श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें380 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/12-23 ] उन्हें श्रवण करके कोई भी स्त्री (गोपी) अपने सतीत्वको एक क्षणके लिये भी नहीं रख सकती, अपनी लोक-लज्जाको भी नहीं रख सकती। उनके चित्तका हरण हो जाता है। श्रीकृष्णके रूपमें जैसी शक्ति है, वैसी शक्ति उनके वचनमें भी है। बंसी मधुर-से-मधुर है, किन्तु श्रीकृष्णके मुखसे निकली हुई वाणी और भी अधिक मधुर है। श्रीकृष्णके मुखसे इतने प्रेमसे निकला हुआ वचन—‘हे प्रिये’ गोपियोंके चित्तका सम्पूर्ण हरण कर लेता है। उनका परिहासमय वचन कैसा है ? श्रीकृष्ण—‘तुम कौन हो? यहाँ क्यों आयी हो?’ श्रीराधा—‘तुम नहीं जानते कि मैं कौन हूँ?’ श्रीकृष्ण—‘यदि जानता तो पूछता क्यों ? मैं तो केवल यह जानता हूँ कि तुम चोर हो। मेरे उद्यानको तुमने रौंदकर नष्ट कर दिया और जितने अच्छे-अच्छे पुष्प हैं, उन्हें तुमने और तुम्हारी सखियोंने चुरा लिया है।’ श्रीराधा—‘अहा ! आज मैं परम धार्मिकको देख रही हूँ। आप तो बचपनसे ही परम धार्मिक हैं।’ श्रीकृष्ण—‘बचपनसे मैंने ऐसा क्या किया है कि मैं अधार्मिक हो गया, कुछ बताओ तो।’ श्रीराधा—‘आप बड़े धार्मिक हो। जन्म लेते ही पूतनाके प्राणोंको आपने चोरी किया। और व्रजमें ऐसा कोई घर नहीं, जहाँपर आपका यह धार्मिक भाव व्यक्त न हुआ हो। ऐसे आप धार्मिक हो। इन सबसे आपकी सन्तुष्टि नहीं हुई, तो कन्याओंके वस्त्र चुरा लिये—यह तो और भी उन्नत धर्म है। और इससे भी परम धर्म—समस्त व्रजकी कन्याओंको बुलाकर रास किया, यह तो आपका परम धर्म है।’ इस प्रकार परस्परका जो वार्तालाप है, वह परम हास्ययुक्त, परम मधुर, परम आनन्दमय है। एक-एक बात ऐसी मधुर है कि जो श्रीकृष्णको आनन्दसे भर देती है और श्रीराधा एवं गोपियोंको भी आनन्दसे भर देती है। अन्य एक प्रसङ्ग— श्रीराधाने कहा,—‘ललिते ! कुछ उपाय करो। ये धूर्त महाशयजी स्वयंको बहुत बलवान समझते हैं और पौरुषेय कार्यमें तो ये विजयी हो जायेंगे। इसलिये ऐसा कोई उपाय करो कि हम इनको जीत सकें।’ ललिता—‘यह तो बहुत सहजमें हो जायेगा।’ श्रीराधा—‘कैसे ?’ ललिता—‘अभी पासाका खेल प्रारम्भ कर दो।’ जब श्रीकृष्ण पासाके खेलमें हार गये, तो राधाजीने कहा कि ग्वाले तो गँवार होते हैं, पासा खेलनेके लिये बुद्धि चाहिये, यह ग्वालोंका काम नहीं है। आप तो गायोंके पीछे-पीछे लठिया लेकर चलो और उनके गोबरको लेकर इधर-उधर रखो। पासा तो बुद्धिमानोंका कार्य है। आपकी बुद्धिसे परेकी बात है। ऐसा श्रीकृष्ण और गोपियोंमें परस्पर परिहास होता है। इसको ही यहाँ ‘कर्णानन्दी’ कहा गया है। यहाँपर राधाजीका प्रसङ्ग है, इसलिये राधाजीके लिये ‘कर्णानन्दी’ कहा गया है—राधाजीके कर्णोंके आनन्दको वर्धित करनेवाला। माधुर्य-कादम्बिनी ग्रन्थमें श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर कहते हैं—श्रीभगवान् सर्वप्रथम जातप्रेम भक्तके नेत्रोंके आगे अपने अपार चमत्कारितापूर्ण सौन्दर्यको प्रकाशित करते हैं। तत्पश्चात् उनके उस रूपमाधुर्यके द्वारा उस भक्तकी मन सहित समस्त इन्द्रियाँ प्रेममय हो उठती हैं और उसमें स्तम्भ, कम्प, वाष्पादि प्रेमके विकार उत्पन्न होते हैं, जिन्हें वह विघ्नके समान ही मानता है। इससे वह भक्त आनन्दरूपी मूर्च्छामें अपनी सुध-बुध खो देता है। तब श्रीभगवान् उस भक्तको सचेतन करनेके लिये उसके समीप उपस्थित होते हैं और उसकी घ्राणेन्द्रिय (नाक) में अपने दूसरे माधुर्य सौरभको प्रकाशित करते हैं। उस अपूर्व मधुर सौरभसे उस भक्तकी सारी इन्द्रियाँ घ्राणेन्द्रियका भाव प्राप्त कर लेती हैं जिससे वह भक्त पुनः दूसरी आनन्दमूर्च्छामें अचेतन हो जाता है। उस अवस्थाके प्रारम्भमें श्रीभगवान् यह कहते हुए—“मेरे प्यारे भक्त ! मैं तो सब प्रकारसे तुम्हारे अधीन हूँ, तुम