भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2404, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2404

[ 15/63-68 पन्द्रहवाँ अध्याय 387 चित्रजल्पोक्ति :- गोविन्दलीलामृत (8/4)में श्रीराधिकाके वचन - <verse> नवाम्बुद-लसद्द्युतिर्नवतड़िन्मनोज्ञाम्बरः सुचित्रमुरलीस्फुरच्छरदमन्दचन्द्राननः। मयूरदलभूषितः सुभगतारहारप्रभः स मे मदनमोहनः सखि तनोति नेत्रस्पृहाम् ॥ 63 ॥ </verse> अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 63॥ अमृतप्रवाह भाष्य- हे सखि, नवीन मेघोंको सुशोभित करनेवाली नव-विद्युतकी भाँति मनोहर पीताम्बर धारण करनेवाले, सुन्दर-मुरलीको अधरोंपर धारण किये हुए, मयूरके पंखसे विभूषित पूर्ण शरत् चन्द्रके जैसे सुशोभित मुखमण्डलवाले, सुन्दर दीप्तिमान (मुक्ता) हारकी प्रभासे युक्त, वे मदनमोहन मेरे नेत्रोंकी स्पृहाका विस्तार कर रहे हैं॥ 63॥ अनुभाष्य- हे सखि, नवाम्बुद-लसद्द्युतिः (नवाम्बुदात् नवमेघादपि लसन्ती शोभमाना द्युतिः कान्तिः यस्य सः) नवतड़िन्मनोज्ञाम्बरः (नवतड़ितः नवीनसौदामिन्याः अपि मनोज्ञे रुचिरे अम्बरे वसने यस्य सः) सुचित्रमुरलीस्फुरच्छरदमन्दचन्द्राननः (सुष्ठु चित्रया मनोज्ञया मुरल्या स्फुरत् शोभमानं शरदि अमन्दः अक्षीणचन्द्रः इव आननं यस्य सः) मयूरदलभूषितः (शिखिपिच्छशोभितः), सुभगतारहारप्रभः (सुभगाः सुदीप्ता ताराः इव हारस्य प्रभा यस्य सः) सः मदनमोहनः (मदयति सम्भोगरसपुष्ट्यर्थं विप्रलम्भांशे ग्लापयित्वा सम्भोगपुष्टिं करोति च इति मदनः ताभ्यां स्ववशीकरोति इति मोहनः स चासौ स च इति) मे (मम) नेत्रस्पृहां (नयनदिदृक्षां) तनोति (वर्धयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [मदमत्त करके विप्रलम्भके द्वारा जो सम्भोगकी पुष्टि करता है, उस मदनको वशीभूत करनेवाले मोहन अर्थात् मदनमोहन] ॥ 63 ॥ श्लोकका अर्थ; श्रीकृष्णरूपका वर्णन (चित्रजल्प) :- <verse> "नवघनस्निग्धवर्ण, दलिताञ्जन-चिक्कण, इन्दीवर-निन्दि सुकोमल। जिनि' उपमार गण, हरे सबार नयन, कृष्णकान्ति परम प्रबल ॥ 64 ॥ </verse> अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 64॥ अमृतप्रवाह भाष्य-[श्लोकके भावोंको प्रकाशित करते हुए महाप्रभु आगे कह रहे हैं]-श्रीकृष्णकान्ति पिसे हुए काजलकी चिकनाहटको पराजित करते हुए नवीन-मेघकी भाँति स्निग्ध वर्णवाली है, वह इन्दीवर (नीलकमल)की अपेक्षा सुकोमल [सभीके नेत्रोंको आकर्षित करनेवाली] एवं समस्त उपमाओंसे अतीत है॥ 64॥ <verse> कह, सखि, कि करि उपाय ? कृष्णाद्भुत बलाहक, मोर नेत्र-चातक, ना देखि' पियासे मरि' याय ॥ 65 ॥ ध्रु॥ </verse> श्रीकृष्णके रूपकी उपमा :- <verse> सौदामिनी पीताम्बर, स्थिर নহে निरन्तर, मुक्ताहार बकपाँति भाल। इन्द्रधनु-शिखिपाखा, उपरे दियाछे देखा, आर धनु वैजयन्ती-माल ॥ 66 ॥ </verse> <verse> मुरलीर कलध्वनि, मधुर गर्जन शुनि', वृन्दावने नाचे मयूरचय। अकलङ्क पूर्णकल, लावण्य-ज्योत्स्ना झलमल, चित्रचन्द्र ताहाते उदय॥ 67॥ </verse> श्रीकृष्णदर्शन-सुखसे वञ्चित श्रीराधाके द्वारा अपने दुर्भाग्यका वर्णन :- <verse> लीलामृत-वरिषणे, सिञ्चे चौद्द भुवने, हेन मेघ यबे देखा दिल। दुर्दैव-झञ्झापवने, मेघे निल अन्यस्थाने, मरे चातक, पिते ना पाइल ॥" 68 ॥ </verse> अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65-68॥ अमृतप्रवाह भाष्य- हे सखि, श्रीकृष्ण-अद्भुत मेघस्वरूप हैं, मेरे नेत्र-चातक उस मेघको नहीं देखकर प्याससे मर रहे हैं। कृष्णका जो पीताम्बर है, वह उस मेघमें विद्युत-स्वरूप है; किन्तु वह-अस्थिर है। उनके गलेमें जो मुक्ताका हार है, वह मेघके (श्वेत)

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