श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2402, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 15/44-53 पन्द्रहवाँ अध्याय 385 (नयनानां) सुनिर्वृतिं (सुखं) तन्वन् (वर्धयन्) इह अपि [किम्] उपगतः? [यतः] कुलपतेः (कृष्णस्य) कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरञ्जितायाः (कान्ताङ्गसङ्गोत्थ-वक्षःस्थ- कुङ्कुमरागेण विभूषितायाः) कुन्दस्रजः (कुन्दपुष्पमालायाः) गन्धः इह वाति (प्रवहति) । श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 44 ॥ श्लोकार्थ :- “कह, मृगि, राधा-सह श्रीकृष्ण सर्वथा। तोमाय सुख दिते आइला? ना कर अन्यथा ॥ 45 ॥ राधा-प्रियसखी आमरा, नहि बहिरङ्ग। दूर हैते जानि तार यैछे अङ्ग-गन्ध ॥ 46 ॥ राधा-अङ्ग-सङ्गे कुचकुङ्कुम-भूषित। कृष्ण-कुन्दमाला-गन्धे वायु-सुवासित ॥ 47 ॥ कृष्ण इँहा छाड़ि' गेला, इँह-विरहिणी। किबा उत्तर दिबे एइ-ना सुने काहिनी ॥” 48 ॥ अनुवाद—“हे हिरनी बतलाओ! सदा तुम्हें प्रसन्न करनेवाले श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ यहाँ आये थे ना? हमें सत्य बतलाना, कुछ मत छिपाना। हम श्रीराधाकी प्रिय सखियाँ हैं, हम कोई बाहरी नहीं हैं। हम दूरसे ही श्रीकृष्णकी अङ्ग-गन्धको पहचान लेती हैं। श्रीराधाके अङ्ग-सङ्गसे उनके कुचकुङ्कुमसे विभूषित श्रीकृष्णकी कुन्दमालाकी गन्धसे वायु सुगन्धित हो रही है। [हिरनीसे उत्तर प्राप्त नहीं होनेपर गोपियाँ कहने लगीं]—श्रीकृष्ण तो इस बेचारी हिरनीको छोड़ गये हैं, यह तो स्वयं ही विरहिणी है। यह क्या उत्तर देगी, इसके कानोंमें तो हमारी बात ही नहीं पहुँच रही है॥” 45-48 ॥ वृक्षोंसे श्रीकृष्णके विषयमें पूछना :- आगे वृक्षगण देखे पुष्पफलभरे। शाखा सब पड़ियाछे पृथिवी-उपरे ॥ 49 ॥ कृष्णे देखि' एइ सब करेन नमस्कार। कृष्णगमन पुछे तारे करिया निर्द्धार ॥ 50 ॥ अनुवाद—आगे उन्हें पुष्पों और फलोंसे सुशोभित ऐसे वृक्ष दिखलायी पड़े, जिनकी सभी शाखाएँ पृथ्वीकी ओर झुकी हुई थीं। इसे देखकर गोपियोंने निश्चित किया कि अवश्य ही इन्होंने श्रीकृष्णको देखकर झुककर नमस्कार किया होगा, इसलिये वे वृक्षोंसे पूछने लगीं कि श्रीकृष्ण किधर गये हैं॥ 49-50 ॥ शास्त्रीय-दृष्टान्त :- श्रीमद्भागवत (10/30/12) में— बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीतपद्मो रामानुजस्तुलसिकालिकुलैर्मदान्धैः। अन्वीयमान इह वस्तरवः प्रणामं किंवाबिनन्दति चरन् प्रणयावलोकैः ॥ 51 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 51 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे वृक्षों, बतलाओ, राधिकाके कन्धेपर [बायीं] भुजाको रखकर, [दाहिने] हाथमें कमल धारण करके, तुलसीके रसपानसे मदमें अन्धे हुए भौंरोंके द्वारा अनुसरण किये जा रहे बलरामके अनुज श्रीकृष्णने चलते-चलते प्रणय-अवलोकनके द्वारा तुम्हारे प्रणामको स्वीकार करके क्या अभिनन्दन किया है? 51 ॥ अनुभाष्य— हे तरवः, (वृक्षाः,) प्रियांसे (प्रियायाः स्कन्धे) बाहुं (वाम-भुजम्) उपधाय (संन्यस्य) गृहीतपद्मः (दक्षिणभुजधृत- लीलाकमलः) मदान्धैः (रसपानमदेन अन्धैः) तुलसिकालिकुलैः (तुलसिकायाः अलिकुलैः) अन्वीयमानः (अनुगम्यमानः) रामानुजः (कृष्णः) इह चरन् प्रणयावलोकैः वः (युष्माकं) प्रणामं किम् अभिनन्दति वा? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 51 ॥ श्लोकार्थ :- “प्रिया-मुखे भृङ्ग पड़े, ताहा निवारिते। लीलापद्म चालाइते हैल अन्यचित्ते ॥ 52 ॥ तोमार प्रणामे कि करियाछेन अवधान? किवा नाहि करेन, कह वचनप्रमाण ॥ 53 ॥