श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2398, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 15/12-23 पन्द्रहवाँ अध्याय 381
व्याकुल मत हो, मेरा अनुभवकर अपनी कामनाको पूर्ण करो।” भक्तके निकट उसके कर्णेन्द्रियके द्वारा ग्राह्य अपनी सुमधुर वाणीरूप तीसरे माधुर्यको प्रकाशित करते हैं। उस मधुर स्वरको सुनते ही उस भक्तकी समस्त इन्द्रियाँ श्रवणमय हो जाती हैं और वह फिर तीसरी आनन्द मूर्च्छामें पड़ने लगता है, उसी क्षण श्रीभगवान् कृपापूर्वक अपने श्रीचरणकमलोंसे या करकमलोंसे अपना अत्यन्त मधुर स्पर्श प्रदान करते हुए अथवा अपने हृदयसे लगाकर उस भक्तको अपने चौथे माधुर्य सौकुमार्यका अनुभव कराते हैं। तदनन्तर प्रेमीभक्तकी चतुर्थ मूर्च्छाके प्रारम्भमें श्रीभगवान् अपने अधरोंका सौरस्य नामक पाँचवाँ माधुर्य प्रकट करते हैं, जो भक्तकी रसनेन्द्रियके द्वारा ग्राह्य है। इस प्रकारसे भक्त श्रीकृष्णके पाँच रसोंका क्रमशः आस्वादन करता है। परन्तु महाप्रभु राधाजीके भावोंमें विभावित होकर कह रहे हैं कि एक ही समयमें समस्त इन्द्रियाँ कृष्णके इन पाँच रसोंमें एक साथ आकर्षित हो जाती हैं, इससे मनरूपी एक घोड़ा क्या करे? 'कोटीन्दुशीताङ्गकः'—करोड़ों चन्द्रमाओंकी शीतलताको पराभूत करनेवाली श्रीकृष्णके अङ्गोंकी जो शीतलता है, वह राधाजीके चित्तको प्लावित कर देती है। 'सौरभ्यामृतसंप्लवावृतजगत्'—श्रीकृष्णके अङ्गोंकी ऐसी निराली सुगन्ध है जो अन्य सभी वस्तुओंकी सुगन्धको पराभूत कर देती है। जैसे—श्रीकृष्णके द्वारा प्रेरित उद्धवजी व्रजमें आये। वे देखनेमें श्रीकृष्णके समान ही हैं और उन्होंने श्रीकृष्णके प्रसादी वस्त्र और माला धारण किये हुए थे। वे जब कदम्ब क्यारीमें गोपियोंके निकट आये, तो उन्हें देखकर गोपियाँ अनुमान लगाने लगीं कि यह कौन है? गोपियाँ परस्पर कहने लगीं कि यह देखनेमें तो श्यामसुन्दरके समान दिखता है, किन्तु श्यामसुन्दर नहीं है। ललिताजी कहने लगीं,—'मैं जानती हूँ, यह कृष्णका दूत है। कृष्णके अङ्गोंसे उतरे वस्त्र और माला पहन कर आया है। नेत्रोंसे देखनेसे तो भूल हो सकती है, किन्तु मेरी नाक अभ्रान्त है, वह कभी भूल नहीं कर सकती। इस मालासे कृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध आ रही है जो मालाके पुष्पोंकी सुगन्धको भी पराभूत करके अपना परिचय दे रही है। इसलिये यह कृष्णका दूत है।' श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर राधाजी उनका चिन्तन कर रही हैं। विरहमें होते-होते वे ऐसी विप्रलम्भकी स्थितिमें पहुँच गयीं कि उनको यह भ्रम हुआ कि कृष्ण वापस आ गये हैं। वे भूल गयीं कि कृष्ण द्वारकामें हैं। उन्हें लगा कि कृष्ण वहीं कहीं छिप रहे हैं। तभी उन्हें लगा कि कोई उनकी आँखोंको अपने हाथोंसे ढक रहा है। पहले तो राधाजीने ललिताका नाम लिया कि वे उनकी आँखोंको ढक रही हैं, फिर विशाखाका नाम लिया। उस विरहमें भी तब वे मुस्कराने लगीं और कहा,–'मैं समझ गयी हूँ। अरे! यह तो कृष्णके अङ्गोंकी गन्ध आ रही है। यह तो अवश्य कृष्ण ही हैं, वे लम्पट, चोर ही हैं।' राधाजीने श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्धके द्वारा उनको पहचान लिया। श्रीकृष्णके अङ्गोंकी ऐसी मतवाली सुगन्ध है जो गोपियोंको पागल बना देती है। और इसी पागलपनके कारण उनके द्वारा अपने लोकधर्म, लज्जा, शील आदि सभीका त्याग हो जाता है। श्रीकृष्णके अङ्गोंका सौरभ्यामृत अन्य सभी वस्तुओंकी सुगन्धको पराभूत करनेवाला है। 'पीयूषरम्योधरः'—श्रीकृष्णके मुखारविन्दका अधरामृत कैसा है? वह इतना मधुर है कि वह पीयूषको भी कोटि-कोटि बार पराभूत कर देता है। जगत्में पीयूषसे अधिक कोई भी सुस्वादु वस्तु नहीं है, किन्तु श्रीकृष्णका अधरामृत अपने एक कणके द्वारा उसके समस्त माधुर्यको पराभूत कर देनेवाला है। श्रीकृष्णकी ये पाँच प्रकारकी जो माधुरियाँ हैं, वे गोपियोंके पातिव्रत्य-धर्म, लोक-लज्जा, धैर्य, गुरुजनोंका भय आदि समस्त भावोंको क्षणमात्रमें भुलाकर उनका बलपूर्वक आकर्षण कर लेती हैं।