भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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382 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/12-31 ]

[बायाँ स्तम्भ] और महाप्रभु इसका अर्थ करते हुए कह रहे हैं,—“‘सखि हे, शुन, मोर दुःखेर कारण।' पाँच दिशाओंमें मेरी पाँच इन्द्रियाँ जा रही हैं—आँख रूपकी ओर, नासिका सौरभ्यकी ओर, कर्ण मधुर शब्दकी ओर, त्वचा स्पर्शकी ओर तथा जिह्वा रसकी ओर। ये पाँचों एक घोड़ेपर बैठी हैं अर्थात् मनके सहारे ही समस्त विषयोंका रस लेती हैं। ये पाँचों इन्द्रियाँ एक मनरूपी घोड़ेको अपनी-अपनी दिशामें खींच रही हैं। इस प्रकार एक ही साथ खींचे जानेके लाभके रूपमें केवल घोड़ेके ही प्राण चले जाते हैं,—मैं उसे किस प्रकार सहन कर सकती हूँ?” श्रीकृष्णके इस माधुर्यका जो आस्वादन करता है, वह अमृतका पान करता है। इसमें जो बाहरसे दुःखके समान प्रतीत होता है, वह भी परमानन्द है। किन्तु इस जगत्के समस्त लोग इन पाँच प्रकारके जड़ीय विषयोंके पीछे अपनी इन्द्रियोंको लगाकर जड़ीय रसका अनुभव करना चाहते हैं और वे जिसे सुख मानते हैं, वास्तवमें वह केवल विषपान ही है।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी” ॥ 12-23 ॥

महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णविरहमें अपने दो सङ्गियोंके निकट विलाप :— एत कहिं गौरहरि, दुइजनार कण्ठ धरि', कहे,—“शुन, स्वरूप-रामराय। काँहा करों, काँहा याङ, काँहा गेले कृष्ण पाङ, दुँहे मोरे कह से उपाय ॥” 24 ॥ अनुवाद—श्रीगौरहरिने यह कहकर श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी और श्रीरामानन्द रायके गलेमें अपने हाथ डालकर उनसे कहा,—“हे स्वरूप, हे रामराय ! सुनो। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मुझे कहाँ जानेपर कृष्ण मिलेंगे, आप दोनों मुझे उसका उपाय बतलाओ॥” 24 ॥ एइमत गौरप्रभु प्रति दिने-दिने। विलाप करेन स्वरूप-रामानन्द-सने ॥ 25 ॥

[दायाँ स्तम्भ] अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरहरि दिन-प्रतिदिन श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायके आगे विलाप करते थे॥ 25 ॥

महाप्रभुके विरहमें श्रीस्वरूप और रामरायके द्वारा सान्त्वना :— सेइ दुइजन प्रभुरे करे आश्वासन। स्वरूप गाय, राय करे श्लोक पठन ॥ 26 ॥

महाप्रभुके भावके उपयोगी प्रिय ग्रन्थसमूह :— कर्णामृत, विद्यापति, श्रीगीतगोविन्द। इहार श्लोक-गीते प्रभुर कराय आनन्द ॥ 27 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भावोंके अनुरूप श्रीस्वरूप दामोदर गान करते और श्रीरामानन्द राय श्लोकका पाठ करते, इस प्रकार वे दोनों महाप्रभुको आश्वासन देते। वे श्रीकृष्णकर्णामृतके श्लोकों, श्रीविद्यापतिके द्वारा रचित गीतों और श्रीगीत-गोविन्दके पदोंसे महाप्रभुको आनन्दित करते थे॥ 26-27 ॥

गोपियोंकी दासीके अभिमानमें महाप्रभुको सर्वत्र श्रीकृष्णलीलाका दर्शन और उसका अन्वेषण :— एकदिन महाप्रभु समुद्र याइते। पुष्पेर उद्यान तथा देखेन आचम्भिते ॥ 28 ॥ वृन्दावन-भ्रमे ताँहा पशिला धाञा। प्रेमावेशे बुले ताँहा कृष्ण अन्वेषिया ॥ 29 ॥ रासे राधा लञा कृष्ण अन्तर्धान कैला। पाछे सखीगण यैछे चाहि' बेड़ाइला ॥ 30 ॥ सेइ भावावेशे प्रभु प्रति-तरुलता। श्लोक पड़ि' चाहि' बुले यथा तथा ॥ 31 ॥ अनुवाद—एकदिन महाप्रभुने समुद्रकी ओर जाते समय मार्गमें अकस्मात् एक पुष्पोंके उद्यानको देखा। उस उद्यानमें वृन्दावनका भ्रम होनेसे महाप्रभु उसकी ओर दौड़कर उसमें प्रविष्ट हो गये और प्रेमाविष्ट होनेके कारण वहाँ श्रीकृष्णको ढूँढ़ते हुए भ्रमण करने लगे। रासलीलाके समय श्रीकृष्णके द्वारा श्रीराधाको