भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2401

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384 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/35-44 ] कृष्ण तोमार इँहा आइला, पाइला दरशन? कृष्णेर उद्देश कहि' राखह जीवन ॥" ३६ ॥ अनुवाद—[श्रीकृष्णविरही गोपियोंका विलाप—] "हे आम्र-वृक्ष! हे कटहल-वृक्ष! हे प्रियाल (चिरौँजी)-वृक्ष! हे जामुन-वृक्ष! हे कचनार-वृक्ष! आप सब (व्रज) तीर्थवासी हो, इसलिये दूसरोंका उपकार करो। श्रीकृष्ण आपके यहाँ आये थे, क्या आपने उनके दर्शन किये हैं? श्रीकृष्ण किधर गये हैं, हमें यह बतलाकर हमारे जीवनकी रक्षा कीजिये॥" ३५-३६ ॥ उत्तर ना पाञा पुन: करे अनुमान। 'एइ सब—पुरुष-जाति, कृष्णेर सखार समान॥ ३७॥ ए केने कहिबे कृष्णेर उद्देश आमाय? ए—स्त्रीजाति लता, आमार सखीप्राय॥ ३८॥ अवश्य कहिबे,—पाञाछे कृष्णेर दर्शने।' एत अनुमानि' पुछे तुलस्यादि-गणे॥ ३९॥ “तुलसि, मालति, यूथि, माधवि, मल्लिके। तोमार प्रिय कृष्ण आइला तोमार अन्तिके? ?४० ॥ तुमि-सब हओ आमार सखीर समान। कृष्णोद्देश कहि' सबे राखह पराण॥" ४१ ॥ अनुवाद—वृक्षोंसे कोई भी उत्तर नहीं मिलनेपर उन्होंने पुन: अनुमान लगाया कि 'ये सब वृक्ष तो पुरुष जातिके होनेके कारण श्रीकृष्णके सखाके समान हैं। इसलिये श्रीकृष्ण किधर गये हैं, ये वृक्ष हमें क्यों बतलायेंगे? ये लताएँ तो स्त्री-जाति हैं, ये तो हमारी सखियों जैसी हैं, इसलिये ये तो हमें अवश्य ही बतलायेंगी कि इन्होंने श्रीकृष्णके दर्शन प्राप्त किये हैं।' ऐसा अनुमान करके उन्होंने तुलसी आदिसे पूछा,—"हे तुलसि! हे मालति! हे जूहि! हे माधवि! हे मल्लिके! क्या तुम्हारे प्रिय श्रीकृष्ण तुम्हारे निकट आये थे? तुम सब तो हमारी सखियोंके समान हो। हमें श्रीकृष्ण किधर गये हैं, यह बतलाकर हमारे प्राणोंकी रक्षा करो॥" ३७-४१ ॥ उत्तर ना पाञा पुनः भावेन अन्तरे। 'एह—कृष्णदासी, भये ना कहे आमारे ॥' ४२ ॥ अनुवाद—लताओंसे भी उत्तर नहीं मिलनेपर गोपियाँ पुनः मनमें विचार करने लगीं,—'ये सब तो कृष्णकी दासियाँ हैं, ये भयके कारण हमें कुछ भी नहीं बतला रही हैं॥' ४२ ॥ आगे मृगीगण देखि' कृष्णाङ्ग-गन्ध पाञा। तार मुख देखि' पुछेन निर्णय करिया ॥ ४३ ॥ अनुवाद—थोड़ा आगे चलनेपर हिरनीको देखकर और कृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध पाकर वे उस हिरनीके मुखको देखकर कुछ निर्णय करते हुए पूछने लगीं॥ ४३ ॥ हिरनीसे श्रीकृष्णके विषयमें जिज्ञासा :- श्रीमद्भागवत (10/30/11) में— अप्येण-पत्‍न्युपगतः प्रिययेह गात्रै- स्तन्वन् दृशां सखी सुनिर्वृतिमच्युतो वः। कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुम-रञ्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥ ४४ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ४४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कान्ताके अङ्ग-सङ्गके द्वारा कुचकुङ्कुमसे रञ्जित कुन्दमालाधारी श्रीकृष्णकी गन्ध इस ओरसे आ रही है। हे हिरनी, राधिकाके साथ श्रीकृष्ण तुम्हारे नेत्रोंके आनन्दको वर्धित करके क्या इस पथसे गये हैं? ४४ ॥ अनुभाष्य—गोपियोंके साथ रासलीला करते-करते भगवान् श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर एकान्त श्रीकृष्णमें आविष्ट चित्तवाली गोपियाँ विरहमें उन्हें ढूँढ़ रही हैं— हे सखि, एणपत्नि, (हरिणि,) अच्युतः (कृष्णः) प्रियया [सह वर्त्तमानः] गात्रैः (अङ्गसङ्गैः) वः (युष्माकं) दृशां