श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें376 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/6-14 ] अनुभाष्य—'कुमाररेर चाक',—घड़े आदिके निर्माणके समय जिस प्रकार कुम्हारका चक्र पहले दिये गये बलसे अपने आप घूमता रहता है, सब समय उसको हस्तस्पर्श नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार महाप्रभुकी दैहिक समस्त क्रियाएँ बाहरीरूपसे चेतनता नहीं रहनेके समय भी स्वभाववशतः सम्पन्न होती थीं। मुक्त, सिद्ध अर्थात् उत्तमाधिकारी महाभागवतके प्रपञ्चमें प्रकटित रहते समय उनके दैनिक कृत्यादिकी सुन्दर उपमाओंके रूपमें ब्रह्मसूत्र और उसके सर्वश्रेष्ठभाष्य भागवतमें इस विषयकी बहुत-सी कथाएँ हैं॥6॥ श्रीजगन्नाथरूपी श्रीकृष्णके प्रति आकृष्ट महाप्रभुकी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीगोविन्द-सेवा :— एकदिन करेन प्रभु जगन्नाथ-दरशन। जगन्नाथे देखे साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन॥7॥ एकबारे स्फुरे प्रभुर कृष्णेर पञ्चगुण। पञ्चगुणे करे पञ्चेन्द्रिय आकर्षण॥8॥ एकमन पञ्चदिके पञ्चगुण टाने। टानाटानि प्रभुर मन हैल अगेयाने॥9॥ अनुवाद—एक दिन जब महाप्रभु भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन कर रहे थे, तब उन्हें श्रीजगन्नाथमें साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन दिखायी देने लगे। महाप्रभुके सामने एक साथ ही श्रीकृष्णके पाँचों गुण स्फुरित हुए और ये पाँचों गुण उनकी पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करने लगे। महाप्रभुके एक मनको श्रीकृष्णके पाँच अप्राकृत गुण पाँच दिशाओंमें खींचने लगे, इस प्रकारकी खींचातानीसे महाप्रभुका मन अचेतन हो गया॥7-9॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पञ्चगुण',—नेत्रोंसे रूप, कानोंसे गीत, नाकसे घ्राण, जिह्वासे रस और त्वचासे स्पर्श,— कृष्णके इन पाँच अप्राकृत गुणोंने अप्राकृत पाँच इन्द्रियोंमें एक ही साथ स्फूर्त्ति प्राप्त की। मनको इन पाँचों विषयोंमें एक ही समयमें खींचनेपर मन अचेतन हो गया॥8-9॥ भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको घरमें लाना :— हेनकाले ईश्वरेर उपलभोग सरिल। भक्तगण महाप्रभुरे घरे लञा आइल॥10॥ अनुवाद—उसी समय भगवान् श्रीजगन्नाथका उपलभोग सम्पूर्ण हुआ, भक्तगण महाप्रभुको पकड़कर उनके घरपर ले आये॥10॥ स्वरूप, रामानन्द,—एइ दुइजन लञा। विलाप करेन दुँहार कण्ठेते धरिया॥11॥ अनुवाद—उस रात्रिमें महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायके गलेमें अपने हाथोंको डालकर विलाप करने लगे॥11॥ कृष्णेर वियोगे राधार उत्कण्ठित मन। विशाखारे कहे आपन उत्कण्ठा-कारण॥12॥ सेइ श्लोक पड़ि' आपने करे मनस्ताप। श्लोकेर अर्थ सुनाय दुँहारे करिया विलाप॥13॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके वियोगमें श्रीराधिकाका मन उत्कण्ठित होनेपर उन्होंने एक श्लोकके द्वारा श्रीविशाखाको अपनी उत्कण्ठाका कारण बतलाया था, उसी श्लोकका पाठ करते हुए अपने मनके तापको दिखलाने लगे और विलाप करते हुए उस श्लोकके अर्थको श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायसे कहने लगे॥12-13॥ कृष्णके विग्रहके माधुर्यके बलकी आकर्षण-क्षमता :— गोविन्दलीलामृत (8/3)में विशाखाके प्रति श्रीराधाके वचन— सौन्दर्यामृतसिन्धुभङ्गललना-चित्ताद्रिसंप्लावकः कर्णानन्दि-सनर्मरम्यवचनः कोटीन्दुशीताङ्गकः। सौरभ्यामृतसंप्लवावृतजगत् पीयूषरम्योधरः श्रीगोपेन्द्रसुतः स कर्षति बलात् पञ्चेन्द्रियाण्यलि मे॥14॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥14॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो सौन्दर्यके अमृतसिन्धुप्रवाहमें नारियोंके चित्तरूपी पर्वतको सम्पूर्ण रूपसे डुबो देनेवाले