श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2392, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय कथासार-उपभोगके बाद महाप्रभुमें विलाप उपस्थित हुआ; [जगन्नाथमें] कृष्ण-रूपका भाव उदित हुआ। कृष्णके अदर्शनसे रासकी रात्रिमें गोपियोंने जिस प्रकार वन-वनमें कृष्णको ढूँढ़ा था, महाप्रभुमें भी वे समस्त भाव उदित होने लगे। श्रीस्वरूप गोस्वामीके द्वारा गीतगोविन्दसे एक गान करनेपर महाप्रभुमें भावोदय, भावसन्धि, भावशाबल्य और अष्टसात्त्विक विकारादि उदित होकर परम-आस्वादनके विषय बन गये। समुद्रके तटपर स्थित उपवनको देखकर वृन्दावनकी स्मृतिके उदित होनेसे ये सब भाव प्रबलरूपसे उदित होने लगे। -(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीकृष्णविरहरूपी महाभावसागरमें निमग्न महाप्रभु :- दुर्गे कृष्णभावाब्धौ निमग्नोन्मग्नचेतसा। गौरेण हरिणा प्रेममर्यादा भूरि दर्शिता ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[अक्षजज्ञानके वशीभूत ब्रह्मादि देवताओंके लिये] दुर्गम कृष्णभावसमुद्रमें निमग्न होकर तन्मय चित्त गौरहरिने अनेक प्रकारकी प्रेम-मर्यादा दिखलायी थी॥ 1 ॥ अनुभाष्य- दुर्गमे (ब्रह्मादीनां सूरीणामपि अक्षजज्ञानवशात् दुर्विगाहे) कृष्णभावाब्धौ (कृष्णभावरूपसिन्धौ) निमग्नोन्मग्नचेतसा (निमग्नम् उन्मग्नञ्च चेतो यस्य तेन) गौरेण हरिणा (गौर-हरिणा कृष्णचैतन्येन) प्रेममर्यादा (प्रेम्णः मर्यादा) भूरि (सुबहुलं) दर्शिता (प्रकटीकृता)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य अधीश्वर। जय नित्यानन्द पूर्णानन्द-कलेवर ॥ 2 ॥ अनुवाद-अधीश्वर श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। पूर्णानन्द स्वरूप कलेवरसे युक्त श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो ॥ 2 ॥ जयाद्वैताचार्य कृष्णचैतन्य-प्रियतम। जय श्रीवास-आदि प्रभुर भक्तगण ॥ 3 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुके अत्यन्त प्रिय श्रीअद्वैताचार्य प्रभुकी जय हो, महाप्रभुके भक्त श्रीवास पण्डित आदिकी जय हो॥3॥ अप्राकृत श्रीकृष्णविरहके प्रेमावेशमें अचैतन्य :- एइमत महाप्रभु रात्रि-दिवसे। आत्मस्फूर्त्ति नाहि कृष्णभावावेशे ॥ 4 ॥ अनुवाद-इस प्रकार रात-दिन कृष्णप्रेमके आवेशमें महाप्रभुको अपना कोई ज्ञान नहीं होता था ॥ 4 ॥ अन्तर्दशा, अर्द्धबाह्यदशा और बाह्यदशा :- कबहु भावे मग्न, कबहु अर्द्ध-बाह्यस्फूर्त्ति। कबहु बाह्यस्फूर्त्ति,-तिन रीते प्रभुस्थिति ॥ 5 ॥ अनुवाद-महाप्रभु तीन प्रकारकी अवस्थाओंमें रहते थे-कभी अन्तर्दशामें वे भावमें पूर्णतया मग्न, कभी अर्द्धबाह्यदशामें और कभी पूर्ण बाह्यदशामें रहते थे ॥ 5 ॥ स्वभाव और अभ्यासवशतः नित्य-नैमित्तिक क्रियाओंका अनुष्ठान :- स्नान, दर्शन, भोजन देह-स्वभावे हय। कुमारेर चाक येन सतत फिरय ॥ 6 ॥ अनुवाद-भावाविष्ट महाप्रभुका स्नान, दर्शन और भोजन आदि करना देहके स्वभाववशतः स्वतः ही होते थे जैसे कुम्हारका चक्र एक बार घुमा देनेपर बहुत देर तक अपने आप चलता रहता है ॥ 6 ॥