श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2400, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 15/28-35 पन्द्रहवाँ अध्याय 383
लेकर अन्तर्धान हो जानेपर जैसे सखियाँ उन्हें ढूँढ़ते हुए भ्रमण कर रही थीं, उन सखियोंके भावोंके आवेशमें महाप्रभु श्रीकृष्णको इधर-उधर ढूँढ़ते हुए प्रत्येक वृक्ष-लताके निकट जाकर श्लोक पढ़ने लगे॥ 28-31॥
श्रीकृष्णविरहिणी गोपियोंके द्वारा सर्वत्र चेतनामय कृष्ण और कृष्णभक्तके प्रति दृढ़ विश्वासवशतः कृष्णको ढूँढ़ना (उद्घूर्णा); प्रत्येक वृक्षसे कृष्णके विषयमें पूछना :— श्रीमद्भागवत (10/30/9, 7, 8) में— चूतप्रियाल-पनसासनकोविदार- जम्ब्वर्कबिल्वबकुलाम्रकदम्बनीपाः। येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः॥ 32 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे चूत (आमकी एक विशेष जाति), प्रियाल, कटहल, पीतशाल, कचनार, जामुन, आक, बेल, मौलसिरी, आम, कदम्ब, धूलिकदम्ब आदि वृक्षों तथा हे अन्यान्य यमुनाताट-निवासी परम-मङ्गल चित्तवाले (अन्योंके हितका व्रत धारण करनेवाले) सभी वृक्षों! आत्म-स्वरूप-रहित (अर्थात् शून्य मनवाली) हम गोपियोंको कृष्ण कहाँपर हैं, यह बतलाओ॥ 32 ॥
अनुभाष्य—भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा गोपियोंके साथ रासलीला करते-करते अचानक अन्तर्धान होनेपर उन्हें नहीं देखकर एकान्तिक कृष्णमय चित्तवाली गोपियाँ उन्हें ढूँढ़ रही हैं— चूतप्रियालपनसासनकोविदारजम्ब्वर्कबिल्वबकुलाम्रकदम्बनीपाः (समीपवर्तिनः फलवृक्षादीन् आहुः—हे चूत, हे प्रियाल, हे कण्टक, हे पीतशाल, हे कोविदार, हे जम्बो, हे अर्क, हे बिल्व, हे बकुल, हे आम्र, हे कदम्ब, हे नीप, यूयं) ये अन्ये (ते च हे वृक्षाः) परार्थभवकाः (परार्थमेव भवः जन्म येषां ते,) यमुनोपकूलाः, (यमुनायाः कालिन्द्याः उपकूले तटभूमौ वर्त्तमानाः तरवः ते भवन्तः) रहितात्मनां (शून्य-मनसां) नः (अस्माकं) कृष्णपदवीं (कृष्णमार्गं) शंसन्तु (कथयन्तु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 32 ॥
श्रीतुलसीसे श्रीकृष्णके विषयमें जिज्ञासा :— कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये। सह त्वालिकुलैर्विभ्रद्दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥ 33 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ओह कल्याणि, गोविन्दचरण-प्रिये तुलसी, तुम—अच्युतको अत्यन्त प्रिय हो; क्या तुमने कृष्णको भँवरोंके साथ तुम्हें धारण किये हुए जाते देखा है? 33 ॥
अनुभाष्य— हे कल्याणि, (सौभाग्यशालिनि,) गोविन्दचरणप्रिये, (गोविन्दस्य चरणप्रिये,) तुलसि, अलिकुलैः सह त्वा (त्वां) बिभ्रत् ते (तव) अतिप्रियः अच्युतः (गोविन्दः) क्वचित् [त्वया किं] दृष्टः? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥
पुष्पोंके वृक्षोंसे श्रीकृष्णके विषयमें पूछना :— मालत्यदर्शि वः कच्चिन्मल्लिके जाति यूथिके। प्रीतिं वो जनयन् यातः करस्पर्शन माधवः॥ 34 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 34 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे मालति, हे मल्लिके (चमेली), हे मोगरा, हे जूहि, क्या तुमने तुम्हें अपने हाथोंसे स्पर्श करके तुम्हारे आनन्दको उत्पन्न करनेवाले कृष्णको जाते देखा है? 34 ॥
अनुभाष्य— हे मालति, हे मल्लिके, हे जाति, हे यूथिके, करस्पर्शन वः (युष्माकं) प्रीतिं जनयन् यातः (प्रस्थितः) माधवः वः (युष्माभिः) कच्चित् अदर्शि (दृष्टम्)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 34 ॥
श्लोकोंका अर्थ; श्रीकृष्णमें तन्मयी विरहिणी गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णको ढूँढ़ते हुए विलाप :— “आम्र, पनस, पियाल, जम्बु, कोविदार। तीर्थवासी सबे, कर पर-उपकार॥ 35 ॥