भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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394 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/5-13 ]

[Left Column] श्रीकालिदासके गुण :- महाभागवत तैं हो, सरल उदार। कृष्णनाम 'सङ्केते' चालाय व्यवहार ॥6॥ अनुवाद-उन गौड़ीय भक्तोंके साथ श्रीकालिदास नामक एक भक्त भी आये। वे श्रीकृष्णनामके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं जानते थे। वे महाभागवत, सरल और उदार थे, वे श्रीकृष्णनामके संङ्केतके द्वारा ही अपने सब कार्य करते थे ॥5-6॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृष्णनाम 'सङ्केते' चालाय व्यवहार,'- श्रीकृष्णनामके सङ्केतके साथ (अपने) व्यवहारिक कार्य आदिका निर्वाह करते ॥6॥ कौतुकेते तैं हो यदि पाशक खेलाय। 'हरे कृष्ण' 'हरे कृष्ण' करि' पाशक चालाय ॥7॥ अनुवाद-श्रीकालिदास कौतुकसे भी यदि पासा खेलते, तो वे पासे भी 'हरे कृष्ण' 'हरे कृष्ण' कहकर ही चलाते थे॥7॥ अनुभाष्य-श्रीकालिदास विष्णु-वैष्णवमें पूर्ण समर्पित आत्मा, श्रीकृष्णका अनन्य भजन करनेवाले और अप्राकृत श्रद्धायुक्त थे। उनकी श्रीकृष्णनाममें निष्ठाका अनुसरण नहीं करके, कोई अनर्थयुक्त जीव यदि केवल अपनी इन्द्रिय-तृप्तिके लिये उनके बाहरी व्यवहारको (पासा खेलनेको) देखकर उनकी वञ्चना-लीलाका अनुकरण करके कभी पासा (जुआ) खेल आदि वृथा व्यसनमें आसक्त होता है, तो फिर (भाः 1/18/38-41 श्लोकके अनुसार) उसकी कलिके दासत्व-हेतु पाप अथवा अधर्म-प्रवृत्ति ही वर्धित होगी। बाहरसे श्रीकालिदासके जैसे नामोच्चारणका अनुकरण और चेष्टाएँ रहनेपर भी उसकी उस नामोच्चारणके अनुकरणकी चेष्टा ही नामके बलपर पापमें प्रवृत्ति हेतु वह नामापराध ही होगा। जगत्के शिक्षित, संयत और सत्-चरित्र व्यक्तियोंके द्वारा धर्मके नामपर उसकी इस प्रकारकी दुर्नीतिपर आधारित कपटताकी निन्दा होगी॥7॥

[Right Column] वैष्णवोंके उच्छिष्टका भोजन करनेवाले श्रीकालिदासका पूर्व-परिचय :- रघुनाथदासेर तैं हो हय ज्ञाति-खुड़ा। वैष्णवेर उच्छिष्ट खाइते तैं हो हैल बुड़ा ॥8॥ महासौभाग्यवान् श्रीकालिदासकी वैष्णवोंके प्रति अद्वितीय सेवाप्रवृत्तिके कारण महामहाप्रसादमें विश्वास :- गौड़देशे हय यत वैष्णवेर गण। सबार उच्छिष्ट तैं हो करिल भोजन ॥9॥ ब्राह्मण-वैष्णव यत-छोट, बड़ हय। उत्तम वस्तु भेट लञा ताँर ठाञि याय ॥10॥ ताँर ठाञि शेष-पात्र लयेन मागिया। काँहा ना पाय, तबे रहे लुकाञा ॥11॥ भोजन करिले पात्र फेलाञा याय। लुकाञा सेइ पात्र आनि' चाटि' खाय ॥12॥ अनुवाद-श्रीकालिदास सम्बन्धसे श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चाचा थे, वे सारा जीवन वैष्णवोंका उच्छिष्ट खाते-खाते हुए ही वृद्ध हुए। गौड़देशमें जितने वैष्णव-गण हैं, श्रीकालिदासने उन सबके उच्छिष्टको खाया था। वे छोटे-बड़े समस्त ब्राह्मण-वैष्णवोंको भेंट देनेके लिये उत्तम वस्तुएँ लेकर उनके पास जाते और उन वैष्णवोंसे उच्छिष्ट माँगकर ले लेते। यदि उन्हें कहींपर माँगनेपर भी उच्छिष्ट नहीं मिलता, तो वे उस वैष्णवके घरके आस-पास छिपकर रह जाते। जब वैष्णव लोग भोजन करनेके बाद अपने जूठे पत्तलोंको फेंककर जाते, तब श्रीकालिदास उन वैष्णवोंकी अनुपस्थितिमें छिपकर उन पत्तलोंको उठाकर उनपर लगे भोजनको चाट-चाटकर खा जाते॥8-12॥ अनुभाष्य- 'ब्राह्मण-वैष्णव,'-शौक्र-ब्राह्मण कुलमें जन्में वैष्णव ॥10॥ श्रीकालिदासकी वैष्णवोंमें जातिबुद्धि नहीं :- शूद्र-वैष्णवेर घरे याय भेट लञा। एइमत ताँर उच्छिष्ट खाय लुकाञा ॥13॥