका वर्णन (चित्रजल्प) :- “कृष्ण जिनि' पद्म-चान्द, पातियाछे मुख-फान्द, ताते अधर मधुस्मित चार। व्रजनारी आसिं' आसिं', फान्दे पड़ि' हय दासी, छाड़ि' लाज-पति-घर-द्वार ॥ 71 ॥ बान्धव कृष्ण करे व्याधेर आचार। नाहि माने धर्माधर्म, हरे नारी-मृगी-मर्म, करे नाना उपाय ताहार ॥ 72 ॥ ध्रु ॥ गण्डस्थल झलमल, नाचे मकर-कुण्डल, सेइ नृत्य हरे नारीचय। सस्मित कटाक्ष-बाणे, ता-सबार हृदये हाने, नारी-वधे नाहि किछु भय ॥ 73 ॥ अति उच्च सुविस्तार, लक्ष्मी-श्रीवत्स-अलङ्कार, कृष्णेर ये डाकातिया वक्ष। व्रजदेवी लक्ष लक्ष, ता-सबार मनोवक्ष, हरिदासी करिबारे दक्ष ॥ 74 ॥ सुललित दीर्घार्गल, कृष्णेर भुजयुगल,