श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 15/12-23 पन्द्रहवाँ अध्याय 379 अनुभाष्य—कृष्णके प्रति आकृष्ट मेरी पाँच डाकूरूपी पाँच इन्द्रियाँ परस्पर सभी युक्ति करती हैं, —'चलो, सभी मिलकर इस पराये धन मनरूपी घोड़ेका अपहरण करें अर्थात् उसकी चोरी की जाय ॥'15-16॥ अमृताणुकणिका—महाप्रभु श्रीराधाजीके भावमें विभावित होकर श्रीकृष्णवियोगमें श्रीराधाके अधिरूढ़ महाभावका आस्वादन कर रहे हैं। श्रीकृष्णसे मिलनेकी उनकी इतनी तीव्र उत्कण्ठा है जिसका शब्दोंके द्वारा वर्णन करना सम्भवपर नहीं है। वे एक व्रजकी लीलाका स्मरण कर रहे हैं—एक दिन दोपहरके समय श्रीकृष्ण गोवर्धनकी तलहटीमें गौओंको चरा रहे थे। निकट ही किसी प्रकारसे उनका श्रीरूप-मञ्जरीसे मिलन हुआ। उन्होंने श्रीरूप-मञ्जरीको कमलकी एक माला दी। मालाके द्वारा वे इङ्गित कर रहे थे कि वे श्रीराधासे मिलनेके लिये उत्कण्ठित हैं। श्रीरूप-मञ्जरीने जावटमें जाकर वह माला श्रीराधाको दी। उस मालाको प्राप्त करके वे श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये इतनी उत्कण्ठित हुईं कि वे अपने धैर्यको धारण नहीं कर पा रही थीं। वे विशाखाजीको उपरोक्त श्लोकके द्वारा अपनी उत्कण्ठाको व्यक्त करने लगीं और महाप्रभु श्रीराधाके भावोंमें विभावित होकर उस श्लोकका पाठ कर रहे हैं और स्वयं ही उसका अर्थ बतला रहे हैं। 'सौन्दर्यामृतसिन्धुभङ्गललना-चित्ताद्रिसंप्लावकः'—जगत्में समुद्रका जल पासमें स्थित पर्वतके चरणोंको स्पर्श करता है। यदि हिमालय जैसा पर्वत भी उसके तटपर स्थित हो, तो भी समुद्रके जलकी तरङ्गैं उत्छलकर उसके चरणोंको छूकर वहाँसे शान्त होकर लौट जायेंगी। किन्तु पर्वत अटल-अचल रहता है। वह बहुत ऊँचा है और कभी भी हिलनेवाला नहीं है, वह धीर है। उसकी जड़ें बहुत दृढ़ हैं। उसके शिखरको झुका देना अथवा अपने जलमें डुबो देना समुद्रके लिये सम्भव नहीं है। किन्तु श्रीकृष्णके रूप-माधुर्यके अमृतका जो सिन्धु है, उसमें तरङ्गैं इस समुद्रसे भी कोटि गुणा अधिक ऊँची उठती हैं और नारियोंके चित्तरूपी पर्वतके शिखरको भी अपने अङ्कमें समा लेती हैं तथा उनकी रग-रगमें प्रवेश करके उनको जलमय बना देती हैं। यहाँ नारियोंका तात्पर्य व्रजगोपियोंसे है, अन्य किसी नारीसे नहीं और शिखरका तात्पर्य उनके पातिव्रत्य-धर्मसे है। अत्रिकी पत्नी अनसूया और वशिष्ठकी पत्नी अरुन्धती—इनका पातिव्रत्य-धर्म जगत्में प्रसिद्ध है। सीताजीके पातिव्रत्य-धर्मकी महिमा भी जगत्में सुनी जाती है। किन्तु गोपियोंका पातिव्रत्य-धर्म इनके पातिव्रत्य-धर्मसे भी बहुत ऊँचा है। अरुन्धती और अनसूयाका जो पातिव्रत्य-धर्म है, उसमें कुछ दोष है। इनका चित्त श्रीकृष्णमें और अपने-अपने पतिमें भी है, साथमें लौकिक धर्म और लोक-लज्जाके प्रति भी है। किन्तु गोपियोंका चित्त श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीमें भी नहीं है। गोपियोंके पातिव्रत्य-धर्मकी जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका कोई सन्धान नहीं है और ये कभी भी हिलनेवाली नहीं हैं। इसलिये अरुन्धती और अनसूया आदि भी गोपियोंके पातिव्रत्य-धर्मकी वाञ्छा या अभिलाषा रखती हैं ('याँर पतिव्रता-धर्म वाञ्छे अरुन्धती ॥'—मध्यलीला 8/183)। इसलिये गोपियोंका जो धैर्य है, उनका जो पातिव्रत्य-धर्म है, उनकी जो लज्जा है, वह एक-एक शिखर है। वे पर्वतके शिखरकी भाँति अपने धर्मको नहीं छोड़ सकतीं, किन्तु श्रीकृष्णके रूपरूपी सिन्धुकी एक तरङ्गसे ये शिखर चूर्ण होकर समुद्रमें गिर जाते हैं। इन गोपियोंमें भी श्रीमती राधिकाका पातिव्रत्य-धर्मरूपी शिखर सबसे ऊँचा है। उस शिखरकी ऊँचाईकी सीमा नहीं है, किन्तु श्रीकृष्णके रूप-माधुर्यके अमृतका जो सिन्धु है, उसकी एक तरङ्गका एक बिन्दु उसको अपनेमें डुबो देता है। इसलिये श्रीराधा कह रही हैं कि हे सखी, हमारा धैर्य, हमारा व्रत, हमारी लज्जा—ये सब न जाने कहाँ चले गये? ये सब एक क्षणमें ध्वंस हो जाते हैं। 'कर्णानन्दि-सनर्मरम्यवचन:'—कर्णको आनन्द देने वाले उनके परिहासमय, नर्म और कोमल वचन। चित्तको आह्लादित करनेवाले श्रीकृष्णके जो वचन हैं,