श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें378 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/15-23 ] श्रीकृष्णके वचनोंके माधुर्यका बल :- घोड़ेको लेकर (रूपादि) पाँच-पाँच (विषयों)की ओर कृष्णेर वचन-माधुरी, नाना-रस-नर्मधारी, खींचा-तानी करती है, इस प्रकार एक ही साथ खींचे तार अन्याय कहन ना याय। जानेके लाभके रूपमें केवल घोड़ेके ही प्राण चले जाते जगतेर नारीर काणे, माधुरीगुणे बान्धि' ताने, हैं,—मैं उसे किस प्रकार सहन कर सकती हूँ? यदि तानाटानि काणेर प्राण याय ॥ 20 ॥ कहो, तुम अपनी इन्द्रियोंका दमन क्यों नहीं करती? श्रीकृष्णके अङ्गोंके माधुर्यका बल :- हे सखि, इन्द्रियोंको भी भला किस प्रकारसे दोष दूँ? कृष्ण-अङ्ग सुशीतल, कि कहिमु तार बल, कृष्ण-रूपादि पाँच विषय-स्वभावसे ही महा-आकर्षणसे छटाय जिने कोटिन्दु-चन्दन। युक्त हैं; रूपादि पाँच वस्तुएँ पाँच इन्द्रियोंको अपनी-अपनी सशैल नारीर वक्ष, ताहा आकर्षिते दक्ष, ओर खींचती रहती हैं, मनरूपी घोड़ेके ऊपर चढ़ीं पाँच आकर्षये नारीगण-मन ॥ 21 ॥ ज्ञानेन्द्रियाँ उसी ओर ही आकृष्ट होकर दौड़ती हैं; श्रीकृष्णकी सुगन्धके माधुर्यका बल :- फलस्वरूप, घोड़ेके प्राणोंके नष्ट होनेपर मेरे भी प्राण कृष्णाङ्ग-सौरभ-भर, मृगमद-मनोहर, जाते हैं। तीनों लोकोंमें जितनी भी नारियाँ हैं, उनका नीलोत्पलेर हरे गर्व-धन। चित्त यद्यपि ऊँचे पर्वतके समान है, किन्तु कृष्णरूपामृत जगत्-नारीर नासा, तार भितर पाते वासा, सिन्धुकी तरङ्ग-बिन्दु उन ऊँचे पर्वतोंको भी डुबो रही नारीगणे करे आकर्षण ॥ 22 ॥ है। कृष्णकी रसनर्म (परिहास)-रूपी वचन-चातुरी श्रीकृष्णके अधरोंके स्पर्शके माधुर्यका बल :- नारियोंके प्रति ऐसा अन्यायपूर्ण आचरण करती है कि कृष्णेर अधरामृत, ताते कर्पूर मन्दस्मित, उसके विषयमें कुछ कहा नहीं जा सकता; नारियोंके स्व-माधुर्ये हरे नारीर मन। कानोंमें प्रवेश करके वह अपने माधुरी-गुणसे उनका अन्यत्र छाड़ाय लोभ, ना पाइले मने क्षोभ, बन्धन करके खींचा-तानी करती है, जिससे कानोंके व्रजनारीगणेर मूलधन ॥” 23 ॥ प्राण जाते हैं। कृष्णके अङ्ग अतिशय सुशीतल हैं, उनकी शीतल किरणें करोड़ों-करोड़ों चन्द्रमाओं और अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 15-23 ॥ चन्दनोंको पराजित करती हैं। कृष्णके अङ्ग-नारियोंके अमृतप्रवाह भाष्य-कृष्णके रूप, वचन, मुरलीध्वनि पर्वतरूपी वक्षको आकर्षित करनेमें अत्यन्त दक्ष हैं एवं आदि रूप, शब्द, स्पर्श, सौरभ और अधरका रस,—ये नारियोंके मनको आकर्षित करते हैं। कृष्णके अङ्गोंकी पाँचों महामाधुर्यसे परिपूर्ण हैं; मेरी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ सुगन्ध मनोहर मृगमद और नीलकमलके गर्वका भी श्रीकृष्णके उन-उन विषयोंके दर्शनसे लुब्ध होकर नाश करती है—वह जगत्की नारियोंकी नासिकामें प्रत्येक ही इन्द्रिय मेरे मनरूपी एकमात्र घोड़ेके ऊपर प्रवेश करके वहाँ वासस्थान बनाकर नारियोंको आकर्षित चढ़कर एक-ही-साथ पाँचों ओर दौड़ना चाहती हैं; हे करती है। कृष्णका अधरामृत मन्दहास्यरूपी कर्पूरके सखि, दुःखकी बात क्या बतलाऊँ? मेरी पाँचों साथ मिलकर अपने माधुर्यसे नारियोंके मनका हरण ज्ञानेन्द्रियाँ-अत्यन्त विषयलम्पट और डाकुओंकी भाँति करता है; वह कृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंमें हैं। कृष्ण परपुरुष हैं, ऐसा जाननेपर भी उन-उन लोभको छुड़ा देता है, किन्तु स्वयं दुर्लभतावशतः कृष्ण-विषयोंको हरण करनेमें प्रवृत्त हैं। मेरा मन तो अप्राप्य होकर मनमें क्षोभको उत्पन्न करता है, वही एक ही घोड़ा है; नेत्र आदि प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय ही उस अधरामृत ही व्रजकी नारियोंका मूल धन है ॥ 15-23 ॥