भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2394

[ 15/14-19 पन्द्रहवाँ अध्याय 377 हैं, जो कानोंको आनन्द प्रदान करनेवाले नर्म-रमणीय वचनोंसे युक्त होकर करोड़ों चन्द्रमाओंकी भाँति शीतल हैं और जिन्होंने सौरभरूपी अमृत-सागरके द्वारा जगत्‌को आवृत किया है एवं जो अमृतसे पूर्ण अधरोंसे युक्त हैं, हे सखि, वही गोपेन्द्रनन्दन कृष्ण मेरी पाँचों इन्द्रियोंको बलपूर्वक आकर्षित कर रहे हैं॥14॥ अनुभाष्य— हे आलि, (सखि,) यः सौन्दर्यामृतसिन्धुभङ्ग- ललनाचित्ताद्रिसंप्लावकः (सौन्दर्यम् एव अमृतसिन्धुः तस्य सुधारण्वस्य भङ्गैस्तरङ्गरूपैः जलच्छाताभिः ललनानां चित्तरूपाद्रिं सं सम्यक् प्लावयितुं शीलं यस्य सः) कर्णानन्दिसनर्मरम्यवचनः (कर्णम् आनन्दयितुं शीलं यस्य ततेन नर्म स्मितेन च सह रम्यं वचनं यस्य सः) कोटीन्दुशीताङ्गकः (कोटिचन्द्रात् अपि शीतं सुशीतलम् अङ्गं यस्य सः) सौरभ्यामृतसंप्लवावृतजगत् (सौरभ्यमेव अमृतं तस्य संप्लवः सागरः तेन आवृतम् आच्छादितं जगत् येन् सः) पीयूषरम्योधरः (पीयूषतः अमृतादपि रम्यः अधरो यस्य सः) सः श्रीगोपेन्द्रसुतः (ब्रजेन्द्रनन्दनः) बलात् (प्रसभेन) मे (मम) पञ्चेन्द्रियाणि (चक्षुकर्ण- नासाजिह्वात्वगादीनि) कर्षति (स्व-रूप-वंशीध्वनि-सौरभ्यास्वाद- स्पर्शादिषु नयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥14॥ अमृताणुकणिका—श्रीचैतन्यचरितामृतमें इस श्लोकका वर्णन है और शीर्षकमें इस श्लोकको श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीकृत श्रीगोविन्दलीलामृतसे उद्धृत कहा गया है। तो इसके रचयिता कौन हैं? श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने महाप्रभुके अप्रकट होनेके अनेक वर्षोंके उपरान्त श्रीगोविन्दलीलामृतकी रचना की थी। किन्तु यहाँ वे कह रहे है कि महाप्रभुने इस श्लोकका उच्चारण किया, इसलिये यह श्लोक उनका अपना नहीं है। मूलतः यह श्लोक महाप्रभुने श्रीराधा-भावमें विभावित होकर कहा और उसको श्रीस्वरूप दामोदरने अपने कड़चेमें लिख लिया। श्रीस्वरूप दामोदर बहुत आश्चर्य-चकित होकर श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको सुनाते हुए इस श्लोकामृतका पान करवा रहे हैं कि देखो! आज महाप्रभुने इस श्लोकका पाठ किया है और इसका इतना सुन्दर अर्थ किया है, जिसकी जगत्‌के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते। श्रीगोविन्दलीलामृत वर्णन करनेकी अथवा श्लोकका अर्थ अर्थात् उसकी व्याख्या करनेकी शैली, श्रीकृष्णदास कविराजने कहाँसे प्राप्त की? उन्होंने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीसे यह शैली सीखी। बादमें वृन्दावनमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने उस श्लोकको श्रीकृष्णदास कविराजको सुनाया, तब श्रीकृष्णदास कविराजने इस श्लोकको श्रीगोविन्दलीलामृतमें लिखा।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी”॥14॥ गोपीके द्वारा अप्राकृत पुष्पबाणके माधुर्यबलका वर्णन (चित्रजल्प) :— “कृष्ण-रूप-शब्द-स्पर्श, सौरभ अधर-रस, यार माधुर्य कहन ना याय। देखि’ लोभे पञ्चजन, एक अश्व—मोर मन, चड़ि’ पञ्च पाँचदिके धाय॥15॥ पुष्पबाणसे आकृष्ट गोपियोंकी इन्द्रियाँ :— सखि हे, शुन, मोर दुःखेर कारण। मोर पञ्चेन्द्रियगण, महा-लम्पट दस्युगण, सबे कहे,—हर’ परधन॥16॥ध्रु॥ गोपियोंकी कृष्णाधीन अवस्था :— एक अश्व एकक्षणे, पाँच पाँच दिके टाने, एक मन कोन् दिके धाय? एककाले सबे टाने, गेल घोड़ार पराणे, एइ दुःख सहन ना याय॥17॥ श्रीकृष्णके रूप-माधुर्यका बल :— इन्द्रिये ना करि रोष, इँहा-सबार काँहा दोष, कृष्णरूपादिरे महा आकर्षण। रूपादि पाँच, पाँचे टाने, गेल घोड़ार पराणे, मोर देहे ना रहे जीवन॥18॥ कृष्णरूपामृतसिन्धु, ताहार तरङ्गबिन्दु, एकबिन्दु जगत् डुबाय। त्रिजगते यत नारी, तार चित्त-उच्चगिरि, ताहा डुबाइ आगे उठि’ धाय॥19॥