भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2414, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2414

[ 16/17-19 ] सोलहवाँ अध्याय 397

भगवद्भक्त चण्डाल भी श्रेष्ठ है और इससे भी कोई यह ना माने कि ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न वैष्णवसे चण्डाल कुलमें उत्पन्न वैष्णव छोटा है। जड़ स्मार्त्त विचारके वशीभूत होकर अनेक लोग मिट्टीके अर्जाविग्रहको स्वर्ण-प्रतिमासे छोटा मानकर भगवान्‌के चरणोंमें अपराध करते हैं। इसलिये 'मिट्टीके गौराङ्ग', 'सोनेके-गौराङ्ग' नाम दिया है। श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीकी अपेक्षा श्रीरघुनाथ दास गोस्वामीको छोटा मानकर वे दोनोंके चरणोंमें अपराध करते हैं। श्रीभगवान्‌की अङ्गकान्ति या शक्तिमानकी निशक्तिक प्रतीति ही ब्रह्म प्रतीति है और जड़के मध्य अनुप्रविष्ट भगवदंशकी अनुभूति ही परमात्म अनुभूति है। ब्रह्म और परमात्म प्रतीतिको क्रोड़ीभूत करके ऐश्वर्य और माधुर्यके पूर्ण विकासके सहित सम्पूर्ण दर्शन ही भगवद्दर्शन है। इसलिये जो भक्त या वैष्णव हैं, वे एक ही साथमें ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण और परमात्मविद् योगी हैं; अर्थात् जो लखपति हैं, वे हजारकी और सौकी मुद्राके भी अधिकारी हैं। जैसे लखपतिको यदि कहा जाय कि तुम्हारे पास हजार रुपये या सौ रुपये नहीं है, तो यह पागलके प्रलापके भाँति ही है। उसी प्रकार यदि भगवद्भक्तको कहा जाय कि 'तुम भक्त या वैष्णव हो, किन्तु ब्राह्मण नहीं हो', तब यह बात भी उसी प्रकार हास्यास्पद है। सभी जीव स्वरूपतः भगवान्‌के दास हैं। जिन सब जीवोंमें यह अन्तर्निहित दास्यवृत्ति जाग्रत होती है, आचार्य उनको ब्राह्मण कहकर निर्देश करते हैं। इसलिये वैष्णवमें सगुण ब्राह्मणता तो छोटी सी बात है, निर्गुण ब्राह्मणताका भी अभाव नहीं है—वह पूर्णभावसे विराजित है। निर्गुण ब्राह्मणताकी चरम परिणति ही वैष्णवता है। इसलिये ही श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने लिखा है (चैःभाः मध्यखण्ड दसवाँ अध्याय)— “ये ते कुले वैष्णवेर जन्म केने নহে। तथापिहे सर्वोत्तम सर्वशास्त्रे कहे ॥ 100 ॥ ये पापिष्ट वैष्णवेरे जातिबुद्धि करे। जन्म जन्म अधम योनिते डुबि मरे ॥ 102 ॥” [किसी भी कुलमें वैष्णवका जन्म क्यों न हुआ हो, तथापि वह सर्वोत्तम है, यही समस्त शास्त्रोंका कहना है। जो पापी वैष्णवोंमें जातिबुद्धि करते हैं, वे जन्म-जन्ममें अधम योनिको प्राप्त करते हैं।”] भगवद्भक्तगण अनेक समय स्वरूपके अणुत्वकी उपलब्धि करके कहते हैं,—जैसे श्रीहरिदास ठाकुरने कहा (चैःभाः मध्यखण्ड 10/59)— “निर्गुण अधम सर्वजातिबहिष्कृत।” [“मैं गुणहीन, अधम और अन्त्यज नीचजातिका हूँ।”] अथवा श्रीसनातन गोस्वामीने सर्वोच्च कुलमें जन्म लेकर भी कहा (चैःचः मध्यलीला 20/99)— “नीच जाति, नीच-सङ्गी, पतित अधम।” [“मैं नीच जातिका, नीच लोगोंका सङ्ग करनेवाला, अधम पतित हूँ।”] अथवा श्रील नरोत्तमदास ठाकुर महाशय कहते हैं— “अधम चण्डाल आमि, दयार ठाकुर तुमि।” [मैं तो अधम चण्डाल हूँ और आप परम दयालु ठाकुर (स्वामी) हैं।”] भगवद्भक्तोंकी ये सब स्वाभाविक दीनताकी बातें प्राकृत बुद्धिसे ग्रहण करके जड़बुद्धिसम्पन्न व्यक्ति कहते हैं—'ये अपने-अपने नीच जातित्वका परिचय अपने ही मुखसे दे रहे हैं, इसलिये ये नीचजातिके हैं।' किन्तु ये सब जड़बुद्धिसम्पन्न अपराधी व्यक्ति भगवान्‌के द्वारा अपने मुखसे कही बातको नहीं सुनते, जैसे उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरसे कहा—'तोमार ये जाति, सेइ जाति मोर दृढ़ ॥' तुलसीदासजीने भी कहा है— “ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सब कोइ करत विचार तुलसी कहे, हरि ना भजेत चारो चमार ॥ हरि भजे त चारो जात मिल्के एक हो जाय। अष्टधातु से परश लागाओये एक मूलसे बिकाय ॥” चारों जातियोंमें-से किसी भी जातिमें क्यों न हो,