भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2403

386 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/52-62] कृष्णेर वियोगे एइ सेवक दुःखित। किवा उत्तर दिबे? इहार नाहिक सम्वित्॥" 54॥ अनुवाद—"श्रीकृष्णका चित्त अपनी प्रिया श्रीराधाके मुखारविन्दपर बैठनेके लिये प्रयासरत भँवरोंको लीलाकमलको घुमाकर भगाते हुए अन्यत्र चला गया होगा। तुम्हारे प्रणामकी ओर क्या उनका ध्यान गया अथवा नहीं? हमें सत्य-सत्य यह बतला दो। [उत्तर नहीं मिलनेपर गोपियोंने विचार किया] श्रीकृष्णके वियोगमें ये सेवक भी ऐसे दुःखी हैं कि इन्हें कोई ज्ञान नहीं है, ये क्या उत्तर देंगे॥" 52-54॥ अनुभाष्य—'सम्वित्'—ज्ञान, चैतन्य॥ 54॥ श्रीकृष्ण-रूप-दर्शनकी प्राप्ति :— एत बलि' आगे चले यमुनार कूले। देखे,—ताँहा कृष्ण हय कदम्बेर तले॥ 55॥ अनुवाद—यह कहकर गोपियाँ आगे चलते हुए यमुनाके तटपर पहुँच गयीं, वहाँ उन्होंने श्रीकृष्णको कदम्बके वृक्षके नीचे खड़े हुए देखा॥ 55॥ कोटिमन्मथमोहन मुरलीवदन। अपार सौन्दर्ये हरे जगन्नेत्र-मन॥ 56॥ अनुवाद—अधरोंपर मुरली धारण किये कदम्बके नीचे खड़े श्रीकृष्ण करोड़ों-करोड़ों कामदेवोंको मोहित करनेवाले हैं, उनका अपार सौन्दर्य जगत्-वासियोंके नेत्रों और मनका हरण करनेवाला है॥ 56॥ श्रीकृष्णके दर्शनसे महाप्रभुकी मूर्च्छा और भक्तोंके द्वारा उन्हें सचेत करना :— सौन्दर्य देखिया भूमे पड़े मूर्च्छा पाञा। हेनकाले स्वरूपादि मिलिला आसिया॥ 57॥ अनुवाद—[उन गोपियोंके भावोंमें आविष्ट] महाप्रभु भी [स्वयंको उन गोपियोंके साथ जानकर] श्रीकृष्णके सौन्दर्यको देखकर भूमिपर अचेतन होकर गिर पड़े। उस समय श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्त भी उस पुष्प-उद्यानमें उपस्थित हुए॥ 57॥ पूर्ववत् सर्वाङ्गे सात्त्विकभावसकल। अन्तरे आनन्द-आस्वाद, बाहिरे विह्वल॥ 58॥ अनुवाद—महाप्रभुके समस्त अङ्गोंमें पहलेकी भाँति समस्त सात्त्विक भाव प्रकाशित हो रहे थे। वे हृदयमें तो आनन्दका आस्वादन कर रहे थे, किन्तु बाहरमें विह्वल हो रहे थे॥ 58॥ पूर्ववत् सबे मिलि' कराइला चेतन। उठिया चौदिके प्रभु करेन दर्शन॥ 59॥ श्रीकृष्णके दर्शनसे वञ्चित महाप्रभुका विलाप :— “काँहा गेला कृष्ण? एखनि पाइनु दरशन! याँहार सौन्दर्य मोर हरिल नेत्र-मन! !60॥ पुनः केने ना देखिये मुरली-वदन! ताँहार दर्शन-लोभे भ्रमय नयन॥" 61॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति सभी भक्तोंने मिलकर महाप्रभुको चेतन कराया। महाप्रभु उठकर चारों ओर देखते हुए कहने लगे,—“कृष्ण कहाँ चले गये? मुझे अभी-अभी तो उनके दर्शन प्राप्त हुए थे! उनके सौन्दर्यने मेरे नेत्रों और मनका हरण कर लिया है! मैं पुनः उन मुरली-वदनको क्यों नहीं देख पा रहा हूँ! उनके दर्शनके लोभसे मेरे नेत्र भ्रमण कर रहे हैं॥" 59-61॥ विशाखाके प्रति श्रीकृष्णके दर्शनके लिये तृष्णार्त्त श्रीराधाके वचन :— विशाखारे राधा यैछे श्लोक कहिला। सेइ श्लोक महाप्रभु पड़िते लागिला॥ 62॥ अनुवाद—श्रीराधाने विशाखा सखीको जो श्लोक सुनाया था, महाप्रभु उसी श्लोकको पढ़ने लगे—॥ 62॥